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Full text of "Shri Ramcharit Manas"

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ता चपा लत ४ 
मिस गर 


उ० २००४ प्रथम्‌ वर ३०००० 
सै २००५ द्वितीयं कर १८०००. 


मूलय श) रीन रषा अऽ भाना 


मिर्नेकापहा-- 
सी क्त्रि म॒,गोष्तु र 


॥ श्रीहरि ॥ 


भरथम्‌ संस्करणका निवेदन 


शरीरमचरितमानसका धान दिदी-साहित्यमे हौ नह, नगतके सिये 
निर्न है | इतके जोढका, दसा ही सर्वद. उत्तम काये वेत 
युक्त साहित्ये समो "सोक आलादन कठनेवाक, काव्यकखाक्र शते मौ 
स कोदिका तया आदरं गरहल्यःजीवन, शद रज्र परिक 
ओवन, आदद पातितम, भादरं मातपमके साय-साय स्वो भकतिनरान, वयग 
चाय तथा सदाचारफी रिष देते, वीरुप, व्क. भौर उवा-- 
सरके ल्थि समान उपयोगी एत्र. सर्वोपरि संगुण-साकर मबान्‌कती आदश 
मानवलीखा तथा उनके गुणः प्रभाव, रहस तया प्रेमे "गहन तत्तो अत्यन्त 
`सरढ, रेचक श्वं शञल्वी श्देमर न्य फेनम कोर दूसरा ग्रथ िवी- 
"मप ही नही, कदाचित्‌ 'घंाकी फी मपे आजतक नही छा गया । 
यदी काएण है कि मिस चावस गरोत-भभोर, रिषित-अरिषित, गृहस्थ-न्यासी, 
लुप, गच्छ --समी परणीके लेग हर भर्यवो पदे ह) ऽते से 
धौर किसी ्रन्थको नहीं पडते तया मकि, शन, नीति, सदाचार्का'भितना 
प्रचार जनतामें इ भरन्यते इग दै, उतना कदाचिद्‌ थौर किप अन्धे 
मषी हभ | "५ 


जिस न्यक जगत स्तना मान हो, उसके अनेकों संस्करणोक्षा छना 

तथा उसपर अनेवों दीकायोंका छिला जाना छामा ही है | श्त नियमके 
अतुपार रामचरिःमानस्के भी आयत सकं संसकाएण छप के दै । इपर 

` सैको हौ दीका ज्जा दुक है । हमरे गताशुल्फो रमावणः 
, सम्बन्धी ५०० प्रन निनर-पित्र भारक भां चुके | अवते अनुमानतः 
इकी शौ प्रतिय छ्य पकी होगी । अद-दिन हतक एकन-एकं नया 
संस्करण देगेको मिव्ता है ओर उस अनव संस्सणोरी यपे्षा कोरैन-कोँ 


„-{ ४) 

"स । 
प्रित बद रती है ! इ परे न्धो भी रमवणी विदि वः 
मतमेद्‌ है, यौतक कि व खलम तो अदेव चपा एक-न-एक पाठभेदः 
मिनित संकरेण मिलता ह । भितने पद इ पन्ये मिते है, उतने 
कवृनित्‌ भर किसी प्न परथते नही परते ] दते 9 इसकी सर्वोपरि 
लेकर पि हेती है 


इम भिरित रमचलिमनस एक अलीवदालकं प्न्य है | इवे 
प्रेम पवको श्द लेग मंत्‌ आदः दते है ओै इते पण्डे जैविक 
एं परसि भनेर वा सिद कते है । षी नही, इतका श्र्पूवक पाठ 
भो ठम रतं इर उदो जारः मम के एवं के 
दुघ शच कलेते तथ श्छ वर्मित गवानी मुर रीयभोका 
विनत एं धरत कोते गस पर पुय एवं उत मी प्क 
मा्मम श्रति भनी जा सतो है । भ्यो न हे, निस प्यक 
सवना गला ठस्दासी-ैरे अनन्य भगदरच्े ्रार, बिन्धेने मान्‌ 
तमनो कपि दतकी दिय रोजा प्रयु जतुमब क यया 
सफ गमन किष द, रषत्‌ पपत. श्तीरद्ीव अददे ह ठप 
जिसपर उद मारले श्वय शिवे घुनद््‌ छिव अने ष्ठे सही की) 
उपक इ कतस जीवित प्रत्र कोट अश्वक बत नही है । देती 
यप ए अलिक पर्क निता मी प्रचार किया जायगा, बितना अधिकं 
पतान ए मनन-तटन शो, उतमा हौ जातक गदगर होग- - 
व ननि गी सले मही है वमन समये ते, जव सत्र हाहाकार 
मा हुआ ई, मर संत दृ" ए अनति भीषण जले अ णा है, 
, ममत केवोनेे भरट मवी इ हे ओर प्रिदिन हनारे मतुका 
वि ष्टा है. करेशअलेकी सम्पति एकक पिनाके स्थि स्व 

किन पी कि पूष्वीको शानके सपमे परिणति 
६, से येने मसि संहारे नपेणये सनोर 
मे गत £, जगं ढन्ति ए का परत कले तया 







{६५ 

इसी दृ्टिते मीताकी मति मानक भी कई हेटे वे, शद्ध, प्रामाणिक) 
सस्ते सवित्र एवं सटीक संस्करण निकाल्नेका आयोजन भोतप्रसके द्वारां 
्िजा दा है । इस दिम सरप्यम प्रयास आजसे गम आठ व पू 
ङ्का था, जव निं श्रीरामचरितिमानसका एक सटीक एवं सचत सस्करणं कदे 
परमम प्राचीन परतियकि आघापर तैयार किया जाकर अन्य उपयोगी 
साम्रीके साथ 'ल्याण्के विरोधके रूपमे प्रकादित किया गया या } उर 
अहुत-सी रिवो हयनेपर्‌ भी मानसम जनताने उपतका कितना आदर किया, 
यह स्र छोरगोको विदित ही दै । कु ही वमिं उसके आठ संस्करण छपे 
ओर ७८,६०० प्रतियां त्रिक गयी | वीचय श्रीसीतारमजीकी श्पासे एक मूख 
शुण्का भी छप गया, जिसुकरे छः वषे थृदर दस सकण शवं दो लव पै 
इजा प्रतियौ छ्प चुकी है । युवे यदप छट होनेके कारण एक संस्र 
पुखकाक्मर भङषखी साज छपा गया, जिसके दो सामे तीन संस्करण चछ्यै 
ओर ४५२५० प्रतिय विकीं । शके अतितिति मोटे यप यू 
रामचस्तिमानसका एक भलेचनामक संस्करण मी तिका गया, निस कई 
आचीने एवं अव॑चीन प्रतयोके पाठमेदोको देते हए तत्र पादम 
अपने पाकी साुताको दतुपूक सिद्ध किया गधा तथा मानसक्ी माकको 
सम्म विषा हो-सव्ि मानसका एक संक्षि व्याकरण गी उरग गोद 
दिया गया । शृ संस्करणका दाह्य भोग होने तया अधे" दर्जनते अधिक 
दर न्धो चित्र, मानसन्यकःण, पठमेद एं पादुटिथणी आदि रहनेके 
कारण उसका मूल्य २॥) सा गया था । ४ 

हस प्रकार पिठरे $ कभ म -गमचरितमानसके'तो / क 

संस्करण निकले; वितु मानसाद्के अतिरि सदीके सत्क केच एक ही, 
त्छका, जो बहत भोटे टाप्मे है, निकल पाया । उसके {यहम बूत 
दनेके कारण उसकी धृष्ठसंलया १२०० हो गयी । दो संत्करणेमि 
उसकी १३१२९५० प्रतिय छम की है । दूसरे संकर > ७) 
ह संस्करण भी प्रायः समाप्त हो युका है । मनस्क स्के 
कारण सर्गोको मिखता नही था ओर मोटे यदपकी कीमत 
कम दमम एक सटीक सस्करणकी बड़ी आदरव्कता थौ) 
यह प्रयास है । 


(६) 

ह दि चैह इ जथ दिवा गया है, जो मेरे द्वाली 
प्रति ह। पठ एवं भवी भूखे स्थि $ कह महातमपि कषमा््ना 
का र मावच्छी चतु विन भानो ^ ्। 

-- 
हनुमानप्रसाद पोदार 
दूरे संखरणका निवेदन 

देशी को शरिरे यन्त कठिनताके कार इष॒ धार पुस्तक विदेरी 
कग्मोपर छपी गणी है ओर उपल कागजोकी सनक अतुः प्रन्को सादज 
भी हषण सोच वद्वर मं ष्येजो हो गवी है| 

` यपि वरदौ कगलकि दाम दीक पक्षा अधिक रगे है, किमी 
रन्धका पूतय न वाया भया है । - 
प्रकाशक 





पहरि ॥ 
श्रीरामचरितमानसकी 


विषवषी 





ए-ंस्वा ¡ विष्य 








दिव" शस्य 
ई-नवाहमारयणके निभाम-खान ९४ | २९-शिवनीदाय सतीका त्याग, 
र्-मासपारायणके विभाम-खान १४ धिग्नीकी समाधि ४४ 
ङ-गोखामी इल्पीदासनीकी २४-उतौका दश्ष-य्मे जाना -*" ५१ 
शृक्षित नीयनी `~ `" २५ | २४-पतिके भपमानते दुखी होकर 
" ४-भीरामरलका प्रभावली "ˆ १९ सेतीका योगागरसे ड बाना 
प-पारायणविधि. , ^" २१ दकः विष्वंस "६९ 
बारकाण्ड २५-परवतीका जन्मथौर रस्या ५१ 
(मङ्गलाचरण *"" १ |` २६-शरीरामधीका धिवर िबाह- 
७-रार-बन्दना र केिमिजनुरोष "ˆ, -"" , ५९ 
\ ' ८-नाह्मण-सेतवन्दना ३ रश-स्र्पिवौकी परीमं परवती. 
ई-तलवन्दना * ““ ५ जीका महत्त `“ “६० 
१०-संत.असंत बन्दना ६ | २८-कामदेवका देवकार्ये ल्थि ः “ 
श१-पमरूपते जीवमावकी बन्दना ९ जना शौर मए होना ˆ“ ६१ 
पर पलसीासजीकी दीनता जीर २९-पतिक्रो इदान "` “'* ६७ 
राममक्तिमयी कमिताकी भदिमा ९ | २०-देवतांा शिवे भ्या्के 
शद-कवि-न्दना “",. "` ,५ व्िग्रयना करना, सतपि 
१४-बस्मीमि, ददः नहमारदेकताः कापा प्रस जाना ““* ६७ 
शिकः पर्वती मादक पद. ,१६ |. .२९-रिवलीदी भिवित्रवारावओर 
विवाहकी.दैवारी 4 
बन्दना "` “;“ १७ १९-धिवरीका विवार 
शः गीर ज, १९ | स-व 
क ॥ 
वि शछ-भीरामगुणे जौर्‌ शीराम- ३८-अच्दाके ह क श 
† चऋरितकी महिमा | -५-न्दका अभिमान ओर 
१८-मानसनिमांणकी तिथि ~` *३१* ,मायाद् परमाव ४ 
१९-भानसका सपक योर माहात्य ३२ | .र६-विश्गोहिनीका सव॑बर 
२०-यावसवय-मण्डान-ठंबाद शिवगर्थक ठया मगवानकोः = 
~ “ ` हिया प्याग-मा्षस्य -" २९, | ; ` आए ओर नारदच् सोहमज्गं ९६ ` 


'९१-सतीका भम, श्रीरामदीका 
रेशर्वगजोर्ववीका सेद "`` ४१ 


२७-मनु-श्तर्पानतप एं वरदान; 
द८-मातुप्पकी कथा = "““" ११० 


।. 


३९-वणादित्र जन्यः तपा 
ओर उस्न देवं तया 


अल्ाचार्‌ ˆ" "““ १२४ 
४०-यृ्ी शौर देवतादिकी करम 
पुकार `" १३० 


अश्-मगवान्‌क्त वरदान ``" १३२ 
रराज दनरथक परे य्ः 
रानिर्ोक्र मरमवती दोना "** १३४ 
४६-शरीमगवानका माक्व्व ओर 
वा्छीलाका यानन्द्‌ ˆ` १३५ 
४४-विशवामि्रका राला द्दारथते 
रागमणक मगना *"* ९४६ 
४५-िशवागि्ि-यरकी रा --" १४८ 
४६-आत्यउदरर """ १४८ 
४७.शरीरमःदक्लणसदतिश्वामिष- 
“* क्र जनक्रपुस प्रेद “-* १५० 
४८. भीगाम॑लकमणको देखकर 
जनकगीरी प्ेमुग्बता " '" । 
, ४९-भरीरम-खत्मणकरा जनकपुर 
निरीक्षण [िि ) 
५०-पुष्पवारिकानिरीन्नणः सीवा- 
जीका प्रयम द्॑न भी- 
मीताएमजीका परस्पर दैन १५९ 
५१-भीरीताजीका पर॑ती-पूजन 
एवं करदानपाधि तथा राम- 
रषमग-षाट +) 
५र्-श्रीराम-्मणसदित विशवामित्- 
का यशवनात्ममे अतय १६८ 
प३-भरीसोताडीका यशा 





य ~~ १७५ 
भष~ना्ेि रुप न उना, 
अनी निरामकः वाणी १७५ 











५७-भण्मह 
५८-जयमा पएहनाना 
५९-अररम-मण ओर परमः 

संवाद """ १८८ 
६०-द्यरयनीके एत जनक्रवीका 

दूतमेनना, अयोव्यति वरत 

क ग्रान "*" १९८ 
६ -वारातकरा जनकपुरमे साना 

ओर सागतादि "" २०९ 
६रे-भीरीता-राम-बिद ˆ" २९१ 
६३-वारातका अयोध्या लीदना 

शरीर चवोष्याये सानन्द "ˆ` ९३९ 





-“६म-महचएण =“ =" २५३ 
६६-रामरा्बामिपेककी तैयारी, 
देवतार्भोकी व्याकुरुत तथा ` 
उरते उनकी मा्थना २५५ 
द७-उस्तीका मन्धाकी बुद्धि 
केना, कैकेयी-मन्धरा-्ाद्‌ २६१ 
६८-कैिवीका ऊोषमवरमे जाना २६७ 
६९-ददरय-ेयी-संगद चौर 
दव्ररथ.शोकःघुमन््का महल. 
म जाना ओर बसे सैरकर 
भीसमर्जक्ो हरमे भवना“ २६९ 
४०-अीयमकेवीवाद "` २७८ 
७-शरीरामदरथ-तंवाद, अवध- 
मिका विषादः कैकेवीफो 
खमटाना = "~ 


[^ 
७र्-भीरमन्ैससयानठाद -"" २८द्‌ 
७-ीरीवा-यम्तवाद्‌ `" २९१ 


७४-पीमनीतवा-सीव परार २९६ 


(९) 


विषय एष-तंस्या | विय षस्य 
७५भीरमपमववाद “" २९७ | ९२-वचषमरतसादः श्ीरयनी- 
७प-ील्दमण सुमिना-सेवाद "* ` २६९ रो खनके िथे विकर 

७७-भीरागनी, वकमणी, सीता- जनेकी तैयारी " ३६२ 
ओकरा महाराज द्वारयके पास ९६-अवोष्यावासिये दिद ्ीमरत- 

बिदारमोगने जाना, द्यरथनी- इतुष्न आदिका वन-गमन ३७० 


का सीताजीको समन्लाना `“ ` ३०१ 
७८-भ्रीराम-सीता-कमपरका वन- 
गमन ओर नरनिबासिवोको 
सोये कर आगेचदृना " * * ३०२ 
७९- भरमा शङ्गवेरपुर प्हुचना, 
निपाद दवारा सेवा "` ३०८ 
८० -लक्षण-निपाद्‌ संवादः भराम. 
सौवासे इमम््रका संवाद, 
मन्तरका लौटना = """ ३११ 
८१-केबरका प्रेम जौर्‌ गज्गाभार्‌ 
जाना """ ३९६ 
५<८र-परमाग पटुवनामरदरान साद्‌) 
यमुनातीरनिवासिर्योका प्रेम ३१९ 
-८रे-तापतश्कएण “= “*" १२३ 
-८४-यपुनाको प्रणामः वनवासि 
कागरेम "दश 
<८५-भीराम-वात्मरि-तंवाद ` *" ३१३ 
-<ह्विवकम निवास, गोर्मीतमै- 
केद्वारा "` "““ 
-<८५-समन्व्न अयेोष्याफो जैना 
भीर सव ्ोक देना --` ३५५ 
-८८-ददयर.सुमन्न-संकरदः 
-८$-एुनि वरषठकरा मरतजीको 
इतने धये दूत भेजना *"* ३५२ 
९०-भीमसतेशद्ु्का आगमन 
गरौरशोक (` '"" ३५४ 
4१-मसत-मौपष्या सगरद , -लौर 


३३८ 


- दरी अन्येहि करिया ३५७ | . 


९४-निषाददी शका मौर सवनी ३७६ 


९५-भरतमिपाद-मिल्न = मरौर 
संवाद ओर मरत्मी्मा तया 
मगरवातिवेंकषामरम `" ३७५ 


९६-मरतक्ीका प्रयाग जमा 
ओर मरत-मदाज संवाद, ३८२ 
&६७-मद्वानदरारा भय्वका सत्कार ३८८ 
९८-दनद-इषसति-ठेवाद “` ३९१ 
९९-मरतनौ चित्रके मार्गम २९४ 
१००-जीसीताजीका स्व, भीराम- 
जीको कोकते द्वारा रपः 
जके आगमनकी इुतचनाः 
रामनीका शोकः सूपणजीका 
करो .. “"“ ३९७ 
२०९ भीरी = चकमगनीमो , 
समन्नाना एवं मरतजीकी 
महिमा क्न "`` ;"" ४०१ 
१०२-रतनीका ।मन्दाकिनी-लान) 
चित्रम पटुचना, मरतादि 
उवा परस्र मिससप) पतिका 
शोकं ओर भादर "४०२ 
१०३-्वािवोदराया॒मसवकी 
मम्दलीका सतकार, फेकेयीका 
फथाचाप `" `" ४११ 
१०४-ग्रपषठिजीका भाषि; ˆ" ४१५ 
१०५-जरीराममरतादिका सवाद्‌ "° ४१८ 
-२९६-अनकजीका पटुना, कोल 
` किति मेट, स्र 
परस्पर मिद्य ˆ“ "`" ४२६ 


(८) 


षव 


नस व्‌, 


एतसय 


१०७-सख्य नना वारु#ी- 3 कया, धूण 


वीतरमभधीच "" ४३६ 
१०८-काङ्गुतवना-वादः म- 
कीमपि - ` ` भ्द 
१०९-जनद्िप्दिसतादः टद 
दीपिनतससतोगर टरो 
साना ४३९ 
११०-बीगमेभएसषाद्‌ = """ ४४२ 
१११-भव्ववोक वीये क्छ शापन 
तयाभिककरभरमम = "“' ४५२ 
१(२-शरपममससवाद्‌ पुश. 
गदाम्‌ मरतमकनेमिारं ` ' ४५४ 
,{६--मररीमन मोषा कदन, 
भरतम पकक 
सपना मनि निवास ~ 
भौर श्रीलमैरे क्सि 
भरकम, =“ ८८ 
अरष्यकण्ड 
१९ "` `" ४६५ 
१६५-अब्दफी द्र मौर 
चति । “ । 
पमन प्व दति "^" ४३४ 
१९५७-यीपद-अनदूयामिल्न सौर 
श्रीक जनपरमिक 
पादिभ्दमं दद्मः =" ५६९ 
११८-धीएममीको सागि ययाम, 
पिरव थोर फमहे रदर ४५२ 
2४५ यति शना प्छ 
प-दतीमनेग्र फ आलय. 
पिः भगस्य रम 
क दकत्व वर्‌ ४५८ 
ज्यु किप्‌ "- ^ ~ 
प -पकयै तवाम र शरम्‌, 


सेरसथाद्‌ -- »,* ४५९ 


स्के एम अना 
र खरटूणदिका वध ''' ५८२९ 
॥ राके नरि 
जनीः शताजेवा उत्निः 
भ्रव यर माया सीता "“* ४८८ 
प४-मरीखन मौर स्गमृग- 
सप मारीचा मार्‌ कता ४९० 
त-स भौर भीधीड- 
किर "४४ 
श्र-ज्यमुरवपबुद्र = ` ` ४९५ 
१९७-शरीरमदीश्न श्रम, उदु 
क प्र् """ ४९७. 
१२८-द््दद्वर "^" ५०० 
दर्प-वतीपर एमा, नवषामक्ति 
उपदेश जोर मासी मोर 
प्रयागे “= “' ६९७ 
ग१०-नादमनवद्‌, = `"" ५०७ 
११९-स्व चे शौर प्न. , 
भदन शिप्रा 
किषणिन्धाका्ड 
०९-गदरषु "= “"" ५१३ 
३३-भीगम्ीवे ददम, 
` ग्ना जैद यमी 
भिका [1 
रेष्फीकका दुत नमाः 
वान्त प्रित श्रीयम. 
जैत मकुचछणर्णन " ५१७ 
(५. ५९९ 
र-गषिमु्मगयव्रल्छिदाप ५२५ 
दृग श्रध, तारजने 
भरम्‌ उपदे यैर 
कीत राप तेषा. ^ 
द वय "^ ५२ 


नि 


(१) 


चिषरव 
१३८ ऋहु-र्णन "दर 
१३९-धरद्‌ऋहुव्णन “ """ ५२द्‌ 
१४०--धीरामकी सुग्रीपर सारी, 
सष्षमणजीका कोप ' "`" ५२७ 
९४१-ुप्ीम-रम-त॑बाद चीर वीता. 
जीफी खोनके पि बरंदरोका 
परखान """ ५२९ 
१४२-रुपमे तपलिनीके दशन “ “` ५३२ 
१४३-ानेक समुद्रतपर आना 
सम्पात ट ओर पातीत ५३३ 
श४-समु्र॒लेषनेका परमदी, 
जान्वैतका तुमानूजीको 
बर याद्‌ दिखकर उत्सा 
करना दद 
४५-ीराम-रुणका मादाय ˆ“ ५३७ 
सुन्दरकाण्ड 
११६-ङ्गलचरण-* ** ५३९ 
१४७-इुमानूजीकाच्ाफो गरस्यान) 
सुपस भेट छया पफ़डने- 
वाटी राक्षदीका वध्‌ 
१४८-ख्हवरगनः = लङ्धनी-चधः 
छम पवेश" "५४ 
१४९-दतुमान्‌ विभीषण-तवाद्‌ `` ५४४ 
१५०-इतुमानूजीका जगोकवायिका- 
म रीवाकरो देलकर दुली ` ` 
शेना भौर याणका सीताजी. 
को भय दिखलानां = """ *५४५ 
"१५६-भरषीता-तरिदटा-खैाद =" *" 
१५२-भीसीता-दतमान्‌-ठंवाद ˆ" १५४९ 
५३-हमुमानजीदारा , अशोक- `“ 
कारिकाविष्व॑सभअक्षयकुमार्‌- 
" बधजौर मेघनादा हनुमान्‌- 
जीको भागपाचे धिक 
सभाम ठे जना 


शषंसया विष्व 


"५४ 


५८८ 


१६५ -ज्ीरम्युणणनी महिमा " 


एृष-तंसवा 
१५४ हनुमान्‌ रावण-संवाद ` "" ५५४ 
श५-च्ह्वादहन , `" """ ५५८ 
१५६ ज्लनेके वाद हनुमान्‌- 
जीका सीता्जते िदा मगना 
जीर चूडामणि परा ""* ५५८ 
१५७-खम्रके इस पार आना) 
सवका लौटना, मधुवनभरेश, 
मुगरीवःमिलनः श्रीराग- 
हवमान्‌-संवाद "=` ˆ-" ५५९ 
१५८-शीरमजीका वानरी सेनाके ` 
साय चल्फर स्धद्रतरपर 
षहुनना ~ "^ ५ 
२५९-दोदरी-ट॒वग वाद ` ""“ 
२६०-राबणको विमीपणकासमन्ञाना 
ओर िमीषणकामपमान """ ५६६ 
१६१-गिभीषणका भगत्ान्‌ भीराम - 
की शरपके ल्थि प्रखान 
ओर ्रणगराति `" ५९९ 
शद्र-समुद्र पर करके व्यि 
विचारः रावषदूत शुका 
आना लौरच्छमगयीफै फक , 
केकर छदना" “"" ५५४ 
१६३-तका , रावणो समक्नाना 
ओर उकमणीका पत्र देना ५५६ 
६४-उमुदरपर शीरामरजीक्रा कोष 
ओर स्री विनती 


५६३ 
५९५ 


५८१ 
छङ्काकाण्ड 


१९६-मद्गसचरय “~ “> ५८३ 


,] १६७ नसनील्दराया प धना, 


६ 
"५५२ 


ओरामजीदयय ` ्रीरमेशवसकी 
खाप्ना  "““ 
१६८-ीरामनीका सेनासदित' समुद्र 
एर उठस्नाः सुतलपर्वतपर 
निवास -त्रणकी व्याङल्ता ५८६ 


॥ 1 


(१९) 


विष 
श्राकाक्तो मदोदगीश्न 
स्मन्नाना, चवर्ग अहल सवाद्‌ ५८७ 
४० श्रीम होगी 
यैर चनद -“" ९१ 
४१-भीरामयीत व्रणे पणुके 
मुकुर छत्ादिका मिरना -** ५९६ 
१७२दोदरीनन शिर रकग 
साता ओर भीरी 
"नी | 
५५६-अहद्् ठेका जाना बौर 
रकीसमा यङ्गद-एका- 
ठर "९६ 
¶५४-पपको पुनः मदोदरी्न 
सपान “"“ "^^ ६११ 
‰७५-अीदरमतवाद `` ६१२ 
¶७६-युदरम्म = “ -"" ६९४ 
१५७-मास्रारश्न राणो 
स्वाना `“ "द 
{०८-क्करणमेषनेदि-ुद्‌,ल्घमण- ` 
चैन शरकिखाता -- 





शतंत्वा | किव 


स्वा 
श्ट्-ङुनमकुद ओ उनकी 
पलमहि "^" दर 
१८८-मेबनादक्र बुद्धः सामर्जका 
सीते नातप षाना ६३७ 
१८५-गेधनादःयतियस, चुद्‌ 
ओर मेवनादःटदार --" ६४ 
१८६-एतणच यके व्थि प्रधान 
चौ मदीश विव 
त्था वानररप्मोग्न युद्ध ६४३ 
ए८५-स्का-रवणन्ुद = "`" ६४७ 
१८८-पकनूछ, रकम 
विन गम्यत युद '*" ९८८ 
१८९ शरपमर्बकेलिवि रथ 
मेडन, यमरवगुद ` ` ६५६ 
१९०-पेणकर विमीपणपर श्नि 
छना, यार्कप्रमिको 
अपने उष नः विमीपग- 
पवणन "६५४ 
११५-पवगलम युः गवा 
वा सवत, गमद 
नाह -“ "६१८ 
\र केर इदः यव का द 
१५३तमदाद्‌ "` ७६२ 
९९४ पमानः रवण, 
सकने जवने ~“ 
?५-गोदभप, र्म 
अन्ेष्टिकनिया --~ ९६८ 
६ तीप रव्वामिपे -.- ६ 
(५५-मन्छीका सतीन 
उच इनन; सवाजीका 
चरः 


मम 
१९८२ सुषि, इ 
` ६७द्‌ 


६८१३) 


पिय पृष्ठसंख्या विद्व पृषतस्य 
१९९-विमीषकी आयना; श्रीरामः ` | २१२रामवर्षठ-ंवाद, शरीराम- 
मौके द्वारा भरनी परेम वी मूद्वतं अमै 
ददा चणैनः बीत अयोध्या जना ~" ५७ 
, परहचानेका अनुरोध ` "`` ६७९ | २१३- दीका आना गौर सुति 
२००-विमीषणका -वलनामूषण \ करे गरह्लोकको ौट जाना ७२७ 
राना बौर वानंरभा्- २१४-यिकार्वती.संवादःगदङ-मोः ,. 
का-उनद दहना `" ६८१ | . गद्डजीका काकपुश्चण्डिसे 
२०१-पुष्यक विमानपर॒चदृकर रामन्कया ओर राम-महिमा 
ओसीतारामजीका अतधके , | ।खनना "७२८ 
ल्मि प्रान `" `" ६८२ | ९१५-कराकुुण्डिका चनी पूर 
२०२-ीरामचरितरकी महिमा ˆ" ` ६८५ जन्या शौर कलमिमा 
उत्तरकाण्ड . क्छ "७४४ ` 
२०३-मङ्गलचरण ^" ६८७ | रेपद-युर्नीष्न अपमान प्व - 
२०४-मरतःपिरह ठया भतत" ~ शिवलीके शाप्की बात मनना ७६७ 
हतमानुमिख्न, अयोध्य , | २९५ खाक """ ७६९ 
आनन्द ~“ ६८८ || २१८-दस्वीकन शिवनीसे अप्ाष- 
२०५-शीरामनीका छाग, मरतः भमन शर्र ओौर 
मिला, सबका मिल्नानन्द ६९२ ककगुश््डिकी आगेकी कथा ७७१ 
२०६-रामोच्यामिषेक) वेद्‌-सुति, २१९-काकयुश्चण्डिजीकसिमदाजीके 
चिवन्ुति "*" "` ६९८ फास जाना ओर प त्था ` 
२०७-बानरो की अर निषादकी अंह पाना `" """ ४७४ 
ह पिदा सु २२०-ानि-मक्ति निरूपण) शवान 
'२०८-रमरन्यका वैन *" ५०७ दप जौर भक्तकी महान्‌, ' 
२०९-पुत्ोस्ि, अगोध्याजीकौ जि त 
५ अ र ७11 रस-रवनके जत भभ रे ` ( 
२१० यस भमी „` | -मन्डचिजक "` ०८६ 
 -अभ यौरथीयमनीक उपदे ५१८ | ररर-मनन-मिय """ "` % 
२९१-जीरमलीकना नाको उपदे ˆ , | २२३-समाय-मदासव, ठस 
रीसमगीत), पुरवा ` > विनय ओर सक्ति “"* ४९१ 
` इक्शत `" ` २र४-श्ीरागायणजीकी जरती "* " ७९८ 


"४२१ 


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श्ीरापरलाका 11 शरव ¡1 १५५।.८॥ | 
, ,  मान्त्रागी हतु ;श्रीरमृश्लकरा शशाद, विरेष परिप देते 
कों भाग्यकता नकं दत होती, उती मदत एवं उपयोगिववेप्ायःखमी मानशयेमी 
, परिचित इगि] ,महः नीचे उपक सल अङ्धि करके, प्रभो मित्नमेकी 
, निधि तथा उसके उतरमर्का शरीरमृदस्रका 




















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इत गमशल्यक ` परभावहीके; प्राय मिट कितीको अव कमी अपने अमीर प्रधका 
उर पाठ केषी च्छ. तो वधस ऊस -चकिको भगमान्‌.कीरामचन््रजकन ध्यान 
केना चाय ¦ तदनन्तर भदा विशषातूवंक, मनसे ममी अश्क, चिन्तन करते हुए 
पनाय पचारे क्म कुकी या. लोर लका. रख, देना चये ओीर धच 
कोष्ठक जो अघर हो उवै मुखा म ए. 





पे इते भी "रि चना 'चादिये ॥ "वः पकार रति न्वे 
स्ते जाना चाहिये भौर उनतक डिठते जाना वाशि, जबतक रती पहल कोके 
अप्रतक गु अथवा शलकु जाय ¶ पे गरक अक्षर निस पो 
जस नरो पकेगा, परेत पचे हचते खक चौ ूरी्ि.जदयी, मो अमङ़चमि 
यमौ? नख "उत्त देगी । य दस भावक भयान रखना चि किमित 


(८) 


मोतं कर धाद मा (1) ओर मिव प कोके दोदो बटर ई । अकर, 
मिते सय व ते मरे ऋक जड देन कवि ओर र दे जदोष 
कोह दो गर मनना असि । वर त्न मोक मवे वं एरैरलित मक्षे 
धो मतर सिम नधि बौर नं दो भवतेव अवर इदो अर एतं 
उ्रन्लि ला चषि । 

ह उदाह्णे बोर इ एज प्रभाते फिर प्र उरं एक 
सैपर निक दौ बत दै प्क जाने ददे । मिरीने मवान्‌ भौरमदव 
छान शरीर से प्म चितं कते हए यदि पशात सर विहर युं भ 
गे शो ययौ भ शत्रा सा भौर द रमर वयि कर अनुजा अपो 
शिन विता मवा तो उत्तएलसम यद चौसरं व जापगी-- 

चेद्ैसोरमेएमभनिरदःेकटिदरण्ददागर्हिसमाा 

य गे वाकम रिद गोर पमि पाद ६ै। प्भ्तंन एए 
शतस योगे वह सङा निनरष्मा दति म य होम सदेह है अतः 
क पवार चे न रेव ६ । 

ऋ पो गिर ्यमरलन् प्््ठे आट भौमो मीर वनतरी 
६ लस सत भोउ के ऋ र] नौ न 

+ छिन श भहट ए पू प खमन ुपतौ॥ 

सन सा बमप्र्ो शीीरे गे पे मपे ह । मतग 

गीदाममन रीर दिवा ६ । 1 ४ 
श-पन्ना मत रमर, ऋ णिद हो | 

भ भ र स्व समद र र रत्‌॥ 

सम-वचे दषठो इतुमन्ीे संं पव करोते समम | 

एड गाना सरण इ ऋवारम करो, शता परौ | 

भ न स पिद मि फन य्‌] 

सम चं बनभ आमि एय रौ र | 

ष्क शव ममर न । स सन्तो छे । 

सिक कठ पहि यि मु ॥ 
समत ते मं क्म मामे ह स पस 
कोत्र े। पतं परर! 

भ म च सवमतमिक जन्र तोदस्‌ 

पल-द वोषं शे न्तन ये चवे है! 

कध रक, र देगा} 

भष्दुक्‌पि स निक) मेष चि शः छव 


षः १ 
गोखाी तरी सक्षि जीवनी 

भवागे पार दा बि जापर नमक प गरम वँ यामराम दुवे 
म ए रिव सूरी ब्रा ए ये । उन धरी ना षती थ | 
संवत्‌ १५९४ की भावप शहा पीके दिन अयुततमूड मयपर इन मावान्‌ दति. 
क र शर महेत यभ रके पात्‌, गोलामी हरीदारजीका जन्म हुमा । 
चने स गात तुतीदास रोये मी, किः उने ससे भाग, स्न श्‌ निकल | 
उनके, खम वीह दोत मौमूह भे | उनका. शी-ड पि वपे बामःसा या । 
श मए अदु. कस देलक पिता अमङगी शष्टसेभृवमोत हो रये मौर 
उसके समन्य ऋं प्रको करसन के ठो | मृ हरते द देखकर षह 
चिलता ह| उन्दने बालके भगिषटको भावत, वमी रत्नो वत शिषो 
अपनी दाग स उसमे समुह भेग दिया ओौर वू दिनं खयं शस असार हंसा 
चले |. दीन, षका नाम शुनि थ पमे पाका पठन भा । 
जव सदाय तमग सा पो अड हः तुयो मौ दत्त हे गगा, भम ते 
परा भना हो गया । बह द्वरद्ार मरके छा ] इप्‌ नगढननी परवती) उस 
शेनशर वापर दमा आयी । म जाहणीको देष धरेण एर तदिन उष पासा 

र उरे अभे धा मोगन का चरत | 
+ षर मगान्‌. शडरकीकी प्रेरणा राम्थौरपर रदमेवठे भीयनन्तागन्दवीके 
सिष्य शरीरयनदमीने श लको व निका मौर उरक नाम रामयो ता 
उते मे अयोषया डे मये ओर वर्त सदत्‌ १५६२१ माप छह एमी दक्वा उस्म 
यशषेपीतसेर कराया । रना सिपि ह बक रामबोयने गायत्री मनका उक्र 
भिना; दषे देखकर व छम चकितं ह गमे) स्के शद नरि लामीने वैषये 
पोच संसार करे ,रमनरोजगनो राममन्दी दीश दौ शर्‌ मयो रद्र न्दे 
£ विद््ययन कामे जो ! याटढ रावो बुदि बद पवर थी । पक भार गुले 
{ नो हुन ठत गे, उने दह कष्ठ हो जाता या ] ररे $ढ दिन बाद गुर शिप दोनी 
¡ चेन (रत ) पे । भोरे द्वो मच इनका । इ 
| दिल ,बाद री चठ अवे] मे शेष॒ एनान प्र खक दीदे 
प त वेदे ज्य सया | इष उनको लेना कुक च्‌ ते 
लौ भोर जपते चशे आश कक वे अपनी चमन से भि 


(६) 


हा क उन पारस ने इम है । उन पिधिप्कं अपे 
गप सरन कक्िगये 
दह्‌ ५८६ च श १६ दुखा भयो कवः 
यथ ठस निम भो वे सुप अपनी नवमनता कपे 
प्क वार उनकी खी माङि षव अपरे मदे चदे गयौ । पपे 
मौव च दुरे | उनसे नये सम उदयप जए फ भ ५) रः 
ददम शरत स्त इषं लख आधी म॑ गि मयनं प 
ते हप ेहा पर छे गय हेव ।› क 
वीसतयैहो गे चट हम गे! मे ए एण गी नहं केतव वहि; 
ऋदिपि। | 
परे चल दशरीरावद राम वे । वं उन् समप परिया करए 
प्रण किव । वीरय क हए धी पव । मनोव प उन 
कभुधगडरे ददन ए} 
कास ददा रषा कशे को | क उदं ए दिन पक पेत मिल, 
धिके उ समग्मत कथमा ! एुमालीहि मच्छर ह्छीदाऽीने उने 
शीएुगयनीका दन कने भर्व क । एनुमासलीने कः इमं नत्र 
सनाय दन गि ! प्रर तरीदासनी भ्रू गोर चट पदे । 
विवद रब राद उन्दने अपना आषन अमाया । ए दिनं वे 
परदषिणा के निष्ठि ये । मरमं उन श्ीएमके दन र । उन्दने देषा दो 
हे दर र्म भोक्षपर स्वरोः धतुषाण ष्णि च ठे ६ । दपर, 
वी उर देल पष छ गये पु उन वाय न स्ते । पर एतप्रानूकीते जा 
उनसर मेद्‌ ययाः से बे वडा प्तप उएे लो । ुभानूजैने ऽन जन्ते 
दौ र कद तश्र पि द के 
ग्‌ १६०४ यी नौ अमवा दुवे दिन उने शमने भगवाम्‌ शौर 
पनः ट | उने न्क ठ्सीदासतीरे कावा ए चदन दो 


दहुगनजीने सोचा, भे च बर मौ वोदा ता बर इवश्व न्दे वेतेक स 
धारम ऋ द दोह दा 


पव छ र मदन मुय श धद सु ॥ 
हीवापयी उष द्रत खगो दार शीत सषि मूड गये \ मगान्‌ 


अपने छे चनदन तेम मपे तण दीदे मदकल श्या चौ 
अन्तर प गे { व 


५ 


(७) 


\ संक, १६२८. ये हतुमान्ीकी आहारे गवोध्वाकओोर चछ पदे । उन दिने 
प्य मपे था । व ऊढ दिम वे.उदर मवे! पर छः दिन वाद्‌ एक वलदरके 
नीचै उन्दं मर्दन शौर वाज्वसकय युके दर्शन ह । वँ उर सघय कही कथा है 
सं थी, जो उन्न सुेत्रम अपने गुरते इनी थी । षषे भे कादी चरे भये 
सौर वँ दाप एक ब्राह्णके र निवासं किया] वदो उन द्र कवित 
पिका सुरण हुमा ओर बे चं एय-स्वना करम श्ये । परु दितमे वे भितने 
भ स्पते, रोगि व स्र छ शे जते। "यह पटेन रन धटी | आध्यै दिन 
उपीदासत्ीको सपर हा । भगान्‌ शदे उन आदेश दिवा कि छम अपनी 
मापा का्यत्ना को! तुखतीदासजीी नीद उचट गयी ! वे उट ठ गवै 
इसी समयं मगवार्‌ शित जीर पाती उनके सामने प्रकट हुए । ुषपीदानीन उन 
साङ्ग परगाम क्या । धिवलीने क-म ' अयोध्या जकर रहो मौर हिन्दी 
काव्य्वना फरो भेर यीवादषे तार, कथिता,ामेदके : मानः वती, शेगी |» 
इतना कषक भरीगौरी्ध मन्थानः -ये 1 इन्रीदारीः उनकी याहा धिरो 
केर फशीते अयोध्या, चे आरे ॥, । , ' ^ ५६५ 

संथत्‌,९६३१ का प्रममहुमा } उस साठ रामनवमी दिन प्रायः वैसा षी भोग ' 
था जषा तयुगे रामजन्मके,दिन` था] उर दिनः परतःकाल श्रीदतीदावीमे 
भीरामचरितमानसी रचना रमर दर; सत्‌ महीन, छन्नी दिन ययक 
एग इ । एकत्‌ १६११ ॐ मायै शमम रामना; न पूरो मुष्ड 
पूणं शेणे। 

इसमे गाद भरावान्की याक्षे दीदाय, अी। चे जावि । रो उन्न 
भगमास्‌ विशवनाय जीर माता भबपूणगो भीयफरिमानख नाया | शत प्तक 
ओीविदनायरके मन्दम एत दौ गयी । स्वैर पठ सोक गया .तो उस्र जति 
हमा पया य्या शिव न्दरम्‌, भोर मदे मगबार्‌ शी सी यी । उह 
सपय ऽपित गेन (सत्यं धितं न्दरम्‌? कौ आग मी नेति नौ । ' 

इष पणेन जद यह वात छी तो उनके भ ईष उलन द । वे दर 
भकः दच्पीदासजीकी निन्दा कले छो ओर उस पु्कंको मी नए कर देने परल 
कले छो । उनहेने पष्क इरे स्थि दो. चोर मने ।रेनि लाकर दे 
लतीदासीमी कके मरगार दो वीर ध्ुनोग व्व य दे द. । दे पठे दी 
छु वाम चौर गौर रमये । उनके दन चोरी डदि दो य्व |. उन्न 
उती मये चो कला छो दिवा भौर मनर ज गवे । उल्शीया्न जने 
छे मावो ऋ हमा लान इयत खरा चमा छ दिवा, पुकः ने पिन 

याम व ख-- 





( ८). 


येम थ ड । इते द उर पल दर रि सिसी । उरते भाषा 
क वो देयः र जो य । प्क प्रर दनदिन भढ सय । 

षर पतेन ओर केह उपाव न देख भीमुहन शरतीतीो उस 
पु्कयो देखतेकी एफ की, शीरुसूदन समते उते देकर वही प्रस्त 
अदद प ओर उमर द समर स्च दौ-- ` 

यन्न दसिलमौवर । कवि क्रि सम्मित ६ 

शू प्रवीरौ भननदवनमहरीराख -वस्तरिता शकती पषा है 
उदकी कतरारी मञ्चरी बदरी ई सुन्दर & -निषपर श्रीरमरगी गरा सदा प्रदरा 
कार त ~ 

पष्डितोफो इपर भी इन्तोपं नह मा । तव पु्ककी एरीभाकर एकं उपाय 
भैर शोचा गवा} मगात्‌ सिन सममे चे उपपद, उन नवे शाद, 
पालके मे एण बौर छव जीेःरमचेरतमनघ रव दिया भया । मन्दिर वद 
कर दियो ताक सत मन्दिर लोल गया ल लगन देखा कि भौरमवितमानए 
दमे सा. हया द। जव त पति ठो यदे ललित हए \ उम 
इीदाषनीष ग गोपौ नौर भिरे उनः चोद व्थि.। “ 

रवती भर वष त | रे एए धार 

कद उनम पए यवा भौर उ हदो ¡योलपीमीने इवमलकर यना | 
चमी उन वत षद स्वो ऋ इपर गोला प्रिनयशमिका हिती ` 
चैर आबे परग करौ | भयानकम गो शवर  हि 
भौर शीसे निर्य कर हि| प 6 


ठ्‌ २६८० वग छना दृता चनो सूषा गोला यम, 


गम क हए अपन छर परिय भया 





(२५) 


सथान चौं भीुमारजके लंकां पेद केम उमयमी रै । 
-भदन दुत भे दै । सरं सफ़र होया | 
७-मदम कमेः सुरस समी \ र ` सनुख घरं अह न धीर ॥ 
स्थान-गृह चौपारः छंकाकाण्डे रावणकी मृसके ९ मन्दोदरी विधे 
रसे है 1. ध 
एकाय पूणं हेमे सदेह रै | 
(सुल सनैष्य दहु हम । रु कलु सुनि मए पु ॥ 
, स्थान-यह चोपाई ब्रार्कण्डमर पुष्पवाटिकाते पुण श्नेपर विधामितरनीका 
` आशीवाद दै! ^ 
फषट-परपन बहुत उत्तम दै । कव रिद हेग । 
` परभा, एमदााकापरनावर्ते कुल नौ नौपाह्ो बनती £ निन चमी 
प्राप प्के उत्तराय सक्षि ह । ` " 
,., एरायणविषि 
शीरामचरितमानचक्न विधिर, पठ करेवञे मतमान परार पूव 
शरीसदासज,भीवासमीिी; भिवन तया शीहमाूलीक आाणूबन कोम 
पाद्‌ तीनो मर्वोसदित भौषीतापमीन यवादः ोवोप्ार शून नौर नान 
का चि | वदन्तः पन्न आम करना चि । सके आवाहन, पून भौर 
घ्वानमे मन्न ममदः नीचे लिलि सते है 
^ 1" `  ' अव सांबाहनमन्वः 
" हरसीक , नमसड्यमिागच्छ षित । 
जैकव्य उपदिश्येदं॑भूजनं श्रितास्‌ ॥ 9 ५ 
ॐ तुुखीदास््य नमः 
वारम नमस्तम्यमिक्षागच्छ छमप्रद । 
इततूषंोम्ये पिष ग्व गोऽ्नम्‌, ॥ २ ॥ 
ॐ वारमीकाय नमः 
मौरीपते भा्ुन्धमिष्गच्छ मेस । 
पूव॑द्िणरमष्ये सिष्ट पूर शृण मे ॥ इ ॥ 
ॐ गौसैपतये नमः 


`" शीर्ण नमस्ुम्यमिष्ागच्छ स्टभियः । 
आस्यभामे समातिष्ठ पूलनं संगृहाण मे ॥ ४ ॥ 
ॐ श्रीसपक्गीकाव छकमणाय नमः 
शरीपतु् नमस्ु्यमिहागच्छ खह्ग्रियः । 
, , शख पथमे मामे पूतं शवीहरषव मे 0 ५ ॥ 


दके सपे चिहूर शृण मे ॥ ९ ५ 
खीसपलीकाय मर्ताय तमः 
शरषानिषे । 
ूद॑मगे सावि पनं सोकर भमो ॥ ० ॥ 
ॐ हदुमते तमः 
अय अथानपूजा च कन्या विधिपकम्‌, \ 
पाष गृहोतवा ह॒ ध्याते ङवौसरख इ ॥ ८ ४ 
सछम्ोजलाभिएसनयनं ` पीताम्बरं 
श्यामलं भस्रवदन शरीतोठया शोभितम्‌ 1 
करूयामृतसागरं भियिभोभिमि मौनि 
चदे दििषायरेनयरिो मखेिददम्‌ ॥ ५ ॥ 
आगषड जानकीनाय अनका द राद । 
ण म तं च शाद ॥ १०५ 
सुवणेतषिते राम दिन्धारणयोभितम्‌ । 
अनं दि सः द याण मगिचितनिम्‌ ॥ ११॥ 
परत रोदशोपचारः पयेत्‌ 
ॐ शाल श्रमन्मानररामायमधीरामचरितिय श्रीरिवकाश्युट्डियातल्मय- 
गोसिया ऋषय शरीसीरारामो देवता प्रीरमनाम वीजं यथरोदरी मिः 


किः मम॒सिवनतासदिभनतया शीसीतारागीतभूषेकसगछमनोरयसि द धथ 
पे बिनियेरः 1 


अथाखमक्षम्‌ 
शरीतीतराम्यों तमः 1 शरीरस्य 
शरम कमः 1 
इतिमन्रतिरयेन आदयते इग्‌ ॥ वीवो प्राणायामं कपौय्‌॥ 
ङ्य करन्यासः 
ङ षत गुन प्र रमर ४ धुनि दे षन चरम चम ङे | 
सभ गम करहि > अपु पनि ५ पृषु स्मह ॥ 
समैीभ्यं नमः 


स्णः॥ 


म स्कर गाड ठे वमक 1 ठ नथ अवं हग गने बृप ॥ 


(२३) 
मध्यमाभ्यां नयः 
उपा दाह जमिति कौ नाई \ सहि नचाव रप मेसा ॥ 
स ` ` ` अनामिकाभ्यां नमः , 
शु हेद ओग मेहि जही} जम॒गरटि सय नासं ठव ॥ ' 
बनिष्ठिकाम्यां नमः 
मामिर्य  सपुकुनामक धृत बर चप थिर कर सायक ॥ 
४ करतर्करगृषटास्यां नमः 
दति कट्यासः 
अथं हृदयादिन्यासः 41 
ज मेक गुन श्रमः त के। दनि मुडि धन वा पाम $ 
इदेयाय नमः 
गाम रंहि जे जमु \ न्धे न परपषुन समुद ॥ 
, धिरे लाहा । 
राम सकल भान्द ते भयिक्ा! ्ेठ माथ अव सग मन गिद्य ॥ 
पिलायै बषट्‌ | 
स्मा दाक जैधिव की नष \ सवि नवत यामु पेष्‌ ॥ 
कवचाय हुम्‌ | 
सन्मुख दोर भीर भेदि जवी \ जनल कोटि अथ नां उवह ॥ 
, नेत्य वौषट्‌ 
माममिरुम्‌ रदुञ्रनाणर  धूव ब चार सिर कर खम ॥ 
अन्नाय फट्‌ | 
१ ४ति हृदयादिन्याछः 
." अथध्यानम्‌ , ~ 
मामद्य 'पकजरो्न \ इष ॒विोकमि सत्व कियन ॥ ` 
मीरे वाषरस स्याम कामम अरि } छदम कंन भकं मषुष॑रि ॥ 
जघुणान कर्य नरु रमजन \ मुनि सनन रंजन अघ ग॑मत्‌ ॥ 
भूसुर सि सव बंद बराक \ अएन सग दीन सन साह ॥ 
सुम न्त भार भि उडद । खर दून निरव वष॒ धटितं ॥ 
शमनर इदस्य ` मूमः \ जम दस्र शुर दुर सुकर ॥" 
"जत पुरान नित निगमा । गत मुर युति संत समागम ॥ 
आसती ्यतीक सद खंडन \ सन वयि कुस केसा मेडन ॥ 
करि अह मन नाम भ््ाहन ! तुरिदास भ्रु॑फदि धन॑ कन ॥ 
इदि ध्यानम्‌ 


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प दार उरग बहव । 
करि सिगार पठन पदप ॥ 








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गणेश्व नसः 
भरीजानकीवलमे विभ ई 


श्रीराचरििमौनेस ९ 
प्प सोपान. 


बारुकण्डं 
णौनामर्ं च॑ ८ 
च क सुधानां `. रसानां ~ छन्दसामपि ।  , 
कतौ ` उन्दे धाणीविनायकौ ॥ १ ॥ 
अक्षरो, भर्म, रतौ, न्दौ -ओौर मङ्गलो केवाली सरखतीनी मरं 
रणेश्ीकौ $ वन्दना फरता द | १ ॥ 


अदधाविश्वासर्पिणौ ! 

याम्यां चिना न पदयन्ति सिद्धाः खान्तःस्थमीश्वरम्‌ ॥ २ .॥ - .- 
भद्रा नोर पिशा सर्प श्रीपावैतीणी योर शीर्टरजीकी मै चन्दना ता है 
निने 2 ९ अन्व्टरणमे ह महीं देख सुकते ॥ २ ॥ 

शृदररूपिणम्‌ 4 

यमाध्चितरो हि ककोऽपि वेव वन्यते ॥ ३-॥ 
शोनमय नित्य, शंकररूपी गुर मँ वन्दना कर्ता ह, जिने भारित हेन 

-शीय्वा चेन्मा मौ सव॑न न्दत रोता दै ॥ ३ ॥ - 


स्ीदाशमयुणग्रामयुण्यरण्यविदारिगौ ॥ 
कदे - -. विदय्विश्ानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥ ४ ॥ 
भीप्ीताराभजीके युणघमूहूपी पयिघ्र वनर्म विदयर केष रिद्‌ विश्चनसमन्न 
-कवीधर श्रोधासमोडिती ओोर-कपीशवर भीहतुमानूजीकी ग बन्दना करता हँ ॥ ४ ॥ 
स्थितिसंहारकारिणीं ह्ेशदारिणीम्‌ 


उद्व 
सर्भ्रेयस्करीं सीतां - नरोऽहं यमष्माम्‌ ॥ ५ ॥ 
उत्ति, खिति (.पारन ) बोर संवर कलेवर) ब्ेशकी हेवा तथा समबूणं 
हणो करेगा भीरामचनद्रनीकी परिवतमा भतीतानीकर गै नमसकार कत्ता टं ॥५॥ 
चम्मायाचशावतिं विश्वमखिलं ब्रहमादिदिवोरा 
यत्खत्वादसूषेय आति रज्जौ -ययद्वि्मः 
यत्ादष्ठबमेकमेच हि मवाम्भोधेसतितीपोवतां 
चम्देऽहं तमशेषकपरणपरं रामास्यमारशा हरिम्‌ १.६ ॥ 
जिनदी मायके ,वीमूव सम्पूणं विश्वः अहयादि देवता ओर अश्र दै, जिनकी 
सत्तार ररी रफ शरो मारि यद सा ृशय-नगत्‌ उ इ प्रतीत दता ६ भर 


र च° १-- 


६ समिमामद ‰ 


= 

वद स स्के वि ए मैभ्ररै भ 

५ खशि ल भौर पे श } ए श्रते भाक्‌ 
कती $नया क्य ६।६॥ व 


द्‌ 
समये तितं इवियलोऽपि । 
६. 
छ पा वे बर [ ठम ] शे उमर रप मे समाप रित ६) 
क स भमा कत कमतो 
छो धि शट मोह परव नदत म द | ७६ 
से- सुमित सिधि श गन दाय रिः चदन । 
रय दुह ओ बुधि सा घुम युत सदत ॥ \॥ 
मि एए कतरे छ व श्त ६ रे वेमे तापी शरद 
श ४३६ इक्र सैः मे पम (फो) एष 
कृषक ॥१॥ 
चदु वामक एयु वेद्‌ गिरिवर धप । 
1 शूल1२॥ 
पि पगे पू वह इर मेनका र त्त ६ परर मदरद्भ 
छ प्प च शा ६, २ दण्डे सव पाको रेल गमि दाह 
(कपम्‌) द व (दर इ) ॥ २} 
सयेद जाए; वर भदन वारित भते । 
एर षो र इर धप स करार एषद ॥ ३ १ 
वत 11 
शोभते दै, 
कषम भवा नरम 
(द दह मा प्र ४८ यन 
एर प्रेद करड शा मद भत्‌ ॥ ४॥ 
क 0 शः १ न क 
च ॥ 
क (त पि ह पदता मद 


भग ५.) घन सदं 
दुष शायन्डे पतव सीद न (क 
प) नतद कम (त) 


# -वाल्काण्ड | 


य्दर वणं रै, नो ऽप्ूणं भवरोगोकि परिवारफो नाश करेवाग टै ॥ १ ॥ 
“ शरृति शरञ्च उन विगर विभूती ! संक रगु मोद्‌ प्रसूती ॥ 
५ जनं मन मंज युङ् म हनौ । किदँ तिरक शुन शन बड करनी ॥ ९ ४ 
बह रज दती ( पुष्पवान्‌ एर्व ) रूपी धिवनीके ध्रीरपर स्मित निर्ग 
विभूति है जर युनदर फस्याण.ओर अनन्द जननी ३, मक्र मनसी पुत्र दर्षे 
मैरको व्र करेवा -गौर तिचक करने गुम उमूरको वम करनेवाकी ह ॥ २ ॥ 
श्ररुर पद्‌ नख मनि शन शती । सुमिरत दिष्य चट हि होती ॥ 
इरन मौह तम सो" सप्रकासू । अदे भाग उर शाद्‌ जासू ॥ ६॥ 
शु महारा रणतो व्योति मियो प्रका समान दै, भिएफै 
सरण करते दी दयम दिव्यड उतर हो नाती ह} यह परक सकानस्पी उन्धारक 
नाश फरेवाा दै; वह जितै दयम आ जाता दै, उत्क बदे भाग्य ह | १ ॥ 
उधर विमट विरोचन ही के ! भिदि दोष ख भव रजनी कै ॥ 
सुहं राम चरित ममि मानिक । युत गट ह नो सेदि निक ॥५॥ 4 
उसमे इयम मते द हदये निग नेत् दुक जाते टै ओौर संस्र रपरे 
दोष्धुःख भिर जाते ई एवं श्रीरामचरिनस्मी मणि ओर समित्य, गु भोर प्रकट स्ह 
ओ भिस सारे दैः सव दिायी दूने ठते ६-॥ ४ | 
शे-जथा ४ भजि दग खाधक सिद्ध नान । 
सख षन भूतल भूरिः निषान ॥ १ ॥ 
लैर शिद्ा्नमो मेनं कगार घाध्क, सिद भौर सुला परव, न भैर 
प्रलीके शंद्र मौद्कये दी बहुद-ी खाने देसते'ह | १ ॥ 
` चौ -युठ पद रज खु संह चंजन । नयन भमिभरग दोष विजन ॥ 
तेहि करि विमत बिनेक विदन । बरन रास धरित मय मोचन ॥ १॥ ` 
शीयुर महारावे चरौकी रब कोमह चौर इन्दर ननागृत-ज्ञन ह, गो 
म दोक नाय केषाम दै । उस अज्ञत पिवेकरमी ननो नगर कफ धै 
छंशारपरीबन्धनरे ुदामेभणि भ्रीसचरिा वणंन कता ह | १ ॥ 
“ धद थम महीसुर चरना । मोट लनित ससय सद रना ॥ 
सुजन समान सके शुर खान । कर प्रनाम सप्रेम सुानी ॥९॥ 
पले परष्वी$े देवता आहेके चरणोी बन्दना करता एः जो शानते उन्न 
, शव छदन हक हं | रःस र्ोकी सान धमान ममत इन्दर 
वाणीस णाम करता हँ ॥ र | प्र 
"५. चरित सुभ चरिठ कपास । निरस नितव्रगुरनमब फल जासु ॥ 
ज्ञो सषि दुख परचद् दरवा । चैद्य बेट जय बरस पावा ॥ ३॥ 
इतना चिव कवे रिग ( जीवन ) के सपरन शरम ह, निरा फ नीर 
विद्‌ जीर शुम होवा दै। ( फा डोडी नीरत हवी ‰, वंद मी 
वमाप नर ‰ शते बह मी नीरव कयाय उन्जर रोता दे, रेका इय भी 
अशन मौर पापसर सन्वन्नरतेररि हा ‰ इरे व विमद छ नौर का 
शण (कु) हेते दै, इलो मग्र तकर चरि भ दूयणौक मण्डर हेता इष्य 
ब गमय ई} ) [ ठे काका पाया द चवि ह दसन जपना ठन देक ठर 
य, अगवा काठ ॐ छेदे चत, कति चने भौर इने यने क पकर भ 





न % रामचरितमानस ४ 


त्त 
प सत स ऊ त र सोणे उक जी १६ 
वः को (देत) ने वापि ख उसमे नं 
दृदलीम य पराह पिया ३ ॥ ३॥ 
शद्‌ मंगद्यन सह दमान्‌. दो जय अयम दीरयपनु. # 
श्र सचि घः युररि रा ¦ क्म्‌ ब्रहम विचार भचार ॥४॥ 
तष समा चाद. योर दल्यगास £ जे चते चक्ति सीन 
(पराम ) 1 चं (उर सदसपनगै प्रवगरन्तरं) मभकिरूपौ महीक 
प दै मीर ्रहमिवास प्रचार सरतीरी ६ \ ४ ॥ श 
सिधि निमय कडि भर ह्मी । करम ङा रननदन चनी ॥ 
क्ले ए कथा चिरा्सि येन \ सुमत सन जुई सगर देनी ५५५ 
विमि मौर नेष ( यह करो ओर वह्‌ न क्ते) र्यी केकी कण प्शुगक 
पतन लेब ना मवी र; ओर भगवानु भौर शी क 
परिणीलपे शोभित है जो इते ही ल आगन्द जै र्मी वाही ६॥ १॥ 
बट्‌ वित शरद निज धरा; तीरथ स्मन दला ॥ =, ८ 
सरि हुखम सेव भिन उ देः । सेद उद्र समन रेः ॥ द ॥ ५ 
[ उम उत्व मामे] सपे धमं ओ शद विशाम ६ वह मघ 
४, भैर शम र॑ प्ै ऽव दीक वमा { पिर ) १ । वह ( ईंपनपी 
्रागरल ) ख दग, ख स्मय समीक हतं भात हे सक्त है मीर भादर 
पद स्व कते कोक ऋ केना ३ ॥ ६ ॥ 
कध कनक रीरमन । दह्‌ सय षठ धरयट प्रधा ॥५॥ 
ह दीयत सीर ओः अयम एं काल त देनव है उरक 
पमा पर्प ६ ॥ ९ ॥ 
योनि समुदि जन शुदित मन मन्न अति धनुखगः ! 
इहि चारि फर हत, तड खाधु सभा प्रयाग ॥ २ ॥ 
जेभनुष्यद् नंदत्माज्यी तौैरकर प्रमाद पसनन प्म दुनते धोर्‌ एमे 
ओर पर भलन् परय मे ल्यते ६ छ वरीर चे दी पम, भये, 
पष्‌ मेप पण जते६।२॥ 
च-प एष पतिम नप्कषला । ए हह पिक वकृ मराद ॥ 
र श्रै जनि कोई 1 उति सदि निं मो ९६ 
„ अती लान तत्काेग्रादेडनेगे यता कि यौद यह वृन तिह 
भ रे इ इन्तो अर्वन के सोक ता गगा टिपी न ६१ 
पते नर्द ष्टनी ! मिनि थुखनिकरनिनदोती¶ 
खन्य्‌ धरर नभ वानो |> खदु देन रीय भश्चना 1११ 
_ मन" नाली जर आग्वदीने अपने-अपने अति वनी हनी 
(लंगा चन्द ) र दै । द्ये रेव, जगीर च्डनेवाछे भः भवाम 
वेगम माने नके सम दी सतर, | २ ॥ 
^ सिक्ते ग्रहे रि ग्ड नन बेहि जतन वौ ॐ पाईं } 
अ सदय प्रमाड लोक द म भम्‌ उपाड ४ १५. 
नये भते विटं एण्य उदी भौ सि किती इ, आति सहरि, 


# वाल्काण्ड. ५ 


विभूति ( रेश्रयं ) भौर भलाई पायी है, खे सवर सततंकन ही पमा समञ्चन 
भवादिमे ।,वेदोमे ओर लोके इनकी प्रातिका दर्रा कोई उपाय नही है ॥ १ ॥ 
ति सत्संग भिवे न दो] राम छपा वि शुख्म न सो ॥ 
"स्मत शद मंगर शूका । सेड्‌ फढ सिधि सब सावत पूरा ॥ ४॥ 
उतत तिना विवेक नहीं होता, ओर श्रीरामजीकौ कपे धिना वह सदम दरे 
मर्ता नष } सत्ंगति भानन्द्‌ ओर रुल्याणकी जड़ है । संगी तिद्ध ( प्रपि ) 
पफ दै, शौर स्य सधन ते परल है ॥ ४॥. - 
"एं धधि रुवसंगति पा । पार परस धात शुाई ४ , + 
„ विभि घत पुजन छुगतै, परह । एमि मवि स्म निघ युन अनुतर ॥ ५ ॥ 7 
इट भी सतसगति पाकर षर जते ह जैखे पारस सप्ते सक सावना हो 
जता (बन्दर सोना बन जाता दै ) । किन्तु दैवयोगे.यदि कमी जन कुगति 
पड़ भति & तो वे कहँ मी सपवी गणिके समान यपने शरणो ही घनुप्रण रते १ 
८ भर्या जित प्रकार सोपकरा सरग पाः मी मणि उरक वरिधको रहण नरी कसी 
तथा अपने सहज गुण प्रकाशको नहीं छोढती, उती प्रकार साधु पुर्य दुे$ कामै 
दकः भी दूरौ गक ही देत ई इका उनपर कोई पमाब नही पडता । ) ॥५॥ 
विधि हरि र एषि फोधिद्‌ वानी । कषत स मष्टिः सकुदानी ॥ =" 
सोमो सत ष्ठि जात नैतं । साफ़ यनिरु मनि युन मन घेस ॥ ६॥ 
अर्षा मिणः सिव, कवि चौर एण्तोकी वापी मी ठंतमहिमाका बन करे 
श्ुचाती दै; व भुक्ते कि रकार नह की जती, पैसे ग तरकाशी मेचनेवेते 
५. न कटे जा सक्ते || ६॥ 
दो ५० 





संत खमान चित हित अनष्टित नद कोद । 
^ अजि. मत सुय शमन जिमि सम घुरंध फर दोह ॥ ३.८९) ॥ 
(८, भ संतो भणाम करता -ह जिनके चित्तम समता है चिनका न" कोद भिन्न दै 
शर्‌ न इ! जेठ अञ्जस रकल हुए इनदर शल [ चिद यने प्क तोडा गौर 
भिहने उनको रका उन ] दोनों धी शार्थोको समानरूपे सुगन्धित करते ६ [ धै 
शंत शु ओर मिल दोक धीः उमानस्सचे. कल्याण करते है] | ३ ($) ॥ 
: श्च॑त रक वितत जयत शिति आनि छुमाउ सनेहु. , 
चारुबिनय चुनि करि छपा खम चरन रति वेहु॥ ३ (ए)॥ 
संव सरृदय ओर जगतूके हितकारी हेति ई, उनके रे सभाव, चोर सहको 
आनक भ विनय करता ह मेरी इत यालःविनयकरो सुनकर कपा करके भीरागजीके 
रणम से परीति दै ॥ ३. ख )॥ + 1 ष 
‹ शरी°-बुरि चंदि, खड. गन सतिम । मे चि -फाज दिने घा ॥ `, < 
॥ पर हिद हानि खाम चिन्ह देर । उर हरप- निषादं धेर ॥ १. 
अवर न सन्दे माछ इको प्रणाम का ह, जो विनां ही पयोनन अपना दि 
करनेनाखेके "मी पिक. भाचरण करते र । दूरौ हितकर नि ही जिनकी इर 
खभ दै, जिनको वूररोके उजढने् हप ओर क्छनेे पिषाद रोता रै ॥ १॥ ` ` 
हर॒ जस रकस राहु से । थर -जच्न भट सहसवाहु चे ॥ 
जै पर दोष ऊं स्सा । पर हित घृत भिन्द क मन मास्व ॥ ९ ॥ 
ने दरि ओौर इरे यदयर्पी शूरिममरे चरमे व्थि राह समान है ( धरयत, 


थ # समचरिदमानस ॐ 


रतम्‌ विशय खे यथम वणेन शेता ३ उषी वे बधा दते, 0 
(११. दुम समान 1 । च सूत भम ह 
त्‌ जिर प्रकार्‌ मवे 
५६ ङी परर दुट ओग दूो$ केचि भो धपती हनि कके भी 
तिपा ॥२॥ ~ 
६८५ रोष मदिरा अप्र अयु धन चरी धने ॥ 
प्रद के समर सवि सही के छंमकरन्‌ स्फ केवत नीक ॥६॥ 
रो तेन (वेमो शाट जाप) पै भग -यैर गोष पमाने सपान 
प मौर असुमर्मी घनम केरे सपरन पत्र है, गौ दती द विमा 
जस्‌ कले शवे हु (पुनर तीरे )$ समन द, मौर निनदे ममर्ष तख 
सेवि सलेम स्मर ६ ॥२॥ 
भ्र धक डि घु प्रस । निमि पिम उप हृपीदकिषरहं ॥ + 
देदईं रः जव दपं परोप । सस भदन धक्‌ एर दषः ॥२॥, ^ 
ओम भेट देता नाय के धाम भौ गर भति £ चैवे ¢ मे दूषरौका फाम 
पिगे तथि अपता दरद छोड देते ६ भै र्हा मृखवाे ] रपी 
पमन ककर गमाम फरता ई; जो पराये दोषोका एर पसि षडे रोके हाय 
क ते६।४॥ ^ 
शमि प्रमद शयु सगानः \ एर अभ सुन सदस दरं फनः ¶ 
यर स सम॒ विचय देश 1 सेत पुरानी क्िनि=मे ॥५॥ 
पुनः उनके राच षु ( लिटोने मवा व उुततेके हिमे एष हनार एन 
मग भे) ड स्मान जानर ्रगम ऋते, ओ द्र श्वर पनेर दूर परक 
ते 1 भि एके समान मानकः गय विन कलत द विनो एए ( मिग ) 
गी. भौर हकार गाम देती ६ [ हके ध्थि भी नीक मधति देवतार्थी 
मेना पवक है}॥\॥ ४ 1 
श्वन्‌ धद शेषि सदा पिर सस रयन पर दोष निष्ठता ॥ ६] 
जिनो इले! वचनी वन्न षदा प्या कगता श गोर जो एमार वशि 
एत दोपमे देते ६॥६॥ व 
भै०-व्ठसीन भरि मीत दित छन सरः खर रीतं । 
आनि पानि शुम जरि जन पिनदी फण्‌ सकत ॥४॥ . 
डन यह रतिर 8 ब उदादीन टु अयवा पिषः किदीकन भौ हित सुक 
जम {| चद जनक दे शय चर दद न रेपः उने विनय कवा ६ ॥४॥ 
चमे भप दसि परनदो । ए निभे लोर र छाडथ भो ॥ 


पायस प्रि ऊति निरामिष ऋ्वह कि 
त 


एल्दु षे थपनी बोखे कमी न वृणे | 

। ^^ 11 
"वदै संह अक्रन ` चनः | इप्‌ उमय वी ऋ वल ॥ 
ष भू मान शि ही । भणत एक द दन दे ५२१ 
सवर गोर जर दनक पमी बदन कला ह देनो कुल दषाे 


# यारुकाण्डं ७ 





& परन्दु उन छ चन्दर कहा गवा ६ । बह अन्तर ह है मि एक (संत) तो भुत 
समय प्राय र ते जौर दूरे ( भरं ) मिलते द तर दारण दुःख देते है (अर्थात्‌ 
संका मिुदरना मके समान ुःखदायी होता है ओर भरता मिलना ) | २ ॥ 
पजं एक संग जग ॒म्टी । नक जोकलिमि गुन बिग 
शुषा सुर सम॒ साच असाधरू। जनक एक जग जर्धि शगाधू ॥ ३॥ ^.“ 
योनो.( संत यौर अंत ) जगत एक घय वैदा हेते पर [ पकं साथवैदा 
नेवा ] कमर ओर जककी तरह उनके शुग अलग-अलग हते दै । (कमर दरंन 
ओर सर्र ख देता दैः किन्तु जोक ग्ररीरफा स पति ही रक चू कगती है | ) 
ध अमृते एमान ( सूुरूपी संखा उवारनेकल्म ) शौर षष मदियङ्े छान 
4 मोह प्रमाद ओर जडता उसन्न कलेषाल्म ) है, दोनोको उलन कलेयाहा भगतूरूपी 
गाध समुद्र एक दी [ धाशोमिं समुद्रमन्धने ही अमूत ओर दिया दोषी उन्न 
अतायी गयी दै] ॥३॥ - 
भक धनभठ तिज निज फरतूती । एहत सुनस् अपकोक बिभूती ॥ 
धधा पुधाकर सुररि साधू. । गरं गछ करिमरु सरि व्याधू ॥ ४ ॥ 
गुन भवगुन जानं सद कोद 1 जो नेहि माच नीक तेहि सो ॥ ५॥ 
भे ओौर हर गपनी-भपनी क्रनीके अनुर्‌ चन्दर बन भीर चयी एमि 
पति है । अमृत, चृरमा, गन्नाजी नौर खु एवं विषः अभि, कषे परो नदी 
अर्थात कर्मनाशा जोर (ता करनेवाला व्याध, इनके गुण-अवरुण सव कोड जानते £; 
कु जिते जो माता दै, उपे बही अच्छा गता £ ] ४९ ॥ 
दो“--भलो भलि पै लहर छहर निबाहटि नी । 
, ` श्वधा सयहिम अप्रता गरं सरादिभ ५ ६- ५॥ 
मण मलाई ही प्रण करवा है ओर नीच नीचता षौ रग रवे रता दै | 
यमतप खरामा ममर केम ती दे मौर विष मरने । ॥ ५ ॥ 
शोण भूव सुन साघु गुन माहा उमय॒ अपार उद्धि मनगाहा ॥ 
चषि त क शुन वोष बखाने। संष्ट स्या न ॒धितु पएषटचाषे ॥ १ ॥ 
इकः परो मौर अवयुोकी मौर सुक दर्षी कयाय दोन घ अगर 
शीर मा उष ई । इस गुण मर दोक वनो गभा-ै ्किविना 
पह्वानि उनका रहण या त्य नक्ष वे सकता || १.॥ (1 
भक्ेड पो सम बिधि उपाए । शनि शुन दोष चेद्‌ विरगाप्‌ ॥ 
की( वेद॑ इतिहास राना । बिधि भरं युन धदशुम साना ॥ ६ ॥ 
~ भे) रे समी तरहङिपेदा यिद ६ पर ध दोषोको विशरार फरवेदोनि 
उको .अ्गा-मल्ा फर दिया दै । वेद) इतिमे जोर एुराण कते हयक यड 
चषि शुगर्युेसि सनी इहे ॥ २ ॥ क & 
इल सुल ९ पुन्य विन राती 1 असाच माति ऊती ॥ 
दानव देब ईव अर नी 1 अमम सुनीवतु मुं मद ॥ ३॥ 
माया ब्रा जीव ` अगदी । उच्छं शरुच्छि रंक थननीसा ॥ 
"~ कसी मग ररि क्रभनास्रा । सरं आरव सहदेव चासा ॥ ४ ॥ 
"खरग नरक ` अधुराय विरागा । मिगसोगम गुन दौप॒ विभागा ॥ ५॥ 
दःस, पोपममयः दार) सुगा; दानाः दानरदेवाः 


1] ॐ रारपसितमानद्ध £ 


------------------------- र 
नी, अमृतवष, सलीयन ( शुत जीवन युः मागार, जीषर्दशरः 
स क क सर्‌ा रा 
का लव॑नरक सनुमः [वरम वदां रान दधत द] दालन 
उनके विमा कर दिवा दै ॥ ६-५॥ 

दद्‌ चेन शुन दोषमय विख न्द्‌ करतार 1 
संह ख शु गिं पथ परिरि वारि विकार ॥ ६॥ 
हिषे दः ्-देदन विमो रुणःदोषमय स्वा है क्रु संतस्मी हए दोषरुमी 
सतो रोद णर दूष ही ग्रण फते र ] ६] ध 
शवौ दियेक ज्यः दे विधाता 1 ठव उलि हष गुहि मसु रत ॥ 

कमर घुमाठं करम 'ा । भट महि बरस मरा ॥ १॥ 

विधाता जव द प्रकारका ( देसल ) धवेक देते £ तथ देको सेर 
मम गुते शत्र हेता है । काह-्वमव यैर वर्मी पवल्ताति मठे लोग 
(षष) ५ माये व शेर कमीमौ साति भूक जहि दै ॥ १ ॥ 

सो धारि इरििर सिमि द दकि शख दोप विमर जप देहौ ॥ 

खट एहिं भ एई सुगू टद्‌ घर सि समार अरग ॥ २ ॥ 

भवान भकं यैदे उख चूको युमा छ र भौर दुःखोप मिगकर निम 
येते, पैठ दु भी कमीतरमी उक्ता रंग पाकर मनाई करते ६; परत उन्न 
केपी म॑स नू हेनेगा मरिन स्वभाव नई भिता || २ ॥ 

(ति छेष जय चक जे। पेय प्रताप पू तड) 

यधस त न होड किवद । करनेनि विनि रेवन राट \३॥ 

श [ यष्मरौ ] ग है, उने मौ अच्छा ( सुकरा) केप पतये देलक 
वैफ प्रतापे जगत्‌ पयता हि पटर एकनएक दिन पे चह गा ए भते दै, 
त्ताः उनकु कद गह निभव) रे कने, रवो सैर रहर ल हुमा ॥३॥ 

धिं डे सश्च , सनम्‌ । निमि शम्‌ साम॑ धम्‌ ॥ 

एमि इग सुगति एय । योऽद चेद विदित स कू ॥४॥ 
,. केष वना नेष भी शाका समार ध शेवा है भद. लगति प्ाणनान्‌ 
भैर पगली दा] संतं नि ओर भे सगे जम देता ४ ब वात 
धेर बद दै ओरी लेग ए बते ह ४॥ = 

मम चह रथ एवन रदं । दीदि मर्‌ नीच ज संगा ॥ 

ण ज ल तरर मद कत १०१ 

प गे शूरं यमय च वदी द मौर कही नीच (वेशी नोर 
वारि) चे संते कीत ठ मती £ | चे षडे त 
इषित ¶ भोर जका पञ तेतना गमनः गाल देते ई ॥ ९ ॥ 

धूम इगति आरि पेद हिलि राम भंड अदि सो ए 

के र धर्मो चछ मरा गं [ पथे 
वे ए त म ही ों [ ठप ] नर स्य 


श अ जीर वदी शरभा सेट, अग्दि मर पने 
गद ह मरो नील दाय वन गरा ॥ ९१ ६ 





# वारकाण्ड % ९ 


शह भेषज जलः पवन पट पाद कजम सुमोग । 
दों वस्त सवस्तु जग ठव घुटच्छन ठग ॥ ७ (ॐ) ॥ 
अह, ओपथि, ज, पाट चोर वह, पे एव भौ कग ओर इय पकः सलाम 
हे भौर मे पदायं हे जते ह । चतुर एवं नचादधीर पुर इइव वातो जान 
पते ६॥५८(क)॥ 
सम रका तम पाख दुं नाम मेद्‌ विधि कीन्ह । 
ससि सयक पोपक सुभरु्धि जग्‌ जस गपजस दन्द ॥ ७ (ल) ॥ 
मरीनेके दोनो लाम उलियाटा यैर अधे उमान ही रहता है, धर 
विधाता नके नाम॑ मेद कर दिया है ( एकक नाम शृङ्ग ओर देका नाम इष्ण 
स्र दिया ) । प्क चन्रमा वदनि जर दृररेको उरुक पयनेाद्य 
समकर जाते एषो एव र दे अपश्च दे दिया ॥ ७ ( स) ॥ 
जड. चेतन जग जीव अत सकल शाममय जानि । 
वदरं सव के पद्‌ कमर सदा जोरि छग पानि ॥७ (ग) ॥ 
गगृतूमे जितने. जड शौर चतन अष ह. एवो यममग जानकर य उन स्वके 
चरगयमोकी स्दा दोनो क्वथ गैदृफर वन्दना फरता ह ॥ ७ (>) ॥ 
व , दु नर नाम खग प्रेत पितर संचर । . 
वंदृ क्िनर गजनिचर छपा करहु अव थं ॥७ (१) ॥ 
देवता, दैत्य, मुय; नाग पी, रेत, पितरः यनधर्, भिकन भौर नि्ाचर 
एको मै प्रणाम करता हू । शव स्व गृह्पर कृषा कमि ॥ ४ ( ष ) ॥ 
ची०-भाकर धारि लास्ल चौरासी । जाति जीष भर यक भम चासी ॥ 
सीय राभमग्र षय जग जानी । करर श्रनाम जोरि छग प्रानी ॥१॥ 
चौरादी खाल योनिम चर प्रकारके ( सेद) जण्डनः उग्िन, नरु ) 
लीव जक, प्रष्वौ ओर . आकारा रक्ते ् उन सबसे भेर दए इ शे नगत्को 
भीीतताराममय नानकः मै दोन हाथ शेदरकर प्रणाम करता हँ ॥ १ ॥ 
जानि पाकर कंकर मोष । सथ भिष्ि करहु खारि एर छेष ॥ 
, निज दुभि बर मरोस मोहि ना । हाहं विनय रर सय पादी ॥ ९॥ 
, , श्वम भपना दाष नकः पाकी सान"आप तब लोग पिव्कर छर छोडकर ङृपा 
कीनिमे । मुर अयने उुदिवहफा भरो न है, शठीवमि मै सवते मिगती कता हं ॥२॥ 
† शरन शई रपति गुन ॒गाक् । डच मति सोरि चरित अदगाहा ॥ 
सूष्ठ त एड र्य उफाड।मन मति रंक मनोरथ राड ॥ ३५ 
„ ` यै भौरषुाथनीके योणोका वणन इना चावां ह परन्.मेरी इदि छोयी दै 
जर भीरामभीका चत्र माह है । इसे चयि शक उपायका धक भी थग अर्यात्‌ 
कठ ( टेमात्र ) भी उपायः नही पृष्ठवा । मेरे मन बौर हद्धि कंणल ठ ति 
मनेदथ णुतादै॥ १॥  “' ४ न 
॥ असि नीच चि ठचि ठी! चटिमरजमिन जप रद्‌ न छदी ॥ ` 
, एमि सनन - मोरि पई । सुनिहटिं यकवघत भन रदं ॥ ४५“ 
रौ इद वो अत्यन्त नीची दै ौर अह यदी ची चाई तो मथव पी 
ष, पर जगत्‌ बद्री अछ भी नह| ऽन मेरी दिगो धमा रंगे मौर मै 
सारवचनोको मन ठाकर ( ्रमपूरक ) समे ॥ ४ ॥ 


७ $ शमद्रितमानस मै 





दिर परह षर इगि । 9 प पपत भूषनधारी १५ 
जैद यय न ते ज बरव्त द तो उठ गारा उने यर 
उ 8द ट वः हेमिग ले ओ द वन गल 
सते परण य रे ह ( यथात्‌ मने परम दोय दी प्रगते ६) रगे ॥५॥ 
नि कविर दे दय न नक । सर शट अधना अति केका ॥ 
- ञे एर भवि नन एतया । ते घर पप बहत जग ` सा ॥ ६॥ 
सदी शेना शलन्त की, अपनी एषिता पिने यच्छी नी खातं ए किनि 
ज दु स्वनातो इनक त चेते ४ एते उत्तम पुर जग दहुव न ६1१५ 
भग हु नर सर परि सम भ मिन चां रह चठ पे ॥ 
सनम्‌ एह शष पम खेदे दलि एर वि एषे यई ॥ :॥ 
ए माई | कार्ते ताव भौर नदि रने रुनं री अगि भो जह 
प वन कत ६६ गप करीन उतत द्रो) तव 
तमो ए भि उन रेड ६ ओ वनम एं सकः (कर उत 
४ ) उ न ॥७॥ 
"मम्‌ टोट अभि यड्‌ कर्डै एक त्िखास 1 
„ ६ इल्‌ नि एलन सव लद शि रपाल ॥ ८1 
भत ण न ६ सैर ए भुव बडी र, पड ये पपिर ‡ पहर 
नक्र इन ही सुद गे चौर दुए एमी उद्र | ८ ॥ 
५-उठ परश हद्‌ दित ने । काके छि उतत ग्रो 1 
कशे व दृष्टः इह । हिरि उलि बभौ ॥१॥ 
कि व ईद रर ठ ६ पण ! हर उणग कोयकरो करये 
चने यदे १13 हो मौव म्पीते हे न दमन 
५. +~ ै।१॥ 
भं रत १ पम एद ट! दिद ध्यै सुद्‌ ए 
भाषा निति भोरि मति मे । रे चय 9 २॥ 
_ अयतो प्रह रई ओद म विलय श मचनरमीर चः 
कमक पद हखिषठन्ं कय देगी | प्रथम्‌. 
द ति ९ गेव रै इष्टे ड से योव प 8 म उ 
भु मदपरीतिन सुधि कद । तिन नि 
रि पद्‌ रद मति न इतर! 9 ॥ ॥ 
(५11 
गी ¡ जिनी शरे (गक विषु) जौर मीह( भगश (५ 
क मौ विते इदि इलं कतो नह ह (न व 
उनी कमान नकी कते), उन शरद्ुनाथरव्ष य कया मीठी 


६1 
धम्‌ भग चिते लि जनि । निदि लन प घुकनी 
विद्रा दू ॥ ४॥ 


म ने ढे पि कन्‌ प्रवान्‌ | रण्ड च्छा भ 


ज यकं च्च सोतरि धते ¦ दुत दित सन पिति धर माता ॥ + 
ह ¢ 











क चाठ्काण्ड $ ११ 


से्नशण इस कथो अपने सीमे श्रीरमनजीश्री भक्तिसे भूषति जानकर सन्दर 
, वषे सदना के ए गे] मै न तो कथि हू न वास्यस्ववामि कौ इह ह) ई 
तो सम काभ तथा छव वियाञेषि रव हूं ॥ ४ ॥ ^ 
भाखर रथ भलंङृति नाना । ठंद्‌ रदे अनेक विधाना 
भाव ॒भेद्‌॒रव , भेद अपरा । कषित दोष गुन मवि प्रकारा ॥ ५॥ 
ताना प्रे अक्र; ययं घौर अल्ार, अनेक प्रकारकी हन्द्स्चन प्रयौ 
शौर तौ सपार भेद ओर किवत ेतिमभेपि गुण-दोष हेते दै ॥ ९ ॥ 
कतित बिनेक गु निं भोर । सत्य कदर फिसि कागद करं ॥ १ ॥ 
रे फानयसम्बन्धी एक मी यादशना ञान मे म ह यह मै कोर क्गनपर 
सिला ( शपदरक) सतय-सत कंडता हँ ॥ ६ ॥ 
दो--मनिति मोरि खव शुन रदित बिख विदित शुन पक । 
सो विचारि चुनि सुमति जिन के धिम विवेक ॥ ९.॥ 
ती वना रत्र शुवे रहि दै; इँ वठ, का्ष्दि एफ शु रै । उठे 
पिचारकर मण्डी हिषे पर, निन निर शन द, एको दगगे ॥ ९ ॥ 
ची-एदि मह रपति नाम उदा । अति एवन पुरान श्रुति सारा ॥ ' 
परग भवन धर्मम श्री । उमा सदत नेहि नपत पुरारी ॥ १ ॥ 
द्म शीरषुनापजीफा उदार नाम है, ओो अत्यन्त पवित्र ध वेदपुराणोका खर 
हि याणका भवन द ओर अमद्रलोको इवास दै, च्वि पावती भगवाद्‌ 
वभ सदा भा करते ६ ॥ १ ॥ ' ^ 
भमिति बिचि सुदि इृत.जोऊ । राम नाम बिनु पौष्ट ग सोक ॥ 
मिषुवदनी सब भति सैनारो । सोह म षन निमा भर नारी ॥ ९1 
जो मन्छे कवि दवाय सी हृं बी अनी विता हैः ह भी रामनाम 
मिनि शोभा नीं पाती | नेते चन्र तमान गुदठवाली इन्दर स्ली सव प्रकारे 
सनित दोनेपर भी वै प्रिना शोभा नदीं देती ॥ २ ॥ ^ 
ह शुन रहित कमि कृत बानी । राम नाम जेस अंकित लाने ॥ 
सादर कहि घनं इष भादी । मुर म "क 
„ इफ विपरीत, यिद स्वी हई ख गुणो क भी, रामकै नम 
वं तेयद जान; इध्‌ शये भारक ले बीर ने योभि 
संन मैरी भति रुणदीने प्रण फलवा ई॥ ३ ॥ , < 
“ बदुपि कथित श्म एकड बरही । रम मंताप भरट पि माही ॥ ` 
, ८ सोद भरोल मोर मन" आवा । डि न धुंय बहन पावा 1 ४५ 
गपि भरौ इए र्नाम कमिताका एल भी रसं यी, तवापि इट ओीरोमनीका 
रा प्रक दै [रर मने यही एक मरोसा है मले खगे मल कने बहेयन गष 
पाया१।४॥ ` एः य 
;, . भूद "तद स्न , कर्मद । गरं प्रसंग शमय यसा ॥ | 
“तिति शदैख ब्द सङि परी । राम छथा जग मंगठ इरनी ॥ ५॥ 
, मौ भी अगर दंगे गन्धव हकर मपे सामविकं कुनपनकनो छो देवा 
1 मेतं कता जय मद परु इमे बग र्यं केषा रासभी 
उपम वल वन वा गय है । [इ यद भी जच व सची यती ]॥५॥ , 





६२ + राम्चदितम्पछ # 

द > यवस १ ------ 
ठ ठ पलि यल हति हुख कथ रनाय कौ \ 
11 

प्रु दुल संमति सनिति महि हदि चरन्‌ सत सानी । 
भर अंग भूहि चलो समै सुदिप्त चुरावनि ५८५. स्नु 
रयाव के ६ सीन क कलकलारीौर ु 
पलल 1३१९३ सची न शा पन = 
दी) क चली मह २ द । भु आनत इनदर क परे यह 
(ग्री) दी चाच्छी भति चठ श्वानद्ग 
मिस तुः तप सद मरको मनेवादी शे जयी । धमान परि यरे. 
म भीमवय यग सगे दवन रगत है धौर सरम कवे ही पविग्र 
बरी ती ६1 अनिति 4 
सि जति रहि यम भगिति सम अष संय । 
सत विवाद निक छोड दद्विग ख्य परम ॥ {० (४) ॥ 
गमे वते करौ कव रमी अकत रम सोमी] ॐ8 मरय 
परते मने शवाय [ सन वमर ] कदलीव हो चाहा र स्या कोई 
दाद [ कुना] र तिजर कता {॥ १, (क) 
स्थाम रमि पय वरिस सति युन करहि सव पान ! 
मिया भ्राम्य सिद गम लक्च महिं छन घनान ॥ १०८स)॥ 
पामा मौ ली देप मी उसा दूष उल्ल भीर बहु गुणक शहा ६1 
य ख सव लोग उदे पति ई । श्ट तद ववाह पाते हेनेपर श श्री 
गग यर दिन्‌ जेप इदे घ त भरर इनते ई ॥ ९० (श) ॥ 
शनि गिक सा इय षो 1 जहि मिरिगम दि सोन तै ॥ 
यृ केर वलौ न्ड प । उशी खकठ सोभा अधिका 1 ९॥ 
मग सपि यर मोती जवी नद छे रै, ट लोग, परमत मौर एषीके 
मखल्पः ६५ यो न र ! पाकर दुदट शौर नवयुधतौ म एको पाकर 
मेन्‌ अगि पने प्रहत है॥ १॥ 

एनित बुव रदं । उपदि नत सनत इषि री ॥ 

म; टि तेन दिद ! मित छद्‌ भाति ध ॥ २ 1.4 
इदिमान्‌ टोऽ कंठ है फि इक कविता भी उस्र भैर कही 

गोम अन्य न्त पवी ६ ( य्त्‌ कको कणी उरश हूर कविता 

र मउ नार परार तया दके ्षथिव मादयन श्ण ओर 

3 सख के ई उव मक्कि ार सरी बर्मेक- 

माही ६॥६॥ ~ 

यम चरि शर घ्टु समवा खे म अद्‌ न कोरि उपम ॥ 

ममि सगि म एव्ये विद्यसे । गाव इरि चह कडि म हारी ॥ ६॥ 

दोडी भनेर पहं पञ स्रचरितस्पी सुरों न्द नह्ये 
उमम भर दूर न चेती । कये मौर पण्डित भगम हृदं षा 
> पोच हनति भी क्श ही गान करे १ ॥ ३ ॥ 

= पत न सुन नाना । निं नि पिर कमत पिकना 

इवय श नमि सीप समान} सूति सार कट सुवाचा ४४॥ 


















# बालकाण्ड # शद 
संसारी भनु गुणगान करते सर्वतीजी पिर शनक परताने ठ्गती है 
[भियो इ इलनेमर आयी ] ¦ बुद्धिमान्‌ चेव ददद स्र वृदो चीप 
भौर पखतीफो स्ति नक्र समानं कहते ई ॥ ४॥ = :. 
„ अओ बषट्‌ यर वारि बिच । होड कवि सुतामपि चार ॥५॥ 
इमे यदि र्ठ विचारस्पौ जर बररता टै तो गुकतामणिके समान न्दर 
कमिता हेती दै ॥ ५॥ 
दो०~शखुगुति वेधि पुनि पोदिर्भिं राम चरित बर ताग । व्क 
पिरि सल्नन विमल उर सोमा अति अग ॥ ११८ 

' उन कविगाल्पीृक्तमणियोौको युक्ते वेघकर पिर रामचरितरसूपी दन्द्र तगे- 
भ पिर सन टोग अपने निर हदय पारण करते ई, निरते अयन्त अतुरय- 
स्मौ परमा हेती है (वे भाल परमो भ्रा शेते ट) ॥ ११ ॥ 
सी०-ने जनमे फिकाक कराला । वर्थ यायक वेष॑ मराला ॥ 

चर्त छपंथ वेद्‌ मग॒र्छौदे। कपट कटेदर कि अख भदे ॥ १॥ 
जो रा फलिग जतम ई, भिनी करनी शपे समान द ओर वेष हंसा चाज 
मेदमाग॑मो छोदकर छापर चरते है, नो कपटकी ूति भौर कल्यिगकेपापोर मदि ६॥१॥ 
भच भगत शाद्‌ राम के। किंकरं कंचन कोट काम कै ॥ 
तिद म यम रेख भग्र सोरी घी चरम भक घोरी ॥ २॥ 
जो शरीरमनीै मक्त कदलाकर लोगोको ठगते है, नो घन ( लोम ); कोष भर 
भामते युम दै गोर बो धीर्थगी करेवा, परली (घर्म श धना 
पानेवाक-दम्भ ) धर पटक धनदा बोक्ठ दोनेवाडे ई, संशा धते छग 
खतरे पे भेर भिनत द ॥ २॥ 
जौ अपते अवगुर्‌ सव क । बद्‌ कथाः परार नदिं ठ ॥ 
ते भ भति भ्य वसाते । धरे मै सनिष्षिं खयाने ॥ २॥ 
यदि अपने सव अबु कने लगँ तो फथा बहूव भद जायगौ बौर ओ 
परार न परागा । इरे मने बहुत कम थवदुर्गोका वर्णन किया दै । बुन्‌ लेग 
यदम समन गे ॥ ३ ॥ 
सघु्षि यियिधि-षिधि भिनती भोरी । कोठ नं कथ सुनि दे सोरी ॥ 
पुतेट पर कदिद्टिं जे भसंका! मोहि ठे मधिकते शद मति रंश ४४॥ 

.. मरी अनेको प्रकरी विनतीको समक गोहं मी इख शया सुनकर धुव 
नही देगा । शतनेपर भी नो शंका करगे, ये तरो पुरे मौ मधिकं मूं ओर 
इवि कंगाल ॥ ४॥ ध 

कवि न होड नहि चतुर दाद । मदति श्लुरूग शस शुन गावे ॥ 
केटः `रुपत्ति ॐ' घरि अपार । करद मत्त मोरि निरत संस्र ॥ ५॥ 
“~. नं लोकि दः न चतुर कहता हू अपनी बुद्धि अदुखार शरीरामनीके गुण 
माता हँ । फर सो भरीरघुनापचीके अपार चरि, करो सशरम आसक्त मेरी शुद्धि ! ॥५॥ 
लि माक्त भिरि ० वृर केष स म्‌ क 
समुक्षत ' अमित राम 1 रत. कय! मन अति द्रा ॥ 
भिदि दुेए-कते पड उड़ जते है, पवितो" उसे ममने सुं किष गनत 
दै। शीरामनीकी ससीप भयुताको समशचकर का रचने पेयमन शुत दिचकताहै--1९॥ 





 । # सषददतिपलख # 


' "शद रद श्ये दिधि अमम निगय पुरन । 
शु रि विर गा १९५१ 
सरसी प, धवी रहै, शा वेद ओर एपम--प भुय 
मेषि प मातिषि सदी" कटे इए) दा निनकी 
करिया पतेद॥६२॥ ` 
ध समह षु त पो । दपि कटे मि र न॑ कोटे ॥ 
त के धच छदनं पल) मन प्रभा मेति वहु भशर ॥ ४४ 
` दि प्रषु भमवनम प्रषरणे स पेवी ( कपनीम ) ठ नने 
दि दिन पोट > र} एो टे त र वलया ६ किथतम 
प्म वदे गग ६ (भार मपा पू पन ते 
क्र मही सा; पत्‌ दर लिला यन पदै उदन मरायु रुषगान श्ना 
जे । सयो मातन गुगगनसमौ मनन पम कं ही भगोषा ‰ उत 
मना प्रहे र्मम दे वदास भौ भगस भवन यदुनभे सतत १ 
भवर ष देत ह । ) ॥ १॥ 
णुके जरीह उदम शामा । पद॒ सदिद एरधामा ४ 
व्यापके विटप भययानो तें घरि दे६ रित एह काना 1 ९॥ 
ओ पमे ए ४ भि भ ता र धिका वों सए भीर नाग 
नं £ जो गलता, सचदनन्द जर परमणम ह बौर मनो स्वां व्यापक ए 
विसम उन भगा दिप चीर बार कके नान प्रकी मीय की ६ | २॥ 
षो वेम मग दिह छागी 1 ष्टम पष प्रगत पुरारी ॥ 
वेदि एन प समदा मति छो! म ना फरि कीर न मेर्‌ ॥ 3 
पह मरत दि धम श द्योम्‌ परम एमा है मौर 
परग पमी द| निनी मक्तेपर धद ममता ओर र १, पन्ते एक 
कानि पा इए, उस्र सिर एमी पोष गह छिद | ३॥ 
गै होः गरव ` दाद्‌ । छ खवर रिव रुम्‌ ॥ 
ण बं ६ अस शर सर्ग} सषि एुनीष शु तिय धानी ॥ ४) 
वै अरु भीूराथसी गग इ इ शरि पराह करमेवाढे, शरौयमिवान 
(कप्‌) स्ट्लमर संशम्‌ यैः स खामी १ । यही चार 
उदिन्‌ 7 उन शीङ क व पर; जप वापी परित भैर उप फर 
(गीष बेर द्म गतयः ) नेम कति ६॥ ४॥ # 
वेज रपि चन गाथा । किष ताद्‌ रास पद माया५ = - 
सिः यप हरि पौएहि र । तेहि मय भरत सुर सोहि साईं ॥५॥ 
छदी वे (दिम यया वन वरह, पु मार्‌ प देतव मभ 
अकर भगवा कपर ह ) प गरीया रोपे दिः नाक शीरुनाथ- 
यत नोषौ एथ हप एरी सिव { स्मि म्प भादि एरिये प 
क सौतं गाी ह| माई {उ म॑ जहना ये वि दुय शेर | ९ ॥ 
योहि भर ने खरि वर ओं "शूप सेह कराह । 
जहि पिरीडिकड एरय स जद अम परह आदिं ५१९॥ 
` चै भवन् दी ९ नदिय यि सा उनः क पै रै तरे भतम 


# ारक्षाण्ड.# १५ 


छी र्यो भी उपर चद्कर बिना ही परिममके णर चरी जाती है [दी प्रकार 
निय वने सहारे दै मी भीरामचरतरका वर्णनस्य ही कर दगा ] ॥ १३ ॥ 
ो०-ष्टि प्रकाद थक सनहि देखा ! करिह रधटुपति, कथा सुदा 1 
ध्यास शादि कमि धगज नाना} चिन्ह साद्र एरि सुजस धाना ॥ १ ॥ 
इ प्रकार मनक बढ दिकलकर मँ भीरखनायजीदी दुहावनी कथाकी रचना 
रगा | भा आदि जो जने र्ठ कमि हे गवे £, वदने वे आदरे श्ीहरका 
शु वणन संवा दै ॥ १॥ प 
` श्चन कमल वेद तिम्ट कैर । पुटँ सक्छ मनौरय मेरे ॥ 
फष्टि फे फथिश्ह फर पनामा । भिन्द वरते रषुपति गुन भामा ॥ २॥ 
^ ओ उन तव ( ष्ट कियो ) ॐ चरणकमलं पणाम करत दूबे मेरे सव मनोरौ. 
श पूरा कर । कंियुगके भौ डन कविवोको यँ प्रणाम फपता ह, निनहेनि शीरधुनाथ" 
जी युणवपूरहोका पणेन विया है ॥ २॥ 
ज्ञे माङ केष प्रम स्याने । भौं नन्द हरि चरिते याने ॥ 
"शप्‌ जे जद ओ होदि आ । भनवडै सवदि कपट सव त्यागे ॥ ३॥ 
जो यदे शदधिमाद्‌ माहव कमि दै, निर्ने ाप्म रिचरतरोषा वर्णन का 
ह) नो पेते कवि परे दो ई, जो स समय दर्मान ह बौर बो जाय देगि, उन स्वको 
म षार कपट त्यागकर प्रणाम कता हू ॥ २ ॥ 
शे अलघ्च देहु परदानु.। सा समाज, भनिति सनमा्‌ ॥ 
जो परषैध इष महि सादर । सो भ्रम वादि य कमि करी ॥ ४॥ 
आए सत्र प्रस शेकर यह वरदान दीयिये कि साखा भेरी निता 
गान ते; यकि बद्धम्‌ खग जिर कमिवाका आदर नदीं फे पूर कि ए उसी 
रचनाक व्यथ परिम कले है ॥ ४ ॥ ® 
५.८ कररति भनिति भूति भि ।सोई। सुरसरि सम सन कई हित दो ॥ 
राम सुकीरपि भमिति भसा । जसर्मनस अस मोहि भदेसा ॥ ५॥ 
कीति) कवि ओर सम्पत्ति वही उप्तम है ओ सज्ञाजीी तरद स्वका 
दिति फलेवाल् हो । श्ीरामचदद्रजीी कीतिं तो घड़ी सुन्दर ( एवका अनन्त 
कृसयाण फरनेवाठी ही } है, पट्द मेदी कविता मरी दै । यष अपग 
दै ( मथौद्‌ लन दोन मेह म ता) इतीर रे चिन्ता दै | ५॥ 
' श्ेष्दरी र्कम सोढ भरे। तिशवमि सुजनि यट पयेरे ॥ ६॥ 
पर ह कभियो ("आपी मसि यह्‌ यात मी भेर वमि रम शो सकती टै! 
कमी सिहर राछपर भी चद्यमनी छती दै ॥६॥ =, , 
दो--खरल वित कीरति विमल सोद अद्रिं छुजान । = , ५५ 
, स्ट थयर विरह रिपु. जो चुनि करा बलान ॥ १४८७)1 
“ चर एुपपए उवौ -किताका आदर कंपते हैः बो सरल षो घौर विषं निम 
चिदा, वर्मन, तथा नसि सुनकर शध भी खामाविक दैरको मुखर सराहना 
करेल] ९४ (क)॥ ` ॥ ॥ 
" “सोनो विन विमल मसि मोदि भति ब यतिथोर !  , 
' क्रु छया रि जस कदं पुनि शनि करं निकषेर ॥ १४८) ॥ 
ल कविता मिना नमेरन मौर मे इवा वरव ही नन 


षु 9 पग £ 


----------------रः 
दै क्कः 2१९ मे क 
(1 ध 
ि श < दुर च भख दु भरं \ 
यपत स ४३ गे प ध ए४॥ (४८1 
स दस । र द एप सतो न ठ १ 
3 5) ५५८ + 
क ड रक्षका यद 
111 
{ऊस ते चप द क करन रनर 
सत्र (डा) लर [दर (षोः) ? मि) 
वं प्रकरः १ येषू (र) प्र पौर भै र रद्‌ 
देहेर। १४(१))} 
इ बाद दे भव परि केशि मऽ । 
पिन सप क धः सुम विद ध्‌  ४(९)६ 
कोद सदय पठ चे गतत दे रे जके 
पातम नि गेपः च संतन रते (दमः) 
५११५६, धः 
4 पुन ५ 
षर हि पदो ख पि ५ 
पै प ददर फ, द ग्‌ शय 3, अवि 
एषेः भ कत कः प्व निमे पौ मः द मदूषहौ 
किगरगदश्व द।९४८य)॥ 
ए. वः बल रि क श शेर । 
कष प्र पः एड २ म्न मेर ११४) 
पत ह क, १ ए से इतो पर के ए पो 
श पकर तोदः तेग ९९ ॥ (३) | 
+र सै एत्‌ इण इ एत मद, च+ 
ल पत श ए एमा न एतं ए वी ॥१। 
पदमव मेश ऋं कत्त ई । षे फ 
भै सन ६।क (कै) लः पतेः क पतै पे 
11111. 
1.0, 
ष्ठि न्द षड सरां हेमु दिर तदे 
मे हा £ 9 (रपि उम इषेद४२॥ 
ष रेतस रेकु जैः हम१,द 
य भतल ध त त वरवे श सतै 
जै वतवते नटसतव िकते{ 16 । 
गरहान जसं सट र पव 
सि कद क उ वमद अठ ग शषा 


# बाखकराण्ड # १७ 


मित चिवपने $ख्ुको देखकर, जगते हिते लवे, छावर न्रपूहकी 
रचनां की, सिन मन्थो अक्र बेगेल है, भिनशन न कोई ठीक बर्थ हेता रै भौर न 
ज्म ध हता है, तथापि भीशिवरके अतापते चिनका परमाव प्रलकच है ॥ ३ ॥ 
खौ उमे मोहि पर भका । करिषटिं फषा सुद मंगर भूल ॥ 
शुभिरि सिवा सिव पा परसा । षरमद शम रित चित चाल ५ ४॥ 
वे उमापि शिवजी पु्चपर ्रखन शोकरः [ भीरामजीकी ] इस फथाको मानन्द 
सौर मंगली भूल ( असन्न फटनेवाली ) वनायेगे 1 इस प्रकार पार्वतीजी रीर शिवजी 
रोना सरण करे ओर उनका प्रणाद प्राकर मै चाभ चिते भीरामचरि्रका 
वणन करता हूं ॥ ४॥ 
भेनिति भोरि सिष कृपौ मिभातौ । ससि खमाज भिषठि मन सुराती # 
जे एष्ट फयषठि सने मेता । रषि निह सश सवेता ॥ ५॥ 
हहं राम चरन भलुरागी । ककि मर रहित सुगर भागी ॥ ६ ॥ 
मेदी कमिता श्रीयिवजीकी पासे रेशी सुशोभित हेगीः नेवी तारागण सिव 
चन्म धाथ रात्रि शोभित हेरी है| > इस केथाको प्रेमसरित एवं वानी 
आथ सपद्च-बूहकर करगे, वे कगे पपि रहितं गौर इन्दर सत्याणके भागी 
शषकर भीरामदुजीके चरणो भरेमी बन जर्वगे ॥ ५.६ ॥ 
दो सपने सावे मोहि पर जौँ हर गौरि पाड । 
तौ फर होड जो केर सव भाषा मनिति भरमाड ॥ १५॥ 
यदि गुरपर शीशिवजी सोद पातीजीक ससे भी स्थषठुच भसत छे) तो ने 
स माषाकमिताद्ा जो मभाव क द, क खव घव हो ॥ १५॥ 
चशे अवध धुरी अति पावनि । सच्‌ सरि कणि कलुष तसावनि ॥ 
भगवँ पुर नर नारि वहोरी। ममता चिन्ड पर घुषि न थोरी ॥ १॥ 
ति पतितर भीअयोध्यपुरी जौर कलियुगे पापका नादा करनेवाडी भीषरयू 
जदीकौ वन्दना करत द, फिर अधुर उन नर-भारियेक्ो णाम करत हू, भिनपर 
भ्रष्ठ भरीरामच्लीडी ममता योद नही दै ( भरात्‌ बहुत है ) ॥ १ ॥ 
सिय निद्क अध ओष भाप । छोक विसरोक धनाद्‌ वसप ॥ 
दुद कौसल्या दिसि भवर कीरति आसु सक जग माची ॥ ९॥ 
उन्मि { भपनी पुरम रहनेवाले } सीतानीकी निन्दा केबाले ( धोबी गौर 
उस तमर्थक पुर-नरनारियो ) ॐ प्रापदमूहछो नाथ कए उनको करदिति भगाकर 
कषपने तोक ( नाम ) म बता दिया ) म करत्यारूपी पूं दिखी चन्दना करवा ई 
जिसी ५ समसतं संसारम फर रही दै ॥ २.॥ । # 
जह रघुपति ससि चरू । बिस्व सुखद षङ फमछ चखार ॥ 
दस्रथ राड सष्टित सय राप । सुरत सुय भूरतति मानी ॥ ॥ 
छर अनाम करम मन बानी । क कृपा सुत सेच जनी ॥ ~ 
जिन्हहि पिरि षद्‌ मय विधाता । मिम अवधि राम पि माता ॥ ४४ 
इँ ( ोसस्यालप प्रं दि ) सेवि सुल देनवाठे ओर इष्टस्पी कमक 
षि प्के समान शरीरामचन्र्ीरमी सुन्दर दरम भक हुः । वं यनयो 
राजा दथ पण्य ओौर दुदर कलवाग मूतं मानकर भ सनः. इन भोर 
कमत प्रणाम का टं । जपने पुव चेक चनक्र वे युनचपर छग करः चनन 


गर घम द्- 


१८ ५ रितमानसं # 


~ ~~ 
स्क हादी म बा; परौ तथ लो पीपली मृता जौर पिता एनम भए 
मुहिम से १॥ ३४} ह 
से-द्रं जघ श्य सम 
` (५ -भू ज्छु पम श्व परिरेड ॥ १९॥ 
परैव र शीद्रयनौग वन्दना ऋ ह, धिनक धीरमते चरेम 
खवप था जीर भने दीद प्रु वदु अपने यर ्रसीरको मभू 
तित्न ठ साग वि | १६॥ 
+भ परिलम सिति विदे । जि रम पद॒गृए सने 
ग भोग स एवेर भो \ राम विषोकुत प्रिर सोद ॥ \ \ 
श पलार सज्‌ रनक प्रणाम कणा टू मिनन शरीरमसीम परणेमि 
शप था, निलन उदन गोग भोर मोग छिपा रसा धा, परु प्रीरमस्रवीको 
देखे द दह मक शे ग्या ॥ ९॥ 
अलवर प्रमम भरत के चनी ) जासु नेम तठ जाह स प्रना॥ 
रम अ पक मत जासू । हर मप दद रदे र पादू ॥२॥ 
[मायते] षे ठे ‡ भीमरतनीडे रो परपम फा ह) धिना 
तिव लैर रा ण॑ महं निवि जा सकता वा मिन्न मन भीगमगरै$े पण 
रम मी दत ठप हार कमी उन्न पन हे ॥ २ ॥ 
` पे उषिगिन पदु लफताता सीत भुम म सुण द्रा ॥ 
पति सरति म्कित पतक | समान मपर लस शा ॥ ३॥ 
प भ धम त शत हदः ौः भमो 
श देन दै {शुम कीतिरमी मम पताकां भिना { म्तपभैका ) 
प [परकश ठव के पणि] दंड पाम हा ॥ ९ 
पेत सैष श्यं कव |स चते भूमि भ यान ५ 


विनि एक भय ट केह समि यकार 
शोभ खानि इषाधि दीनन्दं शरणौ एकर सद प्रका ष्॥ भ 
पुन प पछ नमामो । दूर बीर भर अलुगरमो ॥ 
महारीर पिदर दृषुमाना } रम अदु स॑ माप चलाना #५॥ 
म भवन्मते चकमे रणम करता भेदे ए एवीरनैर 
शपसतनी पठ चलना ६1 महीर विनती शता ह मिक 
पभम सव ( धे शी) न का र ॥ ॥ 
शेपम पयनहुमार ख 


"कपिर रो निसा रा ।कंददादि ओ कस समाना ४ 
वदं स $ चान इए । नगरम रैर समे चिन्ह पर्‌ ॥ १॥ 


*# अखकाण्ड# १९ 


भानरोके राजा सुगरीवजीः रौ राजा जम्वानूडीः राक्षसे राजा मिभीषगजी 
ओर ंगदनी आदि जिना वानरा स्मान ह, स न्दर चरक पै षन्दनः करता 
हः निनदेन अधम (पञ्च जर राव मादि ) यरी भौ भरीरामचन्नीो पा 
करल्िा॥१॥ 
एषुएति चरन उपासक जेते! खग शग सुर तरं असुरं घमेते ॥ 
जंदूदै पद सरोल सन केरे। जे बिनु काम राम ॐ चैरे५२॥ 
पच, पी, दैवता, मलुप्य, असुरे जितने भीरामजीके चरणके उपार टै 
यै उन स्वकरे चरणकपलोकी षन्दना रता हूः नो प्रीरमजीक निष्काम तेव द ॥९॥ 
पुक सनकादि सगतं सुनि नारद्‌ भे छनिबर बिम्वान बिसारद्‌ ॥ 
नवर सवष धरनि धरि सीसा । करहु कृपा जन्‌ जानि मुनीसा ॥ ३॥ 
(८ शकेवी; सनकादि; नारदश्नि आदि नितने भक भौर परम शनी शरेष्ठ नि 
¢ भ धतीपर एिर येककर उन सवक प्रणाम कवा ह हे एनीशवरो ! आप ख 
शशको अपना दा जानफ़र एष कीजिये ॥ ३ ॥ 
जनकसुता नग जननि जानकी । भत्रिसय प्रिय करलानिधान की ॥ 
पाके शुग प्रद कम मरावरं। चासु कपौ निरमल मति एब ॥ ४॥ 
राजा जनक पुती, कऋत्की माता ओर कस्यानिषान शरीयमचन्रजीफी 
मितम शीजानीनीकफे दोनो चरणश्मलको मँ मनाता हू, मिनकी कते निम 
छदि पाड ॥४॥ 
पुनि मन वचन कम॑श्ुनायक । चरन कम बंदर सब यक ॥ 
राज्ञितनयन धरे धु सायफ़। भरत विपति भंजन शुखदायक ॥ ५॥ 
किर मँ मन) यचन ओर क्से फठनयन, धनुप्ायधारी, भो निपतत 
ना के भौर उन सुख देनेवाले मगवान्‌ श्रीरनायजीके स्॑ऽमरथं चकम 
वन्दना करता हँ ॥ ५॥ 
दो--गिरा अरथ छ घीचि सम कषित भिन्न न भिन्न 1 
वेदे खीता राम पद्‌ भिन्हुदि परम प्रिय लिन ॥ १८॥ 
जो वाणी जौर उस्कै अर्थ, तथा ज ओर जच्की ठरे समान दहनेन अल्य- 
अल्ग है, पर्त बासव अभि ( एक ) ई, उन शरीरीतारामजीक चरणोकी भँ 
बन्दना करता हः बन्द दीन-दुली बहुत दी परिय ई॥ १८॥ 
०-चेदेद नाम॒ राम रघुवर न्न । टे एंसालु भानु हिमकर करो ॥ 
बिधि इरि हरमय चेद्‌ रान सो । अर्ुन अनूपम गुन निधान सो ॥ १ ॥ 
मै प्रीरुनायजैकरे कम शामः की बन्दना कता ह, चे शानु ( ञ्नि ) मादु 
(वं ) मौर किकः ( चन्र ) का दे्‌ अथात्‌ ९८ अ' योर भ स्मरे वी दै। 
चह भमः नाम बरह्म विष्णु जीर शिवय ६ । बह वेदौ माण दै निग, उपमारहिव 
जर युणौका मण्डार दे ॥ १॥ 
महासर ओद्‌ अपतत मेस । फासौः षति देह पदेषु ॥ क 
महिमा जाघ्चु॒जान गनराड । श्रयम्‌ ॒पूनिमत ,नाम भमा ॥ २ # 
जो महामन्त्र दै, भिते म्र शरीदितवी जते ह चौर उनके दारा सिका 
उमदेध वीम सकत शरारण ३, हया मिक मधमो गणेन नते ई जो 
र "राम नाम पभाभसे हौ सवे पड पू जपि ई ॥ २ ॥ 





२ ‰ एम्चरिवणु्छ £ 


सद दु करि श्प षू 
म षु व इग पवनां ४१ 
गलते ममलम रना राम कने £) ये उ प 
(भव) भः } शत्र प दे । शिक क वदने इ षि एं 
प्या चाके यमे ए (विवीरा 
| ४२ 
(+. शे षे दे क्निदषरविपूषर वीपे 
नार प शार पिव शो । रल क्‌ भन > ५१५. 
11.1.49 
भैरर्वय पूलस (पिह र ) पवते आना भूम 
कनि! (अर्द्‌ ठम्‌ वमो म घल पे भ्वी कनि) | मके 
तत वधि भदे ऋते ति (ल) रण पर ते 
ऊच मब ए दिया ॥ ४] 
रेशा स सपति गति सलि धवास ¦ 
रमर नाह चट दल्‌ इम रादत रावं भष ॥ १९॥ 
अनप ग यट तीव पते द 9 उठा प 
बैर एम यसे द्‌ वक्ष यमनो मनि ६] १९॥ 
गर ग्द मे न 
भि सुम एत्‌ सव ऊह्‌ । छेक छा ५१॥ 
दोग वष ष्‌ भ मह £ ये स॑माब्प वरे म १ प्व 
शी रैक ररा तं सके १ द्म बै? एत हे १, ओर शे १ 
सेक दम भैर प्रेमी नित£ शे ई (जरद्‌ म दिम धमो दिन 
ए 1/1. ध 
ह । सम श्न एम १ ठौ दे 
त ह) ॥) ध नु 
छे भः कस कशत ¶ शे ($ र भर } र 
कृतर ते भीत सल मन ङ [च्व (१ भौरभद्) 
चेह कन इरत र विलत ह ( अयाट्‌ मन भ्र रश, 
शरं गः ९ दर). {य से भःम लप समक्त 
पौल स्र (षा खक बैर एष } [२॥ 
रए षन सीत सुता ( धा एक दिदिषि गश्रय ,“ 
भवि ति न? क्ल पिद । शादि पमः शत ॥ १॥ 
३ व प भ्न स्मत इद मां १, ३ उम पा भैर 
ववने ले ते! वे मलग हदः स मन इव 
भक्‌म (अ) मे चे सिहर गं वदरम यैर दं ॥ ३॥ 
प्‌ केष उ इरि इवा कप ए पर्षा ३४ 
उक भत मेह ग म ३। ऽ तोति इ एश्‌ पे॥ 91 
इय्‌ (मेव) सम दे सौः दशय, छम नैः 
मषी रे शस भतेगरे ई, भद फसपौ 3. 


# बाठकाण्ड २१ 


त 
निहार फएमेवारे भैरिके सपान ह मौर जीमरूगी यशोदाके स्मि शरीडष्थ ओर 
बछरामीकै तमान [ अनन्द देनेबे ] ई | ४॥ 
दो-ण्ठुः श्र एकु भरुुटममि सष षरनसि प्र षोऽ । 
त्ती रघुवर नाम के धरन विराजते दोड ॥ २०॥ 
र्तीदाठची कहते ह~ शरीरुनायओी नामके दोनों अकषर धी सोमा देते 
जिनमे एष ( रकार ) छतरस्प (रेफ* ) से ओर दूसरा ( मकार ) पुटि 
( अवार `) स्परे स्व भकष ऊपर ई ॥ २० ॥ 
सौ०-सषपतत सरिस नाग अद नामी । भीति परसपर अधु भदुगामी ॥ 
नाम शूप दुद्‌ दद उफधी। सक्थ अनादे सुसाघकषि साधी ॥ १॥ 
समने नाम ओर नामी दोनो एकप ई दिनदर ोनमि परस्पर खामी शौर 
कवक समान प्रीति टै ( अथोत्‌ नाम ओर नामी पूणं प्त हेनेपर भी मसे खागीक 
परे सेवक चरता है, उरी प्र्नर नामे पीठे नामी चलते ई । प्रयु भीमजी अपने 
श्यामः नामका ही अनुगमन करते है, नाम कते ही वो अ नति दै ) । नाम ओर्‌ रूप 
दो ईश्की उपामि हैः ये ( भगत्रान नम सौर स्प ) दोनो भनिव॑चनीय ई 
अनादि द भौर एन्द्र (शद मततिदुकत) इदे ही इनका [ िग्य गविनाधी ] खर्प 
ज्ञानेन आता दै ॥ १॥ 
क्षो बढ़ छोट छट अपराध ! सुति रुन भहु घमु्षिश साधू ॥ 
देषिषहिं रूप नास धीना । सप याम नहं नाम विहीना ॥ ९॥ 
इन ( नागर जौर सूप ) भ कन वदा है, पौन छोय, यह कना तो अपराध है | 
एनम गुरो तारतम्ब ( कमी-देशी ) सुनकर साघु पुर्व खये ही समक्ष छी ! स्प 
नाम धीन देच नते हैः नामके बिना रूपका ज्ञान नर हे सक्ता ॥ ९॥ 
रूप विष ताम चिनु आन । करतलं गत न १२६ पचान ॥ 
घुभिरिमि नाम रूप बिनु दें ! आष दप सेद भते ॥ ६॥ 
क-ख विगरोष सूप भिना उसका नाम चाने धयेीपर रक्डा दुभा भी पहचान 
नी जा सक्ता । ओर रूपे पिना देखे भी मामका सरण कर जाय तो नियेष प्रेमे 
खाय दह्‌ शूप हदयं आ साता टै ॥ ३ ॥ 
नाम रूप शति भकथ कहानौ । समुश्त सुखद भ परति पलानी ॥ 
आन सथुन निच नाम ससल \ उभय प्रवोभक चतुर हुपाषी ॥ ४॥ 
नाम ओौर स्यकी पतिकी शनी ( विषादम कथा } अक्यनीय टै | ऋ 
य्न दुदाव है पटु उषा कण॑न नही मा आ एकता नण ओः सगणे 
बीच नाम इन्दर सदै, मौर दोनोका यथायं न कयनेगाम दुः दुमापिय है ॥४॥ , 
न्‌ 
तर ङौ चाहसि उजिभार ॥ २ 
वि यदि दु भत चौर रहर दोनो ओर उना चाहा है सो 
शुखरूपी दवस जीमर्पी देहलीपर रामनामरूपी सणि-दीपकनो रख | २१॥ 
चौ०-नाम शह चपि जायि जेगोः। विरति निरि भच वियोगी ४ 
ह्ुखदि असुरि धूपा । अकथ जनामय नास न स्था ॥ १॥ 
भ्र वनवि हए इस परप ( इर्यः जपत्‌ ) से ममेति धे ए ध्यवान्‌ 
छक योगी पध शठ नामको ही मीम ज्ये इ { स्लगल्मी दिनम ] नागते ¢ 


ई र््ितमारख ॐ 


न ------------ 
न अतुर क्ते द! 
श्रना रिः › सनम्‌ वरयत अभव 
४ क 61 जेढ 1 नम संद अपि जनह चेड ॥ 
धद माय जगद छ ख । दिं सिदध सनिमादिक पा ॥ २ ॥ 
से पमे रे ( दां मन) जन चह हे (न 
सी नान्न र उदे नन वेद । [ठकि छिव बालनेवरे अर्थथ | 
सयक लौ ठग नामका म कते द सौर सगिगदि [ भो } धिवि शकर 
जते ६॥२॥ 
धतत अत मकि इ तो ॥ 
गम गदं चन॒ खरि परक । घत चरर अनवर उरा ॥ ३१. 
{सद धय दए मव भक नागब करत ई तो उनके के मारी दुर 
रुः कट मिट जट मोर दे दुखी चे जे ६! नयतं चार परदारे { ९- 
अयर-पनादिती चदे मजने आरं निद्धि धि मतेबाते, 
र-विनाु-मावाल्ो चान्तश्च शन्कर भनेर, ४-तनी गगरो ससे 
दाम सामनिः ए रमे नेग) एपमक ६ र चरो ही पुष्यालाः पापि 
भौर व्दार्॥२॥ 
च चह च चन श्या । रै अर्ह तेपि पिजारा ॥ 
५ छा श ति चान ममार । ए तेपि नदि भन्‌ उपाञ ॥ ४५ 
चलि चहु तको नामक ह आधार द; नमै शनी मह प्रको विशेष" 
स्ते श्रियै । द से चरो दुरम मौर चत शी वयोम नामक प्रमा है, परलदु 
(नि । से [ नान्न शोककर] वृ को उपाय ही न ॥४॥ 
शान्--उदन कमना रन ङे सण श्स दीद । 
चा द्धक हद किष चिद्‌ स्त मीन्‌ ॥ २२॥ 
मेकी भी ) श्मनजेवि ररित जर शरीरमा 
र येने भी नामक युन्द्ः परेनरुणी चरते वरोषरण शष्ने मनप 
०.4 "ना लसा ह ( अपोत्‌ > कामरपौ षाक निरन्वर आसादने रहत है, 
भाश भी उने जै चना नही चदे ) ॥ ९२ ॥ 
५ सगुन हद धट चर्यः \ अस्थ शयाप अनादि अनूपा 1 
मः ए णु टु दे । कि हि ग निद वस भिस ये ॥ १ ॥ 
मर ग्शुण-ा> द चर्य ६।य धेने क जकयनीय, जाह, 
गर शुष ६ । मेऽ एमन नाग इन दोनेखि उदा दै, विसमे चेमे कर 
वस्वाष१॥ 
£ लनं चनि जातां जन ए । षट तोति परीति सदिमद छो ॥ 
पृष श्न देवि पुट ¦ पक एम दग व्र विवेद ॥ २५. 
उभय भमन हग पुगस नाम हं । से लषु दह ध रम तं ॥ 
पृ मह धवि । ए देतन ध आरद राठी ॥ ६ ॥\- 
दो उह दतै दारं या केवह शनध्योकि न कम] मै 
क सर सत वत चता [तु ओद म | 
गन भम्कि समान हं । न्णुभर उ अग्र माफ उप्रनहै चो कके 
दः चौर चसुण ॐ यट अ समान दैन त्च दीरदौ 





















# बालकाण्ड स 


1 [ क्तः दीनो प ह ई उबर परकर्म भदे भत्र सद्म रोती ह । वी 
भकार निषु शौर युष तततः एक ई । दवन हेनेमर मी] दोग ही जानने डे 
शूष परु भागे दोना गम शे अते दै। इसे गने नामको [नर्ण ] रहम 
शौर [एग ] रामे ग़ फा दै जहा व्याक दै, एक है, भिना र! एता, 
चैतन्य शओर आनन्दी धन रि रै ॥ २-३॥ 
मस परु हद अत विकारी । सकढ जीव नग दीन दारी ॥ 
नाम निरूपन नाम जतन रैं! सोढ प्रगट निमि मो रतरते ॥ ४॥ 
पे कारित र हदे रते भी जगते ख जीव दीन ओर दती ट! 
नामका निरपण करक ( मामके यथार्थ सवलप, महाः रत्व सौर प्रमवको जानकर } 
नामका जतन कलेस (शरदापूर नामजपरूपौ सधन करसे ) षी रघ पेते प्रकट रौ 
बाता है जते रके जानते उ मूल्य ॥| ४ | 
दो-निस्युन त पदि ति वदु नाम्‌ प्रमाड अपार । 
कद नामु चद्‌ राम तँ निज्ञ विचार धतुसार ॥ २३ ॥ 
ष प्रकार निगुण नामका परमाव अत्यन्त अदा दै । अग्र भएते वि्ारके 
अगार रहता हूँ रना [ सुण ] रामसे भी बदा है ॥ २९ ॥ 
सनन~रम मगत हित नर सु धारी । सषि संकट किए साधु सुखारी ॥ 
नासु सरोम जप अनासा 1 भगत दों सुद मंग ब्रासा ॥ १॥ 
श्रीगगचग्धजीने भक्तो दिके स्वि मनुप्यश्चरीर धारण करे त्वयं ऋष्ट सफ 
साधमौफो. भली किया; पटु मक्तगण प्रेमे पाय नागरका जप कते हुए सदव 
आनन्द जोर ऋसयाणके घर हो जति ह ॥ \ ॥ 
राम कं तापस ति पारी ! साम कोटि सह कुमति सुधारी ॥ 
रिषि हित राम सुका फो । सित सेन धुत फण दिचाकी ॥ २ 
सिति दष दुल दश्च रासा । एर नासु विमि रमि निि नासा ॥ 
ञे राम अधु मव घाप भव सय भजत नाम प्राप्‌ ॥ ३॥ 
श्रीरामनीने एक तपष्ीकी ञ्जी ( महत्या ) को दी तारा; परम नामने कष्टौ 
करी नगदी बुद्धको युषार दिया । श्रीमन ऋषि विश्वामि्रफे हिते ष्ि एक " 
सुद यक्षी कन्या ताहकाकी देना जर पुनर ( युर ) उदित समाप की) परनु नाम 
अपने भक्ति दोष, दल मीर दुराा्मोका एस तरद नाश फर देता १ जैसे सू, 
रिका । भराम तो स्वयं शिवजीके धनो तोकः पनु नामका मताप 0 | 
इशारे स भर्योका नाञ्च कनेरा दै ॥ २-३ ॥ ^ 
दंव बन प्रय ह शु्ावन । जन मन धसि माम कि पावन ॥ = ]/ 
भिसिर निकर शके श्युनंदन । नामु सकट फडि कदटुष निकदन ॥ ४ ॥ 
मु शरीरामनीने ˆ भयानक ] दण्डक वनको सुशबना बनाया, पटु नामने 
अर्य मतुष्योके मनद परित कर दिवा । शरीरधुनायलीने राक्षसो समको 
मारा, पनु नाम तो कषियुगके सरे पाोकी जद उलाङ्नेवाछ ह ॥ ५ ॥ 
दो, सवरी गीध चुसेवकनि सुगतिं दीन्दि रधुनाथ । 
नाम वारे अमित खर वेद विदिव शुन गाथ ॥ २४ ॥ 
शीसखुनायजीने सो सरी, ज्यु मदि उषम चेव दी मुषि दी; पनु 
नामने अयमित दुर्ेका उदर किया । नामक गरो कषा वेदम मविड ई ॥ २४॥ 





क ______ रपर 6 ------ # रप्रदरिमानस # 


र & दिर दौड । रदे एल जाद सदु कोऽ ॥ 

च शु स सिजेव ११ 
शमि सुव ओर विमीपष दोश हो पनी शरणे सला) ह ठव र 

शि क ५६५ वम च दिर 

छिनैवल्पे करित ३ १ ॥ 

। माठ शपि एच दोरा । सेह दह ण्य छन्द ग थोरा॥ 
गख वि ददी । कट्‌ विचर दुर मस म ! २ 
मीदलति तो मद मैः भेन वये शौर स पर वेेतमि 

येहा पग नह किः प्रतु गाम छत रंभ द मन है । सननेगण | 

म विच दीरय (कि देमि कैन धद ६ } ॥२॥ 

र स्क रन रब्डु भारा । सीय सरि मिन पुर ए दद ॥ 
सा सु वध सवधासी । गवद गुव सुर एदि ब सरी ॥ १॥ 
देवक भरुमिरठ घत सतो । मिह भरम प्य मो ३ वपी ॥ 
क्रिल सेह काग सुवं जम । मरे प्दु सोद ग सपरं ॥ ४॥ 
ौगमच्न्मते इटरमसि रणे इदमे गा, ठर धीव उनि पमे 
तगर (अषोधा ) भ ्ेठ किर | रामर रामा हए, अष उनकी गञथानी हु, 
शल भौर दिद व भि गुण यते र । परह रेव (मत) पूत 
मा इणे दनः परिभम गोद प्रक सेनो नैत प्रम मय हर अले ए 
ड पिवते ६) नमे थद उनसे म श्रं धिना नहे एन | ६५ | 
दोर रमर त नेष बड दर शवक धर दि । 
समचिति 1 ५ मेस भि अनि] ४ 
छ प्रभः नम [ नुन घ चैः [सम] सम देने ह्न । 
पदा दमने भौ र देनेगाण र! शीव अपो हेदो यह शन ठौ लौ 
परो एर एव प भामको [ सर नकर ] आण कि दै ॥ ९९॥ 
मस्पाएयम, पटा विश्राम 
सौण-गाम प्रसद्‌ यु समितौ । सतह अर्द मंग शती ॥ 
उड कदि दद हमि चोती। सम भरद्‌ बरु सेनी १ १॥ 
„नमी परदे रिव जनिन ६ यीर व्र देये देर ५ ममौ 
श प्त मैर जि षद, एमि ोनीपय नाग ¶ मयर दशे 
५१॥ 
वाद ॒चषेढ नाम॒ अतप ¦ य परिष इरि दर मिव मध 
रु जपत भरु कीन पसाद । शार विरोति मे शद्‌ ॥ २॥ 
(८ माते पदन यवा द । र रे वणो पदर & {शे ह 
च ६] रः म (शरीनर) इरे मैः इर दर्मो व ई । नामे नके 
ष्ठ ग शी, नत हाद मरदितेयन हो रे ॥ २॥ 
द स्षरानि अड हरि न । पड वचर भूम अड्‌ 
पिरि प्त, पठन ट्‌ भे श्च करि शये एम्‌ + ६॥ 
हे नवि { मिमे तत दषो रोक रमते) हयान 


‡ वास्काण्ड # २५ 


जपा; भौर उतके प्रवापते अचर अनुम साने ( भात किया । भे 
पवित नामका सरण फे रामनीको अपने षरे क ॥३॥ स 
अपु भना गल गनिकाञ । भु धुर इरि नामं भ्रमाडं ॥ 
कटौ क उगि नास बाहं! रसु न सकष नाम गुन गाई ॥ ४ ॥ 
मीच सजामि; गब मौर गणिका ( कैशया ) भी श्रीहरे नामके प्रमादसे पक्त 
षे गये 1 मै नागरी वदा केतक क, राम भी नामक गुणोमो नही गा सकते ॥ ४॥ 
दो०--नामु यम को कट्पतद कलि कल्यान निबाघु } 
ज्ञो खमिस्त भयो माँग तँ तुरसी तटसौदाघ्ु ॥ २६॥ 
कण्दयमे यमका नाम कृसतर ( मना पदां देनवाय ) ओर कत्याथा 
मिवा ( मुका षर ) दै, जिसको सरण करसे भो ग-् ( निट ) हलीदास 
द्सीफे सान [ प्रिन्र ]शे गया ॥ २६॥ 
सौऽ-् सगं तीनि शरारत शोका । मर्‌ ताम जपि जीव दिसो ॥ 
भेद एखन संत मत॒ पह ! सकर सुहृत एर शभ सनेहू ॥ १ ॥ 
[ केच कुकी हौ बाठ न है, ] चारो वुगेमि, तीन कलौ ओर तीनो 
लोकम नाको जकर दीव चोर ह ट । वेद, एप चौर सत मव दीह 
समस प्का पर शरीराममे [ या रामनाम ] रमना है ॥ १॥ 
यातु रथम इग मख बिधि दू । दपर परिलोषत प्रशच॒ पे ॥ 
कि कैवं सङ मूख महीना । पाप प्योनिधि जन मन्‌ मौना ॥ ३॥ 
प ( घल ) सुमे यन, एरर ( ेग ) दये यशे भोर द्वापर पके 
भवान्‌ पर्त ६; परु कु देवल पापी उ जोर मलिन दै, त 
मुष्योका मन पापस्गी दुरम मरी वा हुमा दै ( भयात्‌ पापे कभी अल्प 
तना ह नौ चाव; शकते ध्यान, यख ओर पूजनं नदं बन ते ) ॥ १ ॥ 
५.८८ नास कमं कर॒ कर । मितत समन सक नण चास ॥ 
शम नामन करि भमित दता । हिव प्रोकं छोक पिह मग ॥ ६ 
पते करा ( फाुगरे ) काम तो नाग सी कष है, शे स्म करते हौ 
संर सव ज॑ना नाय फर देनेगाभ ह । कन्म यद रामनाम मनोगाभ्छित 
ठ देतेवाम है, परणोकका परम दिती जोर इत रोका मावा प्रा दै (अर्थात्‌ 
परय मनामा परमाम देत है बौर त लेक तापित ठमान शव ममर 
पाठ्न आर र्ण इरा है ) ॥ ३ ॥ 
मा ककि करम न सराति विदद । र्म माम सयलङंबभ युद ॥ 
कारनेन कि कपट निधानू । नाम मति समर इदुमान्‌ ॥ ४॥ 
कसु र ध द म भक्ति ह र न न ही दै रामनाम दी एक माधारद। 
कटी खान करिुगल्यी कारनेभिके [ गाने ] छथि रामनाम ही द्धिमाद्‌ 
छथ शीनुपरारभी है ॥ ४॥ 
दोरा साम नरकेसरी  कनकफसिपु _ कलिका 1 
पक जन अहलाद निमि पाडिदि दडि इुरखाड ॥ २9 ॥ 
समना भरद भगम्‌ ६ सग हर्दे मीर य पेलि नय 
प्रात समन ह यह र्नाम दवता चु ( कल्दगसमी दैव ) #े ना 
जप कमनेवार्ौकी रका करेगा | २५ ॥ 


र ___ _-*------------ अ यमचसि्नख * 


~ त! नाम चपत मंग दसि वृसं ॥ 
चोगि उपय चनव य! दः न्‌ रुषि माया ॥ ५१ 
श्रुमिर दो माम सत युन याया | क आले, फिटी ते 
अच्छे साव (म) से, इर माब (पैर ) रः कोषे या ह स) 
मी नम ऋत दो विशाम दत्वाय कवल ६ । उती (पम कमाण 
यनक स्र करके यैर षुनानीर मलक नर भ॒पा 
रोच वस कपत हू ॥ १] 
छ मेरि द सो उड मतो । जु पा नहि छ अवात ॥ 
समं सुताम इरे मसो । मिञ विसिदेखि दाति पो ॥ २॥ 
म [आयम ] रौ { विमदी सव त्क षार हेग; निनी छा कमा 
केम बया] यामॐे उम कामी जौर सुनील इय सेद्क { इतेष भी 
उन द्ानिमिने थपनौ भोर देखकर मेर पाटन स्वा है॥ र ॥ = , ४ 
खोक चेद॒सुसापटवि रीती । चिन्त्य सुनत पष्टिधाषत प्रपत ॥ 
सनी मरीदं रास नर नागर । पदिति द मरन उनायर्‌ ॥ १ 
से बौर वेदमे भौ अ लावीत पौ शति धरसि इह नय इनते ही 
रम्मे पचान हेता दै | अमीररीबः रेशरन्गरनिवासीः णित) वद्नाभ- 
ययी, ॥ ३ ॥ 
सुधि एवि मिज अति असुरी । कदि सराय सव तर्‌ नारी ॥ 
साधु शुनानं इस वरप । ख अंस मद परम एषः ॥ ४॥ 
| सुखविःकुकवि, समी मरनारी अपनी-अपनी इदिके धनुलोर रला} वराहा 
कए ६ । ओर साठ विमान्‌) दुर ईते अंते उस हृमाड़ रागा ४॥ 
सुनि सनमानकि सबि सुवाम ! सनिदि मगति तति रति पहिली, ॥ 
गर प्राह नक्टििङ सुय । जाम क्लिरेमनि कोसटराङ ॥ ५॥ 
ख पुलकर भौर टकी बाणी, भि मिन भर चमरो पसानक्र एन्द्र 
,( सीरी ) रणति एक यथायोग्य उपमान कते द 1 ण खमाय तो संघारौ राजारमोका 
४, बोरल्माः शरीरनचन्द्रजी तो चल्रङिरोमभि दं ॥ ५ \ 
सन शम स्नेह निसो ! नो ऊन मंदं सितमपि मों ॥ ६1 
भगान लो ब्द प्रेते दी रक्ते ह प्र जत्‌ यरे बद्र भूर भौर 
-मचिमुदधि अर कोन होगा २ ॥ ६ ॥ 
शस सेक्छ की प्रसि उच रिह रम्‌ रपाल! 
खयर निर जलजान जिं सचिव समदि कृपि माठ ॥ २८८९) ॥ 
तामि पाठ भरौरागतन््रयी यु द सेवकौ परीति ओर सविद यदय सगे, 
लिन पर्ये जहाज घौर वन्दर-भाढभौको दविमान्‌ मतर बना छा ॥ २८ (क) ॥ 
कषवत खरु इदुद गुम सहत उपहास 1 
सादिव  रीताताथ सी, सेवक ठर्सीदास ॥२८८७)॥ 
र चेय तड शरीरमर्ीका ने चदे ओर मी [पिना सना-ठकोच | कहलता 
ह (केगच्ा रिरोध नक कला }; काह शरीरम इ निन्दाको सहते है षि 
आतितायाप्ी-मते सामी दीदार चड़ द ¶ २८ (स) } 
॥ वड मोरि षिञं ोरी । इनि अभ्र नरश ना सोरी ॥ 
उनि सद्म भोहि षडर जपने । सो सुधि राम ऊनं तहं तपनं ॥ १ ॥ 









कै बाठकाण्डनैः ७ 


यह मेरी बहुतरी दिठाई जीर दो ह, पापक सुनकर नरकन मौ नाक धिको 
| है (अर्थात्‌ नरके भ मेरे छे ठोर नद दै ) । यह सप््कर श्च भपने ही 
कषित इरे इर हो शा है कि मवान्‌ शीरामचन्रनीने तो सभये मी इपर 
१ (मेरी दिर भौर दोषषर ) ध्यान नक्ष दिया ॥ १ ॥ 
॥ सनि अवलोकि सुकषित चख चष्ठी । मगति मोहि मति स्वामि सरटौ ॥ 
कत नसा होट हिय नीको । रौक्षत शम धानि षन जी की ॥ २॥ 
वरं मे पथु श्रीरामचन्द्र तो इत वातो नकर देखकर भौर अपने 
ुधिधसूपी चषठुषे निरीक्षण कर मेरी मक्ति ओर बुदिष्रं [ उल्टे ] सरना की | 
१ स्यो म चि भिगड़ जाय ( अर्थात्‌ मँ चदि अप्नेको भगवागृश्न सेवक क्छा- 
॥ कात एः ), पर हदये अन्छापन शेना भादिषे ¦ (दम ठो अपनैको उनका 
षक भनने योग भरी मानकर पापी मौर दीन शी मानता ह यह भच्छपन है । ) 
शरीरमचन्रनी भी दारके हदयी [ बन्छी " खिति जनकर सीह जति है ॥ २ ॥ 
रषि न प्रभु धित धकं किए । करत सुरपरि सय बार हिप की ॥ 
१ मेदि प बधे न्याष जिमि मकौ । पिरि सुकंठ सोह कीम्डि काटी ॥ ३ ॥ 
{| प्रे वित्त अपने क्क की हुरं या नर रती (वे उ भूल जाते 
ह) भोर उनके दग [ वा नीद के रते दै । जि पापः 
के करण उन्धन बरालिनरो वाधक तद गारा थ) वेत ही कुना फि गरीवने ची ॥ ३ ॥ 
सो करचति विभीषत केरी। सपनद सो न रम हिव हेरी ॥ 
ते भरि मेत सपमने } राजसम रधुषीर घले ॥ ४ ॥ 
} ` ऋ पी विमीषगको धी, पतु भ्रीरामदनद्रजीने सपमे भी उता मनम 
विचार न्ट पिया । उषटे मरतजीठे मिक मय भीुनायनीने नक्रा सम्मान 
कवा मौर य्सभाग भी उनके शुन मान किया | ४॥ 
दो-भरयु तदं तर कपि डार प्र ते करिए भापु समान। 
इख्खी षरं न राम से साव खीनि्ान ॥ २९ (8) 
रसु ( शरीगमचन््री ) तो षके नीचे चौर बन्दर डाडीपर ( अर्यात्‌ को 
-सथादापु्ोततप सिदानन्दपन पटरासमा धीरमनी शौर कदो पकी शालाभोपर्‌ 
शूदतेवाे गन्द ) । परे बन्दर भी उन्हेने अपने समान बना या | लती- 
दासी कते है मि भीरामचन््रनी-खरीते शीरनिधान खामी कही म मही ठ॥२९/क)॥ 
गाम निकाई वरी दै खचही. को नीक। 
ज्ञौ यह सची है सदा तौ रको हसीक ॥ २९) ॥ 
३ शरीएमजी { आापकौ धन्छाईलि समीका म है ( अर्यात्‌ आपका कस्याणमय 
माय रमीका शत्याण केवाला ई ) । थदि ह वात सच है तो ठच्सीदासका मी 
सदा कल्याण ह हेग ॥ २९ (ख ) ॥ 
गपि ध भ पु नुन ध २९(ग)॥ 
वरन रघुबर विसद जघ कुष नसा ॥ 
प्रकर, भे गुप कठ मौर सदो फिर दिर नवार म नापः 
ओका नड यध धरमन करता ह हके नेते कच्छे पाप न स ति ई २९ (१1 
नौग-जाययकि नो कया सुदं । मन॒ सिरि खना ॥ 
कड सोद संद अलग 1 सुन घकड खन युद्ध सह्री॥ 81 


श शम्रितग्रतह ₹ 


६ 
बलस यो तं वा फ मदाय मवी षीः 
न ॥4॥ 
सड छद द वद्र । रे र रउ व ॥ 
शह तिनि कुदुदिहि का \ रर भये लथिसरी चदा ॥ ३॥ 
विणे चस ह मपर । 
व बति पित्वो सुनने ममर र स्त भवान दिवा [२॥ 
ष बपदल ि भवा। छर ए पाव गा 
शोत व पमतीत्\ सदी साती इरितः ५ ३॥ 
उन भरि मिः यहववमैन पया वोद रने भि ॐ मद्रा 
न गा कुम । ३ दन वहा शौ ग्रत ( ग्रः भ्य ) म 
शे मैः एतं ६ मः भी ललने के ॥ २१ 
ब्य सी ए मवि वमा! सत क धमक इतरा ॥ 
सैष ते म्मा इब क मौ सु शव॥ ४ १ 
प अम रे ठी से त्न हर रदे इर शा खमन 
(भ) कर {। भै गी ग ए (मारं नैमनेभ र सते) 
१ ४॥ 
५ गुर सते इनी स्थ ॥ 
1 सु रह तख वाकपन टद अति दै गदेव । ३० (१) १ 
तति $थ फ मेषं धे गछ इनी पतु स्ठखाप 
1 एके यवते य कर (भनी य) एकरा 
५१०८] ॥ 
गोः भूल. भवनि या यम & र! 
किरि सम मे भैर क शि कि, 
॥ 1111 
भरे (थनी) त {1 कुरे पर रघ इ तूर अ नष भव 
(१ ॥ १) # 
पूर श षर । यदव पत मि ५ 
भष पवि व लो स म क, 
चै कुमे मत कमर इ चव इदि सुका 8 एह 
भरी 1 मो वमे व पि मद्व ५८॥ 
यप इषि पिक ॐ पे?) श्ट एर 
सि स्ेह शेह श्र एत! जदं व ह सद ल ६११ 
8 व निम ऋ}, रतम मयर 
। भगो रमेत वीर 
श्वर री भा पतैः भिनत ॥ (6 व पने 
श न स सर । पया ऋ विमति ५ 
त (वम | ति वि पक श्यौ भासी ११ 
ग्‌ प्रोनन {प 3न ् सुमे ८ 
भे न न पधी ३ । पया पदु देत नि मोली 


२८ 


# वाखकाण्ड एर 


ओर पिवेषर्मी धे कट कतेक ह्ये अपि ( मन्यन कौ अनेकाल तकौ) 
& ( अर्थात्‌ दत कये शानक पराति सी रै ) ॥ १ ॥ 
रमकथा कडि कामद्‌ सादं । नन सजीरनि सूरि सुदं ॥ 
सोद वसुषतर सुधा तरगिनि । भयं मंजति भ्रम भेक भुम॑मिनिं ६४४ 
समया कतु ख मनोरथम पूणं कवारी कामेन गो दै ओर 
सनेम छि बन्दर सञ्ीवनी जडी दै ।एष्वीपर यदी असूर मदौ दै, चना 
र्मी भयतो नादा केवाली चौर परममी ेदर्कोको खान वि स्पणी ६ ॥५॥ 
अमुर सेन सम नरक निकंदिनि । सुबु डर हित गिरिदिमि ॥ 
श्र समालि पयोधि रमा "सी । भिस मार मर भयर छमा सौ ॥५॥ 
यह गुमकथा अरुरोको देना मान मोका नाच केवाली ओर लाधृसम 
देषतामौमे कुजा हित केवाली पावती (दगा ) हे । यह पंदःसफानस्मी ीएमुरक 
शि षमी समाने सौर रमूं िशवका भार उनम भच एमे समान दै ॥५॥ 
जम गन युस जग जमुना सी । जीवन स्ति दु घु कासी ॥ 
मष्ट परिय पाचिनि हुरसी सी । तुरभिदोस शि वै कती सौ ॥ ९ ॥ 
यमदू रपर कलिल स्ने धमि वह जातू नानक मान दै भर 
जीवो मु दे षि मानो खौ ही दे । यद श्रीरमदौशर पतिर ठरते स्मान 
पिष दै शोर इसरा स्वि इचसी ( एरतीदारनीकष मा ) क ठमान दये धि 
फरोग दै ॥६॥ 
सिवभिय मैक सैल सुता सो । सकर छिदधि दुख संपति रासी ॥ 
सद्गु क्षुरयन शर॑य अदिति सी । रुर सयति प्रेम परमिति सौ ॥ ५॥ 
यह रमक धिव रमाम घमान प्यारे दै, यह सव सिधा तया 
ल-सपचिौ रारि दै । सदूरणलूपी देका उसन्न ओर पारनोषण केके 
छे मता अदितिके एमन ।शरीनायनीकी मक्त ओर रमक परय सीमाश ॥७॥ 
दोऽ-रामकेथा मंदाकिनी चि्रषूट वित धाद 1 
तुखसी सुम सने यन सिय रघुषरीर विशद ५२१ 
द्लीदारनी कहे द कि राम्या यन्दाकिी नदौ है भुन्दर ८ निम ) पित 
चिक ओर दर ह शी वन दै निक भीमीयरगनी मिदर के ६।११॥ 
चो-रामचरित विलामनि चार । संत सुमति सिव शुभग सरू ॥ 
जयरमगछ रुनम॒ राम के। दानि सुङ्ति घन धरम धाम ॐ ॥९॥ 
श्रीफचद्रभीकन चरित्र सन्दर चिन्तामणि है जौर संतो छुदिसूमी लीक 
दर शृह्ार है । भौरामचद्रीम ुणपूहं आत्का कल्याण करेवा भौर सुतिः 
घन? धम नौर परमधाम देवल ६॥ ६] 
खदगुर म्यान बि ओय 1 विव चैद भद भीम रोग ढे ॥ 
जगनि अनक सिय राम भ्रम ॐ । यौ सक बत धरम नेम के ॥ २४ 
हान, वैरत्य ओौर योगे 8 सदयः है रौर छेलररूपी भेकर रोका नाद 
करके एमि देदताभोके वै ( अश्वनीकुमार ) ॐ ठान दै । ये शीसे 
रे उस कल धि माता-पा ई ओर मूं ज, मं गौर नियम मी ई ॥२। 
समन पापं संताप सक प्रिय परक परकोक षयेक के ॥ 
सिव चुम भूपति पिर ॐ । कंगन छोम उदधि परर $ 1६४ 





#) # तमित्य ५ 


पाम, सनाप सौर शक मा कवाटे तथा इत चक सौर परमेक परियं 
फहन दरव ट पवार ( रान ) स्मौ रान शूरवीर मन्दी मीर लेमरपौ अगार 
शरम सोक व्यि भसत इने ई ॥ ३ ॥ 
फम्‌ पोह कषम किन ४ । कदि उक लन मन वन ढे ॥ 
सिधि पूरय नियतम पररि पै कामद घन दारिदं दारि फे ॥ ४॥ 
भक्ते षनतमी वे वनेवा कामः कोष ओर कलिय पायस इथि 
मरते समि ठे वतय द दिऽ पूलव जौर पितम अतिभि ६ यैर दष्िाः 
स्मौ सुवाने दुन धवि कामना पं रमेव मेष ६ ¶ ४॥ 
मे मल्चमनि यिष्य व्याड के 1 भेट करिन हथ माठ कै 
” वन मोट ठम दिन करं §े। सेव्का साहि पार जरुधर से ॥५॥ 
विपी सोप जहर उत्ते थि मन्त्र ओर मघवपगि हं] मे स्छदपर 
रिते हूए एणिनदारे मिमे दुर टे ( मन्द प्ारब्च) धो पिय देवरे ई! 
अ्षनत्मी अन्धका इए करे सथ सूयकिगोमे रगान भौर सनन्त धनदे 
पम केत ष एममि दै | ५ | 
अभिमत इदि देगतरं रर घे । सेक सुरुष मुदं हरि हर षे ॥ 
धरुवे सरद नम मद ष्टम पे । रामणगत छन शधन धन से ॥ १४८ 
५ श्त ० द कले रहे 
र सुल ८ दि मनस्मी सानो 
शोभि कोड हिमे सएगमके इमान न तो चीवनधगक्ठ ह ।६॥ 
सकस पु ए भूरि रोग से । नग हित निधि एषु सोमे ४ 
सेवक गन माग मरु से । पादन गस ठर॑प माक चे} ७१ ५ 
८४ क स्मान द । चपत्ल्‌ छर (दार्थ) पिं 
सधु रल घ्मान टै । मनस्पी मानस्तोके समि ओरं 
परि गक्गनीकी तरङगगलेम स्मान ६ 1} ७1 "६ 
ए.-प्य छुकरक दाल कलि छपट दृभ एपेड 1 
क सम शुन माम सिम दंव नद परय ॥ ६२ (3) ॥ 
च येष क मा त, कुचर ओर कु ट, दमा 
गण उन पि ध हौ ६ के ए पम चष्ट अधि ॥ १२ (क)॥ 
मस्ति यक्रद कर सरिख खद्‌ खव ऋष्ट 
समन इद चेर धित त विपि यड्‌ खाट 1 ९ (९) ॥ 
पि वमा व य उल दने "स * 
समी उ मेर नेते चि श्वि तो वेध हि मो 
1 ध 
तअ 
विक तोरिया ९ ए 
उतर = च्छः ऋस रजय सवना उत गक | 
चे प स्या सुनो नहि दोहे] भनि माक कै शुनि व 
भा भीन इस ओ पयत । ह भावु उह वद भ! , 





# ब्ादकफाण्ड # ३१ 


रमक कै भिति अग नाहीं । शसि भतीपि ति फे मन साह ॥ 
` नाना भति शमर अवतारा । रामायन सत कोटि अपारा ३५ 
जिसने यह कथा पदे न सुनी हो; बह इते सुनकर आश्चमं न इरे | जे शनी 
इर मचत कयाको दु ह, ३ थह जानकर खश्वं नदर फते कि णस्य यमदथा- 
करी को सीप नही दै ( रामकथा अनन्त है } } उनके मनै खा विधार रहा ६1 
नाना अकारे भरीरमचनद्रबीके अवतार हए ई भौर सौ कद ठथा भपार 
रामायण ६ ॥ २.३ ॥ 
कष्टपभेद्‌. दरिविरिस गुप्‌ \ मति अरेक सुकन्ह गाप # 
करम न संय अस उर जालो । युनिध कथा सादर रति मानी ॥ ४॥ 
कल्मभेद अनुतर शरीर सुन्दर चरि पुनीश्रने अनेको पकापये गामा है } 
हदवम एसा विचारकर सन्देह न श्रीमि ओौर आदरसदिव प्रेमे श्त कथाको सुनिये ॥४॥ 
दोरा अनंत मंत शुन धमित कथा विस्तार । 
नि आचरघचु न मानिहदरहिं जिन्ह फ विमलं विचार ॥ ३२॥ 
श्रीरमचन्दरनी अनन्त शै उनङ़े गुण भौ भनन्त ६ मौर उनकी रथाभोका 
बिला भी असीम है । अपव जिनके विचार निभेल हैः पे एस काको सुनकर 
ाभर् नहीमानेगे ॥ १९॥ ४ 
च०-एदि विधि सथ संय रि दूरी । सिर घरि गुर पद पंकन धूतो ॥ 
एचि सबही भिवे करं जोरी । कष कथा कें ठाग ते सोषै । १॥ 
षर प्रकार सव॒ परेयो दूर कत सौर भीयुरलीके चरणकमर्मकी रजको 
सिप्र धारण करके भ पुनः य नोदक सवी विनती कता ह मित कथा 
सचना कोर दोप सशं न कले.पमि॥ १॥ , 
सार सिह नाह यब माथा । बरनर रिसु राम गुन गाधा ॥ 
संमत सोर धै पएकतीसा । कर कथा दरिपद धरि सीखा ॥ २॥ 
जब # आदर्श श्रीथिवनीयो सिर नगक श्रीरमचनदरलीके गुरणोषी निर्मल 
क्रा कहता हूँ । भीहरिके चरणोपर सिर रखकर संवत्‌ १६३१ म दस कथाका 
मारम्प कता हूं ॥ २॥ 
भौसषार भुम) । अनघपुरी य॒ चरित परकर ॥ 
जेष्ट विम राम अनम श्रुति गानं । तीरय सक तरा चलि आं ॥ ६॥ 
वभ मासी नवमी तिपि मंगलवार भीजयेत्ादीत यह चि परफाधितं दुभा | 
जित दिन शरीरामजीका चन्म होता रै, वेद्‌ के द रि खर दिन सर हीं वे 
` ( भ्ीभभोध्वानीते ) चके मते ई ॥ ३ ॥ 
असुर्‌ नागा खग नर सुनि देवा । आ करं रुरायक सेवा ॥ 
जन्भ ष्ोत्वे रविं सुलाल । करि राम. कर कीरति गारा ॥ ४ ॥ 
जर नागः पी, मनष्यः सुनि योर देवता ठव अयोध्या भाक भीडुनाय- 
ीकौ रेवा कसते ट । बुद्धिमार्‌ वेग चमकना मेव मनति दै ओर भीयमगीकौ 
सदर कीर्िका गानं कते ४॥४॥ 
दो--मज्ञदिं सर्जन दद वहु पावन खरतयू नीर । 
जपि श घरि च्यान उर सुदूर स्याम सरीर ॥ ३४॥ 
उन हुतः चमूह उह दिन भीरू पिन चे सान कत मौर 





३९ ई सगचमिष्ालर ^ 


अचर ्नायवीनर याव भके उनके ममता चप कते ह ५ २८॥ 

च सज्यं दम ान। एद्‌ प्यं छ येर्‌ धरन ॥ 

५ 

द क ६ म #पे्र दरः स लग मौर चपा 
श ६।यद कौ दै स पि & ए महिम मरै, चि विम 

अवतीय गं नद र्‌ एवौ | \ [ 
भ चण्वा षते वनि दोऽ सपद्विदिर भरि प्न 

चरि स्मे जेष सीव बा वष ते तले सह सपाण ॥३॥ 

श शोमाममन धोपप मच पपात देने} ने 
प्रि ६ लोर वल पत है । सदे [ मचववः सेद, उदव शौर यदु] 
छ सनि (पररः) हे जन चव र, शेषे चे कोः म भगेति एति 
धोक ६१ र नह ति (जन मृ च क ममम पमषामः 
मै निबा कते है) ॥२॥ 

शव धिष परौ पने शनी । सकट पिदिष्म भेष प्रानो ॥ 

पिम एथ क न्‌ मरा एन्ह ए तम मद दमा 11१ 

ला भमनम ख गरसते हए, २» दिस भै मौर लाम 
शौर एष मे ए निर्मल यारम भद, वव रोते का, गद 
नौएमकपर चे ६॥६॥ 

एमररितमासस पुरि क \सुनेह सदन पष्ठ दिघरा ॥ 

म रष नर १९ । सुनी श प ठ्‌ पट ॥॥ 

श नम यग्गानर र, ग्व न ए हनि तीर | मी 


एषी सितम प गे १६ दद रत पादोतमात्यौ वो शा 
षै ली तेवर | »॥ ॥ 


एमषनकरछ धुनि प्रव । सि सृ इुशेदर शरदन ॥ 
वदे दि ररा कषमि र ५1 
४१ 14 ८१८४ यैर परव मनर र 
भना । तंर इनं घौर दो ठका एलु 
मीः ल्पत अरे ३९} 

प मेस तिय भन एद्‌ दुमद धिक न मषा 
पद र थो यम दर हरे हरि ६२११४ 





"मलस विधि मड उ अदार रि त । 
यद र कान सव 
म फा वैव दै क [५ 1१५ ॥ 


# वाटकाण्ड # दद 





अच्छ भा, व बहस कया यै ीजमा-मरेरका सरण करे कता | १९] 
चौ० शु भवाद्‌ शुमति धि इरी । रामचरितमानस करि दुर 
कद्‌ मनोः मति भलुहार । सुजन सुधित सुनि लेह सुपारी ॥ १ १ 
श्रीचिवीी मये उदके हदयमे सन्द हि विकास इभा, मिते यह दरधीदाठ 
ओरामचरिमानसका कवि हमा । अपनी वदध अनुखार तो दह दे मनोह ही बना 
४०८५ मीहे स्वनो इनदर विके दुन इ धा घुधार म्पि ॥ १ ॥ 
भूमि अङ हदय शगाधू। येद पुरान उदधि धन साधू 1 
बरं राम॒धुजस दर वारी । मधुर मनोष्ठर॒मंगछकारी ॥ २॥ 
सुन्द्र ( सादिवकी ) द्धि भूमि 8, इदम ह उं गहा शान ए, बेदपुराय 
सद्र र भौर सोषु मेघ ह । पे ( शठल्पी मेष ) भीरी छयसी इनदर) 
सुर) मनो गौर मंगलकारी जल्की वर्प कते ६॥९॥ =, 
शीला स्न जो दहि पानी । सोह खण्छता करद्‌ म हानी ॥ 
म भगवि लो बरत न लाई । सोह धुरा वीचार ॥ ॥ १.८ 
स छलका चो विलाल वरणन्‌ फे ई वष्ठं रम॑ुासपी चलकर 
निममस्ता १, ओ महक नाश करतौ है श्रीर भद परप्रमकिका पंन नश किव ज 
सता षी इए जली गुता भीर इनदर शीतवता है ॥ १ ॥ 
सो नरु धुत साहि दिव दई । राम भगत जन जनौबन सोदरं ॥ 
मेधा मदि गतसो म ५४५ 
॥ भरे शुमानस शुध थिरा । सुखद शीत सचि छार चिराना ॥५॥ 
षह ( रम-ुमशसपी ) जर ठता्मसपी धानक श्वि हितकर द, बौर भयम 
। जके मक्तोशन वो जौवन दी ई । बह पमि अछ इुद्िरूमौ एष्वीपर गिरा भौर तिमद. 
{ऋ घुने कानरूगी मासे चस भर मानस ( हदय ) पी 98 खान भरकर 
जही सिर दो या । वही एना हेकर युद, सचि शीत भीर इलदायौ 
ध ^ ख विते बुद्धि विचारि 
+ 'सुदर संवाद वर चारि । 
तेद पदि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि ॥ ६६॥. 
इस छाम धिरे वि्ारकर जो चार अत्यन्त छुन्दर भौर उततम साद्‌ 
( ्णडिगसढ, शिव पाती, शवलव-मरदयान यौः शुरखीदा ओर संत) स्वै ठ 
ध पिर मौर घु्दर सरोबरके चार गनो बाद ई ॥ ३६ ॥ ` 
०-स्त प्रसेवे सुभग॒ सोपाना । श्न नयन पिरहत मन मामा ॥ 
शषुति मिम श्युन , अवाधा । दरनव सोई बर धारि धगाधा 1 ॥ 
खात काण्ड ह शस मानड-खरोकर्र सुन्दर सात सीदिर्वौ ्ै मिनको शनर्पी 
नशे देते वी मन परस्न हो जाता है. । भीरषुनायजीगरी मगन ( प्राङ्क रूणोबे 
सतीत ) ओर निनाँष ( एकर ) महाका नो वर्णन क्षि जायगा, वही इए इन्र 
ऋष्क अथाह गहराई है ॥ १! ५ & 
रुस- सीय जत सदधि सुधासम । उपमा वीयि निष्यस भलेहम # 
नि सधन चाऽ चौपाई । इयुषि मंड भवि सीप सुहा ॥ ९॥ 
ओरमनरी ओर सीाशीका य असते खन च है । इमे ने, उपम 
ह ययी ई वी चर् मनोहविल द । दर चोभे च र न की हरं 


रा५ स० ५ 


४ ह पा्रतमानस ® ~> 


(न) छ नमम (गेव) 

शकती सिं ६॥ २ शे्॥ ` 

य क वणर चेत, 
ख अ पुय न सेद्‌ पग सव , घुसा ॥ यु्ोभित 
ये द, से र दे क दस कतो म सू यो 

१। शयु १ मर एर मधा है प (मर ) मक 

बैर म्ह ॥ ३ ॥ 

+ + (६ आटा । स्न पिरग विचार मराला ॥ 
हि अद एह ए दामन मनोहर ते षमत ॥8॥ , 
स्तम (पु ) ॐपुड मरी एर पवो ६ चत, वैराय मौर विचार 

१ पवरी जनि, पीस, यग भौर नही मोत भसौ मोहम ॥४॥ 
धथ परम पद सरी । फर प्यार पिगथान पिचौ ॥ 
भैयरसजप हप भोग बिरागा] तै सप्र अरव पा तपरो ॥५॥ 
अर्थः मै, ज, मऽ पे चतौ, शानःविशनक विवे फला, काय बरछा 

णप) तप, योव सौः ते रप, पे सथ व सते इन्दर जलब सौव ॥ ५ ॥ 
धरुकतो दाष साप पुर गाता । तै विदित भरुबिषषा माना ॥ 
वेवम द्ध दहि कु ॥ 1 1 
कवी ( ए्बामा ) जते षमत ओर रामना गुणका गान 

जक्षि ५ 1 1 ‰& सरेभफे चा भोर अमरा ( भाम 

पगौ ) नौर भदा व शतु पन क मवी दै ॥ ६ ॥ , 
सपति निर्यत मिधिष् मिमाय । छमा दमा द एता पिता ॥ 
सम जम दिम शर एर श्याना । एरि पद्‌ एति पस भेद पाना ॥ ७॥ 
नि प्रये मिका मरमम भौर छम दया हया दम ( दयन्‌} 

तामे प ६ | सनका नि, यर ( अप्र, सय) अतत, बरहयै सौर 

चपि} पिम (शच एष, स, समाय शौर दै्यगिन्‌ ) रौ उमे 
प द शन श ६ मोः भीरि दए परम र नस पका रै! 
पेवेदेगे षहै॥५॥ ¢ 
र छया भते प्प । के यु पिक एयर बिहपा ॥ ८ ॥ 
ए ( एमरिनर ) ॐ नोर ग नो ममक रग कषा) ३ ही रौ 
ते गरेकड आदि रामर पष ह} ८॥ ४ 
योप बाण्कत जाग बन पु सुबरिहंग विहार । 3 
स मन स्नेह खल सीयते सेदन शार ॥ १७ 
क नेमे क 
९६ इद पप न्ह] तम मन \ ड्द 
न्दा उ सचा ै॥ २४ ॥ ० 
चीरे षद य चरित सुरे। दे दे रह षर सरे ॥ 
धया सि उद्र नर नरौ । ह्‌ दर सानस शधिकासे ॥ 8॥ 
भेजो स अने मतवा मे ६३ दौ क पानक चर सबि 


` वारुकाण्डक " "५ 


~~ 
है बौर वो ज्यु षदा आदू इषे छनते £ ३ ह इ दुदर गाने 
अधिकारी उततम देवत ट| १॥ 
भति खट छे बिष्र यग शग । एषि सर निकटं न जाहि भमागा ॥ 
संहृ भेक, सेवा समाना । द न विषय क्था रत नाना ॥ २॥ 
जो अति दए सौर वि ह भे जख्मेवे यैर कौ ह, भे इ सेवसे 
सर्प नही चात । यो$ यँ ( इ मानदरोवसम ) पमि, भदक धौर सेवा 
समान विषय-रकी नाना कथानं ॥ २॥ 
वेदि कारन भावत द्मे इरे । कामी काक वराक विचारे 1 
आवत पृष्टं षर भति कदिनादै। म पा धिलु जाद्‌ न जार ॥ ३॥ 
इ पारण बेचे फ़ीए ओर बगुेहपी निष सेग यँ मति हए दयम र 
भान ति ट । य एव सरोषरदक अम कठिनस्य बहुत ¦ मनीषी गा 
विना ब नौ याया साता ॥ ३ ॥ 
कृरिन कंग पंथ करार) दिम के यवन यध रि भ्या ॥ 
शह कारश माना अनक्ष ते भति हुम सेड विषाला ॥ ४॥ 
घोर ङग श भयानक धुरा यसा है; उन छुरंगियोके कवन ह भाष, सिह भौर 
सर | षरे कामन्ान शीर एसी भेतिःोतिके नेनाठ ध अयन्त दुर्गम 
येवे पद ई ॥ ४॥ 
तरत हु विषम मोह मद माना । नदौ इतक भेक नाना ५५॥ 
भो मद जर गानं श इहते वीह बन है भौर नाना पकार त ही 
यानक नदि ह ॥ ९ ॥ ४ 
४ संयल ०.१4 च साथ । 
मानस अगम मति मिन्हषटि न प्रिय रघुनाथ ॥ ६८ ॥ 
जिनके पास अ्ल्पी राह-ल्ं नदीं दै ओर रंतोका शथ नही है शौर जिनको 
शरुनायजी पिव मदी रै, उनके स्थि यह मानस सतयन ही धगमे | ( धरात्‌ भरदा, 
सर्ग आर भगवसोम़ भिना फो इसको नष प सकता ) | ३८ ॥ 
पर्वन श्रि का जाद्‌ एनि कोद । नाहि नीद छदां शदे ॥ 
जदृता नादे पिषम ठर काग । गह न जन पाने अभागा १ ॥ 
दि कोई मनुष्य कट उठाकर वतक पहु मी जाय; तो शँ नते ही उपे 
ीदरूपी जुहयी मा जाती है । हृदये मूख॑तारूषी वदा कदा जाक छने कता रै 
जिसे वो जाकर भी षह समागा ज्ञान नकं क पाता ॥ १॥ 
करि भ जा सर मलन पाला । छिरि आषु सेत छभिमःना ॥ 
जौँ कोरि शे पून भावा । सर निंदा करि ताहि इषादा ॥ २ ~ 
उरते उस सरोग क्ञान ओर दुका ज्यान तो क्रिया नहीं राता, ब 
भभिानघतं लोट सावा है] फिर मदि कोर उरते [वका हाल | पठने माता द, 
चौ षष] भपने अभाग्य बात न कवर ] तरो नन्दा फरक उरे समाता टै ॥२॥ 
सकः दिल व्यादि भ वे । राम सु बिक ते ॥ 
सोह सद्र खर मन्ड करई । म्य चोर ्रयतार च जरं ॥ ३ ॥ 
ये सरे िव्न उसको नहा व्यपते ( बाधा नरी देदे ) ज श्रीरमचरद्रजी सुन्दर 
जी द देर है । बी भादरं इव एरोस कान कंरसा है जोर भ्वान्‌ 


मनर नरे (निक सत विभि धरति ) नी श्ट ॥६॥ 
१ हक ८ करष्िन त ॥ ५ इ 
शोन्य चप दः पदाय खट सत 
| 
लोन! म६। > कतेन पला चे मन घगह दी की 
धह नागप नट स री मह सरि इदि भिमः जरगा ॥ 
न्य हव अरर उट उसगेर मेम प्रमोदे अग्रह ॥ ५४ 
छट मान्ञपमो तसे हट मे रेखषर जौ उ योव ठन षि 
बु नः त प हम ल्द मौर उत्व म रणा जीर प्रेष दरम भनन्दक्च 
पराःअन ॥\॥ 
शो पु इमि एरिल घौ । ठम दिमञ जत्र रए मेता से ॥ 
सत, भामे हम चूर! लोष्ठ भेद स भंड कूर ॥९॥ 
के ॐ इन छतर नद ऋ मि त भमै नके 
क्म ष्टमा दै ] ड (विषी न्ती) क नामे चलू टै बो 
नर मग्र डदै । शोपमत मौर क हदे ठे इर केने {।६॥ 
रौ शर्त धरुलन विरि एकि ए मूढ नक्धिति ॥ ०1 
नदर मन्छन्तोप ता उम नद उ पिन दै बौर कुरे 
[च ) पै वन वोः इमे मि उखा नेली १॥५॥ 
दोधत विवि समान पुर प्राम नगर दु ए ! 
सत्सम यटुण् वदध इड सर्मटे मूल ६ ३९॥ 
तीन पचने भलगो् दम" ६ ए तदम यतरे कग केप प, 
मेह यत गमा ह बौर वीर एमा जे दरः मलेडी जह्‌ भतुषम 
बनोनामै३।३९॥ 
(ममयदि इुषठन्ति ग । नि इति सद्द इदं 8 
ड एत ममर उष पयय मिट गह एन भदन ॥ ॥॥ 
र करै दाल दपू रानमचित्णै गहरीम अ निम खे मरि 
हानी धगम तपर तीक पादेसु गा रि १॥ 
इय पिद पति रुनि धा ऽति चपि रिति धिवर ॥ 
रिषि प श्रम विहा 1 म॒ खय धि समुहनी १२1 
ञ वोत वै मपी गस णर शर यौः पैत्ते सि धुलोमि 
ए परिपतन ते कतं नौ नयो रणड रमै 
म्रौ लसदै५२) 
सोकं मूख मि रिती नः सुर चम पवर सिरी ६ 
नु शीली ह 
= (अद्‌) ख मूठ गाना (भीपमचि) ६ बौर द 
ग र ग्मि कथि श भ र) = पन 


| तर दीव दो पिलिभिदि ड 
म त विवि क्वाहं दै चसे 










# बालकाण्ड ३७ 


बसा मेल विबाइ भरा । ते जङ्चर अगनित्त पहु ॥ 
रषु जनम अने पवा । सवैर हंग सनोर ॥ ४॥ 
शीपाव॑तीनी जौर गवली विवाह बरती दऽ नदीम बहूव प्रकारे भस्य 
जल्द जब द भनाधनीकर जनयक आनन्द-बधाय हौ छ नदे वर सौर 
श ॥ क 
~-चाख्चरित चहु वं के वनज बडुरभ } 
शप शनी परिजने दुक्त मधुकर वारिविहंभ | ४०॥ 
त्राते भ्वौ$े जो गाख्यसि है वे ही मे सिये हए. रगःपिरगे बहु 
कमल ह | महरा भीददरथजी तया उनकी रानियो बौर इुडभ्ियमे धल (पुम ) 
ही ्रमर सीर नदी ह ॥ ४० | 
चौ०-सीय ्रययर था सुदं । सरित शुद्वमि सो छवि ७६१ 
जवी नाव पटु परत्र नेका केर ङस उपर सिका ॥ १ ॥ 
शीरीताजीके लग॑बरकी जे पुनद फा दै, बहौ इष नदीम वनी छनि छा 
रै 1 भनेको छन्द विचाूं प्र ही इय मदी नं ह थौर उमम विवेक 
उपर द चतुर वट ६ ॥ १॥ 
घुनि अदुकयन परसर ददं । पथि समास सोद सरि सोई 7 
शोर धार भुनाथ रिघानी । धाट सुनद्ध शाम शर धानी॥२॥ 
इ कथाको सुनकर पे जो आपस चचां शती है, वी एस सदी स्शरेषरे 
चख्मेगाछे थायोका स्मा शोमा पा र्ठ दै । परश॒रामजीका क्रोध इष गदी भयानक 
पाय टै । शीर भीरमयन्रनरे भरे कचन ही एन्द्र मे हए घाट ई ॥ २॥ 
सादन राम भिना उछ । सो सुम उमग सुखषु छन काहू ॥ 
कहत सुगत हरपि एका । ते सुष्ती मन खदित दही ॥ ३॥ 
मायौ दते शीरामचन्रनीक विवाहका उत्सा ही इड कया-नदीफी कत्याण- 
कारिणी बरु ह, भो समीको दल देने है । इसके शलनं जो पित शौर 
पुरूफित शेते ६ ।३ पुण्या पुर जो गख मनवे दष नदी महते द (१॥ 
श तिख्कं हित ग साजा । परव ओग अनु रे समाना ॥ 
काद मति सेद केरी । एरी भासु एढ पिप्रति घरेरी ॥ ४॥ 
शरीगमचन््रजीके राजतिरुककै छिवे जो ंगल-सा सत्या गया उही मानो पर 
एय दष नदीपर यागिवोके मूड इकडे हए रं । केकेयी कदि ही शठ नरदीमे क 
£ मिक एच्लस्य बही भारी विपि आ पढ़ ॥ ४ ॥ 
 दो-्षमन अमित उतपात सखव  मरत्चरित अपजाग 1 
कटि भथ लठ मवगुन कयन ते जछमल जम काग ॥ ४१॥ 
मू , भगगिनत उतो शन्द कणेवाय अजका अरि नदीतवमर 
करि जनेवा जपय ह । कल्ुके पापा बौर इटो अवयुगोके न 
मणेन हवे ही इ नदी चलका कीच जोर बुमे-कौए. ट 1 ४१॥ 
शौण-कौरति सर्वि खृद्रं रिद ङ्रो । समय सुवति पवि भूतौ ॥ 
हिमसैकसुला सिव म्पा । सिखिर सुखदं श्च चनम उठा ॥ 9 ॥ 
यद दीविरपिणी नरी च्ड गोमि इन्दर दै । समी मय थह परम छवी 


प ङ रशरितनाचस १ 


स रव णले 
सदायौ ििर दै ।। १॥ 
"न अरमन खम विनकह , खमाज । घो खुद ॒॑गङ्मय शितुचन.॥ 
प्रपर इष्ठ स वेन वद | पंयक्थाः खरं जातप पन्‌ ॥ २ १ । 
चनम मिबाहमाजका वेन ही आानन्दद्वलमव ऋतुरान वसंत 
नि इडा धोरा कया ही कदू जीरददै ॥२॥ 
व्या भोर विचर ०. ॥ दुष न 8 ॥ 
गम राच यिन्व ॒वद्ाद | सुखद सोइ छरदे सु ॥ 
र्मे खथ स दै, ज देवुख्टपी धानक चि सुद्र 
कस्या केवाली दै । रमचबरलीके राव्यकाठका ज ुल, िनप्रा ओर बहु है 
वी मर्म दल देनेवाठी एवन दाद्‌ श्तु ६ ॥ २ ॥ 
सती सिरोमनि हिय सुन गथा । सोद गुन म अशूर था ॥ 
अशत समाद सुसद । सदा पएफरस मरति न जाद ॥७॥ 
सतीःधिरोममि शरसा गुरणोकी जो कथा दै, षष्टी रप जत्क। निर्म ओर 
लुम ण र । भीम्ठनीका लमाथ इड नदी दर शीतलता है, जो सदा एकौ 
भोर भिक वर्णन नदीं किया जा सका ॥ ४ || 
+... 4 बोखनि मिलन श्ीति प्रसप्र हास । 
भायप मछि चु वंध की जठ माधुरी घुवास ॥४२॥ 
चारो भावक परस देखना, बरना, मिठनाः णक वू म करन, हसना 
अर दर मामन इ जटी मुरता ओर कन द | ५२ ॥ 
नौ-भारति यिन वनतः तोर हता ल्व सुकारि व थोरी + 
अदृुतं चि सुलह शुन्ररी । भास ॒पिश्यस मसोभक है ॥१॥ 
मेर आमा मिमय गौर दुन इम यद्र नौर नड चम कम द्कपन 
च द (ज्‌ अलन्त इतफपन द}. गह रल वगर ह यना ह, मो दनम र 
शण भसा ओर शगसमी प्रे बोर मने मच दर कर देत ६ ॥ १॥ 
` चम समि पोष पानी हरत सफ कौल छप गानी 


भव भरम सपक पोषक तोष । समन रित दख वाधि दोषा ॥२॥ 
यट चछ शरीयमचन्री सन्द भम प रता दै, कलु दमत पातो 

गौर उन दनी निशे द ता टै । संशा ( जन्म-मृल्युरप ) भमन धेल 
0 भी च्छद रवा है मौर पाप, ता, दद्व भीर क्न न 

फर देता हे ॥ २॥ , 


काम को मद मोद भावन \ चिल देक श्िराम यद्वन्‌ ॥ 

न मनन परान किष ते) भि पप परितप्‌ ष्िपते॥॥ 
‰ ` ५६ नड कामः फोष, मद ओर मेदक ना कनवाला चौर निर्म शान जर 
वय दानेवा है । इमे यादपू॑क जान केर जीर ठे पीमेरे इद्रे. 
वहि ख पतप भि ज्ये है | ३ | 

किन ठि मरि मानष प्‌ ते यर किक "कोष ए 


तृषित रिरि रमि फर भव दार । पिह ग जिमि ऋच दुलारी ॥ ४ ॥ 
निन ( रम्यस ) चरे मपे इदन्न नक षमा, वे गरायर्‌ 


% वाल्ाण्ड कै 1 


क्षिका यारा ठो गे | ते प्या हिन दक किरणो रतपर पदेरे उस्र 
हए नकत परमो बस्तमिक नर रमक नको दौढता हे भोर ज न पाकर दुखी 
हेता ४ वते (कन्दे ठो इद ) वीव भी [वपव पञ भय ] 
इखीषगे ॥ ४॥ , 
दो"-मति अदुहारि छुवारि युन मन गनि मनं अन्हवाद्‌ । 
छुभिरि भवानी संकरहि कह छदि कथा सुहाई । ४९८१) § 
अपनी द्ध अनुखार इ पुन्दर जल युको विचारक उत्तमे अपने मनमो 
सान ककर जोर श्ीमव्ानी क्षरते सर के कवि ( दस्तीदार ) बुन्द कथा 
कहता ॥ ५६ ६. चि 
अव रपति पद पृकसद पाई मखाद ] 
कहँ श्वगल सुनिवयं कर मिरन मग संवादे ॥ धल) ॥ 
अव्र भीखुनाधनीत्े चरणक्मलोको हदये धारणकर ओर उकं परलद्‌ पाक्‌ 
दोनो ४ सुनियेक मिलक सुन्दर संवाद वर्णन रपव टू ॥ ४३ (स ) ॥ 
चौ०-भम्दवा् शुनि असि प्रयागा । तिन्दहि एम पद्‌ अति शनुराग ॥ 
तापक्न छम दम दया निवाना । प्रमारय परथ परम पलाना ॥ $ ॥ 
अद्धाजकषुनि भया दरते है, उनका शरीरप्जीम चरणौ सतयत प्रेम । बे 
तपल, निगहीतचिच् जपेन दये निशान ओर परमार्थ मगर षदे हौ चर 
माघ मकगत रवि शब हो । तीरथपतिि थाव सव फो ॥ 
हब दुन कषर नर नीं । सादर मन सकल चरिवनीं ॥ २॥ 
माते यव सं मक राधिपर ति है तव छ छोय तींरज परवागको आते ई । 
देषा, दैव, किलर मौर मते$ समूह उव आदू विवी खान फो ई ॥ २॥ 
पू माधव पद्‌ जशटाता 1 परसि मय बडु रपं गाता ॥ 
सरल आश्वस धति पावन । परम स्मय सिवर मन भावन ॥ १॥ 
श्णीनायवजीके चरणकमलको पूते रै जौर भकषयवरसा संक उने 
शरसी पुकि हेते ६] मरदाजीक साभ बहूव वकः परम रमणीय भरर 
भमि मनको मते दे | ३॥ 4 
ककं शो यनि रिषम धमाजा । घिं ओ मन्न पीरमराला ॥ 
, भिं प्रातं समेत उ्हा । कटं परपर क्रि गुन गहा ४५ 
त्सय प्रयागे लो खान करने जति टै उन , ऋषिनि्ोका समाग षँ 
( भयानके भामे ) दा दै पोर घव उत्श्ूक कानके है शौर 
किः परर मग्वनछे की कथा के दै ॥ ४ ॥ " 
दो०-द्य निरपन धरम विधि बरनदिं तत्त्व विभाग 1 
किं मगति समं ढै सुत म्यान. विराग ॥ ४४ ॥ 
हका निरपः परमक िवाव भर क विभागक वर्णन करते ह ता 
श्ानरगयते क भगवास्की भिका कयम कले ई ॥ ४४॥ , 
चौ०-दषटि हारं मरि माघ नह । नि सज निज गि आाश्रम बाहौ ॥ 
ति संगत अति शद अनदः] मकर मजि यवन सुया ॥ १ 
शा अश्र माषे महीनेमर स्नान कर ह ओौर स खव अपने-अपने भेको 





च " “^ `` `" इ पमदसिमान्छ ‰ 


० 
चे जति ६} इ सक त प य़ आननद हेता है । सकलं सान कले 


शुनम्‌ चछ तते ६ ए ६॥ 
पुः दं मरि ममर नण } इषे घुकीन यश्मन्टं सिए ध 
ज्ायवरिनः इति प्रद भवि । ग्म रसे एद टेकी॥२४ 
एक नार षै मक्र लान करके ख पनीशर अपने-अपने आश्रमे लै 
सये] पर जानी गरखलय युनेवो चरण पकर भादधाजलीन रख दिय; ॥ २ ॥ 
सद्द एल सतेन रे । दहि शुवीट धासन वषे ॥ 
दरि र ञ्नि सुच ण्डानी। बे भि इती शरदः पानी ॥३॥ 
आदू ऊ वरज भौपे शौर पे ही पितर याछनपर रनद वैढाया } 
ए गते नि यायनी ददशा देर्णन किवः ओर प्रिर यलनत पित्र ओर 
कपट बणे वो$- ॥ 31 
जाय पुकं संसड उव ओर पसाव वेदत्व खड पोर ॥ 
ऋ सो भोदि सतभय छा । ब न कदं दद हद्‌ अक्षा 1 ४॥ 
हैनाय। भ मन ए दक दह दै बरख त स्वं गारी पद्मे है 
{ अथात्‌ आ ही वेदन पठ लाने हमक फाएण भेर सनद निवारण करर दक्षते 
६ )। ए टर छो कषे रे मव भौर दाग आती दै { भ दषे कि कही भाष 
जन फा सिरी पीवा ठे ए £, लन इरव्थि सि दती आयु वी गयी, 
सव भवे नौ वत भरष्ठानी 
४ 
दोस कदि भलि नीति पु शति पुम सुषि भाष । 
शरन तिम विवेक इर गर न विप इष ॥ ४५॥ 
दग्र दी गीति शते है भीर वेद, पुराण तथा रिवम मौ वही 
स्वति ६ गे यग धिगव कतय हे गर अन नहं हेत ॥ ५५॥ 
ची पिरि पायै मिल मो। इट्‌ कय शर बन 
क (०५ } संतं एरान ठपनिपदे साका ॥ १ ॥ 
मक 
ए मधा नव नि । स रनाय | सेवक कृपा रके 


गनश | १॥ यणे अप्रमाद 
(2.3 
स शि मप म मप 


ग । करतौ चरत पम पद बी ॥ १ ॥ 


भार युद यि अविना भगवान्‌ श्वम निरन्तर 
एमनापशच ज कल रते 
दन 

त्र मदना नद । विव उपदे रत कूर रापा 
11.11 

वमे [री ९१५) 1 रदौ मपा वोम वयं मायके 
परमद मल्ल & ]1 द्भ! व उदे के द | तम रको 
से तले १ ३॥ "` च छह ममक दकत्व! 


# चाठकाण्ड क ४ 





एक शम्‌ भवधैस मारा । हमद कर चरित विदित संरा ॥ 
मारि विरहं हष रेड अपारा । मयर रेषु एने रादु भारा ॥ ४ ॥ 
एक राम तो भवने दशचरजीके इुमभर ई, उनका चरित्र घारा संसार भागा 
है1 उन्दने लीके पिरम अपार दुःख उढाया चौर शेष नेप बुद्धे रवण 
६९८५ प 
दोभ-प्रसु सोदर किं मपर जपत वियुरारि । 
सत्यधाम सरव तुम्ड कट्‌ विवेङु विचारि ॥ ४६ ॥ 
है भरभो) बही राम वा ओर कोई दू £ जिनको शिवी जपते है { 
थाप स्के धाम टै ओर सव ङु जानते द, शन विचारक कंश ॥ ४६ ॥ 
सौव मिद मोर भरम मरी ! कटु सौ कुया नायं दिखरी ॥ 
जगबलिक शेरे सुका ¦ समदि बिदिव रधुपहि परसुखं ॥ १ ॥ 
हे नाथ | भिद प्रकारे भेर य मारी भ्रम मिट जावः आप ठंदी कथा विसार- 
पूरक कयि । इपर याशवलयरी रुस्कराकर बो, शरीरठनाथयदठ प्रुताको तुम 
जानतेक्ते॥ १॥ ` 
रामभगतं हु भन कम धानो । चुरा सहार तै जानौ ॥ 
चहु समै राम शुन गूढा । कीनि रसत ममं शति मूला ९ ॥ 
म मन, कचन ओर फ्मतेशरीरामजीके भक्त हो । मदर च्छाद मै जान 
सया | इम श्रीरामे रमय रुक सुना चाश्वे हे} इसीसे हमने रसा परभ 
भ्ादेभानो दी मृहुषे ॥२॥ 
तात सुनहु साधुर मड खाई कष रम कै कथा सुदा ॥ 
भमो मदिषेयुविसाख । रामकथा काठिका कराला ॥ द ॥ 
दे तात । ठम आदरपू्क़ मन णाकर सुनो; मै रमी पुन्दर कथा कता 
है षडा भारी भकञान विशा मिषाहुर दै जर भीरामजीकी का [ उपे नष्ट 
देनेवाली 1 भयङ्क कानीन र || १॥ ८ ४ 
रमकया ससि किरम स्मान । संत श्वकोर ररह जेदि पाना ॥ 
पसे ससय द्द्‌ भवानी । मदद तव क थलीनी ॥ ४॥ 
शरीरभनीदी कवा चन््माकरी किरणे समाने है, मिरे उंतरूपी कोर सदा पान 
करतो ६1 एेसा दौ रन्देद पावतीजीने किया या, ठव महदवनीने वरिसारमे उत्का 
उस्षरदियाथा!]४॥ ¢ ॥ 
दो-क सो मति अब उमा संसु संयाद्‌ । 
पै नु शुच सुनि मिरिदि विषाद्‌ ॥ ४७॥ 
अवर मौ अपनी वद्धे अनखर यही उमा ओर सिवनी संवादे करता हट । ट 
भिघ्र सगथ ओर न्ठि हेदुसे भा, उखे हे मुमि | वम सनो, दमदार पिषाद 
भिर जागगा | ४७ ॥ ` 
शौक बार चेतो शग भरौ । सं गद्‌ छंनय रिषि पाह 
संय सती शगजननि साने । पडे रिषि धश्िकेस्वर खानी ॥ १ ॥ 
एक वार ब्ेवायुगमे शिवजी भस्य श्चि पाठ सये । उनके साथ खग्ननी 
भवानी सवीजी मौ थीं ! षिन सम्पूणं नगते ईर जानकर उनसर पूजन कि ॥१॥ 


भ ॐ शय्सितिम्रत्न & 


दकया प्ानौ ! सरै रेस एम, द मानी ॥ 
षि प श, शु । कठी सदु शथिपमरी पाईं ५२॥ 
मुनिवर ज्यनीने रामा विखादे की, निषको महसे परप युद 
मनद छमा । प शुषि वैरे दुदर मतत पूष मौर धिवनीने उनको 
पकार प [ रयत ] भरित निरस मवा | २ ॥ 
कतं नन दुरति शुग नामा । कटु दिन्‌ सरद रे गिरिनाथा ॥ 
सुनि एन धिः मागि गुरी] उठे मदेन से दृच्ठकुमारी ॥ ३५ 
नाग दर्षी का कहने इ दिनक चिव वरे । फिर 
निषे विद मोगक विवी दशङ्मसौ स्वत खथ धर ( कैलाच ) को चे ॥ २ ॥ 
दहि भद्र सेहग महिमारा 1 इरि दर्द छन्दं अधतारा ॥ 
पिष उव ति रश उती ¡दक युन रित जदिभासी ॥ ४ ॥ 
उन दिनो पवशन भार उतासेके थि भीक रवय अवतार टिया था । 
बे अविना मान्‌ उह छप पिता कचनसे रामो तयाग कफ तपवी था 
शुवे दण्डकवनमे विचर रे ये. ४ ॥ 
गेयं विर्व जाद हर केहि विधि दृप्त हो । 
शुत रुप अवेरेड धमु ग लान सदु को ।४८८५)॥ 
दिव इद्र विचरते ज रद ये कि भगवान दुन सते करित प्रकार शषँ | 
रुन पड सबमर्‌ जिया दै, मैः जनेरे ख छेग जान लाने || ४८ (क)॥ 
म" र दर मति दीषु सती च जान मरपु सो६। 
त शव ध श १ । सची ५४८) 1 
/ द्दयमे दूष खसय उ; 
"11111 
समम ] र थ) पल्द दे भेम उम मव उञ्य स ये ॥४८(ख)॥ 
7“ वन भरन तुम कर जाप । णु विधि यच शह सा | 
जै, स ज र्‌ पवा त यथ ॑ १) 
रम (मपी यु मत हेम थौ | राम कन्न 
श ज चा ६ । म प नहो जला हत द वावा दलयगा । 
1 | कती ी॥ १] 


रा । देह समय भाद्‌ दंससा ॥ 
न्‌ शीव मीषद सगा । सथर इतत होट टरम ॥ २ १.८ 


सीदाजीये इर व्वा । उसे स 
पारम्‌ आ ओर दे म मां सणि 
नगरम मषु भर यष॥ भ व वनेन पार) उक 


# वारकाण्ड # ३ 


भित रिक भर हेव रघुराई । जोत सिपित पिरत दोठ भा 
कहर जोग बिवौग नं जादे देखः भ्रगद विपद हु त्त] ४ ॥ 
भीरषुनाथी मनुय मपि बिरह वयर ह ओर दोनो माई षये सीताम 
सनते इष किर रदे है। भिनके कमी कोई संथोग-मियोग नही है, उने मक 
° अति विचित्र आनि परम सुज्ञान । 
जे मति्द विमोह धख हषं घरि कटु आन ॥ ४९ ॥ 
श्ीरघुनायनीका चरि बदा ही मिचित्र ह, उरो पचे हए हानीगन हौ ्ानते 
४। ने मदि है बे तो विरूप गे कच देकर हद ङ दूरी ह गत 
समह रते है ॥ ४९ ॥ 
चौ०-सु समव तेद रामह देहा । उपना शि भति बदेषा ॥ 
भरि छोचन छविसि विशार । कुसमय जानि न ग्रीन्हि चिनहारी ॥ १ ॥ 
शीरिवजीने उक्तौ भवछरपर श्रीरमनीको देला ओर उनके ठयम बहुत भारी 
मनन्द्‌ उसमे हा ] उन शोके षद ( शरीरा्चन्रजौ ) को चिवर्ीने नेभ 
भरकर देलाः परनहु अवसर ठीक न जानकर परिचय नही कथा ॥ १ ॥ 
जय॒ सचिदानंद अय परावन । भव कदि वेड मनोज नसावन ॥ 
चरे लात सिब सती समेता । पुमि एुनिं धुखंकेत कृपानिकेतता ॥ २ ॥ 
जत परनिभ्र करना सबरिदानन्ददी जय हो, इस भरकर कंदकर कमदेवक्ा 
नास करेवाढे सिबज च पदे । एपानिधान श्ीशिवज्ी बार तरार घाननदते पुति 
शेते हर वतीनीके साय चछे ख रे थे ॥ २॥ 
सतीः सो दसा संसु कै देखी । उर पभा संदेह वितेषी ॥ 
„ सकर गतव जगदीसा । घुर नर सुनि सद नात सीसा ॥ ६॥ 
सुतीजीन ` शीशंकरजीकी षह दशा देखी तो उमर मने ददवा सन्देह उलन्र शे 
गवा ].[ बरे मशीन कने ठौ किं ] शंकरी खारा गत्‌ बन्दना करता दै, 
ये नप ईर ह देषता, मलय शनि उष उनके रत पिर नवाते है | ३ ॥ 
तिन्ह पृषु कीम्द रनामा । कषि = सचिवानंद _ परषामा ॥ 
` भए मगन छवि तासु विलोकी । जन॑ भोति उर शति न रेकी ॥ ४ 
उनम एक सनुतर सभ्विरानन्द परमधाम धकः प्रणाम किया शौर उसकी 
शभा देखकर .बे इतने परमम शे गये कि अमतकं उनके हदये पीति रोकनेषे 
, जी नह स्वती | ॥ ४ ॥ वि श 
^ शो०-्हम ओ ध्यापक बिद्जञ अज क्ल अनीर अमेव्‌ । 
॥ सोकर देहं धरि श्ोद् नर काहि न आनत नेद ॥ ५०॥ 
जो त्रम एव्वापक, मायारशित, अचन्मा, यगोचर, इन्छारधित भौर भदरदिव 
ह चर ते वेद भी नी जनते सया बद देह यार के मनुष्य हो उक्ता ६ 11९० 
1 चौ*-विष्ठु छो सुर डित नर्त घारी । सोढ सम्म अया जरिषुररी ॥ 
{ शोष सो कि अमय दून यारी । स 1 
| देवता्ेकि हके श्यि भलुष्वञ्चरीर धारण करनेकाः षणु 
। भी शिवली शी भति सव है| वे हाने भण्डार) सपति मोर गदठरे$ शत 
भृमवान्‌ बिश क्वा जज्ानीकी वण जीन लोगे { ॥ १ ॥ 


% . % रामचरिदनख भ 


संद्ुतिर मि दषा ल जोर \ सिव इदस्य न सड कोई ५ 
सन्न संप सद भयड रश । टद न इय प्रवोध प्रचार ॥ २४ 
शः सिवद कनं ॐ टे नी चे सक्दे। उव कोटं जनते ई कि चिवनी 
र्व ६] सरी मने $ प्रकरा अपार सन्देह उठ खड हुभाः किती वण 
मी उमर हदयं शनक भरमौर नी चेव था ॥ २॥ 
पि परयद घ केड शखर । हर॒शंघ्ररणामी सद लावी ॥ 
सुषि खरी ठद नारि सुखा 1 संखय भस च धरिम उर काठ ॥ ३ ॥ 
दपि मवानीीन प्रकट छढ नरी का, पर अन्तग रिषभी स्व जान रये ! 
वै दोहदे सती | दुनो, हय जीलमाब दै । देख सन्देह सनमे कमी स रखना 
व्यि ॥ ६॥ 
आदु क्था डंम् रिषि गा । भति भासु श ठि सुम ॥ 
सोह सम र्ये खुबीरा। देवत जादि घवा युमि धीए ॥ ४ ॥ 
जित श्याकम भगस्य ऋमिने गान्‌ किया ओर निनी भक्ति ने पुनिको 
क ये वी मेरे शेव धौरवीरनी द, निनकी येवा छी मुनि खदा किया 
॥४॥ 
छ" धीर जोगी सिद्ध संतत पिम भन जेहि ष्यावष्ी । 
दि नेति निगम पुरन गायम्‌ जा कीरति यावी ॥ 
1 
अपने भगत न ॥ 
हानी पुरि), योगी र शिद् निरत निर्मल पि ध्यान फरो हि, 
सया मेद्‌ पुराण यैर शाल भतिन ककर नदी कीति गते है उ सवन्ापकः 
सण ब्रहाणडम स्वामी, मायापत, निल प्रम तततव व्रह्म मवान्‌ भरीरगीनि 
खपे मर्त पिद पमि [ जमनी इच्छते ] रु मणिर भवार लिया | 
शे०-खग्‌ न उर उपवे अपि कदेड सि बार वहु । 
यो विसि मदे हरिमा चदु शनि किये ॥ ५१ ॥ 
पि धिव बदु यार सन्धाय, पिर मो सतीम दयम उनकत उदेव न 
वैम्‌। एव म्ददेवनी मने मगन माया वह नान्ते हए बोञ-\ ५९] 
ची द्रं, मन जति स्ह \ तौ किनि चद्‌ परी ठे ॥ 
त शमि वै शठ बला \ भय कमि इ दह मोदि पाले ॥ १ 1 
ज दद नमे ह वनदे दै वो इम लाकर परा ब्य नकं लेती { जत 
इम पपाठ शेर सामगी ततत दती यदव छर ेा ह।९॥ 
भैष ज्‌ मौर अम मार । कु तो न्तु पि विदारी ॥ 
चली सती छिव ययु पा करहि विवाद करौ का खदै॥९॥ 
(1 
इम वी का | आश पाकर 
सोचने सी फि माई] क कहं (डे परा दै) } ॥ १॥ व 


ष्टौ सं भस मन अलुमाना । इच्छ्ुदा कँ न 
ष म्द न संसप चाष | विधि दिपरीत नद ॥ ॥ 
# किन मने शेवा मतुमान गा कि दन्य स्वीका स्यण गही 





% वारण्ड # षष्‌ 


~ 
३। त मद भी कद द ह हेव, ल [ गा हैव र] वा ह 
उषे ह यतन रह नी र॥ ¢ ॥ 

, दहि सोद भो रम रचि राला को करि त्थं कतै स्र ॥ 

अस कि रगे जपन हरिनामा । ग सत अरं परश सुसामा ॥ ए ॥ 

, „जे ङ रने र एसा 2 कही देग । ठकं फे कीन गरा (विर) 
दे! [सौ] ल क वनी मावान्‌ भीरि म्र जपन छो बौर स 
बी वहं गथ भ्व के पा ग्र भौरामव्रमी ये ॥ ४ ॥ 

दो०--पुनि पनि शय विचारं छरि धरि सौता कर ठप! 

भगं (५ चलि पय तेदि जदि शरद नरमूप ॥ ५९॥ 

स्त भरर्वार गन विचारक दीतादीकर ए धारण के उस माप॑ गोर मागे 
सेत पर्थ जिते [सवी चायतचार] मोड़ गव यमचनली भा दे पे ॥५२॥ 
चौग-रु्ठिमन ` वीस उमाहृत वेषा । घकिति भय प्रम इदे दिते ॥ 

षि न सकत कष घति गमीरा । प्रु परभाड वातत मिधीरा ४ \ ॥ . 

एतम भनी भेष देलक सगय सि हो रे, गोट उनके ह 
पी रमर हे शया | वे भुव गभीर हे गये, कष कट नहीं वे मीरु तवमम 
अ नायक प्रमारो चाने ये ॥ १ ॥ 

सुती कृष जनेड श हव ॒ैवरनामी ॥ 

इुभिरत जाहि मिद अभ्या । सोह रकग रा भगवाना ॥ ९ ॥ 

ए छठ देणमेबे योर सव हदय अननेबे देवतामोमे सामी भीरमनध 
नी सत कटको भ गयः मने खरणमारे भनक सश ह भाता, शी 
1. 3 

# ॥ दमि 

तिं भाया बहु ति नी ॥२॥ 

परीखभावा अएर ठो देशो वह { उन प्वेड मगन मने ) भौ 
सतै छम ला चाष ह | मगनी मापे को इदपमे वान पीपमनन्र 
भ कर गोमल वाणे गरड ॥ १॥ 

चरि पाति प्रष्ठ फ भवाम्‌ । पित्रा समेत छद मिज नामु ॥ 

कदे वोर रदा शपे । विभिन भके भि पे द ॥ ४ ४ 

पे पुने हय नोदद से परम्‌ भया भर पगरा जना नम 
रता । प्‌ फा ऊ शमह रिवय पर ६१ मारय बर करोतम मिपि 
4. 8 ज) 

~-म धचन्‌ 
11.11 0 

शामचनैके कोप ओर ददलम वचन नकर $ ध 

श. ङं इ ही 
न्ता }-। ५ 
पु ज भ्ाना। नि सवा रम पर आना ४ 

आतर उतर व देह षा । दर उदा भति दव दाहा ¢ १ ॥ 
किन पर्क न मना गौर मपवे मनम 


~ (मवत र नवन्त ण 
पष # व 


=-= 
सत का । मद जक पँ दिवम स्म उत दूगी १ [ वो चेषतेोक ] 
शमी हदये अयन्त भयानक जलय रदा £ गवी ॥ १ ॥ 

ज्ञा शफ सती टु एवा । निज प्माड कदु प्रणदि भनावा ॥ 

उही ददा कद मा आता \ अं रु सितं श्र रा ५६॥ 

शीरम्बदरमने नन सकि सतीव इ हमा, त्व उन्दने अपना ङ 
भम्र द के उ दिहा | सतीन कतं ऋते एयर क देवा कि 
शरीरमर्नी धीती मौर व्छमगनीरदव भागे चे ना ठे ईं} [ इख अक्षर 
सीताम मध्व दिखावा मि सती रीरामके उविदानन्दमव स्यन्दे, ्ियोप 
धर इसकी कमना वो उमे हई यी दूर हो जव तथा वे प्रतिर द ] 1 २ ॥ 

पिरि स्वा पटं रुं देखा ) सित चंड पिष सुद्र देषा ॥ 

ज चितं तं सु मोमा । सेवं सिद्ध नो प्रवीमा ॥ दे ॥ 

[ ल उने] पडी मोर ककर देखा, ते व मी भई च्छधूली जौर 
सीसनी$ साय श्ीरचनरजी उनदर वेष दिखायी ववि ¦ मे निष देखी ६) उर 
हीम शरीरमचन्द्रजी पिराशमान दै गीर दच्छर ष्ट गवः उनकी सेवा करर ६।२। 

दे षिव विभि बिष्तु भने ! मिते भगार पक ते एका ॥ 
दृत चन कतल श्रु देवा । िषिष येष देखे पथ ददा ॥ ४ ॥ 
रतौलीति अनेक विष भा धोः विषु दे, ॐ प्क वकर असीम 
भावम थे । [उशन देखा मि ] मदिौतिके भेष षार मिथि समी देवला 
भीरामचन््णीो चरणवन्दना वोर क १४] 
फे-सती . पिघाधी शष अभित ॑यनृष । 
दि ओ देव यजादि दर रेह दि, तत भदुरुप ॥ ५९॥ 
उन अनित पम चत, रणो ओर चम देख 1 जरि तपे रहा 
भादि देता ये, उतंक् द्स्भगं [उन ] थै ख [ चिवो] मी भी ॥५४॥ 
सोमपते भट त सुति चे । सिद रहि पद दुर ते ॥ 
जीव चर्‌ जो संसारा) ददे सक फते कारा ॥ १ ॥ 

न चद दिने शनम दे, चिोऽि वहं खो दी सरे 

रेभे भ देहा कंते भे चाच व ह रे भ मने पक स्व देते ॥१॥ 
म दरव षड देपा। राम स्प दूर नटं देशा ॥ 
> पमि हरे । घता सदत म देष धरे \ ९! 
{को देशा ड } ये वेप धारय कते दव रु भोरमचदरवीकी पला 


कद य ६1 पर भीरपनमीका दूषा रपद म देखा । साति 8 
अ हते देदे) पर उनके ३ च्व थे॥२॥ ९५ 


सोद खवर सेद टचि सोता । ददि सदी शति भं भीता ॥ 
दष प तभे सुधि उ ना । गन भूदि दैक मग मां \ ६1 


{र मबद ] व सनाय, द दमन्‌ मौर मरी शीवाली र देखकर 
यव दर गवी । उनका दय कंपे च्या खैर 
मूर भम ैह गदी ¶ ३॥ ॥ 


पुरे पिके सथन रपर । क म गु उ दचाहं 
नि इमि गृह रमे ए सौदा । ण्ठी ठं जँ दे भिर ॥ ४१ 


# वारकाण्ड ह 
रि भख सोल्कर देखा, तो हँ दक्षुपारी { स्वीजी ) को शु भी न दील 
षड़ा। ठव पे बरवार भीरामचन्रनीके चरमं धिर नवा, वँ चली अँ 
श्रीरिषभी ये | ४॥ 
दोग समीप मेख सव दति पृदी इसखात । 
9) कवन विधि छद सत्य सय या ॥५५॥ 
उब पास पटी; तथ श्रीयिकभीने सकर इुखल्र्च करे व फि ठुमने रम 
जीवी किर प्रर परीक्षा ली, हारी वात सचस्व को | ५५ ॥ 
४ भासपारायण, दूरा विश्राम 
चौण-पतीं सुक शधुषीर प्रभ । भव धस सिव सन कीन्ह दुरा 1 
क्तु न परी म्हि योपा कनद भगाय हम्हारिष्ि नाई ॥ १ ॥ 
सतौजीने शरीखुनाथजीके परमायकने समकर दरे मारे शिवे हिपाव करिया 
सौर क्हा-हे स्वम्‌ ! ने ए मी पला मह घ, [ बँ चकर ] भाण ह 
कह पणम भिया | १॥ † 
ओ रमहकष सो खषा नई । मोरे मन प्रतीति धति सोदं॥ 
उब संकर दत्ते घरि ध्याना सतीं जो न्ट चरित सद जाना ॥ २॥ 
आपने जो का षह हूए नां हौ शकता, मेरे मनम यह षडा ( एर ) भिस" 
दै रम्निवनीे ध्यान फे देखा र सतीन जो शरि क्षा था सव जानसि ॥ २ 
धुरि राममायहि सिर वावा । भरि सषि में ड क्वा ॥ 
रि इृष्ठा भावी वहवाना दर विचार संघु सुवाना ॥ \॥ 
कि भीयवनद्रसीक मवाको पि मशयाः चिम प्रणा कर सती पैर भौ 
1 | हजानं चिवसीने मनम विचार दा कर शीशी द्डामी 
भावी प्रड दै ॥२३॥ 
सीः ष्ट सीता कर जषा] सिव डर भयड विषाद्‌ भिसेषा 1 
,. जौ अव करई सती सन पती । भि गति पष्ठ ई अनीदी ५ ४॥ 
रीरमन धीतीका द धाम विया यह जानकर गिवे इदं पदा गाद 
इभा उने ोचा कियद धै जव उतरे भीति का तो भपिमागं छ ह जवाः 
जोर वहा चन्याय हेता है ॥ ४ ॥ 
दोऽप पुनी न जद तजि किर भेम षद पापु । 
भ्रगटि ग कव मदे कषु शर्य अधिक सूदा ५६॥ 
सती परम पथि ह एथ टै छेते भी मी वनता जोर प्रम क षदा 
पाप 1] प्रर के महादेममी यु भी नही करः पर उनके हदये गडा 
सन्ताप दै ॥ ५६ ॥ ५ 
भरर शंकर परस पद धिर न ध शल 1 ५ 
ए ॥ संकषयु मव मषः 
कु ८ ४4 चरणकमलं सिर नवा भौर भीरामनीक 
सय फ उने गनौ द वाया सि सतक इव ररे मेती पठन ]' 
भैर नहे सकती यौ दिवीति सपने मन यद स्क दर स्थि ॥ ९॥ 
घुभिरत रुरा ॥ 


अस विचारि संरुटं ्िषीरां । चे सवन 
चतं यगन सै गिरा हां चयं महे भि सति खद ४२५ 


(७६. __ > पमबरठमत ५ -------- ॐ यमचरितमानघ £ 


व 
ससय रते हए अगने.षर्‌ 
लिखि की रेण पिस शीपुवजीरा, सएव ठ 
{कणो ॐ) वो म क मदे । भाप्की भय 
सने मक्त भनौ स्वता स ॥ २ 
+ यपर ए हिड पे जना शनम समरथ भयमाना ॥ 
हिवि स्मेव सकोच ॥ ३१ 
शुग भगदा सी इर सोच! ९ ष 
भावो कोकः दमा न सी तिह पट सक्ता ह { माप 1 
भ ४ दषं ए बौर मगवार्‌ १] इट ्ादागनने इ 
किरा मौर उने सङयति द तरप पूा-॥ १॥ ॥ 
शद कवन एर कटं इषा । सत्वभाम अयु दीनद्बाा 
भुपि सत शू भु जीति । चदि न शेः नु आय ५९५ 
१ जसि, जपते वोन मरि छ ३1 ममो] माप सते षाम 
भर दीम १। ममे वतीने बह प्रे पू पर शपि विषनेने 
नक्दा॥४॥ 
क दै अलुमान किय सतु जमिर स्ये ! 
नद शप संभु सन वारि सहस उष थन्य 1 ५७(१) ॥ 
सवी हवे २4 0 मे वनेपि कर 
क्वि, ्ी समाद केसमर्‌ देवी हे ॥ ५७ (फ 
से* श पष रिख पिकः देख परीति किं रीति सदि । 
विरुगे हद टु जाद कपट सारे एत पुति ॥ ५७५) ॥ 
परीति इन्द ८ यूके शय मिष्कर ] पके ठान 
व धिक है परु फिर कषटठरौ खद पते ह पानी भला हे गता (ष 
पट जता ) भौर खाद (प्र ) जात रता है | ५७ ( स ) ॥ 
जगह सोड सुद जिन एर । चित्र अमित जाद्‌ भ परती ए 
पपि सिव पम गाधा प्रग त कहे मोर अप्रधा ॥ 9॥ 
अपनी कीक याद्‌ कंठे श्वीजीमे हदय एना तोच दै शौर नी भार 
विन्ता रै कि विषा वर्ग रही क्वा च उता  [ उनि मह स्था कि ] विष 
शै एण एस धय सा ई, एके प्रये उन मेय मपय नी छा | १ ॥ 
पंक स॒ भवदे स्वयै । भु भोदि सेढ दप अज ४ 
निम दु च दि गाई त सौ एव ठर भमिं ॥ २१ 
भदक स देख चतदन लन्‌ ठ्थि कि सात भेर त्याग क दिया 
ओः म ङु हउ । आवना पए वाकः ठ कते द, परु 
स [ मी्द मौठर } गारे मग धमान भलन् चछ लमा ॥ २॥ 
तिदिः सतोच शनि शष । फटी शया धद ख एत्‌ ॥ 
यमत प॑ विवि इत्ासा। पिनाद पटु दैक ॥३॥ 
पु सिन खी चिनतयुक भनक उन यह दे वनि एन्दर फा 
स मा ममे निम ते एलो शते हुए निपा म 
मनति ॥३॥ 
यः नि ई षठ एव जलन । कड षट एर शरि कसम ॥ 
सकर शन ससु सम्य । छनि एमि बेट भरासः १२६ 


ॐ वारकषाण्ड द ४९ 
` शठे फिर्‌.गरिवजी भनी प्रतिशाको याद करके वकफे पके नीचे पदमारन उगाक 
ठ मये । शिवजी जना सामाबिक स्प दमा ] उनकी अखण्ड गौर अगार प्रि 
चा गयी ॥४॥ 
रो०-सती बसि कैकास तये अधिक सोद मन माहि । 

“ भ्रमु न कोड ज्ञान कदु जुग घम दिवस सिरि ५५८॥ 

तर सतीज कैलषपर खले सी । उनके मनम बड़ा दुःख था | इ रफ केव 

ङ भी नही जानज् धा } उनका एक-एक दिन युगे समान बते रहा ए ॥ ५८ ॥ 

` चौ°~नित भव सौतु सतो उर भारा । कंय॒ ऽ दुख सागर पारः॥ 
मै जो कीन्ह रतुपति भपमाना । पमि पतिचजु शषा करि जामा ॥ १ ॥ 

' स्तीजीके हदय नित्य नवा भीर भारी सोच हे रा या क मै रर दुगमा 
पार माजी । मैने जो भीरुनायीका भमान क्वि ओर किर परिक वचनो 
शूठ गना-॥ ९] 

सो फट मोहि पिधातौं दीन्हा । जो फु उचित वहा सोर फर ॥ 

भ बिधि धस वुक्तिम नि तोही । संकर विख मिभावसि मोटी \ ९ 

उसका पक विधाता पु्फो दिया, जो उचित धा व्क! परु हे विधाता ! 
भव हसे बह उचित नदी ए नो शे परत हेर भी सतर जिव २४ ३॥ २ ॥ 

किन साद्‌ कट हदय गनी । मन स रमि समिर स्थानी ॥ 

ओ भसु दनद श्छावा। भारति हरन वेद्‌ जघ गवा ॥१॥ 

स्वज ददयगी म्नि उ कही नी ती 1 इदिगती षीमने भन 

ओीफाचनीकन सण भा मौर कह अमो ] यदि आप दीनदगा प 
बौर पदेन आपश यई गदा गाय ह कि सा दुमो शग, ॥ १॥ 

` कतौ भँ जनय कर्कर जोरी। वड येगि देद थह मोरी॥ 

जौ भोर सिव शरन सने । न क्रम यच संत्य प्रु एह ॥ ४॥ 
तो $ हाथ मेः विनती क्ती ह कि मेरी यह देह जह्द बूट 
सूप । यदि भेर निजे अरणेमि परेम ई ओर मेय यह [ प्म ] र मनः गवन 

भ (जन) ॥ ४] न्न 

रोती सः तिथ प्रमु फड ग उपाई । 
॥ हो 91 श्म. सद विपत्ति दिहाई | ५९॥ 

। , वोरो | इ, मौर त्र दह यपरय कविय भित भेर मण 
। नन न 0 ५९॥ 
०-प्हि हि `दिव पअजेरमारी } भकयनीगर; दासन (द्‌ भारी ॥ 
| भ 1 व 

# दुता सती दप प्रकार हुत दुःखित थीः इतना दारण हृल. 
| नि यी वर कह जनेः भरव 
 ओतनैने खमन लोर | .१ ॥ तस ॥ 
॥ शमर नाम सिव धिर छीग। वेड सौ जसपयि, चमे 
भ सं पद वदु कीना सनडुल संक आस्त॒ वन्धा #९ ॥ 
¡¦ विषमौ रोमा शसा कसे छो, इवहे जाना ि अव पठे समी 


॥ गाग ६० धे-- 





पर *£ सुम्रितम्पनस ४ 


{ किवी ) सगे । उदन नकर सिवनीके कलत मशम्‌ विवा । शिव्ने उनको 
रनक स्थि चपले बहम दिय | २॥ 
कये कुर हरिकथा शतारः ! च्छ पेष भषु ष्टि का ॥ 
दे पवि छि सद समद! शरदि फ प्रपि चाथक़ ॥ ३४ 
शिवेश मवान्‌ दृरकी रतफथी कया कलले छो ! उसी मय दश परनापति हूए। 
नैते एव प्पे भप देख रुहद दषो प्रमापति्ोका तयक ना दिया ॥ ३} 
ट्‌ भमि दुष्छ पद पादा! अति अमिमादु हदे तव आवा ॥ 
लि ड सस सममा अप माही प्रयुता पाद्‌ जाहि सद्‌ नादी ॥ ४ ॥*“ 
जद दने तना चड़ अधिकार पाया तद उनके हृदये खत्यन्त अभिमान 
जा गया । तयत शेरा शई नही पैदा हभाः निरफो प्रेता पाकर मद न हे | ४ ॥ 
दो०---दच्छ चिप सुनि बोलि सव करन छग बट्‌ जाग । 
बेबे साद्र सकल द्ध, जे पवेत भक्त भाव ॥६०॥ 
दधन स्व सुनिोमो दुय च्या शोर वे बहा यत करे छे ! जो देवता गहा 
भाग्‌ पते ¢ दमे उन सकन भाद्रसदित निमन्नित कि |¡ ६० ॥ 
चौक नय - सिद, यवौ । बधन समेत दले घुर सवा ॥ 
विषु दिरंचि म बिष्ट 1 चे सल सुर॒ धान बना ॥ १ ॥ 
{ दन्न निमनण पकर } पिर, नाग, षि, ग्व ओर सब देषता 
भषनीमपनी छिपोदित च्छे । निप अर्य घौर महदेगीको छोडकर सभी देबा 
संपना-अपन विमान सलार च्छे ए १ | 
सरी विशे धयो मिना । जते च्छे रुद्र विधि शाता ॥ 
सुर दी करि फ गान । नर धवन दं सुनि ध्याना ॥२॥ 
उहीनीन देखा नतन काठे जद विभिन याकममे चा) देदखन्दरिमो 
मर ान श द ६ जिन नर धुनि धयान दूट जावा ह ॥ २ ॥ 
पड त सिप केड भनी ] पत्ना प्य ' सुनि कदु हरषानी ५ 
र्वी पि द; दिव चाद ररौ मिस द्ं ॥ ६॥ 
एतीरडनि [चाम देऽ लने कारव ] पूष; तव दिषजीने खघ बाहं 
र्मी वितान चरौ वात एन स्ते प्रस दुरं गौर सोचने चपी मि यदि 
देवन से य द स दी ऋ क दिन प षर जकर ॥३॥ 
पि परित्याग इये दु भमो भद्‌ न निल अपराध धिवारी 1 
पोल सती सके कदी मव संनेव ब्रम रत सानी ॥ ४१ 
कयो उनम दरे पतद्राय त्यागी नेका बड़ा भारी दुस्ल था पर अवना 


भाप नदर दे ड कती न थी 1 गिर › तको चयौर मेम 

5. (अ सतीढी भव्‌, सकद मौर नी 
“~ वा मबन उत्सर प्रम ज्ञौ भसु धाय श्ोद । 
॥ म जार पावत सादर , 
पवर्‌ ॒देखन सोढं ॥ ६\ } 


पि बह उतसव ¡ वदि सपक थाहा 
छापर ¡ ‡ आदरसिव उह देवने बध {६६ ॥ भ 


चौग-श्े सोक मोरु मन भम्त। यह दु्िट बट मेद एधा ४ 
पच्छ प्स्ठ तिन सुखा दोटा। एमे यर इण्डड व्रिकषराई ॥ १ ६ 











# वाखक्षाण्ड # ५१ 


सवदि -कदव- कने वात तो अच्छ कदी, य मैरे नमो भी पं 
पर नदेन न्योता नही मेना, यद्‌ अतुधिद दै । दने धनी इव (० 
ककि एके भरण उन्दने दमे भी शलं दिवा ॥ १ ॥ 
हस्म शस घन ` दुदु माना । ठि तै जनह प्रि अपमा ॥ , 
णौ चिलु "बढ़ जाह वानी । एद्‌ नीद सन न ची ॥ ९। 
ध 
मत ठम विना ज 
॥ ५ ५५ चरेगी॥ २॥, न ग 
1 व्र अरु पित-गुर गोहा जाथ बिल बरें न देहा ॥ 
, क्वपि भिरोध मान अद कोद । तदय म्द भस्ा्च न हो ॥६॥ 
पिन्द नही फ मिज, लामी, पिता मोरु पर बिन इये मीजना 
चाधि ते भी जरत को विरोष मानता शे, उरक षर जानिसे कल्याण नही शेता ॥ ३ ॥ 
अनेक संभु॒समुत्नावा ¦ भावी वस न भ्या ठर धावा ॥ 
ए पञ्च जाहु जो दिनं ढा । नहि कि घात मरे भरु ॥ ४ ॥ 
विममे बहुत भकारे समस्या, प्र लोनदारव्य पतीक्-हदयमे वोष न्ष 
हा ] फिर, धिबबीने क कि यदि बिना इये जमोगी, तो हमारी घमस शन्छरी 
बरन ्ेगी ॥ ४ ॥ 
दो"--कंहि देखा इर जतत्‌ बहुं रषद न दच्छ्ठमारि । 
वि ख्य गन ग तव बिदा कीन्ह शिषुरारि ॥ ६९॥ 
दिने बहुत परकारते कर्‌, देल व्या, किन घव सती वही प्रकार भी 
नद सी ठव निपुरारि मदक अपे शर्य ग्ोको चाथ देकर उनो मिद 
क दिया ॥ ६२ ॥ ध 
-पिहा मघन जय शई भवानी । दण्ड चास ऋ न समानी. ॥ 
पाद्‌ भद मिकठी एक माता । भगिनीः मि गडूत इकाता ॥ १ ॥ 
भवानी जय पिता ( दद ) फ षर पीं ठव दके इरे मरे किमे उनकी 
खापमात नी \ रनु पक माता मे दी मादर मिडी । बिं बहुत सुसर 
ह्ण ॥१॥ ` ` ` 
इच्छ च छश पी छुसकत्रा । तिहि विलोक जरे सन गाता ॥ 
सतौ जाह देखे ठव चाग । कलह न दीं सुकर मागा ५२॥ 
दने तनो उवी कुछ कुयश्त$ नह पूली, सती देखकर उष्डे उनकेखे 
ग ज उदे | तव सताने जाकर यड देखा तो वशँ की धरिकजीका भाग दिखी 
नदिया ॥|२॥ ' - # “ 
सब चि श्वदेढ ्ो संकर कदेड । अधु पमादु सस्ति छर देक 
पाठर दु म हरथ भख ब्थापा । जस चद भयर महा परिदा ॥ ६॥ 
तव विवनीने जो का या बह उनकी समह आया ] लागी अपमान 
फकः तीका हदय जक उदा । पम (पतिपितमगक्न)ुःल उनके हदय उतना 
नही म्या.था जितना मान्‌ दुःख ह समय (परि-मपमामके अरण हवा ॥ ३॥ 
ब्पि अग दुन दुल मा । सय त कवि ति अवमानाः ॥ 
सुक सो रिषटिमवड जति कोचः] चहु मिथि चरन नह भवोषा £ ४7 





च ‰ प्वरिदसालस # 





जते अनेके शकते दारय रुः ट तथापि लति-भपमान सरे 
न ६\ यं उमश्कर सती हा एष च माया ! माताने ठम बरव 
प्रकारे एमायावुकाया ॥ ४१ & 
दोस जपमातु म साद्‌ उरि वयै न एर भ्योय । 
वट खरि इ टप दद पोर भरत सफतोध ॥ ६३॥ 
पु उने व्विददौं जगमान तल नदी गयाः इठे उन्कै इदयं इ भी 
भवोर नर हवा । त ३ री कम प जेयः रभम कचन रौ -1९३॥ 
चौऽ-पुवटु समा सकढ दुदु ! की सुरी चिन्ट संगर निदा ॥ 
के १ उ सष एव छ ठी सौरिं परिता पिह ॥ १॥ 
द एगमदो यौर ख एनी! डने । नि चेन वहे सिमी 
इनी र उन स्वणो उनका ण्ठ दरव द मिलेगा भौर मे प्व द॒ भी मलीमौति 
प्ठतेमे ॥ ६॥ 
व पथु श्रीपति भपषादा 1 सुनिम च स भसि मस्बादा ॥ ./ 
आटि शर श्रीम जो वदा \ श्रवस मूदरिन त चिल परा ॥ २ ॥ ५ 
च ररः शिवी जर चीरि विष्मगम्री निन्दा सुनी जाप बँ पेली 
मवा मि पदि अपना कः चे तो उर (निनदा केवले ) दी तीम पाट क 
शौर म तो षान द दे भाम बाय ॥ २ ॥ 
अगद्त्मा' महु परारी भयत शेफ सव ॐ दिसरारी ¶ 
पिता भंधमरि तदत तेह । इच्छ दुक संग यट दैत ॥ १॥ 
भैर षु दनक मरे परवा गर समू अतत आना ६, गमिता 


म प चीर दशक ववत तन्न ॥ ॥ 


इ त्व देए येरि हेद्‌। उर धरि चमौरि इषं | 
अस हि बोग भगिनि सदु अःय । नद दकछ सन्न हटकर ॥ ४॥ 
षरि च्म , ठय धारय देवे इषत्‌ शिवतमो हृदय धारण 
के प इ री व॑र लम म । दव ककर सतीन पोगामिमै शना 
शैरभल कः दाय । छारी या शदाकञार मद थेया || ४] 
दोस्ती मण्ड छनि सं शन खये रन मद खत । 
ध किंसु च रच्छ पीन्ठि शुनीस ॥ ६४ ॥ 
६ मरन्‌ सुन गण कह विख करो श्रो {- कड. 
मिव हे देः नीर शुने उश रा क ॥६४॥ 
“स्मार स्व संहः पा } 
भग बिष्पख दिम ओन (सक्ड सुर 


भेमष्दिरः इष्ठ ह चो \ ददि च्छ कैश 
शद शिकार सकः जगः तानी । ते ॥ व ५९ 


# बालकाण्ड # 1] 


दश जात्मरिद्‌ वही गति दुद नो शिवी इमा करती ६ । य पतिं 
सार कसार जानता दै, पवषि ने संधेय वणन बिया ॥.२ | 
सतीं मरत हरि सन ,बठ सत्या ! जनम नम सिव पदर शतुरामा ॥ 
तेहि शरन हिमगिरि गृह जारं । नवमी पारर्पी तबु पाईं १-३॥ 
सतीन पते छम भगवान्‌ दस्ति यद व गगा कि मेरा चमत विवी 
करणम अतु रे ] इती कारण. उन्दने `धिाचलके षर अक्षर परवती शरीरे 
जन्मःलिया ॥ ३॥ ^ 
+ भव ते उमा रैर श्ट जाई । सकड सिद्धि ,संपति लै छद ॥ 
जह ट सुनन्द सुख्रम.छन्दे ¦ उदित यास हिम भूधर कीन्हे ४ 
जवसे उमाजी समाचरन पर जन्मीं तवेदं षारी दध्यौ भौर षग्पियो 
शा गरथी । सुनियोने जत सुन्दर आश्रम श्ना किये ओर हिमाचलने उनको 
उषित खान दिये ॥ ४॥ 
दोसा घुमल फर्‌ सदधित सव दुम नव नाना जाति । 
भरगरी. दर सैल पर मनि आकर बहु भांति ५६५॥ 
स खुन्दर प्वतर बहुत प्रकारके स्य नयेनये षष षदा पुष्प-पष्टुकत ह गमे 
ओ वे बहुत तप मगिोकी लान प्रकट हे गर्वी ॥ ६५ ॥ 
चौ»-सरिता सथ नीद ङ बदरीं । खग शग मप सुखी स रदौ + 
स्न बह सग भीमम स्या गिरि प्र सकए करि शुराः + १ # 
खगौ नदयो पमिभ च यता है ओौर पशन ध भ्रमर दमी दी रे द । 
न अपना स्तामाविक दैर छद दिया; शौर पवतर समी प्रखर पेम 
॥ ॥१॥ ति ॥ ७ 
सोह धै गिरिश शह धा धिमि नलु रामभति ढे पर ॥ ' 
` भमित नूतन : मँगक गृ घरासु। पदमादिक गावहिं जल घासूः॥ २॥ 
` प्वीजीके षर दा भनिते प्त ला शोमामान शोः है वै एमभकतिको 
"पाकर भक्त ' शोभायमान “होता दै । उ (पर्वया ) के चर मित्य नये ये गङ्गोतम 
। "शे £ मिका ्रदमदि यद गते है ॥ २॥. ` १ 
॥ जरद्‌ समार 'सब॒ षाण छोटक भिरि "गेहं सिथापु ॥ 
` ` चैरराय थद्‌ कादर कीमडा। पद्‌ परारि बर, सलु “ददा 4 १॥ 
^ चे भारदीनि-बे सद समाचार ने तो ञे कौतच्दीत 'दिमाचलके षर परे | 
पूर्वृतरमेने उनका बहा भादर किया भौर चरण धोक उनशने उत्तम गोखिन दिवा ॥३॥ 
¢ भारि सहित सुनि पदं सिह नाव । रन खछिक सु मवतु सिचावा ॥ ` 
निन सौमाग्य बहुत गिरि वरना । सा वो ` मेरी छनि (रना ॥ ४॥ 
फिर भपनी जीति शनि चरमं दिर नवाया भौर उनके चरणोदकको खे 
(क छिदकाया । दिपाचठमे मपने सौमागयक महूत वान शा भर पुनी 
| खन पने चर्णोपर डाल दिया ॥ ४१ _ , (र 
^ 
4 के दोष र हृद्यं विचा 
[ जोग मुनिवर | र बिरल्हःजौर चवं हैः आप स्व पैव 
दै। भवः आप इदे विचारकर क्याङे दोषुगं कि ॥ ६६ ॥ 





ष % समच्रिम्नस # 
व 
न 
भक नि ्दिसि २ शु दी । दु हारि सकर शुन का 


कुंद सल शुम संयमी । वान उस अविकः सानी ॥ १॥ 
, नारद्‌ शमने ह शयु पेम वाणीस फडा--दम्री कन्या ख 
कुत लने! द्‌ त ची र इरी यैर समाद दै । उमा, भागब 
भवानी श वेदम ॥ ६॥ 
+ ८: सपय इमे! दहि संतत पिवषि पिधारी 1. 
दः दर पुट र वाला । पट ते जसु वह पिह माता ॥ ९॥ 
दास एनम समर हव अपने पिको इद्‌ प्यास होगी । सममा दुष 
सदा अवद सगा भौर शपे इतके मातापिता यय पर्वे ॥ ९॥ - 
हेहि पल्य सज छग माहीं । पदि सेवत ऊद दुरम ना ॥ 
पि कर नषु भिरि ससाद । त्रिय शिं पठित असिधारा ॥६1 
ध सोर नगत पूष कयौ जर सकी चेवा करद कुक भी दंभ ग हेमा} 
रं छौ शत नाम सर्य करते परि्तरुमी तववारकी पारप चद्‌ जर्विगी ॥३॥ 
सह धुखुचछम शुत ह्री । सुनहु ने मउ अवगम दुद्‌ चारी ॥ 
शुर कमान नाच पितं हीना । उदासीन सन ससय छीना १४ ॥ 
द रवतन ! रा कत्वा सन्नो है} यव इनो देनचाद अवगुण रै, उम 
भुन ले। युणीर मानीनः माता-पित-विहीन, उदाखीनः संयवहीन (परवाह), । ४ 
` दो*--जेमी जरिर अकाम मन्‌ नगन सरमय `चेष 
अख खामी पि फः मिकिषटि परी दस्त असि रेख ॥ ६७ ॥ 
बोगी, बटापारी, निण्य, नंगा बौर मके ेषवाल, एसा पति इयकनो 
पिला । रली ही रेखा पडी दै ॥ ६७॥ 
चौ०-सुनि दमि भिरा मत्य सि जानी । दुत्त दपि उमा, इरानी ॥ 
सै नह मदु न चाना) दसा रक समुब विरगना प १ ॥ 
नद मुनिवर बाणौ इनक जौर उरी हदवम रत्य जानकर पतिबरी (हिमवान्‌ 
जर मैना) को दुः हा मौर परवतीशौ सन्द । नारदमीने मी एच लनो न 
न यौमि उदी याहो दया एक हेनेपर मी भीरी खमप्त भिव .भिम यी ॥१॥ 
सदृ स गिरिका गिरि मैवा । पुरुक सरीर भरे जक जैना ॥ 
पद न चं देदरिपि भाषा 1 उस सो यचतु ददर धरि रचा ॥ २1 
चासी सरिर्योपारेती, पतव शविमदान्‌ गौर मैना--पमीके चीर पुरुक थे मौर 
समीर त्म ज भरा था | दके क्चन हत्व नसी दो स्ते) यह विश्वारर ] 
पावती उन दर्म हदय धार कर विवा ॥२।॥ , 
उपयेड छिव पद्‌ कषर सेह । मिङनं दिन सनं भा संदेह ॥ 
सि कुस ग्रीन दुरा । षो येग वैढो युनि लां ॥ १ ॥ 
उम पिवनीके चरकमर्तमि स्मेह उसच हो आयाः परन्तु मनम यह खन्द हमा 
पि उनक मिलना कठिन है} अवह ठीक न सानकर उमने मने रमो छिपा लिवा 
जर पने मीक मोद चाकर वैठ गव ॥ ३॥ 
श्न पद्‌ देवरिषि वानो । सौचं वति ली सथाम ॥ 
चर्‌ धरि धोर क्श निरितङः। कहु चाय का किमि उपा ५९६ 
दमडी मणी श्रौ न सोयी, यह विचारक हान्‌, मैन मौर छारी चुर 


ॐ वाठकाण्ड ॐ पष 


------ ~~~ ~~~ 
सों चिन्ता कृले सीं । किर हदय प्री षकः पतय ू 
५ अव कय पाय शिया जय १४} मेते! 
शकह शुनीख हिमवंतं सुदु ओ विचि ,छिखा छिछर } 
देव वृद नर नाग सुनि कोऽ न मेदि ॥ ६८॥ 
ने क्च-रे सि्‌] रुन, विधातमे कवर ने कुड छिव पिये 
उसो देवता, दानव, मदय, नग भौर शुनि कोह भी नही भिदा सते ॥ ६८॥ 
सौणतदपि पुक = उपाह 1 हेद्‌ क. जौ -दैर सं ॥ 
श ष म दते दष प । भिचिदि उमहि तस ससय नाही ॥ १ ॥ 

" तो भी एं उपाम बतत ट । षि देव धा परतो ह दि हो धका] 
उमा षरतोनिमदेदवैश दी पा जै वैन इमहे रमो वणन या है ॥ १॥ 
जैने क के दष प्ले ते द तिव परि तै महान 1 
' जौ विवह संस्‌ सन हो । वो शुन सम सदु दों ४ ९॥ 
भ्रमु मै स्ते नोने दोष तलप ह मैरे धतुमने वे पमी विषौ ट| 
यदि ितयीके सय दिशा के जय तो दोक भी खव लेग गुणकर्म ही की ।२} 

८/९ भह सेव सयम हरि इरी इष कह विद कर दोषु न भरतं ॥ 
“भातु हल्‌ एवं र शादो । तिद कं मद एव कोडः गा ॥६॥ 
चे मुमान्‌ शेना ष्या छेत है, ते भी पडत लोग उमे 
ई दोप मक चारे सव॑गोर मीव च्छे मी मेका भण के परु 
उन रोई ड कदा ॥ १॥ 
सुभ मह भुम सरिटसथ वद । सुरति फोड़ शुनीव ष कष्टं ॥ 
` - समरथ कहु नर दोषु खाद । शमि . पावक सुरसरि कौ पराई ॥४॥ "~ 
श्चन छम्‌ ओर अश्म समी गड वहा दै) पर कोई उन मपित गही 
आता । व सभि ओर गङ्गा मारि समथो इ दोष मदौ ल्त ॥ ४॥ 
एे,--जौ भस हिसिषा करटं तर ज्‌ वेक अभिमान ! 
' परं करप भरि नरक मं जीव कि रस सपान ॥ ६९॥ 
' यदि मूतं मनुष्य शनके अभिमाने इर प्र हें के ह तोबेक्पभरे वि 
गरन पते है। मलाः की चीव भो रधर समान (पपा खतनतर )हो रकता रै{ 1६९ 
चौ*-सुरपरि जख इत वादन भला । कह न ज कर तेहि एना ॥ 
शुर्रि भि घो पावन चैते । ईैस॒अनीसदि भंवर ` पं ॥ १ ॥ 
'भङ्ाजलदे थी बनायी हई मद्रको वानर तंत शोण फमी उरसश्च पान नही फे! 
परी ग्नी पिस तिपर से पतिर तेनात्र ओीर बी भीवेर शीमेदर।१। 
सं सच समरथ भगवान । एदि विम सर विधि कनयाना ॥ 
रराम पै अहि महेषु । खातोष, एति किदं रेट्‌ ५२५ 
शिवजी स ही स ई, रोक मे भयान्‌ ई। इससे द विवा सत प्रकर 
छत्याग है । पर महदेगनीफी आराधना वही कलिव ह पि भीकषिश ( तप ) कवे 
वेषु जदद सु हो जते ई ॥ २॥ 
जौ सषु इरे ङ्मारि, इन्र । भाविर मैट सकं श्रो ॥ 
जपि बर नेक भग मा । पहि कट्‌ सिग तयि दूसर ना ४ ६1. 
गदि दर्रे कतया तम क त रिपु महदेव सेर गि सके द! 


दिव्या ~ ` 
५ « रह + ध 


_-----------------------~ 
मति व ओत पर प 
त (= शस) शती वेल शु 
हा पिति भ) व त के स परि+ 
शै र धि, मबा श ए शते इग) क्र 
हम शत सो कावि शेके 
ककत ग पम त ८} नि 
पेन ण इर शि नरियी कि चडीऽ। ? ० 
के ख भजे मर सम हु पष ॥4॥ 
सेव ण भम से परली सपने मदि 
अ 1 4 
मौ^-स मन ह छ । रत खो पन्‌ का भर ए 
11111111 1), 
गीष गद फ सोभ सेदः धेये इन ते| 
पोप मे १२ ६ रितम भ ह्न} 
चेक १९ हर त भीर निषु छव षस ॥ 
९१ २्माघ्‌ एर इवत) रपा भत अदय ३१ 
1011. 1 11 
तौ एतौ तै 4 ‡ रेव १ ठप उत नि कं त 
शी) (रलम प के करे छापा ट || 
१} न १६ 
पे तरेव सरत्यवेणरोरण्ते पम समते क 
५0111 11 
कै एसेश्या ।१॥ ॥ च 
01 ^9.1.3..1 1.1 
७ प शे यरी सरं नु सद सथ 4॥॥ 
एर नि पे समे कसक मि शी । तम्य 
त-य स नरकन रपे॥ 
१ स स) 
रे ति देर ले सरि इया १५१८ 
"1.1 1 
१) ौ 
11 । ॥ 
न (५ 
श्रमे दिश 
111 
पित ले मेद ति कदु 
पीर जर सते एथ भम ॥ १] 
रै सा दत शोः सकस चै सक | 


# वाटकाण्ड ५७ 


के म्र, द| ग निचारर हुम [मिप ] सन्देशो दो ]. ववी. रभीः 
ते निष्क दै ॥ २॥ , 
, छनि प्रति चन हरपि अभ्‌ माहं 1 य तुरत उटि शिरिसा पी ॥. 
उम वि्ोकि नयन" भरे चारी । सदिति सने गोद भैरी ४३४ 
पिके वचन धुन मम सन होकर मैना उठकर हरत पावते पाच गर्व} पाः 
को देवकर उतकी ओमि ओं. भर आयि । उसे लेखके खाय भोदमे पठा छिमा ।२॥; 

अरिं वार केति उर छाई ।\गदद ड न.कहु कडि आदं ॥ 

क्षत मातु सेय भवानी ! मु सुखद बोधी सदु ब्रानी ॥ ४॥ 

फिट बार-बार उसे हदये साने ऽमी । प्रमे मेनाका गख भर धाया, कक 
प्रहा ग जाता } जगजननी मवानीजी ठो सर्वरी । [ माताके मनकी दशाको जानकर }; 
1 तहि 

०- सुनहि भातु मै दीख अस सपन छुना 1 

,शंदुर शौर सुतिप्रबर अख उपदेतेड भोदि ॥ ४२॥ 

, भा घरुनः मै ठत इनाती दः नि रेण खप्र देखा दै कि षुत प्छ धन्द्र 

श नाहणने रसा उपदेद्‌ दिया १-॥७२॥ 
{करहि जाद तपु॒सैरकमारी । नारद छा षो स्व. दिर 
नि.थढ्‌ मतर आवा । एषु सुलयद हुल दोष, नसावा ॥ 9 ॥ 
है पाषैती  नारदीने णो कहा है से सतय समहाकर तू जकर ठप कर । फिर 
यह याव ैरे माताःपिताको मी, अच्छी. गी है !, तप षड देतेबाय भर इुःल-दोषा 
ना केबाह्म है ॥ १ ॥ 

„ सपबल रच, प्रपेचुः विधाका ।.तपबढ विपु सकोड जग प्राता ॥ 

तपड. ध॑सु ~ करिः संवारा 1 मरिभारा ॥ २१. 
` पके गे र्मा संसा से ओर तपे शे 
पासन “भते, | तके पले ही शस्घु [ रपते ] जगह संर 
तगरे ए शेषी ृष्मीका, भार पारण करते है॥ २॥ ४ 
:  हप,भषार सव; षरि . भवार । करि जाद्‌ छ नस शितरनानी ॥ = - 
नतं भवन भितमितं महतारी । सपन सुनायड शिरिषि.हकारी ॥ ६1 
हे भगरानी | सारी खि तपे दौ भाषारपर दै | देखा जी. जानकर चू आकरः 
पप कु । यह बात घनकः भाताको बङा अचएब हुभा शौर उपने हिमवान्‌ इकर 
बहसम,इुनागर,॥ २॥ - _ . 
सु सिव बहुविधि सु ची उमा ठप. दि इर 
भिय परिवार पिताः अरः माता । भु विख युस्‌ माव न बाता ॥ ४1, 
मापिता बहव तथे समहारे व खाय पतीन त करम 
(च । चर इ, पिता जोर माता ख्या होगे भि धाद नसी 
1४॥ 
# ०. सबहिं 
= ध र्दे भरमोधहि पाई॥७२॥ 
कत वेदय भुमिने आकर सवो समाक कहा। पाव॑लीनीकी महिमा शुनक 
सको.दमाधान लो गया || ७३॥ 


५८ ॐ समखरिदस्सनसं 
~~ 
कनो०-उद भरि दमः यानपति कररता । जाह पिप छागी तेष करया ॥ 
अहि लुक र चु हप जम्‌ । पडि एव्‌ शुभिरि सजेड सदर मोगू ॥ \ ॥ 
आगति (निषजी ) के चरणेन ह्व वारय के पा॑तीजी घनम खाकर 
ह कति खी 1 परयतीीन्न अवन्त इमा यकर तप योगव नदी था, तो भी पिके 
शणो खर कले उतरे ८5 मोग तञ दिवा ॥ १॥ 
नितं न नग्न चयस दुत । पिषरी देह त्प मदु खगा ¢ 
संभव खत गूढ पत सु । सयु खाद्‌ सत दरस मर्व ॥२॥ 
खाती द्म दित्य न्वा अतुदय उलत्र छेते ल्मा शौर एप ए मन ह्णा 
$ तरख पातं दुष पितर गमी ] एक एनार वर्तक उन्हे मृत मौर फर छि 
पिर सौ क जन सा वितथे ॥ २ ॥ 
दु छिन सौद्यु ररि यता । किष कषिन पु दिन उपवासा # 
चैर पाठी महि पर इ ! रौनि स्स संयतं दो खाद ॥ ३॥ 
क्ट दिन जन ओर वाणा भोजन किया यौर किर शुक दिन कठोर उपघरा 
कि | तो र्त्र सूक षवीपर गिपते ये, तीन ह्र वर्पतक उन्दफो खाया ॥ ३ ॥ 
नि प्रिर सुरमनेड पेना । उमहि भगु ठव भयउ भरन ॥ ` 
चेदि इम हए टी सरीरा} र गिरा मै शग गभीरा ॥ ४ ॥ 
ए तह्य पणं (प्ते) मी छोड दिवे, तमी परवती नाम म्मम दबा ] 
व्ठे उमा श्री शीण देख माका गम्भीर बरबाणी हुई--॥ ४॥ “ 
दौ°~-मयड मनोरथ शफर तव घुङ शिरिपरजछुपारि ¡ 
पिदर दुसट केर सद अव्‌ मिठिषट न्निपुयारि ॥ ७४॥ 
वि ए पवतम दुमे | इनः तेर मनोरथ एर हुमा } दू चय रे अण्ड 
ने (स्न स्यो) त्याग दे] भर दे शिवली मतग ॥ ५४॥ 
चण त्पृ एद मश्नट ५ { स॒ अले धीर इनि यानी ॥ 
उद उर्‌ धरदु तट दरं नानी । सस्य सद सते 
वि 
वृष्श्े् उदा सत्व 
भने दव त्म स॥ १॥ ५ 
भवे पितता नेद अबहीं । हठ परिहरि षर 
त । चाहु ठब क २॥ 
+ त्व ् 
वु र 0 मी अश क 
इरत भिरा धिथि पन वा । एरुक गत्त गिरिजा 
1711 
गयी कः भर] क इं राय वर्णने सुनते दी पा्तीनी प्रसन्न हो 
शप मर त कत हो रवा । [ 
॥ 1. 
प्ते पतौ ज्‌ तहु ४ साना चरि सुनो ॥१॥ । 
मरः मद न तु स्वागा ठ दै दिद मन मड बिसाः ॥ 
० सुनयना । अ तद दुन राम युन राना 1 ४ ॥ 
कसे दीने जाकर पर्वा किव, तवे धिव मनम द्य है गा | 


6 द: # घाठकाण्ड % ५९ 


~. 
वै षदा भीखुनापजीका नाम जने छो भौर नह हो भरौरमबननीे 
9.५ ॥४॥ ४ | 
° चिदानेद छृखधाम सिथर पिगत मोद मद्‌ काम ¦ 
विचरदि महि धरि इदरथे ्रि स्ट लोक मयम {७५ ॥ 
विदानन्य इक धाः मोह, गद भौर क्ते रत शिवी समं पो 
जान देना मगवान्‌ भर ( रमयन ) को हदये धर { मषा 
प्यगमे मल दष )्नीपर भिचरते को | ७५९ ॥ 
नोप शुमिनह उपदे वयाना । कट रम शुग करहि लारा ॥ 
दपि अकम तवृपि भगवान । भत विर द दित सुयमा ॥| । ॥ 
वकी सिवो चक्ष उपदे कते धर की शरीरमचदरबभे म 
वैन कले भे । यद्य युजान विवी निष्कम ह, तो म ३ मगबान्‌ अपने भ 
(सती ) ॐ ियोगके दुःससे दली ई॥ ¦ ॥ 
एदि बिधि यद काच बटु ब्रती । नित नै हो राम षद्‌ भरी ॥ 
तेयु प्रषु संकर कर देखा । भरिचरं इदयं भगरि कै रा ॥ २॥ 
इ परभ्ार बहुत समय वीत रवा | भीरामचन्रजीमे चरम नितिन भीति शे 
खी । शिवम [रोर] नियम, [ असय ] भेम ९ उनम य मिक 
मल देक [ जव श्रीरामच््रभने ] देखा) | २ ॥ 
प्रे राजु तस्य कपाट । रूप सी निति तरम विरा ॥ 
षह प्रकार संकर सरा । एम भित भस ब्रु को निरवाक ५ ६॥ 
कत कतल (उपकार भननेवडे ) एृपाछठः स्प गीर शीले मण्डर महद्‌ 
नञ्च मगवान्‌ भीरमचन्रगी भष हए | उनधेने बहुत तरे दिवी सरना 
की भोर भा कि आप मिन ला (कठिन ) मत कोन नवाह उक्ता ह ॥ ३ ॥ 
बेहुपिभि राम सिदहि समुश्ावा । पारकछौ कर॒ न्मु शुनाना # 
अति पुनीत गिरिः कै करनी । भिद सशत्र हपानिभि भरनी ॥ ४ ॥ 
ओमनददीने बहुत परार सिववीको सगक्ताया मोर तीक जनम धुना 
एपानिषान भीरमचन्द्रजीने विलस पावतीजीकी भयन्त पवि कनीक वणम किव ४ 
दो०--भय विनती भम शछुनहु सिव ओ भो पर निज मेह । 
जाह विवाद सखि यद मोदि मे वेड ॥७६॥ 
[र उन्हेनि सिति कहा- ] है थिवी ] यदि गप आपका सोद दै तो 
भमभाप भेरी विनती छुमिये | मृ ह भगे दनि कि आप ज्र पावते शय 
विग कर छ | ४६ ॥ 
चम सिव जदुपिऽधिठ भस्‌ नाक । नाव वधे धुरि मेदि न जी ॥ 
सिर धरि अयु करि शुम्हार । परम धरमु यहे नाय मारा ॥ १ ॥ 
धिकीने का--प्यपि रेषा उथिव नह हः धर खामीकषी वात मीभेय 
मी आ सकती | हे नाय ¡ भेरा यही परमं है मै शापं आहाको सिरर रखकर 
उख पालन करते ॥ १॥ 
[माहु एता शुर भ््च कै षानी । दिना विचार करि दुभ चनी ॥ 
शमह सव मति परम हितकारी 1 यम्या सिर प्र नाथ सुमदारी ॥ 
" माता; पिता, गुन जौर खामीकौ बातको दिने दी विचार धुम समकर कतना 


नि क रागर्सि्रातर £ 


(भावमा ) चव ! न्द चाप चो मप प्रश्ले मैरे परम दारी ई । है माथ 
आपी भा मे हिस ॥ २॥ 
अ सपि दि हदः वचना ! सपि दिकः भरम श्त रचना ॥ 
पह शरुः धर कुःश धव श्टेड । अय ठर रते जो एम केर १६१४ 
चितली भक्ति, इन भौर धमरे यु ब्नरवना सुनकर परु रमचन्रनी 
वन्ते रवे! पे चठ -दे ए ¦ यापन परिहा ूीदो यवी । अव हमने जे क 
रे ददम रत्ना ॥ ३ ॥ 
श्॑तरधातंपु सम आप । संकर छोट दूति उर राखी ,॥ 
“ सहि सररिथि दिद पहि अप्‌ । दके अ यति मेनं छदा ॥ ४ ॥ 
श प्रकार टर शीगमचद्रली मन्तन ज्ञो मये 1 भिरिजीन उनकी बह 
शति भगे हयम रल ड । उसी समय सतप यिवजीक पाठ अपि } प्रभु महदिवजीते 
दने शन्त सुदरावने क्वन कदे-॥ ४ ॥ १ 
वो-पारवती पदि जार तु पेन, परिज्मा जु । 
' भिरि प्ररि पट्‌ `यत्र दूरि करेदु संदेह ॥ ७७ ॥ 
साप्य पावते फ जं उनके अन, परीशरा रीन भौर हिमाचर्को 
य परवीर टवा येके स्थि भेजे हवा ] -पाव॑तीमनो धर भिमबांम 
यर न्क इन्दे दू फनिे ]। ७७ ॥ 
च०-रिपिनद नरि देखी सं हसो] मूरतिमंड उपसया - , नैषो ॥ 
44; 
श लाकर पा माः न्‌ तला शी छे । 
यन बो च्म उनो, म पिरम ना कशोर रप र खै हे {| १ 
भि मदु मः इमं चट्‌! इ स राच सपु पिव षट ए 
द मथन ग्‌ यति सक्च चदु इचि. मारि जच ॥ ९ ॥ 








५ पट च छन विका ! ऋत परिः पट" वि खवा] 
= पदा सल साद घान । वपं हम चिं दा ॥ ३ ॥ 
(1 स याह सदे नवा यर सतम दार टटाना नाह 
नः त भद दिया उपे खत जानकर दिन पोखे उद्ना चाहती द ॥१॥ 


८ छ हमारा 1 घ्ादिज सदाः पिह ` भरारा ॥ ४२ , 
2 ( मेरा भगान पो देदिये कि ष्दा चि्लीको शटी पति .बनाना 


दो°-नत धच बिसे रिदय गिरिसंमव 
तव दह । 

ग कर उयदे्ु नि दह्‌ वसेड किसु ५. ॥ ७८ ॥ 
न बरत छने ही छपिलग दव पदे मौर बोह--दम्द्मय शरीर पवृते ही 
सुप एमा है भ नो तोनास्ता उप नकर नतक रिषो परहा है ! ७८ 
५ दष्ुनन्‌ अपेहि अदं ¦ चनद ममर भक्तु ज हला बाहे ॥ 

चेतु कर षद्‌ टद दादा ! फेवक्करिषु के एुमि अस दाढा ॥ १ । 


# याक ई ६१ 


उन्म नाश दके पुत्रो उपदेश दिगा घा, मिमे उने पिं नैव 
क 1 चित्के परक नारे ह चौपट विया । कवरी हठ 
हमा ॥ १॥ 
माद्‌ विच सुनहि भर नारी । अवमि रोहि हमि मबु विकारी ॥ 
मणे कपय तन स्न चीना । भापु सरिस सक्छ चं फा ॥ २ ॥ 
भे सीयुसष नादद सील एते ह वे परतर छेदक जवल धै पिला 
पे चदे ६1 उन म वो शटी ६, असीस दमनके नह े सीमे प 
समान ( आवार ) बनानी चाहते है ॥ २ ॥ 
उ छं कनं भानि वित्वासा । तर बाहु पति सद उदासा ॥ 
निशुर निश इयेष ॒काढी । न मगेह दिवर ध्वी ॥ ३४ 
उनके व्चनोपर विश्वा मानकर इम एषा पति चती हे दो खमा हौ 
उद्नः शुणदीन, निः हर वभवा, नका गृ एहनेषाल, लीन) मिना 
पापक नंगा ओर शरीर धर्म स्पे रषेवास है ॥ १ ॥ क 
कटु वन सुख अष यर पा । भक भूष खग के भैर ॥ 
पंच कटं धि सती विग । नि भवे मरन तादी ॥ ४॥ 
पठे वके भिरे के रे या सर शेगा ! म उछ उ (नारद) त यणे- 
आह श भर्व | पठ पंच फे दिवे ठते पिह भा परु पि 
कमर तिमद का 
अव धु भव बाहे] 
सद एकारिन्त के मवम कवं छि भारि खटाहि ॥ ५९.॥ 
मिव फोट विनता तह खी, भी गकर खा छते टै ओर धरले येते 
1 रे खमानते षै कते रेवि षर भौ म्ल, स्वा कमी सि कि 
श्री! ॥०९॥ 
चौण-भरयः भाण कदा एमार । हम इड शई पर भेक विरा ॥ 
अति रुदर धि शुश्द् ुसीला । णवं वेद आलु चस ठी ॥ १ ॥ 
अव भी इरा कमानो, हने वर्ह स्मि जच्छ बर पिस है । हुत 
इन्दर पवि राणक ओर दुरीर 8 सिखिका यथ शर लैस वेद मठे ६ ।९॥ 
पूषन रहित सकर गुन ४ येक व्न ५ 
भस यर तुम्दहि भिाडव सरी । सुन के कचनं 
ऋ दोपे एवः चरे श्टणोम रि, जी सागी जौ ड्ध 
शषटीवास है । हम पेते को लाकर उदे मि दमे। द सुनते ् पार्वतीय 
पमन बो २॥ 
श्य हु गिरिम सु पष । इठ ध षट ए षद ददा ॥ 
नङ पनि पृएाद तं दें । जर सह न परिहर सो ॥ ६॥' 
आरे बहस ही कह भेर बह शरीर परव उलन दुभा दै । इरव्ि ठ 
नू) रीर भे ट नाथ । चना भ॑ तपते हौ ल होत ठो दह जपे 
0 ३॥ नअ 
रार्दं चन न 1 बद मबु नरद ~ 
५ श्वन परीति न बेह । सप गम न सुख रिषि ही ॥ ५ ॥ 


द # शासनदरिरमाससं # 


~ 
ख ताके कयन म लै =दै पये य नै शेम नह 


श्ल | नित शे यद विशार म है, उषो दु नैर सिद्व सममे 
पुम मही तेत ॥ ४ ॥ 
दो*-मरदेद अवयं भदत धिषु उरं शते धाम । 
कि भर भटर आटि सम तेदि वेदी सत काम ॥ ८* 
भना भि ररव शतशत सवन ह ओर दिषु समल स्दुेषि धाम है एर 
भिका मन धिते र गया, उने ठो उतत काम है ॥ ८० ॥ 
चीर हम शिषे रयम सीसा । सुनषिर सिख इनदारि रि पीस ॥ 
जम क्रसु हितं दार\ के युत षर्‌ क दिकास ॥ ९६५ 
द एरी 1 यदि भाप पडे पिलत ते म गाप उपदेश तिरमाये रखकर युती । 
परु भ ते भै भपना म्म शिवर्जके व्थि शर चु । पिर गुणदोषा विचार 
कनके {॥१॥ न 
1.1.111. । 
दी हमभ खलु वदु । दर न्या चले छग सा ॥ ९४ 
वदि माप हद हुव ही ४8 दै घौर बिवाुकी वाती ( देख ) विये विना 
आपे ह नी अता, तो सषाम परतया वहत । पिधा करोवोर्लको भाग 
तो रेल नै र क द्र कीमपि ] | २] ध 
अन्द कोटि एषि र्‌ ईम \ शदे सहु न त दद भारी ॥ 
हवे च नारद्‌ फर. उपदस्‌ । सषु षद स बार भरद्‌ ॥ ३1 
मेव तो कते चनयौत पी हठ रा म वा सो दिनी गी, न ते 
इस श शमी! से पवय सौर कर, तो मौ ना उपरर न लद ।३१ 
पा परर ष्द समदव ! छह श रतनु मगर भिय ॥ ` 
ददि मठ बो इनि प्यनी । द॑ श्य जगदवते सवानो ॥ ५ ॥ 
मगदननी पार्त शि पाकिम आके पै पदवी ह । आप थने 
फ जसे, हु ह दे प} [रिम पैसे] भरे देकर 
रु न~ उमकमनी ह तप | यी चय से! ठे ॥ ॥ ४॥. 
"तुः माय सपदान्‌ सवि खद इत प्ति महु! 
द्‌ चर्‌ हिर शुनि चष पुनि पुनि हरत गातुं ॥ ८१ ॥ 


४, - अ यग ह बोः भिदं भगवान्‌ ई, आष दोनो मल अगतत मातापिता 
६1 [ पदक्य अरम 
बास्वार पूखति रे कनं रभ वः ना चर दे उने 


^ णद्‌ उवह पञ्‌ 1 र छी पिह याप 1 
क, 
८ ४ 
म निति समभेषर 


म म॒ विवि इह शे" द + 


महु भिर खमि २३ से समाना । उगे करव धुगायद 
ग्ज्य भर के दवद भलन्कप्र से भय ! न । 


कै धाठकाण्ड # ९३ 


1 अप षर ( अलोक ) को चे.सये । तव शुभान शिवौ गनो सिर कर भीरुनायः 
५ जीका ध्यान कले लो | २॥ सि 
लारङ़ लर्‌ भयर `तेदि श्रा } युन परताप प तेजं पिठ ॥ 
तष्टं सम कोक शोकपति जीते । मय्‌ ` दैव बुल परि , रते ॥ १॥ 

. खी समम हाक नामना अर हमः भित शनम कर प्रताप चह 
^ त जर 
॥ सति्ेयये॥३।॥ ` ` ४ 
॥ भलर अमरं सो जीति नशा । हरे सुर करि बिविघ एर ॥ 

"तव भिरि सन च्‌ पके । देसे विधि ख देड हुखते ॥ ४ ॥ 
यह म-अमर था, इठष्य प्रहर जीता नही भाता धा । देवता उत्ते दाय 
वहूततरषवी रदाय कर हार रये । तव उन्दने ्रसानीके पाए भकः पुकार मचायी । 
रानी ब दष्क दी देता ॥ ४ ॥ ` 
| दो-व.सन्‌ भदा शु विथ श निवन ठव कोः । 
संघु धुकर संभूतं घत पि जीव रन सोर ॥ ८२ ॥ 
' अष्ठाचन सद पमार शाश दती सु तव शेम जम पित 
ये पुभ ठस ह| एरक दमं की जिगा ॥ ८२ ॥ 
सौम डा सनि फु उप । धेरि शर कति सां ॥ 
' सशो. ती दस्ड मल दे । अमी वाद, दिमाचल रेः ॥ 9 ॥ 
ती गात नफ उपय त । ईर सायत करो वीर कायं शे यगा | तीन 
(०.५५ देहर त्फा कि था, उनदोने अव सिमाचल्ने प्र जाकर चना 
1८1 ४ 
तेतु क संशु पि रागी 1 सिव साधि पैर इ प्यागी ॥ 
दपि, मह्‌ _स्मनस- मारी । तदपि वात शक घु हमारी ॥ ९४ 
जननी पति भना धि तप भिद; रदनः उव होडा 
रगा पर 1 प्प र ते वेश्यं ठ, तयाम तीए वप इे॥२॥ 
, पहु काञु जाद सिव पौः । करं चे सं मन माही ॥ 
} " छव हम चा, सिबहि सिद दई । कराड विहः बर्मा ॥ १॥ 

, इम जाकर कमनो सिसी पाह मेनो. पिवनीत मन भोम उयो 
(ऊनी एधि मह के ) । तव हम दाकर दिवर्गके अरणेमि धिर रख दग ओर 
भवरदती ( उन रानी के ) विवाई करा देये ॥ १॥ , -; 

` पृ निषि मल देत शई । मत शपि लं ब पद शं ॥ 
` अस्प सुरद नद भति इद्‌ । मं मिषमनन श्षत्‌ ॥ ९४ 
शत फा मेध देवतर्थ्न छि ह ( जौर ल शोर उपाय न्रे |। छने 
शायद एमि बहुतः अच्छौ द 1 फिर देवतास यदे ममे सयति शी हर विषम 

(च) गण धारय कतवा ओर मलीन हुत लजगय ( इमा)४। 

रोद कृ निज विपति सव शुनि मन षीनह विचार । ' 

“` , संख िरेषन ठ मोटि विहि कटेड गख गर ॥ ३ ॥ 

देवरामौने कामदेवे अपनी धी विसि सी इनक कामदेनने मन्म विभार 


# ~ थ हिमा * र 
रिण भोः तुस देव्यम प 51 रि जीर माय वितेष कले भेव इक 
ऋ६।॥८२॥ 
ऋनि ण मे स एषा दु, कद णय दरम्‌ इकार ॥ 
पमि रणि नत ग्ठि। रं हह परवीर क 
रशि २ द्ग कते करप या धू चपरम पठ (श 
नेर हिने भि पना चन सार, स्व पा उती ककत । 
कते छह ए धं पुष म प्रेलपदर। 
ऋत भर नि ह धेत रिः विरोध टर मसु पमार ४२॥ 
गोष्ट गहत नब फषव मणे एषणे शते कयो क 
{ म्द] स्कोर चय चल । = रम पापे यमे षा विचा८ 
दिनि छण वरो९ फले मे शष मिभित ए ॥ २ । 
देथ भष्न परठ भिवन निय रम पी प संदाय # 
नैवेह परि स्विदि} एद गू पिरे नर टुत पद्‌ ५१४ 
हा से न्ना भय रे मेर छस्‌ एतदो जते शमौ कर विथ | 
सिसन उह 24 {गी धमरे अदसो पो व, ॐ एम प्र 
तैम म्यील टवी ३॥ 
ग्स्मं शम सप भना । वीरवर णात दयाया ॥ 
सदा उप बो बिग} समय विदे एदु इट सागर | 9 1 
चै मम, न रके एय शीत, मै, भर 0, उदार क 
कम्‌ भद रतना कक मम तौ ॥ ५ ॥ 


ॐ विवे$ सराय सरित सो हम एग हि हे) 
०१ देमि वर | 
गिनि ल भरर म रवार अग परमद प । ॥ 
मि धु र धरा ॥ 

भवेद ग क उ गोड शस वीह दा रे | 

2 एस पदलप पी करम ग नि (सरा शमः वैय 

खम; निगम तपनि प्रि दौ नित 





सै (सा प १६ भृ नके 
#+ = 


म चर धर दरि त नार! 
निरमिमत मिव स मर मा) ५॥ 
यो न वल ले कमर परल म क ननन 
भरर, ( ्किष्यरेगे ६८८१ 
प ११ भस चय । वद नरे न एरका 1 
धौ पि धट टे भर म कर दमम च १५ 
मां वन (त 1 
ता 11 
यनाम ्म गनै (लषन) च १॥ 


क वाखकाण्ड # ६५ 


, भं भसि द्साः उदृनह कै बरनी । को कटि सकद सदेवन कनी 
' पष पथो नस जर यरचारी। भए कागयस मय विसारी ॥ २॥ 
जब जढ (दृष, नदी आदि ) की ह्‌ दगा क मवी, तवर चेतन नीक 
करनी भौन कह सक्ता है { आक्र, र यः एषवीप विचनेवारे सोरे पश 
{मे संयोगा ] समव शलकर कामे वड हो गे | २ ¶ 
` भदत अं भ्याङुर सय रोका । निसि दि मिं जवरोकं पका ॥ 
दैव दसुन नर किंनर व्याला परेत रिच मूत वेतारा ॥ ६॥ 
सव लोग फामानध शेक व्यायुल हो गये । चकवा चक रत्रदिन मीं देते | 

देष, दैल) मनुष्य किलर स॑ रत, पिशाच; भ्रू) बेवाड--॥ ३॥ 
इन्द दसा न फर यल्ानी। सदा काम ठै चेरे जनी ४ 
सिद्ध भिरक्त मदसुनि जोगी । तेपि कामबस मए वियोगी ॥ ४ ॥ 
भे तो सदा ही कामके गुलम ई, मह स्मदकः मरने एकी दामा वरन नहं 

। किया | षिद्‌, पिरत, हामि ओर महाम्‌ योगी भी कामे वश्च हकर योगरतं भा 

; क्के पिरदी शे गे ॥ ४ ॥ 

, हेम फामवस मीस ` तापस पार्य्दि की कशो कै । 
देखि चराचर नारिमय जे श्रह्ममय देखत र्दे ॥ 
अवला .विलोकि पुरुपमय जगु पुरूष सव, अवाम । 

द दंड मरि वर्ाड भीकर कामक ॥ 

६ अब योगीधरं थर तपल भी फते बश हो गये, तम पाम मतप्ोकी कौम 

" करे | मो समसतं चरायर जातू अमय देलते ये बे अग उते लमय देखे छो । 

जि श संणारको एरपमय देखने यी योर धुर उे क्लीमय देखने कम । दोप 

, वक शो ्रहमणडक द्र कामदेवक रचा हुमा ह कौतक ( तमार ) रहा । 

शेध न्‌ क्र धीर खव के मन मनखिजि षरे। ` 

॥ जे राखे रघुबीर ॑ते उवरे तेषटि काल महँ । ८५॥ 

॥ किसीने भी दद य नहो धारम क्वा, देवे वके मन हर स्थि । 

„ शरीखुमायजीने जिन रधा फी केवल वे हौ उस समय भे रदे ॥ ८५ ॥ 

चौण-एभय चरी भल श्तु मय । नौ कणि कषु संसु पड मवड ॥ 
सिव विोकि सरसैड मारू। मड वथाधिठि सदु धसा ॥ १ ॥ 
दो षदीतक रेरा तमाशा हुमा, जनक ,कमदेव भिवनम पत भूच गया । 

, विनीतो देलकर कामदेव ढर गया, त सारा जता करण सिर शे गमा १ 

\ भष्‌ तुरत _ षव जीद सुखदे । चिभि मद्‌ उतरि गर मवार ॥ 

| खदहि देष सदन सय मामा । हुराघरष हैम भगवानः ॥ २ 

| तत श एव जीवे ह खी हो गवे नेर मतवा ( नया विह ) लोग सद 

¦ (नथा) उत्त जनेपर शली देह द । (न अल ही सवि 
द) वीर हम (जिनका पार पाना कठिन) भवार (मं पः षम? 
म, शन जीर ैययलम छ इतीय ुेणि शक ) दह (मम ) वीरो देख 
॥ क्र श होगा ५६३५ (ननो 
चां । मरु 
॥ नि ११४ 


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ननन 
पुट भनिर सन मच्छ देती & भौर इते इड 1 {म 
यल निय बे उमे ओय सर | कव प द ऋत कट 
विम । हूए तमे कयो स्व युवो स्व॑ ॥ ३} 
ज वस ग्न सा पय नय सद दि विमामा ॥ 
य द सतु उम श: द सु सन मगसिन भगा ॥ 9 
पणन, की भलर भीर एद विव दिम पम इन्द चणय 
जह मन म 28 २८६ छद ेदद म प्म त गग उम ॥॥ 
प-कयः समेषद सुप भ दन छुमगता न प फटी 1 
सीर छथ शदे माद्त मदत धन सद्वा सष्ठी॥ 
विक सदि वदु कंड शुं पुंस हर मधुक्य 1 
एच पिक स उरस र करि धात नाचे भपप 1 
सम मौ कम गाते ठ वन इनत शी नी ना करी । 
समल मौ था यतन दुध पन चमे गा | सेव यो 
क हिक वे, वर द मे सू युर के रे । दर) शे 
मौर रे सी मैले सो मौर म्र गारा नाते छां] 
तो" सा करि कोष्ट परिधि हेड खेम समेत 1 
टौ न भढ समभि सिव भपेड. इदयदिकेत ॥ ८६॥ 
पदे अपनी सनत के मकार व प्रज ( उप्‌ ) कत छर गया 
पर्‌ सिवद अल समाधिम दिगौ । तव फमदेव कोपित हे उठा | ८६ ॥ 
जौ" रक चिप षर सासा । हिप वे अदद नर माला ॥ 
इ शष ज स संमते । धरि रित शि धत की कते ॥ १ ॥ 
आक प दर स म कधि व भू 
पर चद्‌ गा | उने पुण्र भे [म } कण चदय गीर भलत 
ठगी भेर] सक्च उन 1 ॥ ध 
एषे दषम दिर इए इतो 1 टे षान संसु ठ धागे ॥ 
भवर दैत भन छो रितेरी। मगन उपारि सदृ दिधि ली ॥ २॥ 
र (५ ११५५ येत इते लो | क उनी इ 
जगं रे । क त्त 
1 
सौम पटय म दिशो । भयर श॒ केर शैलो ॥ 

श प कु सष जरि र ॥ ६॥ 
0 इए ] अदे देखा तो उ कट क्रो 
न वेग ॐ | स पे सष ने सोम, ५ 

देव कद मल च य ॥ ६ ॥. 
एष्क्र मढ ड बारी । ते सुर मए भुर बार ॥ 
ध खः प १० 
सगे एकार मच यथ दसा इर मे चेम 
गाहने यद के छित कले स्ये मोर क (१ ४ ॥ 


क बालकाण्ड # 4 ७ 


ड०-ओगी अक्षटेक भप एति शति दुमत रपि सुरदत भई । 
येवति दति षह भांति कना करति संफर पहि गर ॥ 
अति रम करि विनती विविध बिधि जोरि कर सनयुख रही 1 
भ्रु मालेव कल सिव भव निरंखिं दो सद ॥ 
गोग निनदं हो रये; ऋगदेवक्ी छी रते अपने पतिकी ह दा सनते 
भूरछिति ते गयी । रोती.बिशाती भौर भंति-भोतिठे करणा कती हर भह धिवनीमे 
पस गग । भलयन्त परमके धाय अनक प्रकारे विनी फते एय नकर सामने एद 
के गवी । शीद् प्रस हेनेवे गाड दिषरी अव ( यस्हया क्ल ) फरो देर 
दर ( उसको सान्तना देनेवाले ) वचने वेरे--) 
दो"~मव ते रति तब नाथ कर होहि नापु अरन॑यु । 
निदु बपु व्यापिहि सवदि पुनि सतु निज मिढने प्रसंयु ॥ ८७॥ 
है रति { भमर तेर सवमीका नाग धभनङ्' हेग 1 षट विना शरणे चको 
पयपेगा । अय दु अने पतिते महनेकी वाठ इन ॥ ८७ ॥ 
०-जब्र॒ शव॑ प्न अवतारा । हेदि हरल मा मदिरा # 
कृपन तनय होदि पि तोरा। वच्छ अन्यया शद्‌ न भो ॥ १॥ 
भवी बहे मापी मारको उतारे व्यि यदुं भौकषणफा अनवर रगा तव 
देशपतिउनम पुव (रप्र ) क्प उलन शग भे पवस न्यया नी शे ।१1 
रति शदनी दुनि संकरः भनी । कथा अप्र म्‌ कटं दलाी ॥ 
देवन समाचार सद॒ पाप । ्दादिक  वे$ं धिषाष्‌ ॥९॥ 
दिनी पचन छु रति चह पवी । शव दूरत कथा वलानकर (विलप) 
ऋ | रादि देवोन थे स वमे दोपे वड चे ॥ ९॥ 
सष धुर निपत्‌ विरम समेता! गए रशा छिव निकेता ॥ 
पङ यक पिन्द कीनि मससा। जप्‌ भद चेद भवता ॥ ३॥ 
पिर यदे ममु ओर मारि एव दता चग कए धरिम ये! 
इन समने दिवम अलग -भला सि फी, उव इदिमूषण रिव प्र हो गये ॥३॥ 
श्रे छृपापिष॒ पद्‌ । कहु धमर शाए भशि हद ५ 
कद पिथ कुद प्सु संतरासी  ठवुपि मगति बदा विनद सयमी ॥ २१ 
म वम्र धिव मोठे देवरा ¡ कि, भाप विभ्ये १ 
अहानीने कहे पमो ! याप अनाम, तपि हे समी | भकिक मँ मते 
मिनी कला हं ॥ ४ ॥ ^ 
दो"-खकल रह के हेदर्यँ मस संकर परम उचछ । 
निजञ  नयननहि देखा चदि नाय दु्दार विवा ॥ ८८॥ 
भ हे शकर ¡ सव देवता सनम देष परम उताहं दै कहे माय । षे भनी 
धसति भपका माद देखना चते ६ ॥ ८८ ॥ 
पौ" उत्व देखिम मरि लोचनं । सोषु कहु दुन मद भोचन 1 


मदने 
शठ ससक. मेत भरकर दैदं । हे पढे, छाग 1 कामदेषको भस कणे भाने 
रि ्ो दान दिया ठो बहुत मना मिवा ॥ १ ॥ 


६८ ई राप्रदश्िमानस 





शसति करि `पुमि पि पसाजे । माय अन्द पर सहते शुभा 
पदवती तषु श्रीद भरयत। एष्ट दासु अव प्ंगीकर ४३॥ 
माय | लपि दर सत लभ ह है वै पर देक पिर 
कया कया कते ई | पने जर ला य दै, अव उ गीकार बीरि ॥९॥ 
शुिदिभि भिवय स्यभि पडुएनं। तेद हेऽ श घुसं सानी ॥ 
षव दवन दुय भला । रपि सुम शय एव सुर साई 1 ३॥ ५ 
अरनी धरथः॥ सुग ओर प्रथु श्रीएमचनद्रनीके पचनौको वाद कफे 
शिन रतप इ) शभ ध सो! तव देवतान नगदे पये थैर पूवती 
श गते प हे | देता सामीको जय हेः थ क्ले को॥ ३ ॥ 
असर जनि सररिषि भाष्‌ । एर मिथि गिरिभेवन धाद ४ 
पथम गपु र रती भवावी । बके म्र वचनं छट पानी ४॥ 
उतनित भयर जनश हरिं थते ओः बहाने शरत ही उ मारे 
प भेन दिया ¦ ३ पव ग जद परव॑तीजी धी, मौ उने छसे भर गी 
(पिमोदुक, भाननद पटुनिवडे ) भचन बरोठे-।| ४ ॥ 
दो-क मार न तुन ठव नारद क उषदेख 1 
.. वभा शूठ ठम्हार पन रेड कामु भेष ॥ ८९॥ 
ननी उपदे उड कमय हमर बात नही नी ! भव तो द्रा 
भ्रा हे पाप्य मदिवनीने को हौ मस कूः गज ॥ ८९ ॥ 
माएपरायण, तीसरा 
च०-सुनि पो युस्‌ म्बातौ | उत परेड शुनियर सि्याती ॥ 
रे जान दयु भ्व चर । अग एमि समु रे सिक ॥ १॥ 
कर गर्ल तकर मे. विनी यने ¡ माने उवि 
दा । मौ रन धिवबीे कातो भव चया रै, अमतो भे विशन 
सुर (की) हे॥ १॥ 
पर्‌ अन धद स्वि भी । अन मनद भम अपी ॥ 
नौ शैखि पेदे जघ न पति सेठ क्रम मन यानी 1२४ 
मैः (८ य योगी, घम्म, न 
५ मन) कचन 
भसित उन च छी ६ २ ॥ क प 
शर एन सुनहु सीसा । च स्य हृपारिषिः दै ॥ 
षज ष्क एर भरेड भारा। सोए अति व¶ अभि षार ॥ १॥ 
| यौ सनीय | छ, व गगिभन मगन भप्त व क्रये । 
६ 1 क सिने समे म क दिगा, वही आपस बा मतै 
मेक ॥ ६ ॥ 


५ समीर ह भ क्‌ । हिम तेहि निकट आद्‌ प फास ॥ 
प 1 4 1 चि मन्म न की नईए४४ 
41 य्‌ उशन समाव 
वी रता बौर जने इ ३१ पर उषे वमप कमी जा 


ब्य न ९ 
उम्भ भ ही यावं (वात ) समना व ॥ १ 


# बालकाण्ड ® ६ 


=-= ~ =-= 
योदय श्रमे सुनि वचन घुनि देसि अति विलास । 
„ चले भवानि नाद सिर मय दिमाचर पास ॥ ९० ॥ 
पावते वचन सुनकर जौर उनका भरेम तथा पिशा देयकर परनि दयते बे 
र्न हः । वे भवानी सिर नवाक चर द्यि ओर हिमा पार पैवे ॥ ९० ॥ 
~स भरु गिरिपमि्ट सुनादा । मदन दृटन सुमि शति ह पावा ॥ 
बहुरि षडेव रति कर परदूना। सुनि हिमवत वहत सुलु माना ॥ १॥ 
उन्दने पतन पिमाचखको रबर धल नाया । फामदेवक्ा भस होना नकर 
हिमाचल बहुत दुखी हुए ।. किर सुनर्यन रतिके वर्दानकौ बात की, इते सुनकर 
दिगवाने बहत सुख माना ॥ ९ ॥ 
इदम भिरि संय भसुताई सव्र छनिबर शिप पोका ॥ 
सुदि खनु सुरी सोचे वेगि वेदविधि कगन धराद ॥ २॥ 
शनी प्रभावको मनम विचारक ताचल्ने भे सियो आद्पूर्क य 
छिव जीर उने श्म दि, शुभ नश गौर ग्म षद शोषवाकः वेद विके मनुर 
शीर ती रा निश्चय ककर लिकषना छवा ॥ ९॥ 
एरी सषरिपिन्द सोद दीन । गि पद्‌ यिनय ्टिस्ाचल दीनधी ॥ 
जाद बिधिषि तनह दीन्दिसो पाती । वाच्त प्रीति न हदर्य एमाती ॥ ६॥ 
पिर हिगाचने ह्‌ स््निका सिक दे दी भर चरण पकद्व उगकी 
विनती फी | उन्दने जाकर बद र्रपिका ब्रमजीको दी । उसो पदुते समब डारै 
इदमे पेम समाता न था ॥ ३ ॥ 
छाने बाचि भज सरह सुनादं । शपे छनि सब धर सखुदं ॥ 
„ भुमन ष्टि नभ॒ वान बान । मंगर फस सहँ दिसि साणे ॥ ४१ 
जर्ाजीने सगर पदृकर सुबो धनाय, उके सुनकर सव युनि भौर देवतामौका 
ग समान र्ठ हो गया । आकारते पूरक वषा होने लगी, भामे वको को यर 
पी दिम मक्तरकर्दा सना दिषे गये || ४ ॥ 
दो-क -संबास्न सकल र॑ वाहन विषिध विमान । 
होहि सगुन मग्ड दुमद करि अपछरा भान ॥ ९१ ॥ 
ख्व देवता भूपने भेतिःगोत्कि वाइन ओर विमीन संनाने लगे । इतवाप्रद 
भ्व इन शेन छो ओर अ्षरर् गने घ्म ॥ ९१ ॥ ध 
च०-धिवषटि संसु गन करहि क्विगारा । जदा स्ट अष्टि मौ ' सवाग ॥ 
डंक कंकन प्रि थ्याङा । तन निसृत्ति पट देषटरि छा ॥ १॥ 
॥ शिवीके गण रिवजीका शगार कने रू ) चयर्ोफ सुंकुट बनाकर उष्पर 
सरको मौर घनाया गया । शिव्ीने लोकि ही कुण्डल जौर ककण पद्मे, शरीरपर | 
^ विभूति रायः भौर द्की जाद बार्बर ठपेट वा ॥२॥` 
ससि काद दर धिर भंगा । तमन तीनि उपनीत सुरया ॥ 
मर कंठ डर नरं सिर भराखा । असिष वेषं सिनधाम॒इयाडा ४२ ॥ 
यिम चन्दर मखकमर चन्र, विरयर गह्लानी, तीन मेन सका जनेऊ, 
गे मष ओर छातीपर्‌ नरमुण्ो की माय थी । इ परकर उनका वेष अश केषर 
` भीतर क्याणके षाग ओर छया ह ॥ ९ ॥ 


७० ‰ रा्लसितमान्स ४ 


र भरसूर ५९ दये प्रत \ च्ठे सः उदि जनि बाभा 
मेदि दिदि इफ युकं । कर सूयक दरुषटिनि जग वाह ॥ ३॥ 
ष शरं चि भौर दूय ऽमलू बुदोभित ह । शनी वैद्म चदृक 
चे । कदन दै ६! भिव देखकः देवन खय र र { लौ कतौ 
नि] इर णके मौमदुलहिन संवरे नही म्विगी ॥ ३ ॥ 
टु हिरदि सदधि इर्दा। चि वद्वि बान चे बराता ४ 
सुर पवा छ सति नू । जहिं बरत दूर अदुख्पा ५४॥ 
विष्णु सर नदा धादि येकार सूह भपने.अपने वाह्नं { छवरारिवो ) फ 
दुक मरत छे ¦ देवतार्भोका स्मा स प्रक्ररे अनुम ( परम सुन्दर ) थाः 
पर स्ख गोग वरहंन थी ॥४॥ 
"--पिष्ठु कः मसु विषटसि तव बोखि खक दिखिराज ! 
भि विटगः होई चहु खव निज निज सहित समाज ॥९२॥ 
सम मि एुभगदामे सड दिष्पलोको इुलक्र हंखकर एेसा कषट-स्र छोग अपने. 
अप दुत घत भतम शेक चले ॥ ९२ 
चोरक भनषरि बरत म मां हसी करए एर एर जाई ॥ 
प्ट प्म इनि धुर शुनि । भिक भिञ सेन सिरे बिरगाने \ \॥ 
भारं! इमेरगोकी यहं वरात कर येगव नही है । का पराये मगसर भद्र 
शी कराभेगि ! पिषणुमगकानकी बत गकर देवता परकाये नौर बे अपनी सपनी 
उेनारदित भ द गये} १॥ 9 
मनौ भन मदेषु सुदुकष्ी । दर के विप ददन मं ष ४ 
कति पिव यदन सनत भिषक । गिरि भेरि सड गत देर ॥ २॥ 
मरेषली [ प देकर ] मनही-मन पुकरति मि विष्ुमगवागके धष 
बन (दिल्भी) दीं दूते ! अपने भ्व  पिप्ुभगवान्‌ ) फे हत अपि पि वचर 
इनक गिव भी मृगीभ् भनक अपन सव गक इवा सिवा ॥ २ ॥ 
सिय भलुसासन सुमि सम रप । पश पव अकच सौर तन्द मापए ॥ 
भसः ब्य मागर देषु निहते पिव समाव निन देता ॥ ३॥ 
धिषजीनौ रः पुनते ही स च्य भये मौर उदनि खाते चरण-कमोम सि 
नबी 1 तवी स्वियौ भीर रतये बेषबालि अपने समाने देर 
निन्ये ३॥ ति 
८ कोऽ युन सिर उड काहू । वदु पद्‌ कर छोड चह पद्‌ वाट्‌ 
चि न्यम वेड जयन वित । रिट फोड छि तलना ॥ ४ ॥ 
शन विना मुख ‰, मिसे हुत गुड र, फो भिना हापयैरका है तो 
निम द ण्यै ६। भ बहव शरे टतो कि ठ मी भंड न ₹। 
कुत मोरा तो देर भुत ही दुवस्य दै || ४ ॥ 
४०.-रन खीन जेट भति पौन पत्म कोड अपद मति घरे । 
मपन कपट कफश कर खव श्य क 
एर स्यान समर सुका गख मन वेष गलित छो गतै ! 
हु बिस मेत पिखाच जगि अमात यर्लल | बत ॥ ~ 
२ कह दुः ऊई शद मोगः शद पविन र कोई अपरिन भष षार 





# वाठकाण्ड ‰ ७ 


=-= ~ ~ ~ 
तिद ३1 मग शे पहने, छाम कगार छेद यर ववर्त शरो वाला 
शूट षे ह ६ । रथे, इसे चूर भौर रियागकेते उनके इ द] गमि अगिन 
यणो दौन गिन { वटूत प्रका प्तः पिशाच मौर योगिनियोक जमात १ । उनका 
करदे नशी धनतः ! 
, शो-क गवि शीत्‌ परम तरंग भूत घव । 
देखत अति विपरीत वोद वचन विचिज विधि ॥९३॥ 
भूव नाचते चर गते ई । वे ख षडे मोनी । देखने हुत ष येदमे 
` आन पते ह । भौर भरे ही विचित्र टगर पोरे हं ॥ ९३ ॥ 
चौ०~भस दू ठि मनी परता] कौ धिष हिं मग नाता ॥ 
ष्ट हिमाल श्ैड बिताना | अति बिचि नहिं जाद वाना ॥ \॥ 
वैरा दू रै, अव वैधी ही वरत घन गय ह} मर्व चलत इए भेपि-भोष 
शरक ( तमाक्षे ) शेते जति ईै। इषर िमाचर्मे देषा विचि मण्डप मनाया कि 
मिका वणेन नष ते सकता ॥ १ ॥ 
द्वै सकर जर नि जग म । रु पिस न परनि सिराही ॥ 
श्न सागर सब न तछा । हिमगिरि सब कटं मेदस पावा ॥ २ ॥ 
अगत भितने छोटे-दे पव॑त ये, भिना ध॑न कफे पार नह परिसा पषा 
मिते वन षद नदिय ओर ताज ये, हाच खम्षो न्धोचा भेभा ॥ २ ॥ 
किस्म सुद्र पत ॒धारी। रित समाम सित दर नारौ ॥ 
} गुः सकट तुदिनाचछ गे । गव॑ मेगक सित सनेहा ॥ ३॥ 
यै सम॒ अपने इच्छातुतार सूप धारण करतेवाञे सुन्दर छरीर पारक सुन्दरी 
कगौ ओर समानक साय हिमराचत पर गये ] धमी सनेहसहित मङ्ग गीत गति द ॥१॥ 
अथ गिरि चु शृह सवरा । लयाजोगु रहं ते सब ए ॥ 
र सोभा लवो ` सुदं । सग शव॒ विरंचि निपा ॥ ४॥ 
दिपाचत्मे पेते बहुतः भर उनवा स्वे पे । यथायोग्य उनउन सानि श्व 
रोग उतर गये । नगरी हुन्दर धोमा देखकर की रवना-बदरी भी च्छ छाती यी।५। 
छं०-रघ् छाग विधि कौ निपुनता अवदो धुर सोम्‌ सही 1 
वन वाय द्रप तदाग सरिवा मय खव सक को कंडी ॥ 
मंगलं विपु वोर पतराका केठ शद्‌ शरद घो । 
बमिता पुष चुबर चतुरं छवि देष सुनि मन मोरी ॥ 
नस्क चोमा देखकर माकी निषुता उरु च्छ सती ह | का, गाय, 
५ श, वाहान, नियो खमी इनदर हैः उजक् वण॑न श्न कर सकता टै ! षट 
{` हुत मङ्गकदुचकः तोरणं ओर ध्वज थाके धमिव हो स ६ । चे दर भोर 
छर खीरी डि देकर रन भ) भन मोहो जते । 
शो-जगदंग्‌ जरै अबतरौ शो धुवं रमि कि जाद । 
सिद सिद्धि संपतति छु निव सून अधिका ॥ ९४ ॥ 
मि भसम खयं सगदन्ाने अधा वमा, य उता वर्णन हे सक दै 1 
रादि, दिदि, समति गौर इड निदे वदते जते ६॥ १४ 
चौ५-नगर निट बरात सुनि आ । पुर खरमठं सोमा अधिकाईं ॥ 
ऋरि बनाव सनि बान भाता । चके केत सद्र ल्षगवाना ॥ १॥ 


४२९ ॐ रामघसिलिराव् ४ 


ध --------------~ 
दयक्नो गे निकट आयी सुनक नगरम हरहर मच गयी लिते उदकौ 
पेष वद्‌ गयी 1 अगवानी कोवि चेग यादार कैः कथा नाना प्रका 
सवरि ए याद्रसहित धामो लेने चे ॥ १ ॥ 
हवै श्वे ुर॒सेनं निकासी! हरिहि देखि धवि भषु सुर ४ 
सिव समा चय दढन रये । बिषरि चके दा्टन प्तय भणि ॥९॥ 
देवतास दमनको येदकर छ पन्ते परस हुए जौर विष्णुमगदातजो देखकर 
ते दुत ची इती इट । छि जय चिक्लीे दल्को देखने खो ठव तो एतकरे घव 
आ ( स्मरिर दरी, थेह, रये दैक सादि ) डर माग चे | २॥ 
धरि धीर तयौ सहे सयाने । वाक सवर के जीव राते ॥ 
सहु पदम पूछ पितु माता । कहे वन सय केपि याता ५३॥ 
कु बद उद्क उपार लयेग धीरन घरक वरदो इटे रदे । लक क 
संपन भा स्कर भनि } पर पदुचनेपर भव मातापिता पूरे ्ैः ठव बे भवते कोते 
हए पीले एेरा वचन जते है] ३ ॥ 
क्म कई कि लाह च दाता। अम कट धार रिषं षरिजाता ॥ 
बद दौरहं रस॑ सवरा भ्र कपा दिमूपत छारा ॥ ४ ॥ 
श्या क र दात की सही वती ! बृह वयत ह या मरली सेना १ दृता 
भागे लोर शर सवाः द । लोपः शाट नौर राल हौ उसे गले ई ॥ ४ ॥ 
इं०--तव छार व्याट कपाटः भूषत चगत शद भयंकरा 1 
संग भूव भेत पिच ओमिति विकर सुख रनीचरा,॥ 
ओ धित रिषि वत देखत एत्य बड तेहि कर सी 1 
वैविदि सो इमा विवा घर घर वाव भसि छरिषन्द कही ॥ 
दे गरीरर रल स्मौ £, सष लौर काठक गहने ई बद संग, ष्पी 
भौर भवह है उषे अय मान शतारे भूत, परेतः पिवादः योनि मौर ग्र 
६। ले परतो देख जीत पचेगा, उच उपवे ही एव टै भौर क पाती- 
क ^ ८ , 
७ स समाज सये जननि सतक भकार । 
आ यदः बिविधं दिधि निढर ददु डस बाह ॥ ९५ ॥ 
रेभ ( शिवजी ) क उपान धमहकर एव उदको माव्ापिता सुस्त । 
उन्दने क तते ष्ठो साकचाया किनिढरशे जायो, रणी कोई दात मक ह ।९५] 
चण रान चरति आप्‌) दिए सवदि न्ष सए ॥ 
यैन धुम स्री सवार व गक या नारे \१॥ 
गवाम लेग बरतो सिग्र छये, उने कको सन्द जन्ते उहल “ 


पि] मेना ( परवती मत ) ने वें 
उम मङकल्यीत यमे च> ५ क 


‡ वारुकाष्ड * थ 


भि मधन ददी अति प्रा गपु गदेषु चौ वनदा # 

मैना र्ये गयठ दु भरी छीन वोट गिरीसङगारौ १६॥ 
„ शुः ग्ले मरे मग पे पम ग | मौ पितौ जं इन्र पा 
क धरे गये । मैते हदवम रा दुः इया । उन परतवसे भपते 
एर ुत्र ५. ॥ 
, ` अभिक सेहे गोद वैवरी। साम खरेच वयन भ धा ॥ 

धेहि पिधि ठि स्यु स पना ते ए यर्‌ रर कस मीना ५ ९॥ 

ज मल स द ज मरत मी भ्ये सम्‌ मव भद 
भरकः ़ढा-नि विताने हमको देव सुन्दर प दिवा; उर मून हशर पूरे- 
गाय भते नाया { ॥ ४॥ 


धर ड अपजघ होड जगं ज्ीवत विवाह न टौ रौ ॥ 
जिह पिषातनि दो दवा दी, उक हदे षे बर दाव दैवे बनगर { 
भो प कसृदमे छाना चाधि, इह ववर्स वमूर्यो क र द । रेचकः 
पेपर्‌ मग ब जगी धद पी । पर उनह जव ओः 
वमतो अपरं र जय) पर जतिजीै इववागह पे वाय विगाह न एग । 
दो"--भर बिकट भवला सकल दित देषठि गिरितारि 1 
$रि वितमपु रोदति वदति छता सनेहु मारि ॥ ९६॥ 
दिनष्वी लौ (मन ) को दुल देलकर दारी लयौ वकु हे गवी | भैना 
भनी कन्या सेतो याद क किशाप कती, रोती भौर कलं थ| ९६ ॥ 
$ -काएद कए रै कष विगा । मु मोर मिन्ह मरतं उल ४ 
असर उपे उमरि भग पीन | वैर बरद गि षु नह ॥ \॥ 
ॐ नारा श्या मिग भ, निनि भे वश हमा पर उन दिया घर 
विदन र्गो पेष उपदेश दिषा ं जशठे देले बावे के रमि तप कमा ॥१॥ 
सु उन्हे मोद भ माया ।उदृसीन धरु भ्ठ न्‌ गणा ॥ 
„ ए पर षाठ छान ग. भीर फ ष भरव है फर ॥२॥ 
~ मुव उने म पितीका मोद ह, न मावा) म उने षन) न धद ओर 
शौ दै पे शे द्नदै। इर ३ देका ण उदन १। य्‌ 7 
कि जज हे, म डर दै । मल) मद लो पष दानो समा ये {॥ २ ॥ 
चनमिहि दिक तिसोकि भदानी । शी छत विवेकं दु भाम ॥ 
शस्‌ विधारि सोवि भति माता । सो न दहं लो एद्‌ बिधाता ॥ ६1 
मातन पिक ईर पर्तीनवेुक् कोमल वाणी बोहर मा । जे 
विवा तव देहे ६ य्य न येवा निचाकर इग चेच ग क । ॥ ६ ॥ 
करम स्सा जौ वारर नाह । तौ क्त दोस छद काट ॥ 
हसन मिद विधि क भस । मादु व्यथं नति ये कठं ॥ ए॥ 
जोर ममे बही पति छिठा दो न्न यो दत गावा जव १६ 
माहा] वा र द भिः से र! दा कलसं यन्न मवे ॥ ४ ॥ 


ङ्ग ५ सप्रितग्रानर # 
जनि चि महु सत कूर परु अथर हू । 
1 ~ 2 
एवि धमा यदम विनी शरेमछ सक्र वल्‌ सोचहीं । 
ण्ट मौति धिधिदि खार ईए कयन वाहि दिभोचरीं ॥ 
दे माल | इनत मै, सेना 9 
मा ® इट सि द ओ जो वर वरी परग पी 
विनये दमस वचन्‌ इनक मरै र्वो सोच कले + ओर मेति-भोति विधाता- 
स देष देका भेषठिने थद्‌ एते द्ग । 
दौरि भद्र गाख्‌ सहित अह रिपि घ समेत ! 
उगगचार शुनि चुदिनगिरि ग्ने तुरत निकेत 1 ९७॥ 
श माचा छते दी दिमाचर उरी सगय नवदनी ओर सिरवषो पाय 
ठेका जरौ व यवे ॥ ९५ ॥ 
चौन-एव नन्द्‌ गष शद । पट कघामर्तयु पुनावां ॥ 
भपरल सल इन अम एनी । तदवा उद हुता भयानी ॥ १५ 
त्र वाट पल्ल काशना चो समर [जीरक] देमैना! 
मेरी यै ह हो, हमरो य सदी सादात्‌ सयननयी मानी रै | १ ॥ 
सजा अनादि सक्षि भविासिनि 1 सद्‌ा संशु रधं निवासिनि ॥ 
ज समद पाडन छप कारिनि । निज ईच्छा डा येषु धारिनि ॥ २॥ 
मे ममन, मनादि नौर मदिनधिनी श्चि द । स्या पि जद रदत 
1 भ जात उ, पर्न जैः सदर रवय: शोर शम द्रि हौ 
शीलतः पेय कलीदै॥ २ 
भग णम वषड गृ कद (ना सदे हषर सदु प ॥ 
ट एदी स्रि रिवः कपः परिद्र सड दग माक ॥६॥ 
पपे दे पर ब्र जनी ध, एव इश एती नान था, शृत दुदर शरीर 
भाम बा । क पी चल दैवी रवी पी) याणे जण र ।२) 
ठ प्ट णद सिव रंय डेः क्र कमर पमा # 
भद्रम ० सन्ध। भ्न दते सीव इर्‌ छन्द ॥8॥ 
पठ दार शृ पनी जप्‌ मति हए [रा ] खुञ््मी के दूत 
धौफवददीको देख, मोह दो गवायौर 
मर छदन दिमभीक् टना न भनक 








भमि दातत चरु क्िवा 1 
अस अनि उस तनह गिरिजा सवदा सकरा ॥ 
क विः! प चकन वयोम कान तपरापतरे क्षरण दंकरजीने उनो 


विवा कम नरुर ृ वाति 
नेमी) थर देते तके का जन्य छेक मपे पने 4 कनि 


द्य उनः णयः जे दे, पन वेय च यिवनीगो धिषा ( अदवहवनी ) ह] 





# बाखकाण्ड क प्‌ 


यौ» नि नारद के बचन तव सब कर भिदा विषाद्‌ | 
छन महं भयपेड सकट र वर धर यह -्ंाद | ९८॥ 
तव एके दन दुन कका पिश मिद गवा ओर गभे वह समाचार 
खे नग मर फैल गया || ९८ || 
चौम-षव भया दिम भने) पमि शुनि परवती षद्‌ पर ४ 
सारि शुष ससु छवा समाने । नर रोग सवे अति इफ ॥ १४ 
मेना मोर दिवान्‌ नन्द रे गे घौर उन ररर पात रो. 
्ीक्दनाकी। खी) पुरषः बारा ओर द, नगरे षमी लेग हुव पसत्रहए॥ १॥ 
हेत पुर मंगकगना । सवे सिं हाटक धट नाना ॥ 
भति भेक भई भेवनारा ¦ सषसाप् जस कु व्यवहार ॥ ९॥ 
नसम गर्मी याप जने समो जौर सवन भोति.मोतिफ वणे कलश एय पा 
ग्म मैव रिह, उ अदर अनेक मती ्ोनर हई (सेवी) ॥ २॥ 
सौ वनार छि जाद्‌ दलाती । यसा भवन जे भु मदामी ॥ 
सद्र गे सकट बरती । पिपत विरंषि दैव सव जाती ॥ १॥ 
` मिष परम खयं मादा भनी रदी हैः परह ज्योनार (भोबनखमगी ) का 
यैर कषा न सकता द! पमनम सादरतरं ज रातिवोभ-षिु) बरष्ा 
भौर उब जादो इ्माग ॥ २॥ 
विनिषि पति बैक मेवा । छे दसन मिषु पुरा ॥ 
भारि शुर जेल जानी । ही देन गा रु पभ ॥ ४॥ 
मोषन [कार] बहत शफ व । चर रोले परेल । चै 
मणयो देवता ने भोजन करते जनक थ गा दे र्गी ॥ ४॥ 
छे,-गारी मधुर सर देषटि सुंदरि वचने स्नानं । 
` भोज श्रि भुर मति वि विनो घूमि सु पाव ॥ 
जेबैत जो वदृ भनु सो सुख फो न परै कटो । ` 
अवर्वोर्‌ दीह पान शवे बास सहं जाको सदयो । 
सब ुत्दरी सि मीडे खरम गालो देम ठगी घोर येवम इदन्‌ दुनाने ठगी 
रेमगग पिद दनक बहुत सल मदम करे स्वे गोजन कर मो दे 
खा रौ टै। भोगम नो थानद गद, बह करोह प म महा भा त्त । 
भोजन कर शुकनेपर ] से यन्द इल्नाकर पान दिथे ये । पिर श्व छग, जो 
^ | ॥ क 
षरि सनिन्द हिमवत छं रुगन शुनां आद 1 
समय विलोकि विवाह च प्प देव बोरा ॥ ९९॥ 
म मुमि छट दिवान्‌ कान (नपा ) सनायी मौर विवास 
मय देकर देगतानोषो दुख मेता ॥ ९९॥ 
०-भोडि घल सुर सादर लीने 1 घव जथौषित शासन दुमद ॥ 
बेदी येद्‌ भिधान दारी । घुम सुमंयक सबि वारी ॥ १1 
सदेम आदररदित इना जिया ओर स्मो यथायथ आरन दिषे 
के रीत वेद ससावौ थी मरि बन्द भह मदहगीर गते सी ॥ १॥ 


< > सागवरितालस ‡ 
५५ _ 


दिदासु धरि विष्य दुन । द्‌ न ध्वनि विरि भनावा 
कैत छद शिन किर श 1 इवं समिर विन भसु रुई ४ ३॥ 
रदिवापर ए सन्ध इद्र दिष् सिहयसन या, च्छि [ करी य्दा | 
र्मः नद कि ज र्तः योनि यह खे उदज बनाया हुमा या 1 नहो 
दिर मनाल्र सीर छययं धपते स्वामी श्रीखुनायतीकय सरण कके दिवनी : 
स्कर्ट गये ४ २॥ ि 
पुरे कन च्छा वेदा \ श्र विमाठ सं टै धा ४ 
दपर रदु इन्छ इर मेदे । दरम एवि मर उ सवि को है ॥ ३॥ 
किर इतीशरने पतीन खया । इलि शगार ररे उम ठे थाव 
पत स्मो देके श य दद मोठ श रये । उल देल कि पैन रै 
ऊह दाका वर्मन क्र ऊ {॥ ३ ॥ 
सवशि आभि धव नामा ¦ सुरद सनद मन कौन पनमा ॥ 
शुदता = मर्छद्‌ यवानी ¡ सरा न कोष चत टली ॥४॥ 
पर्यसने नदा दर चिव पदौ समकर देवतानि मनी, , 
मम किः मवनीनै इन्दलाकी कषमा ई । कर लखे भी उनकी शभा नही 
षी ला छती ॥४॥ ^ 
दं*--क्िु, ददन स्ह दतै वरलत जपजननि सोमा मदा ! 
कहत श्रुति खे सारद भ॑दमति ठुखसी कडा ॥ 
छविल्यानि माहु भवानि गनी मध्य मंडप सिव जँ । 
मध्कि सकर न सुङ् एति पद मर भद अणुक तहां ॥ 
जग्मी णररीजीी पदान्‌, तोमाका ब॑ने कर्नौ एरोरे भी कते नहीं 
नतर द शेपदी घौर धरकतीरमत ददे कहते हए एषा जते £, ठव मन्दवुदि 
हल्य न्च निन्त र! इन्दा भौर शोमा जान माल्‌ मानी मण्डप बीम, 
स षिमनी ये र्गी | वे संकोचक मोरे पति ( चिव ) $ चरणकमर्नम देल 
नी कती, परह उनन्न गनत्पी नैस ले ऋही [ रान रा ] या | 
दो > यास्त श॒नपिदि पेड संभु सवानि ! 
डि संय करै ऊनि छर थवादि श्यं जानि ॥ १००} 
याश तिलनी यैर पा॑तीवीने गमेनमीका पूजन किव । मनम 
तपम न [ कि मपेशनी पो 

















प्िर्वव्ी जम करे ए ह वेके आ गये ] ॥ १००] 
रउ 


विन ठ 8 धुन पं । महयन सो द परां ॥ 

मिरे छप कन्या पानी । स्वि समरप चानि अदाम ॥ १॥ 

तिव रश सेते की रती: दिने गड उमी सीति क्यायी 

व छयते डटः देकर तया क्य दाय भवानी 

(स्वपली ) चन्र मिररभनन एण विवा ५१ ॥ व 
निम्न ज मीनः नता ¦ हरे हव शह सुम 
व निर उद! जय छ्य खय संर इर कही रा 
अर मर (दिरदी ) ने शर्वे पाणिग्रह दिवा, छव [रादि ] सव 


# बाखकोष्डं # ७ 


षता व र हए । भ युना वेदन उण ते खो श्रीः 
दैवमा पिभा जगयकनर करे छे | २ ॥ 

भा फल विनवे सिथाना। सुमगहषटि नय मै विधि नतत ॥ 

` र शिरा इर भवड मिव । सक्छ सुवन भरि शा उकाहु 1 ६1 

अ कमे बि पजने छो । आदते माना काणे धरली वर्ह । 
विनासा मिम ठो गया । ची ब्रम भाननद म गा } ३ ॥ 

कसी दस शग दथ माया । देडु श्खन भि व्यु मिमाया १ 

श दलङ्गमाशत भरि जाना) दृद्व दीद रं जद दवाना ॥४॥ 

दात, दाद, रप, पदे छः गथ, ब बौर मणि आदि उनेकं प्रकरी ची) 
भातया न स्का४ 
$" दाल दियो बह पुनि फर ओरि हिमभूध्र कयो । 

क वेड पूरनकाम संकर चरन पंक, गहि शधो ॥ 

सि शपसापर ' घुर कर ५४ छव मतिं बियो । 

धनि परे पदे पाथोज मयनं प्रम प्रपूरय दयो ॥ 

५ पराका देम देकर) फ हा जेहक लाच कार धेर | भा 
प्र हायते थ देवता ह! इतन ऋ ] ३ रिवदी चरम 
पक एह रथे । तव गाम सर धिवनने अणे सुरे सी परे एमन 
मि । पि परमे पूय मनाने विवी चरक पते [बोर क--) 

दो-जाय उमा मम प्रान सम करु । ', . 
छम सकल भपरध अब होः परस्र धर पे ॥ १०१॥ 
रैनाद्‌ | उर एते प्राम रमन [ रौ] द । थ शते भगे परली 
खनी पाएगा भौर ए सं यामो मा तो र्गा । अन पर्न चेक 
छोर दीनमि॥१०१॥  , ~~ 
ची,-गु विभि संयु सा सुका गतौ भदन कल पिं ईं ॥ 
जतौ उमा भोहि तम छीन । लै उष पदर षि ीनदी ॥ \॥ 
धिवलीने बुत्‌ ते भगी सको एमाय । दव पे रिव चरेम पि 
न प ग्य | र मातन पवतो इ लि मौर गोद बैड द ददर 
कैव दौ--॥ १॥ 
फो सदा संकर पद पका । नारिषस्ु एति देट त दूषा ॥ 
५ बन कहत मरे रोचन बारी । बहुरि छद दर ए मारी ३ २॥ 

पती [द्‌ सदा धिवर चरकी पूवा पलना, नरियोशन शौ पं ६। 
उने पति दीदे रै शौर ऋं देकर नी । दख कारौ त शोचते 
उनमी.शोसिं ओषु भर आये ओर उन्हे धानो शातते विप स्मि ॥ ९ ॥ 

कट बिधि स्त नारि जय माह । एरा्ीन सपे सुद्ध भाद ॥ 

मै भति म जिकर महतारी । धीर कड हरम दि्ारी ॥ २ ५ 

[रेक पि] विषारने गतम जपो शप दं क्षिया! परा्षीको 
एमे मू इत नमित । यो की इ परेम भलन पन षे गी, रद 
छतमब जनकर (हुल करेखा गवर न जनक) उन्न भरम षरा ॥ १ ॥ 


ष्ट न रामरितेास भ 


मि ए पटति परटि गहि चरता; प्रप षु कु जइ न करभा ॥ =, 
एव भादि मि सेदि भगो ¦ ज जनमि इर एनि सपदानी ५ ४॥ 
मैना बाप पल द मीर र ] चरणो पककर गिर पदी ई । 
परव परेम, छ वर्णन गी स्वा सता । भवानी स्व वसि मिव किर 
अपनी गे क) ४॥ ज द 
समि वरि भिलि जल खद का द । 
किरि विरि विलि हु ठन तव खीं ले सि पि गर ॥ 
सवद सङ समोधि संकर उमा सहित भवन्‌ चे । 
सृष्ट भभ ये दटुमन रपि निसान नम वाजे अञे ॥ 
पर्वती मातासे शि मिठकर चर, सष किनि उदे योग्य आशीर्वाद दिवि । 
र्तीणी परिरफिर धातादी भोर देखती जाती धो । ठयं शिया उन दिवधीके 
पा ञे गवी । मदेवजी एव याचको संत कर पार्वतीके एप ध्र ( फैमस ) फो 
च] स्वदेवतापसल हेकर मोक वपा कले रो भौर मामे न्द गाद बनाने को! 
ध०-च्े संगर दिम ठव  प्चातन सति देतु । 
भिविध मति प्रिकोषु करि विदा करीन प्ृषकेतु ॥ १०२॥ 
पव िमनीन्‌, लयन्त भेमखे शिवनीको पषनिके स्वि षाय च्छे | पृषत 
( शिवी ) ते वह दशे उन संतोष ककर भिदा छिमा | १०९॥ 
"हुत भषन माष गिरिर । सकर यैर सर दिष्‌ घोरा ॥ 
आद्र दाग यिनय॒बुमाना । सव कर विदा दनद हिमवान ॥ १1 
पयन शिमार्य रेत षर जवे धर उन्दने स्व परतो घौर एरोवरोको 
हका । हिसा भाद्र, ानः विनय जौर भूुतसममपूफतनती रिदी ॥१॥ 
शर्वः सु कैका मार्‌ । सुर सव नि मिदर कोक पिधाय ॥ 
अगत पहु पि स॑मु सानी ! ते पाद भ करै लान ॥ २॥ 
अम रि फैला परतर पटु) त्व स्त देयता घपने-षपने जोक चे 
गै वशीव फ द मि ] परवतीन जोर धिक जपे मातािता है 
इलि म उन शगार वन मह इता ॥ २ ॥ 
कर वि चिवि मोग मास } यनन समेत दसं कैकासा ॥ 
र भिर नर निह भवञ । पि विधिषु काह धरि गय ॥ ११ 
& ध पिभिष प्रकारे भोगम करते इए शपते गरो कैरास्पर 
श्छ पनत पहर फे ये। एभ्य बौद गया | ६] 
क सेः सरयदन छारा । त शुर समर जेहि मारा ॥ 
न) 
५ तम खाः मिन्हेे [यङे शेन ] 
शद्ग तारा मरा । वेद, शन्न सखामिका्िर्के 
षरे चौर सय भाद्‌ ए क व 


“शु जान पद्यु जनमु चुं भता पुररणु भहा । 
ध वै ङ फर. चरितं सेय कदा ॥ 
ए उमा खं विवाह ज नर नारि कहिं जे गावी 1. , 
$त्यान काद्ध विद्‌ संगर सर्वद छलु पएवर्ही ॥ . + 








# वाटाण्ड ‡ ७९ 


पदान्‌ { लमिति ) ॐ जन कम भरतव चौर मशा्‌ यपरके चार 
जात्‌ गदा दै । नमि मैने श॒ ( चिरजी ) ॐ पत्रक र पेषे ही ष्या 
है। शिवाम विवी इव कथाको ने जीत को बौर गकि, ३ एला 
रो भौर भ्वादि मङ्ग एदा सल पि 1 
पेच सषु गिरिजा रमन मेद्‌ न दायि पर । 
कलै तठसीदास किमि. अति मतिमेद शर्वो ॥१०६॥ 
गिरपि महदेवजीका चत्र स्के पमान ( सपार ) 8 ऽका परवेद भौ 
ते! त अलन्त मन्दि भौर दार ह्दीात उ र्न वेण 
प्सता रै |॥ १०२॥ 
बोघ रित सुनि सरस सुदा । मषज् ुनि जति इल पवा ॥ 
बहु शसा भथा प्र वरी । नयनददि षीठ रोमावलिं दी ॥ \॥ 
धिक एड भौर यवे चसो हरर एनि माजवीने हुत धत 
पाया ! एवा हुननेकी उनकी लट्टा बूत अद्‌ गवी! नेत्रम जड पर आगा त्था 
सेमा खद हे गवी ॥ १ ॥ 
रम भिक्स सुख भ्रव न वानी । दसा देशि हप सुमि म्मानी ॥ 
महो धन्य एव जलय नौ । ठनि न खम भिय गोरक्ष ४९॥ 
प्रमे ह गवे सुखे बाणी त म्तौ । उन यह दथ देखकर 
शती सुनि बवल ष मरन हए [ ओः वोर 1 रे यनी । जह श । द्र 
सेना यदै मतो ौरीपति भिव प्रा खान मिव ६] २॥ 
सिव पदमक बिनि रति वी । रमि ते सपमे घ सोए ४ 
म्ल 8 विर्मनाय प वेहू । राम भात कर शष एह ॥ ६॥ 
विवर्णे वराक जिमी परति गं ३, वे भीरमचन्रनको सपमे भी 
भच्छ तरी समे | वश्रनाय भीविषलके चरणोम िणड ( विद ) भरम होन प 
रभा रक्षण दै ॥ ३ ॥ 
सिव सम शरौ षु मत धारी । वितु भय ती सती शसि भारौ ॥ 
पलु करि रदति भगति देखा । को सिव एम रमरि च ॥ 
शिवम एमन शुनायजी [ की मछ ] क बरत धारण करवाम 
मिदि भा पपे तीची ह ल्ग दिया मौ भति कले भोखनायीरी 
मति्ोदिला दा रम ीपचदजीन्ने भिर खाननीर फन णाग ६ १॥४॥ 
दो*-प्थमह मै कहि सिव धरित बुक मरु वुष्डार । 
& राके चश विकार ॥ १०४॥ 
ॐ पडे धिक चर फक ददार मेद समल टिया भीएमवनः 
$ पिन वक शे वीर रम दोपि च हे ॥ १०४॥ 
ऽक चराणा छार म सीद । क हन भव रधु कोख ॥ 
घञ समि भश समागम चोरं ! षि च आद्‌ सल सु सन मोर ॥ १ ४ 
ते दर रुण सौर शर गन वा| अव र भगुगयनीमी हीम्‌ का 
ॐ छो । द इनो, भा ह वे मसं ओो आनद इम ४ ¶ 
कह जा सक्ता ॥ १॥ 4 





५ ____ + पवमल ------- ॐ स्रशिताच्छ # 
=-= 
रन चकि समि पित सुवीर कट न उड चद कोटि महसा ॥ 
ई द्द \ सुरि सिरर ऽ चवुपानी # ९४ 
मसि सल स्र । द कोष भौ ठे न क 
ड छन वै च त्वनौ (गरक ) लैर शर्ण धर 
र्ती रर एकं कटा ह ॥ २॥ 
द्मे छ खनीरस्दु = शत्रणर संहत्ामौ ए 
ॐ अलु दौ । छथि उर अज्र नचा बानी ४३१ 
४ लं १ ओर चन्दर्वन लारी अरमचन्ती [ छ `` 
क्पे अवमे ] छार ई। अयना मक्त चनक्र चठ कमर 
इव गन रपो ३ नचागा कते ६ ॥ ३ ॥ 
दर्‌ तोष हपाछ सुनाया 1 चरनं दिशं छा युन गाया ॥ 
प्ल स्य॒ शिरि कैकाद्‌। स जरह शिव उसा निसू ४ *॥ 
ठ जाड भोदनाय्चे पै अयाम करता हूं भौर उने निम दुग 
रण म्पा । कैर पवते ठ यौः बुर ही वम्ीव # स चितयाधेतोनै 
स्वाकार क्ते द| ८॥ 
ग"-सिदध दपोधन जनिन छर नर सुनिर्द । 
श्रि तद छठी सकल सेवि सिव छंद ॥ १०५॥ 
षिकः उलन बोगी, देल, कनेर सौर नियो उम उ पर्वपर रत 
६1३ द एतन र जौर जानन शरीनसदेऽनीरी ठेवा क्ते है ॥ १०५॥ 
चौ" शर व्क धनं रति रर दे तर ज सफ भि दाही ॥ 
चेष्ट पिरि पर चट बिद्प दिक्खा । निद मून सुंदरं सद श्रा ¶ १ ४ 
ये भ्कञन्‌ दु खर वेष पदउ नौर लिन घरमे प्रीति नह 
नेर शनी = छते] छ पर एल कड कलया 1 
रच शर (षो) ॐ दः पा ई ॥ १ ॥ 


























रप । दे विकि उर अति उभय ॥ २॥ 

रद मौर इष्य) गु नहर ख है नौर 
र्ती दै ! ३६ व्य विशाम ऊजे शठ है! ज्रि 
कान भु पोदिव्यी उ एकक नोते उवे शौर ॐत देखकर 





गौर रीर! छुच प्रय परिषन सुनिचीरा ॥ ११ 
छि्कर मष निवी त्वमे ही { विना ष्टी खार 
| इन्े एन, चन्रमा यीर धके समान उन नौर रीर 
म र दे (चचक } चक धारण नि हुये | ३॥ 
च भ्ल नइन सन छना नु मय इय हमं एना ॥ 
मुखम चूनि नि, मुन शपुर ¦ जनदु स्व्द द्‌ ठंडि दारै ।॥४॥ 
९ पू॑लपड छले दुष) उर अमल दात ये, नकी ्योति 
म्र षने यो] सै कीर षटु उव सण ये । जौर 


यष्टी न्न 


#-चालकाष्ड # | 


, “~~-~------~--------------------------~-- 
उन निषु चितश्च इड क्‌ (-ूिमा)-ॐ चनम चेमे भै 
शेश ( सीकरी केला ) या ॥ ४॥ "० 

५ सिर सेवन नलिन विसार । - 

नीकं खवन्यनिधि -सोहं  बाख्बिषु - -आढ ॥ १०६॥ 

"उनके" धिरपरं जदामौका युकुट ौर गह्धाजी ` शोमायमाय 1 थौ । कमले 
मानद नेतर ये ) उन भीर कष्ठ था ओर वे एन्दरतके भण्ठा पे । 
उक मसकपर द्वितीयाः चन्द्रमा शोभित थ ॥ १०६ ॥ 

चणकैः सोह मरि कैसे । धरे सरीर -पावष्सु नैते 

पासवती भक अवहद्‌ नी पद संसु पार मत्त सवानी ५ १॥ 

कामदेषके शतु शिवजी वह वै हुए दते शोभित हो र ये, मानो सन्तर शी रीर 
शरणे धडा हो । शच्छा मोका जागकर रिवपकठी माद प्रातीमी उने पास रय ॥१॥ 

ज्ञानि प्रिया धयादर अदि कीन्हा । वाम भाग, भासु एर दन्ह ॥ 

डी, सिव समीप इरां ¦ प जन्भ कथा चित आद ॥ २॥ 

, अपनी प्यारी पतौ, जनक शिषे उनका बहुत आदरउलार किप भौर अपनी 
री भोर रने ख्य जान दिवा । पावती प्रत्र होकर धिव पा ठ गवी | 
उन पचे जनपकी कथा सरण हे आवी ॥ २॥ 

पति हिम हेह भधिक-भनुमानी । विहि दमा बो प्रय बानी ॥ 

या जो सकढ छोक हितकारी । सोए श्न चह सैरडूमारी ॥ ३४ 

-लामीक हदय [ अपने सपर पठेी अ ] भिक पप पमहकर परवतीनी 
र भिप-वचन योल | [ यामस्य कत ६ कि | नो कंथा सव ल्क हि 
करवा दै, उसे ही पार्वती ष्ठा -ची ई ॥ ३ ॥. ^ 

बिस्वनाथ ममर नाथ पुरारी । भिवन अदिप विदित तारी ॥ - 

तर भह अ जाग भर. देवा । सक परं पद्‌ पंकन तेषा ॥ १ ॥ 

[ तीन श-] दे संचरे सामी 1३ भरे नाय [द भिषा गष 
कृपे माकी गरिमा तीन. मि मिरवात दै । च अच, भाग, मवु 
भैर देता समी मापे चरगक्म्फी सेवा. के ह ॥ ४॥. 

दोरु समरय सर्य सिव सकर कलां शुन घाम । 
जोग श्यान बैतम्य निधि प्रगत कुपततं नाम ॥,१०७॥ 
प ष्व कल्म मौर युपि 
षान ई, ओर योग, आन ठथा कै मण्डर दै । आपका नाम ररणीते 
} थ कवष दै ॥१०७॥ 1 - ~ 
चज भो पर परद्र सुखरासी । जानि स्य मोहि मि वसी ॥ 
तौ भष इर मोर भवयाना । कटि र्नाथ कया सिधि नाया ॥ ५ 9 

द छर रयि { यरि माप युपर त ह जौर एच यके मपनी धनी 
{गा भुन इ दी ] जनते द, तो दे प्रमो! भाप शखुयसीती आना भ्रौ 
भ्या कर भर॑ मान दूर ने ,॥ १॥ ५ 

दु मवतु पप्र एर दों । सदि क दण्ड वनिः द.सोदं + 
सिमूषन भक इद्ध विद । इर नाष मम मति भ्र मरी 1२ ॥ 
विका थर्‌ कमे नीचे टोः वड म दिति उलनदुःल्नो यो 


० दे 


द # शसदरिीनस ४ 


शे द िमूषण ! ६ नां द| पस विचा भरी सिरे मैने 
दृ रीरि ॥२॥ ५ र 2 
अरु ने शनि पोरायवादी ) चदि एम कृ प्रह पी १, 
"` देष्ष॒शवी ` धद रामः \ सरूट कर सुरति सुर भानः ५ ६१, 
र मोजे वपल (रर) ३ हा मौर वक्त युनि १ वै शररमचन्वीको 
भादि अ ब ह ओर ए र्य, वेद भौर एए सम श्ीखुगापनैक 
शणमते॥१॥ = 1१८५ श 
ष पनि शत रम विन शती । ह्र र्ग आरती ॥ “ 
` शु ओ सीव धरसि कद 1९1 
पौर दै कमेषु ¡ भप भी दित भदू शमनतम जगा फते 
(ये पम श ममोधयके राजि पुन ६१ गा घव, तुप घौर भगोचर भो 
बर एव ६१॥।४॥ , . “ ॥ ८ 
छह ०८ ॥ 
अदि ३ राखत {तो अय कैद! भर पदि र ६ तो] ल्के विषे 


कोड । एए दद्‌ भाय मोदि सोढः ॥ 

“." भा जामि सि इए उनि धर्‌ । नि पिपि मोह पि सेद कर्‌ ॥ 4 ॥ 
दि पहारः वापकः समथ ह कोटं मौर ६ तो ए नाय ¦ पे रे 

एमा फलय] दा समह पन कोष न सहे । जि हर स "मेह 


„ म धम धि रास भमुतर । षो भविकठन दुम पुना ॥ 

„~ चषि दिन्‌ सन दो ग अवा । हो पु सष्ठ भति एम पवा 1९ ॥ 

“ग [2 जनान] वन मची प्रता देखी षी; परभष 
भमत हे कन मेद बात आपके इनायी नरी । तो भौ मः स्म 
वन हवा ) इसका पह भौ पै जच्छ पेखा चवा | २] ^ 

“ भरू एड घंट सम मेरे! एई शषा विवर कर जेर ॥ 

गह सब मो संति परोपा। नाय षो खु बनि परोधा ॥.६॥ 

स म मे कुड देह १ थ सोदर मित 
पत । १ धमे भामे उउ उम छे व दयते सममा था । [किमीया 
छेद गवा दनाय । ख सो सोबत परे ॥ १) -* ` 
„ ; खय ऊर चद विनोद भव ठ] रमस्य पर दधि सम क , 

ष व, ए सुर गा । युय मूष. हरा ४४॥ 
१ ५ दअ मै पमो नोभ धव 

अरुशएपमे धार आरामचनभी- 
र्पति का क्लि" ४॥ ` स 
यै" प्‌ घरि चि एर पिय कड छ शओरि) ध 
करन पुपर विस बु. सधात -मिवोरि | १६९॥ 


५ 


# वाककाण्ड # ५. 


न 
. रै ृषवीप सिर येककर पके चरणो की बन्दना कठ जोर हाप जोगार विनती 
करती ह| भाप वदो षिदन्दन्न निचोदकर शीरुनायनीका निमय वंन मिम १९९ 
श्ौ०-अदुपि षिता भिं अधिरारी ¦ दासी मन कम उम तुम्हारी ॥ 
शूषुढ तस्व न साप, हुरवं । भारत अधिकारी ज पावा ॥ 1 ॥ 
यिस के काय म ॐ8 एनो अधिकारिणी नहीं तथपि थमन 
यन शौर कमरे भाप दाती हूँ । संत लोग बहौ आत अविकारी पे, ऋं 
गृह प्त मौ उषे नी छित ॥ १॥ 
अचि आर्ति सूर सुरया । सुपति कथा कषु करि दाया ॥ ` 
, अथ हो फारन कट विचारी । निररं बह्म सुन चु घरी ॥२॥ 
टै देवताजके खामी ! म बहुत दी आर्दमाब ( दीनता ) ते पठती द; भप 
मक्र दया करके भीरघुनायलीकी कथा किये । पले तो व फरण विचारकर 
तटाश्ये निरस नि्तण ब्र सगुण र्य धारण करता टै | ९॥ । 
` इनि भ्रु कटं राम' भवतारा । दारुचरित पमि कहु उदारा ॥ 
कृष्ट जथा जानकी विया । रल ठना सो दूषन काही ॥ ६॥ 
पिर ह पर | शरीरामचन््रजकै अवतार ( जन्म ) की कथा किये, तथ्‌! उनका 
दार भचर कष्य | प्रिर जिस भकार उन्न श्रीजानकीनीते विवाह किया, वह 
का कवि मौर पिर यह यतलादये कं उन्दने राव छोड़ा लो भख देके ॥ २॥ 
जने भि कौन्दे चरित धारा । कटु ध जिमि राव मारा ॥ 
| शग वैद ध्न दहु लीला । सकल फट संप सुलसीका ॥ ४ ॥ 
हिनाय। पिर उन्न नमे रघ्र भो अपार चरन किये तथा विष तद 
समे मारा, षद फे ¦ दे इसस्म शंकर ] फिर माए उन खरी रीरा 
पवि ओ उन्दने रान्य [ सिंदासन ] पर क्ैठकर की थीं | ४ ॥ 
} दो~--षहुरि कहु -करनायतन कीन जो जचर यम । ` 
। *“ प्रज्ञा सहितं रघुवंसमनि किमि भवने निज धाम ॥ १९० ॥ 
द कृगाधाम | भिर बह अद्रुत अरि करे जो भीरमचद्रनीने .किा--पै 
। खङलधिरोमभि परजसहित कि प्कार जपने घाम गये { ॥ ११० ॥ ॥ 
चौ०-घि भस टु सो स्व बली । ने विनया मगन सनि पानी ॥ 
अगति श्याम किनथान विरागा । इनि सब वरन दित.भिमागा ॥ ॥ ॥ 
, " एभ्य] फिर भाप उस्‌ तने समसनं किये, जिद अनुभूति पानी 
गण सदा मण अदे &; ओर भिर भि, हाः विन ओर पमन विभागत 
पिक कीनि ॥ १ ॥ ८ 0; 
मौर, रमर रस॒ स्लेका । कट वाय भष विमल निवेका ॥ 
जो भयु. षा नहि दों । सोर दयार र जनि गो ॥२५ 
„ [ इम धि ] भीयमचन््रजी$े मौर भी जो, उनेक र 0 
जि) उने क| ६. ताय} आ श जलन मि 
मो] जो बाद र नमो पू हद दयाड | उ मौ त तमान रहिता .९ ४ 
, हन विन रुर चेद शाना 1 आन जव पवर श जाना ॥ ` ' 
,. "ल्ल गमा एतै सहज सुधां । छ वद इ दिव मन मदं ॥ २५ 
बदन आपो होन शे युर कद । दू पामर शीव शठ स क्वा 


\ 


| & रामचरितमानस # 


"~~~ 
जते पमि न सद भर छि (ल) प्र दु मेम 
यहद रच्छ खमे ॥ ३ ॥ न 2४५ 
इ शिं रास्व सनः माए पग दुक रोम जरः छप्‌ ४ - 
शरीलं रूप उर खाद । परमान्‌ अधित सुख पादा ॥ ४॥ 
पर्णे इदयं जरे रामचरिनि भा गवे 4 पे + उमका श्र 
ल सम ओर नैम ज मः मावा । शीरनापरीक्न स उन भ 
गा स्विते खमे पसनन्दखल्प शिवजैने मी यार इख पाया ॥ ४ ॥ 
दमन ध्यान दंड शग पुनि मन बद्ठिर कीन्ध। 
सुपति चरिते परदेस तव पित वरत लीनद ॥ २११ ॥ 
वस दौ दी तत ( भगाद ) पद ते) शि उनि मते 
बाह सौदा मौर दम वे प्रम हकः ीरुनायनीका चित्र दर्णन करे सगे} १११॥ 
कोणः सत्य सादि चिल यनं । भिम पुरम निरु पदिन ॥ 
सहि जात छग. ता हरदं । आगे जणा सपन श्रम शरै १॥ 
मिस विता बति शठ भौ सल माद हेत %; वैरे तिना परवाने- रस 
सप्र? ते चचा 9; मौर भि नन करप ऋगदञन उही तद लेप हे जता 
१ मदे भनेपर सका भरम जवा रकतं दै ॥ १ ॥ ~ ~ 
"7 ददै नाल्प सोद यमं । खव सिधि दुम नपि भासु ॥ 
संगे भवय अरग हारी । दूब सो दुसरय चिर चिष्ारी ॥२॥ 
उदी भीयगवभजीके ाखहमक वन्दना इरा; चिनका माम्‌ जपने व 
क्ये स्न प्राह ते नदी ई मदचके षाम) जगद हवि गै. शरीदधएप “ 
स भगिने सेतवे (वाठहम ) णीयतचनदनी र हया करं ॥ २ ॥ 
रि प्रवय रमि बरपुर । एषि सुधा सपर शिरा उधारी ॥ 
धन्य तिरिरनङपारी । इम समाने वा छोड ऽपकारी ॥ \॥ 
पुर दष केवडे वसौ शीरमरन्रजको मगाम ते आनद 
` प्रखर अमृते स्मान वाणी गैर भिरि न्छुमायी परती | दम पृतय ते ] ष्य 
है} षरे समान कोई उपकरी नदी ६ ॥२॥ ॥ 
वड रुहि ज्या प्रलय । सक्छ कोक जग पावनि भैमा ॥ 
हम श्वी चरम भतुरागी । बीन परल जरत हितं छामी ॥४॥ 
जो इणे भनया रद पूर नो सथा इमल केम वमि 
कात पविध केषी गङ्घवीके समान है 1 ठगने भणते कल्याणे ष्व ह प्रण 
1 ड्म + भेम रषमेवादी हे ॥ ४॥ 
धस इष ठै फरववि सपने षद भन माहि । 
सो मोद. सेद भ्रम मम बिचार कंद नादि ॥ ११२ ॥ 
दै पर्वती | र विचा तो भीरमनीकौ इणे न्दे मनँ लम मी ओक 
मोदे बोर पर इछ भी नीह ॥ ११२॥ 
रौ", सतश्च शु सों ट ह एव कर धित हद ॥ 
चिम्‌ दिवा सुन नद सना] रयन रध. अदिमवन समाना 1 § 1 


किरि भी मे इधन क (पनी) हारै मि इष के शले 


% बारकाण्ड # ' व 


भाअ 
शुने समर मस्या होगा । मनने अपने जनि भगवान या म चुनी, 
उनके कानफि छिद्र सपे विरे समान ई | १ ॥ ^ ५ 
॥ (म देषा । छोच भोर कर डेखा ॥ 
कट समदा । जै न नसठ रि शुर पद मूका ॥  ॥ 
` बिह पने नेनेति रंतेके दन मदं किये, उनके वे श पोप 
दौखनेवल नकली -्भोजौकी गिनतीयै द । वे सिर कदी दैक समान ई जो शहर 
ौर शरे चरणवटपर नही वे ॥२॥ ~ ॥ 
॥ जि इरिमगति इद तहि भनी । कीवत सव समान तेह प्रानी ॥ 
ज्ञो नष्टि फर्‌ रम युन' गाना] खौ सो दादर जीह खमाना ॥ ६ ॥ 
निन्दने भगवान मछिको अने दृदरगे खाम नरीं दिया, बे पराणी ओते हए 
¶ एे$ समान है । जो जीम भीरमचन््रीके रुरगोका गान नरह करती, षह ढककी 
जौ ठमाग दे ॥ १॥ ^ 
षम, फञेर निर सो छी । सुनि रिचरित न नो पाती ॥ 
, गिरिजां सुगु राम कै रीरा पुर धित दु बिमोहमसीका ४ ४॥ 
चह हदय वंके समान का ओर निष्ठुर है चो मगवानङे चरित्र सुनकर धर्षित 
नशी हेता \ ह पार्वती श्रीरगचन्रनीकौ रीड सुनो यह्‌ देकताभोका कल्याण करौ 
गरी शौर दैयौको विरोषरूपे मोदित करेवा दै ॥ ४ ॥ 
दो यामकथा सुरधेदु सम सेवत सद घुल वानि! 
स॒तसमाज. ुरछोक सब को. न सुनै अस जाति ॥ ११३॥ 
शरीरामच््नीकौ कथा कोमवेनुके उमान खेवा फरेरे खव लोको देनेगली दै, 
१ माज हौ खव देकताोके छोक है एसा नानकर इषे जैन म 
॥ १११॥ ५ = 1.2 ४ 
सौ"-रमकया शुदर ` इर उरी । एवय भित  रदा्नदयरी १, 
रकां -कलि भिदप॒ छारी । सादर शुत ` गिरिगजङुमारी ए १ ॥ 
भीरामचन्द्रजीी कथां हावी युनदर , जी ह, नो 'षन्देदसूपी, पकवोको उदा 
देत ६ । पिर रामकथा कल्नुगरूगी ए चव्नेके ध्य ऊजा है । ए गिरिगन- 
इमा ¡ द इते गाद्र्वक सुन ॥.१॥ - , 4 
शम नास शुन चरित घुष्‌ । शभम्‌ फरम अगमित्ुति गापु.॥ , . 
कथा अर्नव ॒रामंमयवाना । तथा फा कीरति शुग भा ॥ २॥ 
दनि भीरामवनद्रनके इनदर ना यण, वसि, म ओर कम मी अनमिनत्‌ 
. पे ६। मिस भकार भगवान्‌ भीरमच्रनी यन्द हैः उंी दद्ध उनकी रयाः कौं 
श्ण. भी अनन्व ई ॥ २॥ , - र क 
वशि जया श्रुत जसि मति नोरी । कवि देखि पति बति तरी ॥ _ 
उमा भरल चष . सस इ  घुषद संततम मोदि मा ॥ ६१ 
तो भी दारी अन्त परीति देकः जेवा ङु मैने छना दै वीर जैती मेरी 
शि है, उसके अतुसार यँ कय 1३ पर्वती! ठम भव स्वामापिक दी छट 
इ्दायकः शौर संतमत दै ओर इ तो षुत ह अच्छा एमा है} ९ ॥ 
फक भात नदं मोदि सोहा ॥ जद्पि भो जस कडु सवनी ॥ 
शह ओ षा राम कोड शाना । जदि शुत याष धरदवं सनि ्याना ४ ४ ॥ 


) # पम्रस्तिमानेख £ 





श पूर्ती! पठ कत पुरे भन्छी न छी, यपि वई दमने मोदे ब 
रष ¡हने नो यह एदा पिये एम कों ओौर ई निन वेद गति गौर 
विन ध्यय षरे द--॥ ८॥ । 
श अथम्‌ नर्‌ प्रे जे मोह पिसाच्च 1 . 
~ " पादी रि पद दिल आनि शूट त साच ११४ ॥ 
ˆ बो मे्मी पिशाचे य प्रत ई पादौ दै, मगवान्े चरणेषि 
दिम टै शौर बो श्रूठःठव ड भी नद जानते, देठे अघम, मनुष्व ह इ तद 
दने ६॥ ११४॥ ‡ 
चोऽ-अ्य अकोदिद्‌ भध अभागी । काह बिषय सड मन काग ॥ 
` कपट पदी $ तेषं । सपनेहै संतसमा महं दी ॥ १ ॥ 
ज अशनी, मूख, भष ओर माग्य्ीन है ओर भिनके गनसमी दप॑भर विपम- 
स कई नभो हु) ज व्यभिवारः छरी मीर यदे इच रं ओर निन्दोत कभी 
सम्म मौ ठंस्समाजके कन नही कि; ॥ १ ॥ 
य ठे वेद्‌ अमत भाती । किन द सुर सु तष मी ॥ 
युर गनि भर स्यते बिना । रम र्य देख किमि कीना ॥ २ ॥ 
ओर निनद मनी छम-्मि नर रहती, भे 8 रौ वेदि व षा रो 
६1 मित इदयसती दण तैयार मौर ओ नेभेठ हीन ६३ मे भरएमचननी- 
ष्यक देषं ¦ ॥ २॥ । 
निष फ धुन न सशुन दिका । अपप ऽसि थ अतेसा ! 
^ ` दिमाग बऽ: जगत श्रमाही | तिह कत क मदत भा ॥ ६४ 
पिमे नियभसुयन्न ड मौ कि म , ओ नड मनद तका 
के ¢ ज श्री मषक वरो शेष जगदे { नममक चतरे } प्रमे 
पिते ६, उन वमि डढ मौ शना गहम्मग नही | ३ ॥ -- “ ^.- ~ 
¢ ‡ नाह" , सूत॑वे मतरे । ते बं शकटि बदन मिरे ॥ 
त छठ भानौ सद पाना । वनद करका हरिभ भ कमा ॥ ४ ॥ 
1८, निन रु रग.( दिप्‌ उन्द्‌ ादि } ग्रा षे, मूते पर शे 
परे हमौर ने के चूर ई, दे गोग तिचरर ब्चय नह बोधो } विमदेन 
एगो मदिर पो री) उने र मान न देना चवहिवि॥४॥ 
भेऽ तिम द्य धारि व्डु संस भु र द्‌ । ` 
(५ (क अमि कर चत मम्‌ ॥ ११५. 
^. षने दकौ ये दे छो रो ओर श्रमघ्नी रोको 
मनो 1 परी पसम जन्नके नाय केक चवि ूर्की क्षरणे पमान 
वकरो इनो 1॥ १९५ ॥ ~ $ 
, तभे नीह श भदा । वि घुम सरन इष ददा ५ 
४ अत गह्य अल्ल, सा नो । मणठ शेम ज सुन दो होई ¡ १ ५ 
ह ५८१ १ शक भेद 1 एुरणेः पण्डित शौर र 
ू १ (भरु) ,अल्य (. } अल्ल { सन्यक्त) भौर 
अमा द द म ममक तु से गतः र ॥ १ 1, ,- ॥ = ध 

















8 णे ही निग ओर व्युण एक द |) भिम नाम 
कै मिराेके मि सूं ह.उसफ सव गोका परसंय अी करे कशा भा प्रकत 
"` श्म `स्चिदानद्‌ ` दिला न तर मोई निखा उवे ॥ 
सल मकासरूप गवाना । नात पुनि विगान बिष्ठाना ॥ ६ ॥ 
ीरामचद्रजी उथिदानन्दसरूय घं ४ { वँ मस्म रानिका उवते भी 
मी दै। वे स्वभावे ही परक्धरूप आर [पडे ] भावाद्‌ -ई, षँ तो 
वितानस्य आतेाठ मी नरी होता ¦ ( अश्ानसंभौ शाति षे तव तो विरामरूमी 
प्रतसकरार हो; मगवाम्‌ तो नि शनशस्म है । ) ॥ ३ ॥ 
क्ष ॒गिषाद्‌ मयान शग्थाना । जीव धमं अहमिति अभिमाना ॥ 
राम रह्म न्मापक सं भना । परमानंदः प्रेस पुराना ॥ ४॥ 
ह॑, शोक, लान, -बहान, ` दता ओर अभिमान-ये खर ओक धम ई | 
भरमथेरली तो व्वापक ब्रह्य, परमान्दलस्प) परासर प भौर 'पुराणपुरष द! व 
गातो रा नगत्‌ जानता है! ४॥ 
दो-क प्रसिद्ध भका ` निधि प्रगट परावर ताये 1 
मम सामि सो कटि सिँ नायड माथ ॥ ११६॥ 
„ जो [ पुराण ] पर परिह प्रकारके भण्डार ह, सव रपय प्रकट) जी, 
मया ओर न्त्‌ शकने खामी ६, मे ही रदवमणि भीएमचन्रनी मेरे लागी ईद 
ऋकर धिवजीने उनको मक नाया ॥ ११६॥ =` ` 
अम निं मुसि सम्यादी । परधु पर मोह घर जद आनी ॥ 
भभा गगन, वन ' परर निरी 1 पिव सादु शष ्मिष्री ॥.१ ॥ 
-  , अशानी मनुष्यः अयने परमके तो रमते नकं ओर म पूं प्रय॒ भीरमवन्ः 
भीपरं उसका आरोप कते ६।. जवे शाम. पादलोका पदां देखकर षिचरी 
( भशनी ) लोग ते ई मि बदन दुय ढक क्वा ॥ १॥ ,, ॥ 
वित्तव कगुडि . रप] परमट कणठ ससि तेहि के भाद ५ 
„ “उमा.रास ` भिदु भस हूः । नम वम भूम ूरि शमि सोहा ॥ २ ॥ 
५ + मनुष्य मदमे ठगी ;माकः देता है, उम्के.ल्मि तो दो चना पकट 
{ मर्यक्ष ११ हे राववी | न शुम र 
ही हे भेता आका अन्वकार) 1, 
निष्क ओर निष्‌ ई ५ 411 सी प्रकार 
सगा आगमनम निय निम॑ढ जर निप है ] ॥ ५१ अर 
शिक्य करन सुर्‌ व समेता । सकल शङ ते एक .स 
7 स व 
' -विषः इन्दो, इन्दो देवद ओर जीवातमा ये स एक छ 
सेन रेते ह । ( सयत विषयो भ्ण इनि, इइव ध 
जर इन्दिपेवदारथोका चेतन जीवात प्रद छता ६1 ) इन समका-नो पम 





1 





८६ ॐ रामद्ितानस ₹ 


न 
प्रदम { सौद मिते स स पर रेता है ; यदौ चनादि नकष वयोधा 
जरम ६! ६॥ ' ध व 

छत पर्नसं॑अन्तस राम्‌ । मायाधी प्यानं धुन धामू 
षु स्त्य ह डद साका सष सत्य इव मोह स्या ॥ ४॥ 
ह स्‌ परन्व टै यर शीरम्बन्वी दके अकमक ६ । वे मायके खामी 
शौर व तथा युके दय ३1 दिनम उ>े गोदी स्हाप्ता पाकर जड़ माथा भी 
खय-सी भाष हेती है, ॥ ४ ॥ व ५ 
चे~-रनत सीप सहं शस जिमि था भाद कर वारि! 
जञदूपि दया सिषं काठ सो धम न कद कोऽ रारि ॥ ११७ ॥ 
हैर सोप दीक जौर सक किरम पानी [ विना हर भी] तीहि हेती 
दै) यपि परतीतितीनो ऊच ठर पयारि दव मको फटा नही सकता १२०४ 
{ च-प गि प्ण दरि अभित रट । सदपि ससत्य देत दुख जह ॥ 
५ ओ स्पते सिर कर को श्छ न दरि हल हं ११ 
वी त्‌ दह संघार भगनोनछे साभित रता दै । चपि यह्‌ भक्त्य है तो भी 
दुटोरेताीरिनि त छर केह सि क्व ठे ते विना नो दह हुः 
रमं हदः ॥ ६॥ 
सातु पा जल भ्रम भिदि चा 1 गिरिः सोद्‌ कृरठ रुर ॥ 
अदि अंस्‌ फोठ णपु च पादाः मदि श्ुमानि निगम अपया १ ९ ॥ 
दि पती १ दिनक शमे श प्रकारा भरम मिट गता है पह कमा 
ओीखनायनी ६। भिनन्र जादि ओ भन्ने नही जान ] पाया ] वेदि 
सपनी ददे चुनाव कले ९ मकार (नीचे हिस भका › सया ६1 २ ॥ 
डि पदं पय्‌ घु रसु मा! कर ददु शरम क पिभि चाना ॥ 
न्न रित्‌ सत रस भभौ । मिहु दान एता एड भयौ ॥ ३.॥ 
८4 
४ करलाष्ैःविना कैदीददे (खद 
क ३॥ ५ 
स्न धि प्रस नयन विदु देखा भह भ्म दित पाद रेषा ॥ 
सि सद दि अलौकरिर शरन 1 महिमा खु आई नि षरनी ॥ ४४ 
बि ी धीर ( त ) ॐ सर्च कट है, भना द भदो देदवा रै! 
भैर विन ना च गने टन कूद दै (पयार) 1 38 जइ कनी चमौ 
मकरे दरौ बरौ ६ 8 जलती महिमा कदी नहं ज सकी ॥ ४१ 
, द" दि म मह येद दु जारि पर सति ध्यान 1 
साद दस्य सुत भगत हित कोसख्पति मगषान ॥ ११८ ॥- 
५ मिलकर ओर पि इव प्रर धरर के ट मौर ऊनि नि घ्या भते 
4 मरह नरी भवोनकेलागी मगा भीरमचन्रनर।२१५॥ 
सी म भेह चयो हु कम चल ऊ वतो ॥ 
२ मयु र श्च त्नी 1 प इम उद रा -2,१ ५ 
[प ] जने नाचे दर्थ मदे ह्‌ प्रमी देहर ॐ 
[ पणन वः योव कर देतां (उक करदे), दे प मे 


‰"वारकाण्ड $ ध । 


भरव (० खामी ओर के इदे भीठसकी अनवम ई ॥ १ ॥ 
भिक जासु नाम नर कद ! जनम बनेक रदित शप दही | ; 
घाद भुमिरन जे नर कर । भद रिषि गोपदु वं तर ॥ २ श 
विवर शकर ( पिना इच्छ ) मी भिनफा नाम केनेमे मतु्यकि मेक करभि 
क हर पाप जल जति ई । पिर चो मत्य द्रुं उनश्न सर कते द, ब्रते 
कसासपी [ द्र ] इमु गावे छुरत यने हए गदटदे$े सपान ( मात्‌ विना 
किह परिभ ) पार कर जति ६ ॥ २॥ ४ 
„ शम सो परमातमा भवानी 1 व रम अपि सवित पव की । =! 
भ्त संव भानत उर सारी । भान विराग सकर शुन शाही ॥ ६ ॥ 
[हे परवती ! } वह परमात्म श्रीरामन्रली है| उन्म भरम [देखने तर] 
वर्षण रेष हना भयन्त ह अनुचिह दै । इत प्रक्रका रबदेद ममे छते री 
मतु शन, वैगग्य आदि अः सहूण नए हो जति १ ॥ ३॥ 
भि सिब के मनम भजन पचना । मिटि मै सद कतक प रा ॥ 
मह रुते पद भीहि भतीते । दासन अर॑मावद्य॒ वीती 8 ४॥ 
धिवजीरे भरमनाभकं वर्नोको सुनकर पाव॑तीजीके सव तोक रचना मिट गवी | 
भीताय चरणो उगक परेम ओीर विशवाए शो सया ओर कठि अम्वा 
(निष्का होना समव न दी पष्य कृपना ) ज रहौ ॥ ४ ॥' 
दोन पनि भसु पद कमल गि ओरि पफरुद एनि । 
ोी गिरिजा वचन वर मनद प्रेम रख सानि ॥ ११९ ॥ 
बारा सवामी ( शिवी ) क चरको पकर जर पन कमरे समान्‌ 
शर्य गोकषमर पार्तीजी मानो परेम शानक इद्र कयन दो ॥ ११९ ॥ 
चौ०-सि इरसम घनि गिर दारो । मिय॒ मोर सदातप रौ ॥ 
ह क्षार स संसड हेड । राम ल्म जाति मोदि पर & 9 ॥ 
आपी बनद्रमाकी करणेति खान शद भाणो नकर मेर अशानर्मी श्व 
(शर ) वी धूपका भारी तार मिढ गगा । रे वाढं | मापने भेर सम उने ह्‌ ठिक 
सस भौरापचदरजीका यथां खस मी समे भां गया ॥ १ ॥ 
नाय रपा भब प्य दिपादा । सुखी भयं श्रु धन सादा ॥ 
भव मोदि सोपि विकरे आनी । जद्पि संद जरं नरि धवानी ॥ २ ॥ 
देगा | शापक इमाये मय मेय विषाद जाता र ओर थे चरणके मनुष" 
पै षौ तेप । पयि प्व हन पं लमा ही यूं ओर चनद ट ` 
शो भी जन भ दरक्े भपनी दारै अनकर-॥ २ प नि 
यथम भो पं पू सोद ट्‌ \ बो मो एर परसन्य भसु हट ¶ ॥ 
रामं भह दिममय अधिनी । सथं रदित शव उर धुर फी ॥ ३४ 
हे प्रमी] चदि भाष प पसन १. पे प यौ 
६ द्म (शनः ॥ 
# (व = व्व कब ६॥ १॥ , 
साय भे नतत कदि देद्‌। मोदि सदए एड पः ॥ ॥ 
मा भय सुमि परम विनी । एनकूपा प्र्‌ भलि ११ 
„ किदेनाय | उन्ैने भलष्यका शरोर किस रणते धारण विया! हे भ्र 


] ‰ रमयरतिमानक ₹ 


चना धारण फ ममो ! क एते पमाः रचि । पर्वती यतय प्न 
इक बौर भएमा उनका धष परम देउक्र-- ४ ॥ 
कूदि एर हारारि तथ संकर सन शुजान । 
‡ हु विधि उदि ऽसंसि पुनि दो एपानिधातं ॥१२०८४)॥ 
` व करटको लामाधिकश् दान कृएनिथान सिवनी ने बहरी 
हुए मौर रह ्रकसे पानीही दद कर कि वोह १२० (क) } . , 
सृाहृरायप, पाविता = ` ` 
सहपारययः घरवा विश्रम । 
ठेषु इम कथा भरमानि रागदस्तिमादस विम 1 
~ सुह सु दलानि श्चुता विह भावक गरुद ॥१२०ख) ॥ 
देती निमेड पमदितनवकी स्‌ मदथे ¶ः इनो जते नशय्- 
ने विला $ मैः पन रा यद्वने एना या । १२० ( उ ) ॥ 
सो संपाद उदार ओदि विभि मा भगे क्व । 
खु एम मषतार श्रि प्रम छुद्र अनध ॥१२०१) ॥ 
३ साद्‌ मिः गा, ड मै यय गा | भौ ठम भीएमनरनीरे 
क्र एम दर ओर पवित (पापना ) चि दनो | १२० (ग) ॥ 
युत साम अपार कथा स्प भगनित ममित । 
म नि वि अुलार कत उमा सादर प १२०) 
शरे गुण, ना, कया थैर स्प एमी अपर) भगिते मौर यर्म १ | फिर 
चीव पर| प भरन दमदमा इ यदप इग ॥१९०१)॥ 
चैमं गिरिज पतवर स । गष पद्‌ निगम १ ॥ 
के अकतार हदु बे तेह) एवभिलं एष खन सोहै1\॥ 
,_ पप छ दयक भीति इरन मैः नर8 बरनोन्न 
हकर । दरस भक्त नद स रेव ६, द छत ए रेख 
नीत न पक (अनश्च राण शं चे मैः पेहेभौ हे स्ते६ चितं शिर 
गन धमशा )॥ ६1 . व 
शो भवं द्धि न्‌ रनौ । महं मार शस दुगि उयासौ ॥ 
चषि स सुनि येद ए । प ॥-२॥ 
५ 9 भ न किष, च बीरे धीरामचदर- 
0 1 यि रद, तुन, शरण भगनीपत 
^ २॥ . 0 . 
स गोदी । इष्ठ रट्‌ वर कारन भो, 
थु) नी ज म ३५ 
न 1 $ भरद दषते अद 1 मः 
¢ नमक प हरलेग है नैर नीच क त १ 





उ व छु घरि विषिष् खर । रोहे 
बौर येल मनाय के ह $ चत्र 9 


` # वालकराण्ड.#र ९१ 


मौ, देषता सौर शी कट पते ह तदत वे एृगानिषभ परु मति-मोततक {पिव ] 
शरीर भारणकर सनरन पीदा हरते ई ॥ ४ ॥ 01 
दो-अखुर मारि यापर सर्द रसि, निज शरु सेतु। ^ 
१ ञम्‌ विस्तारि धिसखदं जसं यम अन्म फर देतु ॥ १२१ ॥ 
ˆ : रे अदु मारकः देवता्क स्थापितं करते टै, अपने [ ्ातलप र्दी 
भर्या रका को टै ओर जगतूमे गना निमय पैल ते ई 1 श्रीपमचगलीके 
अनृता यह कारण दे | १२१ ॥ . -, 
परौ*-सोह नस मा भगत भव तरही । इपासि् जन हित तु घरी ॥ 
५९।५९म अनम क दद अनेकः । परम `चिदिन्न शकं तँ एका ॥ १ ॥ 
;॥ उसी यकर गा-कर भक्तजन मवसायरसे तर -अति है । छृपासागर मगवान्‌ 
भक्ते दिते स्थि धरीर धारण करते ई. भीभवदधनीके न्प लेेकेमनक एय १, 
जो एतृ-र-एक बदु निचित ६ ॥ १ ॥ ॥ 
, जनम एक श्ट कष्ट घाती । सादभान सुद सुमति भमानी ॥ 
ह्ारपाछ रि के परिय दोडः । जय मर्‌ विमय जात घव फोड ॥ २ ॥ 
हे नदर शद्वाली भवानी | मै उतरे दो जनमा विलासे वरन ताह 
[९4 हेन । श गय भौर विज दो चोः दासा ६; मगो 
सरं जने ६॥ २॥. 4 
1 किप ' घाप ' ते दुदड मृं तामस भलर देह तिष्ट पाई ॥ , - 
““ कनककतिपु अर हाटकञोदन । जगत बिदित रपति मद मोचन ॥ ५॥ 
उन दोतौ भानि त्राण (घनकदि) ॐ थापते भुतका तामसी शीर प्राया । 
पकम नंग या हिकु भौर दूत ररा । ये देवन के ग॑मो इदान 
बै रि जग्म पष हए ॥ ३॥ =" _ ,. ५ 
विभरं॑प्मर ` षर दिष्याता ¦ धरि वंगा ष्ठु ए मिमत ॥ 
1:4५ हु नरहरि द्र पमि मागा । जने श्राव नस 'मषरा ॥*४ १, 
युद विनय पाने विरात वीर ये इने एल (हिरा) भ ममदः 
ने वराह (सुमती शरोर धार के मागा रं शूरे (किप) का नरि 
स पोल करे धं का भौर भगे भक प्रहदन्न दर य फैला ॥ ४॥ 
"1-.दोभ--मृष निताचर जई ' तेद (= ष्ट ध 
"१५, " ज्मकरन. रावन्‌ सुम जई अग जान ॥ १२२ पः 
3 [ दोनों ] कर 0 तथा देः योदा र॑वणं नौर 
ककमा भ रसवान्‌ बौर वीर रष ह, निर सरा गद नानाह ९२२ 
८ 'न -म्‌ इते भगवाला । तीनि जनम द्विन' बचन भवानां ४ 
` २१, पृक वार्‌ दन्द ॐ दित की । धरेदं सरीर, भगतं जुदगी ५ १ ॥ 
~" "वाने दासा मे जनिपर मी वे (हिरा भैर रिरक्षु ) नयः 
श नी ह कि हाणके चन (दाप ) का परामं सीन जनमे मे भा । भतः प्‌ 
भार उनके कल्याणक छवि भक्ेमी मयबादे किर मेदवार वि { ॥ १ ॥ 
८ 'ऋष्यप अदिति तरो पिति त्ता । दर्थ विकता ॥, 
५, -क-खलप पदि बिधि -धवतारा । चरित - पमि शिष्‌ संरा ॥ ९ ५ 
बं (उव ववा ) क्यप ओए अदिति उनके मता हः नोक 








म्‌ ई रामरिठमाल्ख ‰ 


न 
शद वौरस्णके नते प्रद य । एक रतम इ प्रकर अथ्ता ठे उदन सप 
पिनि सीप ४२) 
षक क्य मुर दलि दतर । समर ऊधर सन सदे हरि ए 
. दुः कोष्ठ संपन अय) दरु सहार सरह न सार ॥ ३॥ 
पक कयत खद देवाभत्ते वटन्दर दैत्ये शौ शर नेमे फरण दुखी 
देए शिवौ उ ख षडा दोर युद्ध विय; पः बः महाब देव मरे गदं 
मत्ाया॥३॥ 
फम्‌ एत शुगाभिय्‌ मारी । हेदि वड ति न सित सुरी ॥ ४ ॥ 
उह दैचरानती ली परम्ठी (नदीश पतिन्त) थी } उदी प्रतापरुद्र 
[ॐ अभय पपु ] ज दिना जेहि दिवी भी उ देखो नी तीत सै ॥४॥ 
ले-छट शरि येऽ ताड नद भु घुर्‌ कारज कीन्ह। 
दष तिष्ट मेड मरत तव श्राप छनोप फरि दीह ॥ १२६॥ 
मुव उत नन मत भक क देकारमोका काप क्वि । लय उस 
जीने यद्‌ भेद नाना, ठव उचने रध शके मामले धप दिवा ॥ १२६ ॥ 
च-प श्राप दरि न भमाा । केनिमि पाठ भगवान ॥ 
स्तो अरर रादन॒भयदच | एन इति रम प्रम प दय ॥ १ ॥ 
लीदयजेक मण्डर गाह इरिने उ ली शन्न प्रागगब दिवा ( खीर 
किया ) { व चस्य ठ करमे रागेण दुमा) न्ति श्रीरामचन युद भारक 
परमपद धिया 1 १ ॥ 
प भ्नम र छर षा। बेदि गि शम भरी नः देश ॥ 
पतति पवता परवा प्सु र] छु सि वौ ककि परेत ॥ ३ ए 
प ५ ध = रे भीएच्दरीनि मद्ये बाणं किया] 
मद्रान इन ! इनोः परु भल्यद चतस यान्न करेमि नाना 
क्णननहै॥रा ध 
न्द पाप की पर यरा ¡ एप पु ते गि भवताद्र ॥ 
पिरि चचह अट हनि दात । भाद्‌ दष मि थवी ॥ १। 
ह 
ओदनी १।.३॥ । ट ४ , क 
त भवन श्प दुनि धनी । का सपव र्पति शाना ~ 
। प्‌ क म मो सत्व भी ॥ ४ ॥ 
चमनं मनम मीयत भावराद्ने उनका ष्या 
अपच ज्रा या } पुग (उदरी ) ¡ यह, र 
मर 2 याड गद दै ]। ४ र ऋ द लि चनि नस्क 
वौ दोले विहि मे च ग्यानी भूद ब कोद 
ल 1) छत होए? १२८७)४ 
१ ्े' मूल । ओीगुनायतीच्व चरे 
चयक थच पपकत तो महे ॥ १२, (5) ) ^ 


# वाछकाण्ड कै ९३ 





` शो-क रम शुन भाध भरदा सादर इन्‌ । 
“ भष भजन रधुनाथ भजु तुख्ली चनि सान सदे ४१२५७) ¶ 
[ गावली कते है ] हे मद्रान { म भ्ीएमचन्रममर योगी कया पडा 
इम णादपते नो । हरौदाऽनौ के ~ मान जोर मदकरो छोडकर आकागमनका 
जा केव खुनाथरीफो भजो ॥ १२४ ( त ) || स 
चीन गुहा एक भति पावनि । यह समीप सुरसी पु्वनि 
.भाध्रम प्रम पुनोत धुषा । देति ददिष मन जति मावा # § ॥ 
दवमास्य परव एफ यदी पवित्र गा थी । उसे समी ्ी दर गङगानी बहती 
पी] ह प्रम प्र सन्द्र आश्रम देखनिषर नारदजके मनको बहुत ही सषवता रगा १॥ 
निरि सैड सरि भिपिन षिमागा । मड रमापति पद अराग ॥ 
सुभिश्त रिष्ट धप गति वाधी । सव बिमक मन रमि समाधी ॥ २ ॥ 
परवत, नदी ओर बनके [ न्दर } विमागेको देखकर नारदजीकी रमन्त 
वागे सरणेमे्रेम क्ष यया । मगयारका सरण कते उन ( नारद दुनि ) कै 
शापकी ( भो शाप उन द प्रवापने दिया था भौर शिक काएण्‌ ३ एक खनपर 
नी उह सकते ये ) मति रूं गवी योर मने लाभादि ठी मिगड हेग उनकी 
स्मरारि गयी ॥२॥ 
श्नि गवि. देखि सुरेस डराना । क्ञामदि कि दीन सनमाल ॥ 
सिति ष्टा बाहु गभ हेत्‌ । वेउ पि दिये नङ्वाकेत्‌.॥ ३ ॥ 
गार रिक [ यह रोमी ] सिति, देलक दमन इतर डर गया } उने 
कोम लाकर उका आदरकार कयां [ भौर कहा पि ] मेरे [ हिते ] च्वि 
हव शपते स्ायधिठ [नारदी समाधि भद्र फेको ] नो । [ह छर ] 
भनप्वन फगमदेव मनम परनन हषर चला ॥ २ ॥ - 
सुनासीर मभ मँ धसि ऋता । चइत वेवरिषि मम धुर शासा. 
जै फामी रेप जग आ । किष फक दष सहि गष ॥ ४॥ 
एके मनम यह डर दुभा क देवष माद भेद दौ ( भमरावती ) का निवा 
{ग्य } चा दै । जग कामी भौर मी हे र,१ ष्ट कोप तरद 
ससे इरत दै ॥४॥ ॥ 
दो०--सूख हा ,ऊ भाग खट खान निरस गरन । 
छीनि ठे जनि जान ज़ तिमि पुरपतिदि न्‌ खज ॥ १२५॥ 
जै मूलं कुरा एए देलक यी हट्टे मग नौर ह ूरं.यह फ 
. मी दत व रीन न 3, वव ही शको [ दनी राय छीन ठम 
फे शेते } लन नही भाषी ॥ १२५॥ . प 
शो जा्रमहि मदम अव गयङ \ नि मारयो धसंड निरय ॥ 
इमि विविध निदप बडु । नष्टि कोष शुदं शमा ४ १ ॥ 
जब कामदेव र आभ गया, तब उने सपनी भावि वरहा बटन 
उलन्न किमा । ठर इृ्ोपर रंगनिरी श्र खि येः उनभर 
गी सौर भौर शुबार कले को ॥ १ ॥ ' 
हो सुराबनि शिवि बयार । काम ददद भदाघनिहाी 
सादिक सुमारे नना । सक जमर कर भरना ५ २ ॥ 


छ” ~ ~~ 


#) 
[] ॐ एचदिमानप ३ ८ 
4 


गते कस ममं (तक मदमे कषे? 
छ व ६। प नप सा लन कमन 
१२] र 
पित पुः वर ध र कर परप ॥।६५ 
वैष ब म; एक केपि एति वनन {21 
पशष साती हरे ययते महम) त्न 
मे द प्रेष गते ८ द्मे रशन सूतपसा एल 
बौर नि ते ऋ भरते गताय पि \ | 
इल $ द नि र न् । दि षं तेद पेश प 1) 
विशम्‌ व्‌ । पका सापि च 
श भगी रो ५ पतः बदा १ सौ तवे ौ 
शरद भति [गाते] मे रभव | ससी पसर ने देप 
फा, उल दीय (श्र) केप लद ।॥४॥ , = 1५ 
पेष जाय फीत पति रति शरि म्द! )1 # 
ग एति रस लवि छ प्त कि ¶ {२९0 
पमन शते सदमे सुव भोः ए म तामि 
11] ॥९९९॥ 
रैर १ भस्‌ षः । एर पिद सम भयं ॥ 
क सव चः फु श । शप्र त ल प्ल रां ॥1१ 
न 11 1. 
ष्ठलमन। ते प हि क वो मौ भ पाह फ 
भां भन नैः ६ (॥ ध 
द व सतति पन प्‌ स भं 
< 
ग्न उक ती ५५८ 
(१५५ धप म इव 1 
1 ४ 


प्‌ फे विव पर । चवर शति भग ही } 
र स छ ष्य । भि ररि शो पि ॥६॥ 
1. 
॥ परि सिरे नर 
॥ 11 


[1 
( क चनन १ 


(11 
श्छ ग इ ए चा श । १४६, 


# वोढकाष्ड ॥ 


^ ` यदि दवन यई दित दिना द, प मार्च नी । द 
भज 1 व्‌ कोद (माया ) एने [इक इच्छा बद बलवान्‌ ६ ¶ १२० - 
गरं ` की चह सोह र । इर भनया भस च रद 
£ ' सुं शथे. सुनि भने नदिं माए । चप दिरचि के श सिषाए्‌॥ १ ४ 
1". शरीरम ती छना जाह हत हा रेल कोन नो उतपि 
एव] र्मी कवन गासनीके मरो अच्छ महो; तव द मेत 
हणो च तिव | १ ॥ इः र 
एक: श्‌ करें कर दीना । गावत हरि सुन या मैवा ॥ 
` धरिष  ' गो, ५ 
" ग वार गवि पण सुतिनाय नारदी थत ददर वीणा ल 
त य हीरो ये थ्‌ दप मस्य (मूर यत ) 
उ्तीगिबाऽ गबा नारायण एते ॥९१॥ =` 
षि 1. ` सगत । कै जासन शिपि हमत ॥ - 
` " दे मिहि `स रथा हत वव इनि प्रमा ॥ १॥ 
< मिप मान्‌ कर दे यानन ठे ड भौर शपि ( नान ) 
१५. वड रे । दपर सामी माषम्‌ ण वमे ए | जन 
विप दयो रौ ॥ १॥ । 
12 
 “ भति "पष भाया । ष्टिम मौह भस ङ भग 
पम्‌ प सनस 9 नती प्र 
घर चलि सममा ऋ इरा । भीक गया पदी मकर । नयत 
देष कौन षमा नवे भिः = कर ३॥ ४॥ / 
ध पू मद्‌ मान ॥ २८॥ 
1.1.101 
तू मेद, खम, मद शर यमान पट चत {षि भे ४ 
(म 
‹ \ भदत मण एत भविीर । एहि क छ भनोग. फैर ॥ १ ॥ 
< 1३ गुनि इन, मे तो उल गने मि. सनम न 
है।-आाप ५१1 ससर लौर षदे पदि टै मय भ कते र 
श्त तादे! छ ध 
मार भ अनाना । छपा इरि सक भवा ¶, ^ 
सहतनिि मग -दी, विच । ठ डेव म क 
नारद्ीने कदा-भगवन्‌ ! दह व # 1 ८ 
स 
1.11 
रिं तों कति सव टीव भद११॥ 








९६ > सुप्रर्रितमासस * 


स 
ख इर चसा पेष कोक देका हि कला छा परग १1 
शरद्‌ हो बह उपा करेगा नषे निकष क्वाण मोर माछेर के ॥ ३ ॥ 
य ना एष सिर सा । ते पे समिति भिदं ॥ 
शपति सिर सामा पब पर । सुनहु छिन करनी तेष केरी # ४॥ 
तद रदी भगवामूढे चालये हिर नवाम्‌ चे । उनम हदयं अमिन 
जर मौ क गमा} ठन ल्धपटि भगवामूने यपौ मगो परित या } खम 
उर्वी कठिन कनी दनो ॥ ४॥ 
दे०-विर्येड मभ शट नमर तेष सत जोजन विस्तार । 
श्रीनिवास एर तं अधिक रचना दिषिध प्रकार ॥ १२९ ॥ 
उह ( रमाया १ ने रतम सौ योन ( चार तो को8 ) ऋ क़ नगर रवा | 
8 मी भोति मौ सवना छ्ीनिवाड मवान्‌ विषु नर ( वकु ) पे 
भी अविक सुन्दर यी ॥ १२९ ॥ 
चौरहि नभर शद नर नारौ । लु दु ममम रति त्लुधारी ४ 
वेट एर दम सीरनिभि तवा ! मनि हय मध सेम समानां | १ ॥ 
उष नगरम रषे इनदर नसमा वषत थे मान युत से मदे ओर [ उची 
स ] रति ही मनुष्य र भासय पि हए हे | उत नगते शीलनिधि नाम्न रजा 
सा धा, मिवे यह अर्य शेदे, हणी मोर रेने एमूह ( इतिय) थे ॥ ९ ॥ 
धत सुरे खम भिमद दिस । रूप्‌ ठे शरु भोति निवासा ॥ 
पिष्ठमो्ी ताद मारी। भी विगर शु स्यु निहारी ५२॥ 
उषम ैमद जीए विर लै इरे ख्मान या | षट सप, देन भढ शौर 
नीदितर पर्‌ या उसे मिश्रो यापर प्क [पेसी सपदी ] कनां यी, 
निए सपण देखकर सीय मौ मोदित हे भर्ये ॥ २ ॥ 
ख़ 1रिमिया उव गुर खाद! सोमा हाड मि शाद वसात ॥ 
क दरण सो फा । भाएु तं भगनित्‌ मदिपरस 1 ६१ 
६ स्व गगोकी खानि भगवारूसी मया ह वी ¦ उप गोमा कन कैतेध्नि 
स सका है! पह रच्छूरौ सपर ना यावी की) इते ब सपिद राज 
अगि हए पे॥ १ ॥ 
मि फुर नगर वट शय ।पुरविनह्‌ एव पू भय 
छ सव चदि भूष रहं आए 1 इरि पूवा भृ शनि दैप्‌ ॥ ४ ४ 
सि मनि मलौ उद नग यवे शौर मगरमारियोरे उदनि ए ह 


शा । क नमाः इनङ्‌ म रान र्मे जवे { यजने पूज रे एमिस 
[ भारनपर ] वैढयः 1 ४ ॥ 


दो-यानि देणार णहि भूप्ि रजङ्मारि । 
साथ शुष दोष यँ 
॥ शत दोप ख पट ॐ दर विचारि } १२० ॥ 


लकरनारदनीमो दि्माया [ ओर पडा 9-- 
दनाय ! भाप अपे इदमे विवर स्ख सः मदो क्वि 9 १३०॥ । 
णद स्म शनि विरति भिारी । न्धी भ्‌ गि रहे निष्ठरी ॥ 


एच्छन सासु पदेमि सुडते 1 ददद इष वद मग षद ॥ १ ॥ 


# वाखकाण्ड # र 


, उस श्पको देखकर. सनि वैराग्य भू , गये, जीर यदी देक उन्न 
ओर रैवते ही रह गये । उसे उषण देखकर पुनि उने जापको भी मू गदे नौर्‌ 
इदमे इषित ह पर परकर्म उन छर्णोको नहं कहा ॥ १ ॥ 

जो पि बरद भमर सोद शई । समसपृमि ते चीत न दं ॥ 

`सेविं सकढ चराचर तादी | बरद सीठनिधि कन्या जादी 1 २ ॥ 

[ शशरगोको सोचकर वे मनम कटने ठे कि] जो -ए्ते व्यदेग, क़ भग 
छे चायगा शौर रणम कों उपे जीत न सकेगा | यष शीछनिभिकी कन्या मिठको 
प्रणी; एव चर-भन्वर जीय उसकी सेवा करेगे | २ ॥ 

एच्छन सब विचारि उर रासे । कचुक बना धूप सन मपे ॥ 

सुता सुरुच्छन करि वृष पादी । नदं चरे सोच भन माही 1 ६॥ 

खव लकषणोको परिचारक यमिने यने दयम रख व्यि ओर राजति कड 
[पनी शोर बनाकर ह दिये । राजते लकी दुर्ग फटकर नारदी च दिये | पर 
नकर मने यह चिन्ता थी क्रि--॥ ३॥ 

करौ लाह सोद जवन बिचार । जेहि परार मोटि धरै मारौ ॥ 

जप तप कं न दोह तेष काल । दे विधि भिक कवत भिधि धारा ॥ ४ ॥ 

लाकर लोच-भिचारकर वही उपाय करं जिपसे वह कन्या सुले श वै । दए 
य लप-तपते सो इछ ह नहीं रका | है विषाता ! यदे यह इत्या कि तद 
(५ खोमा हव विला 

॥ अवसर क प्रम सेमा रूप ॥ 

ज्ञो विटोकि {- ठव मेढ ज्यमाल ॥ १६१ ॥ 
इत सपय तो गदी मारी शोभा ओर मिद्य ( इन्दर ) स्म चाम, निषे 
देकर यजकुमार म्प रश्च जाय नौर तम यमा [ भरे ञं | अल दे ॥१६६॥ 
चौ०-दरिः सन मानौ सदर । होदि षदं र्ठ ति भां ॥ 
मोर एरि सम नह कोड । भि अवसः सव सोद धोक ॥ १ ॥ 

[ प काम फर ] भगवान्‌ इन्दवा मोग; पर मा { उनके पाए जिम 
तो बहु देर हे भयमी । छ भीर मन भेर हद्‌ भी मोरंग, इर्य 
एष समय वे ही मेरे सहायक ह ॥ १॥ ५ 

बहुरिधि विनय कोन्ह ददि कला । ्गटेड भु नोदक इला 
स 

उ मय नारदनीने भगबाच्की बहुत 
म ह] कदो । सामो इल नाद्र मेन कदे ग भीर 
मनम बे सी र्षि हए फ़ अद तो कम बन दी गया ॥ २ ॥ 

अति आरति कष कथा नाई । करट हृ करि हह ष्टाई ॥ 
आषन रूपं॒देदु ग्घ जोष \ न संति सपव नोक १ 

नारदम बहुत आतं (दीन ) रेकः सथ इया क्‌ री (नग (४ 
ष का कीले मौर इमा ढे दि वहाय वतये। दे ममो ! भाप अना स्य 
ये दीभिवे; ओौर किरी प्रकार म रब ( राजकन्या ) कलो नही पा सक्ता ॥ ३ | 

वेदि बिधि नाय ह्‌ दिव-मोर । कं सो वेगि दत भ होरा ॥ र 
नि भया बढ दसि विला । सथं सि वे दीनद्याका ॥ ° ॥ 


श० ० ७-- 


। ; कैः रपखरतमावख नै 


~ 
मथ | निह तध मेय दिव शेः चप कठ श वीमि । पै आपा दढ 
र अतौ माक विदा वलदेड दोना भाभरनन-6 मनर यढ ॥ ४ ॥ 
दोजेषि विधि शेहि परपर हित नारद छ त्हार । 
सोम फ त आल टु वचन न सूषा हमार ॥ १३९॥ 
ह नारदली | नो, मठ प्रकार आपा प दित होगा, एम वही कर; एषा 
इ न मार क्चन मतय न ददा ॥ १३२ ॥ 
सौ» भा स्म व्यक रोग । चद्‌ २ दह सुनहु इनि भोगी ॥ 
पहि दिषि दित तमार त ठस । हि भस दहित प्रथु भवः ॥ १ ॥ 
हि भेगी एति | सनये रोगस्य सेमी पध्ये तो चे नदीदेत । उदी 
प्रकार रने गी द्रा हित कृलेकी डान यी ै। देल ककर मगान्‌ जनतन हे गये १ 
आवया भिद भु सुनि मूढा । घी ना इरि शिर निग ॥ 
शवने ख तष्ट रिषि जहो खरं मूमि चनद ॥२॥ ~“ 
[ मगगनूी ] मामा करीपूत ष मनि ते मदे ४ फिवे मगक्षारी अमूर्‌ 
(सट) ाणीको भी न समह फे | पिरव नारदी ठव ये नहो खयो 
भृति कलभ गयौ थी ॥२॥ 
निम निस जास पडे शन घट वनाव करि पठित समा ॥ 
नि मन दरष ङ्य भि मोर । भोहि तथि जानि बिन भोर ॥ ३४ 
एजाोग शूष सयमत ठमानहित जफो-उपने आवनप्र भरे ये | घगि 
( भाद ) मन्मन प्रहे दे ये कि मेरा हम बहा न्दर है, से छोड़ कन्था 
भूष भी वेको न कगौ ॥ ३॥ 
भनि दित कारन छ्पामिधाना । दन्द ऊुसुप न भाट भताना ॥ 
सो चरित्र शि टं = पादः ! नारदं जानि स्ह सिर भावा ॥ ४१ 
शयानिधान भमकदरुनके कत्यणके ल्थि उने कस्स बना दिया कि 
जिसका णन नरो सकत; प्र यह चरित कों भी न बान एका । एषे उन नारद 
दी मानकर ष र 1४1 
दोण शह स्ह गमे ते ज्व सव भे। 
„ बिभ्रदेष देखत किह परम श्वत तेर ॥ १६६ ॥ 
वो दो दिवी गण भौ ये । वे दव भेद जानते थे ओर राणक मेव नासर 
सारी हील देलते कि ये वे मौ शे मोनी पे ॥ १६२१ ॥ 
चज मस दे यि चं 1 इवे स्र अमिति अभि 
न व षोड यि इद न फोर ॥ 41 
अपनं हृदयम स्पकर वद्म ठकः त्रि खमाज ( पक्ति) मँ 
अकर ये य म दोग म मौ बह ठ गये । जद 
छदौ 1. 9 । जाक्षणक वेष हेनेके कारण 
५ वा । नीड दनि इरि पुरां ॥ 
१ भ सी अनिषितेसो १९५ 
४ वचन्‌ -भगवानमे इन्नो भग्र 
शन्त शौ है । नभ गोमा देलक रनछुपरी रीष 4 
(कामः ) जानक ह्व सुह करे देगी ॥ २॥ ^ 


# चाठकाण्डं # ९९ 
व < 
निहि मोष मन हाथ परा । हसि संच गन अति चु पाए ॥ 

जदि घनं सुनि गदेपटि वानी । सुयुद्ि न परह घु भ्म सानी ॥ ४1 
मारद सुनिको मोह हो रघ था वर्यफि उनस्न मन दूरत शय (मायके वच ) 
मै था] शिवी मण भुव प्रस्त ोकर दघ रटे थे । यचपि सुनि उनकी भरपटी वते 
शुन टे भे, पर हदि प्रमे नी हुं होनेके कारण बे वातं उनकी समह नदी भरी 
यी ( उनकी बार्तको वे अपनी प्रशं खम रहे थे ) ॥३॥ 
कु न रु सो चरित वितेषा ¦ सौ सरूप ॒तृपकन्यौः दैखा ॥ 
मकंट वदन भ्र देशे | देलत हृदरयै कोच ना सेहो ॥४॥ 
इए विशेष रजय ओर किनि मष जाना, कैव राजकन्यने [ नारदभीक | 
य्‌ स्प देखा ] उक्षा वंदरका-णा पुह मौर मयेकर शरीर देखते शै इन्धाके इदो 
शीष उस्र हे गया ॥ ४॥ 
दोघं संग के इमैरि तव चलि जनु याज्मराख ! 
देखत क्षर महीप खव फर सरो जयमाट ॥ १३४ ॥ 
त रज्ङुमापी सखियोंको साध ठेकर इय तरह चठी भानो यज्दंिनी च रही 
४ सपने फमल-मैठे थमि लयमाल चिदे सब रानाभशषो देती हदं भूरने 
॥ ९३४ ॥ 
ओौण-जेदि विपि बैड मारव खी सो दिदि तेह न लोकी धूल ५ 
पि भि मि रकस भङुखहीं। देखि दसा र गन सद्ुरादी ॥ १ ॥ 
जिद भोर नारदी [ रूपके भरव] पे वैठे थे, उठ ओर उरते भूकर भी 
नी तका । नारद मुनि वारंवार उ्षकते लौर छरपयते ई । उनकी दण देखकर 
सभी गण मुके है ॥ १ ॥ 
धरि पृपलु तै गड कृपरा । भेरि इरि मेकेड जमाल ॥ 
कषमि ® ने रष्छिनिदासा । तरपखमान सव वड निरा ॥२ प 
काष्ठ भगवान्‌ मी राजाका शरीर धारणक बहौ जा परहुवे । राजङुमारीने 
पत कर उनके गन्म जममाखा दार दी ] छदमीनिवाए मगान्‌ एलिम ते 
गये । सारी राखम्ली निराश हो मयी ॥ ९॥ 
सनि भति विक मोह मति नौ! मनि पिरि मद इटि बदु गोह ॥ 
सथ हर गन वोके सुसु । निज सुप युर बिकोकट जद ॥ ६॥ 
भोम कारण शुनि दधि नष हे गवी थी, इते वे [ रच्छुमारीमो गयी 
देख ] शत दी कर षे गये । मानो 38 दकए भणि मिर यशो | ठवशिवनी- 
कै मरभम गुसकराफर जाकर दमे अपना ह तो देके | ३ ॥ 
भल कहि दोढ अले शरवे मारी 1 बम दीख जनि वारि निष्ारी ॥ 
चे विषोकि कोच शति वाद 1 विनडष्ि नल 9४ 
रे ऋक ३ दोन बहुत ममतं शकर गे । निने नडे शक्कर अपना 
देवा । अपना ल्य ध कष बहुत बद्‌ यया । उन्न शिवनीहे ऽन 
॥ टर शप दिवा--॥ ४॥ अ. 
°--होहु निसाचर्‌ जाई क 
ह स्र हेड सुनि कोड ॥ १६५ ॥ 


1 # यसचरिवमनस # 


--------------- 
ह दोन कौ मौर पापी जनः र्ठ हो जामो । दमने मारी लीक, 
उन्न फल चक्वो । छर फिर ती सुवकी दशी करना ॥ १३५ ॥ 
चप -युमि नर दीद स्प निद शवः! तदपि इवं संतेष न भावा ॥ = 
~ शष्ठ अपर ्ोए मन मा ¦ सपदि चे कमछापतति पा ॥ १ ॥ ; 
मुने पिर डमे देखा, तो उन्हे अपा ( अष्टौ ) रूप प्रात हो गया; त 
मीन नते नही दभा । उन ठ एकक दे थे बौर मनं कोभ [ भरा } या। 
तुरत द दे मगयास्‌ कणपतिभे पास च्छे ॥ १ ॥ 
दह ्ाप छि मरिद जाद । डगत मरि उपहास कराई ॥ 
नीच ¶4 मिठे दुजारी | संम रमा सोद राजकुमारी ॥२॥ 
[ मलम सेचते बते ये-] लाङ्र या दो शाप दशा ा प्राण दे दगा । उचने 
भगतं पी हषी करी । द्व शु मगवान्‌ रे उन वीच रास्तमं शी पिर गये । 
मा तद्मीमी ओर वही एज्छुमारी यीं ॥ २ ॥ 
सोके मदर बचन सुरसां । सुनि कं चरे विक की नाई ॥ 
सुनत खदन उपशः अति द्भोधा । साया वस न रहा मद बोधा \५३॥ 
देवता खामी मगवानते मीठी वाणीस फा -दे मुनि । व्याकुली वरह 
को चे) प श्रथ छने हौ नारदकन क कोष भवा) मायके वकषीमूत रोने 
कारण मनम चेत नही रहा ॥ १॥ ५ 
प्र संपा सकु नरि दे! पुम्र रिषः कपट निसेषी ५ 
मधत सष्ठ गरि वौरायहु । सुरन पररि बिष पान करयहू ॥ ४॥ 
[निने का] इम दूसरोकषी सम्पदा नही देख सकते, द्रे ईषया गौर 
कषर बहुत दे! समुद्र मयते सपय मने शिवीको वावा वना दिया चीर देवता 
मेस ङे उन रिषाम कराया ॥ ४ ॥ 
दो*-मषुर य दिष संरूरहि यापु र्मा मनि चार । 
सारय खाघक्‌ छुटि तुम्द सदा कपट ग्वार ॥ १३६॥ 
भटक मदिरा सौर धिनक पिष देकर दमने सथं सकष शौर दुनद्र 
[ सम ] मि टे री । हुम यदे भोहेना नौर मत्य शे । सदा कपा न्क 
कत दो 1 १३६ ॥ € 
०-परम स्व्र न सिरर कोई । मवई सनि करहु एुम्ड सो ॥ 
भट मेद मंदे भक रद्‌ । मिमय रय न दिये कहु ध्र ॥ \॥ 
ठम पर सतनतशषे, सिरर तो कोई है नही, इते स्म नो मनको भावा है, 
[ खंष्छग्दतचे ] दही ते ष । के इरा ओर दुन मला कर देते हे । दयते 
शविषाद कुड भी न उत १ ॥ 
यच दरणि परिवह ब काहू । अतति अर्क भन सवा उद्र ॥ 
रम सुमा कष्ट वे याध । अने ठनि हदि न का साधा ॥९॥ 
 _ सपन ठयक परक रवे हे, चर अतयत निडर हो यथे कषे; इत 
{ ठगनेके कमम ] 


£ मनम खदा उत्वाई स्वा है ! श॒म-यदयुभ कम॑ ठं बाधा नही 
ते । भगव ठको कितीमे ठीक निवा था ॥ २॥ । 


से मन भव वायन न्ह । परबहुगे फक शनाषन कीन ॥ 
“ देह मोहि अदन घरि देस! सोह भद पप मम प ५६॥ 







न अकी हतर अच्छे भर वैन दिया द ( र चरदसेप्ादमदे ॐकबानी 
वी हे )] अतः अपने किमक पठ अवदय पाजोगे १. शरीरो धारण कर मने 
शे गा है, ठम मी वही शरीर धारण करो, यह भरा मिहे || ३ ॥ 

कपि धातत हह कन्द मारी 1 करिह शीस, सरु एवह 1, "7४ 

भस अपकर रनद दुह मारी । नारि वरह हे हब दुलारी ए _.: 

त मने इमारा ल्म बन्द्रका-सा षनां दिया था, इते न्दर ही तुम्ही स्या 

करेगे | [ मै भिर नीको शराहता था उसे मेस वियोग कराकर † ठमने मेद बदरा महि 
किया रै) एसे पुग भौ खीके वियोगसे दुखी हेग ॥ ४ ॥ 

दो-्रप सीस धरि हरषि दिर भु बहु भिनत कोौन्दि । 

निज -माया कै प्रबख्ता रषि छयानिभि लीम्हि ॥ १६७ ॥ 
शापो सिरपर चदाकर) दयम हित हते हुए प्रसते नारदे बहुत बरिनती 
की सौर एयानिषाने भगवानूने अपनी माया परमर्ता खीच ही ॥ १२७ ॥ 
शवौण-लम हरि माया दूरि निवारी । मं तह रम! न रानछुपरारी ॥ 
थ धुनि अति खभीत एरि चरनः। गे पा प्रतवारति ` मा ॥ १ ॥ 

" शष्र मगवान्लो अपनी मायाफो हटा ष्वा, तव बह न सपमी ही र गवी न 
सही । तव मिते अत्यन्त मयीव होकर भीहरक चरण पक तिथे ओौए 
शर--रे शरणागते दुःलौको हरन । मेरी रका कीन्ति ॥ १॥ 

भूपा होड मम क्षप पाडा । मम इष्डा कट दीनद्या्ा ॥ 
षै दुषैचन कदे च्रे । षद सुभि पप भिरि किमि मेरे ॥ ९॥ 

५ कृषा ] मेरा शाप मिथ्या हे चाय । उतर दीन दया क्रमेय मगवानने 
कावि ह स्व भेरी ही इच्छा [ते हमा ] दै 1 सन्नि कश-ैने भापकरो अनेक 
सो वचन कदे ह । भर पाप कते मिग १॥ २॥ । 

जप्‌ चद्‌ संकर सव (31 श 
छोड नदि सिव मान भिय मोरे ! अखि ठं जनु 
 मानूने करा--] जाकर र कृप 8 (न 
न (य होगी । शमीम एमा स कोय नी १ इष 4 र भूकर 
न छोड्ना ॥ १॥ 2 + 
षेद प्र छपा त इरि ररी । क्ष व दुनि मपसि 
प उर धरि 1 ॥ न थः ( (१५ 
न ! रि (धिव ) सप ग नश 1. 
दयत देषा निशव करे जाकर ए्नीपर विचः मेसा इन्र निक 
॥५४॥ न व । 
* तवं 

1 

(\ हादस देक } ठव परथ अशठ 
शये 078 अ करे हर ( जदोष ) 
॥ ॥ १३८ १ ला ह तदो ॥ 

४ सिप्‌ मरत शव हु ॥ ११ 












१० ॐ रामखरितयराव्त # 


"__ __--------~- 
म रन ज पुमे मदि ओर मनम बहूव मल होकर 
सि हरदा ठ ३ ममत मवे द्वक मे ऽ मापे र उनके 
पकर दीन कने मेके १} 
ह गन ह न पदर दमिसवा । वड भरे कीन फ पथा प 
शप भसु पु इका वरद दीपदः 1 २॥ 
द मिरय । इ ब्रामण य ई, धिव स ६1 हमने यक्ष यपराष निप) 
किक १5 दन पा व | ६ जषा मव दाप दूर केकी हषा इति । दीनपर 
द्‌ करेवा नावन कडा-॥ ९॥ 
पिरच सा शह ठ दोर ैनव पिठ हेव प शो" 
शुभकरः तव तदिा।धरिि पिष मुन उद परिनि ॥ ६॥ 
म देन जक रम चमो हे महत्‌ देय तेन जोर करभ प्ति ते । 
दुम भप पमभेरि पठे जब ररे विलो जीत छोय, तव भगमेन्‌ णु मतु 
ध्रैर पारम कगे] ३॥ 
पभ मरत इरि एष दुरा । हे सुत न पुति घंसारा ॥ 
छे गढ भुवि ६ तिर सा मषु निसवर॒काठि पां ॥ ४ ॥ 
को परीदि यते सशरी भु शेगी, निरे दम एकत पे जने जर 
शि समं अय भह गे । ध दोत पिके चरम हि नाक चे मौर समब 
पक राई दुर ॥ ४ ॥ 
शोप $प पहि देतु प्रभु छीन सुश्च अवतार | 
शुर र्न सञ्जत छव्‌ हरि खय शुदि भार॥ १३९ ॥ 
देवतामीपरे भत कसार, एको शु देनेवाले ओर वीक भार एण 
रनवे मनने एक कर्म दलौ कार्ष ्ुष्यकर भवदार छवा धा ॥ १३९ ॥ 
चौण-पि धिष नम करम हरि > । घुर सुतर ॒चिध्ति धेर ४ 
फरप करप प्रति भसु अदद । शसं परित नानाविभि करटौ । १ ॥ 
छि मार मवा भगे नदर पसम मौर लोकि जन मौर कर 
1 परमेक को जग-जद गवात्‌ अनतार छठे दै र नाना कारी पदर 
गीर कटे ई, ॥ १॥ 
प्ये तथ श्या सुनीरण्ट र । परम ' पवीठ प्रवेध ॒षनाद ॥ 
विषिथ श्व शूप य्ते । ऋ ग पुनि भाद सपने ॥ ६ ॥ 
4 
भे अलुम क्णनम क्वाह र समता 
(व) भव मारने कते ॥२॥ ॥ 
रि अत इरकिया अनत । परि नद बविभि सव संता ॥ 
स्भर्् के चर्व चु । क्छ लोटि नि जदि न एए ॥ ६४ 
रीर अननत ६ ( उन के पर नह पर उक्ल ) बर उन कथा म 


यन्त ह; एथ सव ओग उपे हत प्रदे कदरे द भीरा ए 
रि करोड कोम मी गवे मर जा उवते ॥ ३॥ त 


ह मरंय मै कहा भवानी माया मोष युनि स्याली 
भु शवदये अनत 11 


कै वाख्काण्ड > षदे 


~~ 
[शिवी कहे है कि ] ह पार्वती! मे यह वतते एवि इत परमको का 
क शनी गुनि भी भगवानकी माये मो हो जाते दै पसु करकी (वैसम्य ) ई 
बौर शरणागतम धित कलेव द । वे धवा करल बहत दकम मौर च दुतम 
लेशे ई ॥ *॥ 
से*~-कुर नर सुनि कोड ना जदि न मोद सायः अरवल 
अस विचारि मन माहि मनि मभाया पतिहि ॥ १४० ॥ 
देवाः मनुष्य भैर पुनिम रेड कोई नकी ई भति मवा हार्‌ कती 
मवा मोहि न परः दे | मनम रेषु वधार उत महामाये खामी (प्रक ) 
शीमरवानूा भजन कला चाधि | १४० ॥ 
चौण-अपर देह सुत सेच । के विचि रुषा निलयते ॥ 
जेषि कारन अज सुत भस्मा। ब्रह्न गवर श््शषुर भूपा ॥ $ ॥ 
द पिदिरजङमारी । अम्‌ मवाप अवतारा द दूषय शररणं एनो-- 
उसी विविभर कया धि्ार कके का द जिह कारणसे जन्मरदित, निदंग ओर 
स्परकत ( भवयत स्थिदानन्दषनं ) बर भयोध्यापुतीके राजा इए !} १ ॥ 
जो प्रस विपिभ फिर परह देल । च समेतं धरं- उभिषेषा ॥ 
जाद रिति मवे मानी ¦ सी सरीर॑र्ि॒वौरानी ॥ २॥ 
मिन प्रमु भीरमवनरनीको दमने मारं समगौ खथ छनि फसा वेष 
आरण के वमे फिरते देखा था, भौर टै मवानी ¡ निने चरित्र देखकर सतौत 
शीय म देतो बाकी एे गमी यौ ि--॥ २॥ 
अनह न छया भिरपि इरी । तासु चरित दु भरम स्न री ॥ 
क कीनि६ ओ तेहि मतरा । घो सव किदं मति भुरा ॥ १.४ 
अ भौ व्र उर बावरेषनकी छा नहीं मदी, उन्मि भरास्पी रोगे 
, पणकएेवषि रिषो । उभा मगपभते नोनो गी की, ए मै मनी 
इषे भतृणर धमे गा ॥ २॥ 
भर्ान सुनि संर धानी | घुषि स्परेम उमा यसाम ॥ 
गे शरे कणौ हषे । सो भवार भमट॒ नेषि हैद्‌॥४॥ 
श्तस्यनीम क--े भरदा | शं वन इनः परवती एुचाकूर 
वदित एरका पिर पृषत पिषजी जित कारणठे भगवानकां बह मभार हभ 
षा, उसा प्न कले क्रो ॥ ४! 
दोसो र दुमद खन फदर सषु, सुदु सुतीस मन खाइ । 
शम कथा कछिमल हरनि मंगल कनि सुदा ॥ १४१ ॥ 
र एनीसमसडात। वहस्य मन छग इनो । भौमचनरनकी 
का दस्र प इतषासी ऋतयाण करेवा र बड़ी इनदर ६ ॥ १४९ ॥ 
चो०-सांसू महु भर संल । तिन ठं सै नर॒ भना ४ 
दंपति भरम्‌ आचपन बीका । भ शव श्रुति भि ड छक ॥ १ ॥ 
ख्धुभनु मौर [ उनकी पवौ ] तरमा, मिते मतुोकी थह मकुमम 
स, न दोनी पतिर धम सोर माकर हव शच ये | मान पेद 
निनी मवद गन कए ट | १॥ 


ष्य ® रामघरितिमासख £ 





ध्य ररागिणद्‌ शु तालु) रुद एरिभ्गह भयड सुत जाद ॥ 
श्रु त नाम पियत वही ् परव भरसंसद्िं जी ॥२॥ 
राज उत्तनणद उने पु ये, किमे पु [परखिद } रिम भुमी हप । 
उत (ती) दयेन समभियबठया, तिद रोादेद नौर राग कते ६ ।२॥ 
देहि युनि तप्ठु॒इमारी । ्ो सुनि च्द॑म ई किव नैरी 1 
शादिदेव भ्रु दीनारः । चठर धरेढ जेहि एषि इपाछा 1 ३१ 
प देन्ति उनकी क्या यी जो कर्दम शुनक प्याय पी दुई बौ विदन 
आतः दर्िपर इमनेवलि समव वदपष्टमगयन्‌ षिच स्मै गरण क्वि 
सोद्य सात लिन्द गर दाना} त विशार 4 वा प्र ह 
के मदु रज कनद बहुदा । परु मायसु सद विधि प्रनिपाला 1 9 
तका विचार करे अध्यय निपुण जिन ( शपि ) मगत्ानले संयाता 
महर बर्न रियः उन ( सपय) मते बहव स्मय रा या भौर 
सव प्रा भगवानीश [ सम श्की मर्यादा ] क पाठन्‌ किया ॥ ४ | 
सेनक, त विषय वियग भवन वदत भा चौयपन । 
इदे वड देव छाग सनम यड हरिमयति पितु । ४९ ॥ 
धमे रे दाग वा रव, परु चिर वैय नदी सेत; [ इ 
गोक ] उनके वद टुः भाकरी मकतिमिना जनमे क चसभवा ९४२ 
चीव रत सुरि खव कना 1 भरि समेत गद दार ना} 
सीरमदर नैभिय॒दि्याता । कति नीह छाश धिथि दता ॥ १ ॥ ॥ 
तेव मनुलीने भगे पुत्रे उवद राज्य देकर सयं ल्ीददित बनको गणन 
मिवा ।भलनपिन सैरमी ॐ तमपा ्सिदरै ॥९॥ 
र रकं छनि षिद्‌ समाना । सह द धरि श्टेर मलु रावा ॥ 
पय ऽत सोहि सतिषीरा ! सान भरति तु धर शटरा ॥ ३ ॥ 
कं मे भौर दि मृह वते ६। रस मल्‌ हदव श हे घरी 
चे 1 शरीर बदिमडे यानी भरम अते इए पञ इधोमि दे रै ये भामो 
शन भर मकि तर घरण श्नि लार ॥२॥ 
पे ज भेयुमहि लोर । हरपि नहाने शिरमक शीर 
अप्‌ भिर रिद ति म्पाती । घरम धरषर चृपरिपि सारो ॥ ६१ 
[ चेले नोप वे पहु 1 त पोकः उन्न नि 
न्ये स्न पवा । ननो बलः रारि चत सिद यौर गरी छनि उत 
मिलने भये ॥ ३ ॥ 
चे चं रय दे ध्‌ युचि सक पादुः सा 
ह छरीर सनि पर परिवारः सड समान मिव सुन राधा ॥ ४१ 
कन सीय म स्म वीयं उन छग (१4 
नघ्न सर्र गदायाः 5 ( क्छर ) ब चारण कस्ते थे धीर 
सके उन्म निव्व पुराण नते ये, ॥ ४1 (रर) १ देच 
गेवाल मच्छर भत्र पनि जप दितं भुरा । 
बारे पद पुबद वपति मन यसि दग ॥ १४३ ॥ 


# बारकाष्ड कै एण्‌ 


शौर दा सन ( ॐ नस भगवद वेदाय ) प भष इठे 
दे | भगवान्‌ वादेव चरणमर्ेप्ं उम राजा-यनीक् मन बहु च त गय ॥१५३॥ 
चौ» षढा शाकं एड या । रदं भ शषिदया 
पुनि इरि दह शन देप कणो वरि भधार रूह एर सगे ॥ ९ ॥ 
३ छग; कठ बौर कलदज् मर छते भे भौर रविदान्द ऋका सरम 
कते थे | फिर पे भीर धि ठप कले छो गौर मूरतमो तयग कर केष जे 
आसर सम समे ॥ १ ॥ 
इर धरिद्यषं॒िर॑तर दो । देसिशच मधवे परम प्रघ सोई ॥ 
अ 0 श 3 रा 
दयम नतर गदौ अभिभा हमा कती म ह [ करे ] उद पम भुनो 
भे रे, भ नुप, भरुक, भगन ओर अनादि ह भोर परमद 
८ नौ, तते ) सेय विनका विन्न विवा कते द ॥ ९ ॥ 
नैति मेति. येद निका । निनानंद निषयभि  भनूर ¢ 
ठ किरसि निषु भगवाना । उपदे पु वंस रे पारा ॥ \॥ 
भि वेद भेतिह (यद मी म यही नहं ) ऋ स्मय बे {। 
च भामरलर्म, उपधि भैर पम ई एतं किमे थे भोक्षं व) ब्रा 
चौर पि भगार ट हते टै ॥ ३॥ 

, देम भु वक घ अहे । मक देह रषु म ॥ 
जषा रवत सल शुदि सधा । तौ इमा पनिद अमिलका 9 ४1 
फते (ख्‌ ] प्म भ सवे करटं नोः भो ववि [ पिन ] लर, 

कते । येव यवचन वल कव ह ते सं म्निप भौ 
चकयपूरीशेी॥४॥ , ,' = 

„ दोपि विधि -बीते बरप 0 आार। + 

"` संब सप (सदस पुनि अवार ॥ १४४ 
एव मका मका गाह [ तेत कते स्वर दरं जैद वे} ॥ 
द (नार पृ रुक आखर रदे ॥ १५४ ॥ ` ५" 
चौ, सस इष प्यणड. षोऽ 1 धते, फे ए ` पद ` र # 
बिधि रि ए हष ददि भगदा । महु समीप भाद श छत ॥ १ ॥ 
~ र हारक उनि आर भ चेय । दप पे क 
छे उन भप तप दद हा पि मर वनौ कर धर दप ते+ 
मागहु-षर षु भति क्ेमार्‌] एम वीर महि धर ररापू॥ 

, मरखिमाव्र हे शे सरीरा । हरि अनाग सहि महं पार ॥ २१ 
उदन इवे मो प्श लला मौर कदा क कुश, धट मग { परदे 

सम क्‌ [रवा कष दे ही त । अ 

शीर इवो दौम र सथ था, किरिभीउकमये व्यायामी पधा 
रु सर्वन्र दाल निन ज । गि अत्य तापसच मूष रन ॥ र 
भु शतु कह ग नम जानी) तस गीर दृत ५ ( 
वव प्रु यक गि (जामय ) कन उपल पल्स विति 


०६ = पनिना 9 


द --- ---------------- 
जना) सव परय कमौर भौर हर्य अगत नी रं यह याकशषाणी हहं १ 
चकरममे)॥२॥ । 
मूकं जिमि शि सुदा । वन स होद उर नरष भदे ॥ 
हट भु ठन स सुप । गानु दहि वम ते आपु ॥.9॥ 
दो भौनिला नेयौ २ उदर वणौ केम कदि देकर जव इयते माकी 
त्ष राना-रानीक दी रेषु्दर ^ मु परतेभाय हे ४ 
दो०--द्वल सुधा सम यखत सुनि. पुलक भफुरिलत गात । 
बे ६. करि दंत प्रेम नं हृदर्यै सभात 1 १४५॥ 
र बभ्रे पमन गेये कन केही उन्न यी टमि मौर 
ष हे गमा । ठव मुनी दण्डवत्‌ क कोठ रेः हदये दमाता न था-॥१४५॥ 
सौ°-ुड सेवक शुरं सुन्‌। पिष पर दर वंति पद दे्‌ ॥ 
सेवते शुम सफर सुख दाग ।प्रततपा सचराचर नायकं ॥ 4 ॥ 
प्रभो} हुन, रेव स्थि कलदृ भौर कामयेत ६1 भाप च 
रवी रा कु यीर विवी मी न्दमा फले द । आप देव कर लप 
इया शव तो दने ई । भप शरणागते रवर जोर बड-चेतनक खामौ ह ॥ १ ॥ 
जौ भनाय दिह षम षरं ने । तौ प्रप्र हषर दह्‌ ॥ 
जो सरम य सिव मन्‌ मव । देष कारन सुति अतन फां ॥ २ ॥ 
हे बराथ कस्य कोवा । मदि द जोष आपश रू ६) तो गरन 
क्था कर दीनिपे ठि मारक मे लस्प विवय मन बहता है मौर मि [ की 
हन] के मि निः यतन करते ६। २॥ 
शौ शुदुडि सन साग इरा । गुर सुन जेदि पिन संघा # 
पसं एम सो रप मरि शोधन । कृपा कु परततारति मोर 0 ६॥ 
ने कगे पसम गनत महर कमनेगाल ह ३ सगुण गौर 
सिग ककः मद मी भशं कत £ दे शमायत दुद मियमेबठे अमो } धसी 
छमा वीनि पि उती सको नेष मरः दें ॥ ३॥ 
दंपति घन्‌ परम भिय खे । सदु पिरवर परेम शष एमे ॥ 
भगद धल ग्रसु षारिधाना । विखषास प्रपरे भयत्रामा ४ ४ ॥ 
तनके कोरः विनययुक भः पमरप इए बचन मानो ऋ 
न छौ | भन, करपनिषानः धमं वशे निवाससान {या सम वि 
५ माम पर शे गये | ४ ॥ 
०-नीक  सरोष्टू नीरे अनि, नी , शीरर स्याम ! 
अरब तन सोभा पिरखि कोटि पोट सतर क्षाम ॥ १४६॥ 
मेगकरन नीठे, कमह नीति ओर्‌ नीडे ( जतुकं ) मेक समान [ फो 


परकारमय ओर रर † व्याक 
2 ध द ध [व ] शरक शमा देखकर केदो कामदे 


रौ-सरद सथर मदु छमि क्वा वार कोठ ओः ॥ 
अर अन्न रदं सुदूर चास । विड्‌ कर क ११ 

-उतभन हत वद्‌ [पिमा ¡ ३ चन्म सपार हि समास या । 

च ओर रोरी वहू इन्द्रै गम्‌ शे हान ( विरु, वदाव.उतारवासा } 


* वाठकाण्ड ‰ १०७ 





¦ था | जह ओढ, दत ओर नाक { अयन्त ) इन्द्र ये । हसी चद ¢ 
भेनैसा दिखी चो १॥ १ 
नव शु शनक छि मो । चिठवनि उडत भ्त ल फ ॥ 
शूकर मनोज चाप छवि हारी । तिक छकार पट हुतिकरी ॥ २॥ 
व र मे [ विले हुए ] कमक दमा पी इन्दर यौ । मेहर निठवन 
शको महूत प्यार व्यती थी | टे मै कामदेवे षत सोमको इेवादी णीं 
रखररपद्मर्‌ प्रकाशमय तिलक धा | २ | 
कद मकर सुक सिर भ्राजा ।कुचिर केस भनु मप समाजा ॥ 
इर श्नीभष्यं श्चिर बनमाला । पदिक हार भृषम निजा ॥ ३॥ 
कानमि मकर ( मछली आकारे ) इष्ट भर चिरपर एकर हुशोभित 
या दद ( षते ) करे राड दरे खन्‌ य मानो म चंड शं । हदपर ्ीव, 
दर भनमाख रदभदित दर शौर पणि्योके भाभूषण सुद्रोभित ये ॥ ३ ॥ “ 
केहरि कंथर आर शनेठः। दद यिभूषन सुंदर ॒तेड ॥ 
करि हर सरिस समम भुजदेदा । कटि भिपंम कट सर दोधय ॥ ४ ॥ 
, शितौ गरदन चौ नदर अतेक पा । दरम नो गहे, वै भीर 
पे क्यौ दके एमन ( उतारन्दाकलि ) इन्दर भुनदष्ड धे । फं तरकर 
ओर मो गण जौर धनुष घमा ण रहे] थे ॥ ४॥ 
पोर विनिदफं पीत पट उद्र रेख प्र तीनि । 
नामि मनोहर ठेति बु जुन मर्षः छपि शछीमि ॥ १४७॥ 
[ खण॑नर्का रकाय ] पीतम् विजरीको लजना या । दर बद्र 
म तारे (नियसी ) थी | मामि देशी मनोह थी, गनो याब मकरो 
कमणो छने ठेती ते | ९४५ ॥ 
सोऽप रालीव रमि नष्टि । नि समप भज मादी ॥ 
आम माग सोति भवदा । मदिसक्ि छविनिधि भगूला ॥ १ ॥ 
निने नियर म्स्पौ मौर भरे ह भगवान डन चरणक्मलोका ते वर्ण्‌ 
शीं गा जा उकठा । मवा कथ माग सदा अतर्क रवाणी शोमाकौ रमि 
जह गखारसपा मादिव भीगानदी दमित ६॥ १॥ 
आतु ख उपजा गुनदानी  भगनित च्छि उमा अरह्यानी ॥ 
शटि विास आसु जन्‌ हदं । यम चाम दिख रा सोद ॥२॥ 
व. 
-जदमत्न जिनकी रचना > 
(गी लुन भीयमचसर्मर बसी ओर दि द ॥ ९॥ 
छरिसमुदर इरि सूप भिोग । कटक इहे मथभ पट रोक ॥ 
चितवि भाद्र रूप धरना । एति न मानदं मदु सठरूभा 1 ६॥ 
सक दर भा सपो देर म शतस ननम १६६ य) र 
इ (लम ट रवे | 58 भत स्यो रे मार दे रेभेबर 
दैसे-दखते भाते ही न ये ॥ ३॥ 
सर ठव या यख ड व गि षदं पव 
दिर परस असु निज र कं । रदं उछ ककव 4 ४॥ 


० 


श्ट # रामचरितेमातष॒ ४ 


सानन्दे मधिकं वशत ह जनक शरण उन मपे दहु मूठ गवी ।३ 
इये मवा चरण पयव दण्ट रथ ( दषे ) मुम गिर प । कषामौ 
गिभ भने कको उनरेमसकेा सिय ओने हादी उदा रिया।भ 

दो०--चले एएगिधात एदि अति प्रसन्न मोहि जानि । 
माग वर जोर भावं भन महापानि अुमानि ॥ १४८॥ 
किर छषानिधान मात्‌ योते अत्यन्त पहने ज ओर बदा मारी 
दाग मानकर, जो सनक मये दी पर मगर लो ॥ १४८ | इ 
चैति भ्रु कवत जोरि छग पादी । धरि घौर बोली खु घानी ॥ 

नाथ ददि पद फमल पहार । अब पूर घव काम हमारे ॥ 4 ॥ 

अमुके षन शुनरूर, दोनो शय घोढकर भीर धीर धरकर्‌ राजनि कमठे 
बागी ऋ नाय ! बाप चरणकमले देखकर अद हमारी शाश मनप्कामना 
पूरौ रे.गी॥ १॥ , ्। 

एद रषः चदनि उर भह! सुगम अयन कदि जि घ नाही ॥ 
हरि पेत भति समम गोसादं । गम छाग मो निज छपाई ॥ २ ॥ 

कर म भन एव बही शाशा है । उषा पूरा हेना रहन मी द शौर जलन्त 
टन भी एसि उ कते नद. वनवा । ह .सवाभौ ¦ मारके स्थि तो रका, पू 
एता बहुत उन दै, पर पु लपनी पणता ( दीना ) ३ कए बह भयत 
विन मादस शेता रै ॥ २॥ 

जया धरित दिवु पा । पहु संपति भागत सङ्चा ॥ 

स ड चान नं प्रोह त्या हदे नम एस हहं ॥ ६॥ , 

से कों दा कस पा भी अधिक मगन सकोच फरवा है, कि : 
ड उत मभाव नही अमदः व ह गर हदये तशव चे दै ॥ ह॥ = , 

सो इन्ड भान संर्यमो। परह मोर भरोत चामी ॥ 

पक ष्डिद्‌ माए सू मोक । मोरे हिं जेष ङ्ह वेष्ी॥४॥ 

द लाम} माप न्तमामी ई, इर्ये ते बाते ही} मेर दह मनोर प्र 
भौन [ मगगान्ले स्दा-- } हे रञ्‌ | देच जोहर शरे मगो 1 तदेन 
पँ खे ¶ठ ङक भी नरी रै ॥५॥ क) 

(= छृषनिषि ताथ फदर सतिभाडं । 
हर्दि. समान छ भु सत कवन दुखड ॥ १४९॥ 
क ( (न रोण 1 कानन [ग्ने 
ष्पता | ॥ १५९ ॥ न ६। मै ^ 
चनि मो चति तव्‌ नोह पद॒ उलि य 
भाष सरि शोल कं आष! दूए ठव वगय हव प्त आई ॥ ५ ॥ 

स प्रीति देलक मौर उनड़े अमूल्य क्दन दुगङर कर्णा नान भगवान्‌ 
यले ह्र दे रजन्‌ र अपने घमन [दूम्य ] कं जकर शो | अठ! 
खय ह मार धुम्चर पत्र ब्दण॥१॥ “५ 
उरस्य विकोषि कर चर । देमि णुः बर ओो सचि तोर ॥ 
शो महन च दृष म । सोहि षया ॥ ९ $ 





# वाठकाण्ड # १०९ 


1 , शस्मन इष जद देखङ्र भगवाते का देष! द्री ने इछा 
¶ कै सो पररमग जे } [स्यते कदा--] हे नाय । चर रजनो वरग 
४ १ हष । बह से बह ही प्रिय च्णा | ₹॥ च 
भु परंहु धुडि हति दिशं ! दपि भयत दित पि सोर ॥ 
॥ ह पादि जनक जय स्वामी । रह सक्र उर भराम ॥ ३ # 
7 पर्त है भर । ह्व दिगा श ए ३, क्यपि है भर्तौका दित वरे ¡ वह 
। पई मी मापो मच्छ ह उती है । लाप हम आदद मी पिता ( उत के- 
षर), मयते लाभी ओर सक दमे मीत जेव तरच | ३ ॥ 
॥ असन समुष्ठतं मन संसय हों । एषा जो प्रमु प्रवात पुनि सौ ॥ 
† ओ निज मत्त नाथ तव च । लो सुल गरव चो गति छी ॥ ४॥ 
‡, रेखा ्कनेपर मनप सन्दे हेत दै, फिर भी रुमे भ वू वदी प्रमाण (तल) 
ै।[ैगोयदर्ौगती हि ] हेनाय | जाप जो निन उन ई पे जो { भलैविक, 
मेष्ड ) घुस पति है जीर जिर परम शतिनो मत्त शेत ६-॥ ४॥ 
बोस सुल सोह गति सोह मगति सोई निज चएन स्नेह । 
सो विवेक सोद नि प्रमु हदि छपा फर वेड ॥ १५० ॥ 
| । दे परभो) षक ल) वही गति; वदी भि द अपने चरो प्रेम, बही शन मौर 
१ शी सल्ल कृपा कफे ह दीनि ॥ ६५० ॥ 
नौ-पुन मु गू रथिः बर स्वन | कुपसिषु घोरे दृटः कचना ॥ 
भो क रथि तहरे गन माष । मै सो दौन्द सष घम ग ॥ \ ॥ 
{  [रानीकी } ओभ मूद्‌ शर मनोह भेष बास्यरचना दुमद कृपङ एर 
' मगान्‌ कोम वन योरे मनम ओ यु इच्छ ६, वह सद यने मको दिवा, 
, पो कोई देह न समक्षना ) १ ॥ 
मादे चिचक भटौषिकि तोरं । वटुं न सिरिहि अनु मोर ४ 
यदि धरम भहु कटे थलेरी । शवर एक दिनती प्रस मोरी ॥ २५ 
हेमा मै दरमसे ठः अलीक ्ान कमीनन होगा | तव गुने मगवान्‌ः 
ॐ सर्णो्ी पन्दना कमे भिर क्-३ भु | मेर एक विनती भौर है--॥ २॥ 
, धुत विषदृक तच पद रति होऽ । मोहि ब भू कै किन फोड़ ॥ 
मनि बिष फएनि जिमि जकथिनु मीना। मम जीद तिमि हरदहि अभीता । ९॥ 
आपत चरम ते वैष ही परि हे ॐध पुने नमि पिताक हेती ई, चरे एषे 
रोदे बदा मारी मूं 8 क्यो न फटे । सै मधिक वरिता सोप ओर चे भिना गस 
` [न सकती ]; वैरे मेर शीवन आपै मवीन ए (भाप बिना नर उक) ॥२॥ 
भस बर माभि रन महिषे । यवमस्॒ करनानि कदेड ॥ 
भब दुम मम जलुखासय मानी । दह जठ सुरपति रजधानी ॥ 9 ॥ 
देखा भर गकर राजा मगवानके ण एकदे ख रये । तव इयाते निधानं 
भगवान कद-रेखा ही शे! यव हम मेरी आसा मानक देरव इद्र यजधानौ 
( ममरावती ) म जाकर याच कते || ४ 
सोकं करि भोग विखाक वात ग कह शाल पुनि। „~ 
शेष अवघ भुगाड ठक म दोव हार त ॥ १५१ ॥ 


१९० # रामचरितमानस 


है दात ] वलँ [ ले ] बहुत भोष भोगकर, डु फाल बीत जानेपर, ष 
अके गाः हेगे ] ठव मै त्रय पत्र होयँगा | १५१ ॥ 2 
चौण-षचछमय सरवे रषं । शोहर प्रण निकेत हुहारं ॥ 

असन परित दष्ट धरि पराता ¦ विदद रित मगत सुखदाता ॥ 1 ॥ 

इच्छनि्ित भुय चङ र दु षर प्रकट गा ह तात ! १. 
अधसत देह धारण फरक भरर इ देनेनाे चरित्र करा 1 १ ॥ 

ज दुनि सादर नरं षडभारी ! भ तदिदं ममता मद्‌ त्यागी ॥ 

मादिति हि खग ठपजाया । स्रोड लधतरिषि मोरि यह मावा ॥ २ ॥ 

मिन ( चरि ) को वदे म्व भनुष्य याद्रसदित शुनक, ममता ओर मद 
त्याग कर, भवसागष्ठे तर वाये । भादिशक्ति यद भेरी [ खलूपमूता ] गाघा भी! 
निहमे अगतो उन किया ह, यवता जगी ॥ २ ॥ 

एडम मै अभिलाष तुरहारा ! सत्य सत्व पन सत्य हमारा ॥ 

नि युनि भस कष हपािधाना ! शंहरथान मप्‌ भगवान ॥ ३ ॥ 

इ भकार रै तमद भमिखप। पूरी करा } भर प्रण सत्य दै, स है, एल 

) एषनिान भगवान्‌ वारवार रेख ककर धनतद्न हो गये ॥ १ ॥ 
दंपति उर धरि मयत टाका । तष्टं आश्रम निवसे कलु फाला ॥ 
एमय प्रा ततुं तजि अनयासा । आद्र कौन्द ममराबति वासा ॥ ४॥ 
वे खुर ( राजञा-रानी ) मप्‌ कृपा केवाले मगवानूो हद घारण 
करे ऊ कार्तक उव आभरे दे । पिर उने समय पाकर, एन ही (कनि 
किरी एकै ) दरीर छोदकर) अमरावती ( नरकौ पुरी ) मे जकर वाऽ किया ॥ ४ ॥ 
दे°-यष्च शतिहास पुनीद अति उपि ही धृेतु 
ण्न छद, पर्‌ पुनि राम जनम कर देतु ॥ १५२॥ 
। _ ,  गयलयवी दते ६--) र भव्यान । ठ असन पयित एतिरसतो धषी 
पावते हा था | खव भीरा अवतात्‌ कनेक दूत काण घनो ॥ १९२ ॥ 
मप्रायण, पौचरथो धिश्राम 
चोः -षृद शनि कवा रल पायै । लो गरि अरि संह वदान 
वलं निदि ए कैत देषु । सतपेढ तदै चद्‌ नषु॥8॥ , 
दुनि! व पिब बौर प्राचोन कया दनो वो दिवी पाती की वी! } 
गे षड पल कक दे दै र्द नामक रदा (रव्य कता) था ६ 
धरम रधर नैति निधाना ] देल प्रताप सौर दरुकाना ॥ 
वि क मप्‌ क सुत गोरु । सष शुन घाम भदा रनधीरा ॥ २ ॥ 
ऋ पकी धीक धारय कलेयाल, नौतिक्ी सान, तेवली, परतापी, ठुशील 
सौरबध्वा्‌ा | उदो वर पत्रहए लो सु्गके मण्मर जौर पडे व रणवीर मे २ 
शृण धनी नो डेढ त आदी । नाम मतापमाकु अस दाही ॥ 
भम्र इतदि अरिमर्दन नामा । सुवङ भढ उत्व संभ्ामा ॥ इ ॥ 
एनय उत्रािकादी चे बडा ठका पा, उरक नाम प्रदापमातु सा । दूस 


एतेषा नाम भरन या, सिवदी धनायने सप ब था नौर नो शुदं [ पवते 
समान [ मह रता या ॥ २ ॥ 





# बाठकाण्ड # १११ 


माहि भरद परम सीत । सकट दोष एरु षरजित्‌ भीती ॥ 
@ सुति राण नुप दना । एर्व भ्ठ मव दन कन्दा ] ४ ॥ 
गाई-भसे बड़ा मेह ओर सद भ्र दों भौर छले रद { सौ ] भरति 
षी ] राजान जे तरको रातय दे दिय जौर भाप मगवान्‌ [ कै मन ] कै स्मि 
वको चर दिया | ४॥ 
ो-जव प्रताप्रवि भयर चप फिर दोषां देस । 
भा पाठ अति बेद्दिधि कतं नी अधर ठेस ॥ १५३॥ 
लम परहपभात रजा हुमा, दशमे उक दईं फिर गवी । श पेद वागी 
ह पिक अतुरार उत्तम रीतते प्राक पाठन करने लया । उस र्यमे यका 
केश मी नही र गया | १५६ ॥ 
जीणर दितकारक सविद साना ! नाम श्ररमसचिधुक् समानः ४ 
एदि सयान दैप बलवीरा 1 णु प्रतापं ररषीरा 1 ¶॥ 
राजा क्त फरोवासर भौर श्राचायेे तमान इमान्‌ धरसि नागत उ 
मरी था | हत भकार बुद्धमाद्‌ मन्त्री चोर कलवान पथा वीर भाईके साथ द सवयं 
गा भी बहामताषी मीर रथीर य ॥ १ ॥ 
सष सष चतुरंग भारा। अमित सुभद स सप्र छरा ४ 
सेन बिष्ोकि राड रषा । अरं॑ दत्रे गदगहे मिसा ॥ \॥ 
एथ अपार चतुरक्िणी ता थौ, मिहमै भरंएय योदा पे) जो एवकसष रणम 
इ भरेवा भे । सपनी सेना देकः दा वटु र्हा जौर धपाष भगे 
क्षो ॥२॥ 
विजय हिद शदे यनां । दिन साधि दप चरेठ असारं # 
द से पर नेक शरं । जीते सल सू वरमा ॥ ९॥ 
दिगविनये षि देना घनाकर षट्‌ राना मदन (श) छपर णौपजतावलक 
नमर | त बूतसी षडा हर | उमे दवरादामो रो बभ्ूवं$ मीत स्या ॥१॥ 
सष्ठ दीप सनव भर यीन्दे। ठै ले दंड छादि दए दृनदे ॥ 
सक भवनि मंड तेद काठा । एक पतापु सिप ॥ ४ ॥ 
अपनी थ यले उस्म तो दीपौ ( मूमिलणडौ ) र मै कर गा 
मौर पभम दण्ड ( क) ठकः उने छोड दिया । ममू मीम उस 
पमय प्रतपमातु दी एकमात्र ( चक्रवती ) रजा था ॥ ४ ॥ 
दौ" खस विस क्रि वाहुबर निल पुर कन्त प्रवे 
अस्थ धरम कामावि छुं सेवई खम नरश्च । १५४॥ 
डामरे भवन छागो बते वरे के रााने मपे नगते परे किया | 
राओ अः म गौर काम आदि लोशन ठमयातुसार सेवन कता या ॥ ९९४ ॥ 
चम-मूष मापना शर प । चेव नै यमि इदे ४ 
समे हुल याजि प्र सुखात । घरमसीष शद नर नारी ॥ १ ॥ 
जा परापमालुका मर पाकर भूमि इनदर कमे (मनव वदु दोषागै ) 
शे गक । [ उष्ते रण् ]पन स [परक ] लि ररित नौर इ थी, 
पौ ज्यु दर मौर राला वे | १॥ 





[क 


0 क सथ्रितमानस * 


हि भरव हरि पद पो 1 दर छत ड सिव निह नीतौ ॥ 
ए र संवि मधा क स कर सव दै सेवा ९१ 
पर्य मल दति चि भेरा । वह रारे सिते ववि सदा वमे 
सीदि शाय ता था ¡ य ए) देत तर पिद जैराम लक 
दुदाव क्ता रहता या ॥ २॥ 
शूर भम चै दे९ पदे! एष फट्‌ उद्र घुल रने ४ 
दिन मति देह पिविष निषि दाका । सुद खख बट वेद पुराना 1.६ ॥ 
मि यजौ लो ध वरये गय ह, रज षदा भादू सोर ह 
नक उन सन रहम शता पा । परिथिन बन पका दान देव जौर उफ 
श्त, वद रीर पुराण छुना था 1 ३ \। 
शना दाप दूष ता] सुमन वाणि सदर बाणा ॥ 
श्म सुरमवन सुदय। सव दीरथनट विचिश्न॒ बन्‌ ॥ ४५ 
उको त वादो, ताराय, इखि, दर इगीके, आरि 
किमे षर भौर देवरा ब्द विचित्र मन्दर व वीये वधे ॥ ४ ॥ 
दो- ज ठि षडे पुरान भ्रति पकं एक सथ जाग । 
वाट उदल्ञ खख भप किप सदिति बतुराग 1 १५५॥ 
दद धौर ूररणेमे िको प्रकरे गड टे रये , राजान एक को उन 
ब वरो वरमिह हनप्टनार बरार कवा], १५५ ॥ 
चग न कटु एड दुदामा । पूर बिम परम दुन ॥ 
करदे धरम्‌ कतम सगे धानी । बापुदैष सर्पि यूप श्यानी ॥ 4 ॥ 
(र्ते ] षदे विभ ल्वी ये (कोणता) न यी । रुख वहु दै 
वश्‌ शौर शनी षा! बह चनी रावा कम, मम बैर वाणीरे जो छ भी धतं 
करता वा सव भगवान्‌ वेके वि क कता या ॥ १ ॥ 
शि धर दावि दार एक राता । मृगया कर सव सानि समा ॥ 
विधवा गमी दन्‌ गकं गर रीत दहु ननद भधर ॥२॥ 
क वार व राना एकं अचछे पेक्ष उता देकर धिकार स्व जमान साक 
िम्भाचसके प जगे गमा धर पर उदन शहद उत्तम-ज्त हित मरि ॥ २ ॥ 
किख तिरिन प दद दरू । सतुष रत सरिद धसि ४ 
क वि न समात दुल सकी । ममुं खोष ध उनिरत नदीं ॥ ३ ए 
जते भन मिसे द एक मे देखा । [ दति फरण वह दे दील 
शता धा ] मि षम प्षकर ( ते पकक ) रह न आ रा ते । 
चरमा ददा, मणे उसे दशे एमा ह द योर मनो शरोषवथ षे भी उरे 
उान्ता कह है ॥ ३६ 
गोड करर दुन यि श । एलु विट परोवर धिका ॥ 
„ श्रत घ आरौ पर \ दष विदेकतं छान उद ॥ ४॥ 
यद ठे पअ थानक दीनन रोमा षट सवी | [खर } उसका दतैर मी 


कत विदार शौर भोगं या । दोही हट प्रक दुला हुमा दान उवे 
चोमा हेकर देख या ॥ ४॥ प ॥ 


# वाच्काष्ड # १ 


दे जीव परशधर सिर म देखि विसा रह । 
चपरि चरेद इव उ गृप करि न होई निवह ९५६ 
नीर पे शिल समान विसार { बरसे ] द सूषर देवर रत्र 
पोर चक सगः रीर चल भौर उतने चमस ककर वि अव ते वपा 
नि स्व ॥ १५६१ 
चै*-भवत देखि भप र धी । चेद बराह भू गति भवी ॥ 
त भट पप सर संल । महि मि पव पित वान ॥ १) 
भिका कते ष पक (अपनी ठर ] गा देवर एषा पके 
भप चछ । रब दति ह वाये पुपर चदय ।दूसर बन्ने देशे हौ 
परी दुष या ॥ १॥ 
दकव तकिं तीर षीस धाद ¡ करि करे सुण सैर क्वा 
मदत रत द शग भाः । रिष धस भूप ष्ठेड दव क ॥ २१ 
प तककः तीर चदता र, परनदुसूमर छर करे शतको वरा भाता 
१1६१४ कम प रेत भोः चमी दिप दरम मग अता प चौर रव गर 
पम र उपे साप (पीठे) ला चज जाता या || २ ॥ 
यड शरि घन गदत धर । ज भादिन गन क पिबू ॥ 
भति भके एन विष करेषु तदपि न मृग मग समद्‌ रद्‌ ४ १॥ 
पुर बहु धर पपन नगर चम गवा ज हयौ-पदेका निबा (गर ) 
के पा । राश रिष य या र पनम म यहद थ, ध मी एने 
उष पा पीडा नी छो ॥ ६॥ ४ 
' गो िषठोकि भूप श्व धीरा । भमि पैट निषि पीप ॥ 
अगम दलि प डति पशवे पड मवम पड धरई ४४ 
एश बद पैन देखकर) सूर भागक पह एक गौ धुरम न 
स भना किन देलक राजो बहुः पठत लैढनः पषा; एर उप पोर 
वह रासा भूर गा | ४ 
दोूेद सिक्त धरि द्षित रजा बि एत 1 
चोज ग्या षरितं सर जञ भिं भयड जयेत ॥ १५७॥ 
षुत पिम करेय भा शर पदेव भूषय वकु सया भेद, 
स्व सोजका-खोजता पानी पिना बेह हे मया || २५७ ॥ 
चो०-किः विपिनं घ्म प डा । टे चपि कट रुषा ॥ 
` चु वेसा चप सनद धारे । समर हेव तमि गभर पराई ४१॥ 
नरै पितरो उस्ने एक समर देखा; वा ठे सनको वेष नाये एड 
र एता ा नि देए र प्रतपमाह ठन मा भा ओः गो चेन्न शेर 
यदेमाग मपा था ॥ १ ॥ 
सभय ॒भरतापेदुः कर आन \*उपन. अवि भदत अतुमानी ¢ 
गड न गृह भन बहुत गनी । सि न रावि सूर सिमानी ॥ २ 
रभ दमय (जच्छ दिर) चनकर जर मग इष्य (दन) 
भवुमनकर छे गनि हं | एव दो पर रथा जद न अरनी 
क कण शवा पटापते हौ मिव गड का ) ॥ २॥ 
गरष ८-- 


न 
सखि उर सारि रर भिमि रासा । विविन धस्‌ हाप ढँ साला ॥ 
षु एमीष पदन दृष सना । टं ऽप तेह ठर धान्य ॥६॥ 
ददी मेति मर कोधो सकर षह राता तपे देष नमे रहता था । 
सत्ा( मतम्‌ केप चथ !उसने इर पलवान सथा कि यह रापभादरै।६। 
स्र पित नष्टं सो परिसा । देखि सयेष मषापुमि लान ॥ 
यरि छर ते कीट अमासा । परस शपुर त कख निन नाभा ॥ ४7 
राजा प्याला हैन स्नरण [वयासं ] उठे पहचान ने स्वा । सुद्र वैष 
देषद् रलम उत मरणान शसा जौर धोद उतरकर ऊपे परमम किया । परु 
यदा चः नके मारय भनि खे अपना नाम नही वतशवा | ४ ॥ 
दो*-भूपि दपित विशोक्ति तेहि सरवद दी देखा । 
म॒ज्नन प्रान समेव हय. कीष्ध सपति हरपाई । \५८॥ 
गी यापा देखकर उसमे षरोदर दिला दिया । श्प शकर रानने 
पोदैसीत उछ लान चौर नमान का ॥ १५८ ॥ 
सोम प्रम समर सशी क मठ । विल आश्रम तपत ठै गय ॥ =. 
भासन दनद भस रि इभी । पुनि उपस वेङेड अहु शनी ॥१॥ , 
जद राद मिट पथीः शाना सुल हो गया तवर त्प उे अपने अधि 
डे गया भौर धवल ठम मानक दे [ रान वैके स्वि ] न दिगा! 
कर प६ तपली कोप धरये बो -] १ ॥ 
छो इट कप यन कि कें । दुदर शवा जग पएरोटेए 
चिति ड रुष्छन तें । देह दया छागि अति भोरे ॥२॥ 
इम भेन शे १ एर इव पे दनक परवा # फे कम म्यौ 
पिर र! हरे की ०० दवा भी॥२॥ 
ताम्‌ प्रतादगानु । सासु शुन सुनी ॥ 
कव शरं पेट सुखा । दै भण देतह पद्‌ वा ॥ ३॥ 
|= ४1 (9 इने, परतापपालु नामका एक राच £, $ 
सता मनी हू | इए राई भूक गा हू । वे म्यते य भार 
न चे $ ह ॥ ३५. प 1 भ 
म कर टन दरद छनदारा । नान षौ क्र भर होनिषटारा॥ 
२६ सि तोत मयर धिर । चोन संसरि सगर (डर ॥ ४॥ 
क मरक दरम्‌ दरम. था, इडे जान पडा ह इक भदा सेनाम र । 
सेद वह {ॐ हो गण । गरा गगर पते ह यो्नपर ३ ॥ ४॥ 
धर गेभीर वेल पय न घुट घुम ] 
१७६ आदु जस जानि हम्ह आदु शद विहार ।१५९(३)॥ 
ह इमेन । नो, षो अभिर राह ६; घना ऋल ह रला न है ट्या 
एफ दुभ मान वह 2 ज स्वरा हेते ह पे नना ॥ २९९ क)॥ 
1 
लादि तषु लै अद ।१५९(७)॥ 
उरते 
दै। गाते कदम दरे व जादीदवा उन्न कंठ जदीदै 1 ९५१८९) 


# बादकाण्ड क १९१५ 


र सौभे बाय सी । दाषि हरम तर वैः ष्टा 1 
शप बहु मति प्रसंसेठ ताह । चरन वंदि निश भाष सराष्टौ ॥ १ 
नाग | बह जन्छा, रा ककर ओर उपक का छि चद दे 
दते बरधकर शाना पैठ णया । रामे उसकी बहूव ्रकारे प्रण ढी शौर उखे 
चरणो बन्दना करे जपने माग्वकी सराहना की ॥ १॥ =. 
नि जकेड. टु गिरा शुदे । नानि पिता प्रभु फर दिं ॥ 
मोहि शनीस सुतर सेवक जानी । नाथ पाम निज कट बानी ॥ २५ 
, पिर इन्दर कोम धाणीठे कदा-दे प्रमो ! यापो पिता जनक मँ दिठार 
कर टः] हे नीर ] रे भपना एत्र मौर देक नकर अपना नाम. [ -धप्र ] 
वितरत वच्य ॥ २ ॥ 
वेदि म लान नूप चपि सो जाना । सूप हष सो फ़मट वाना ॥ 
, वैरी पुनि छरी इनि रा । छर यसन च भज कामा ॥ ६॥ 
राद्ाने उक नदी पषवाना, प्र ड राको पचाम गया था | राजा तो 
्रद्दय या जर षट कपट करम शुर था । एक तो वैरी, फिर जतिता छनिय, 
पिर राजा । व छट-बल्ठे सपना काम बनाना वाला श ॥ २ ॥ 
पुकि रुत दित मंत । रवो भनक व सुह छती 1 
, सरक बचने सृप छ सुनि काना । धमर मारि हद हरणा ॥ ४॥ 
वर शु जपने रुक समह क़ ( सरण करते ) दौ धा । छी 
छती [ $ ] भगी भागकी रह [ मीतसी-मीत्‌ ] ठय रही थी रागक 
एषठ पचन कान सनकः, अपने पैरको यादकर वई हदये षित टमा | ४॥ 
को-पट भोरि वानी शदुरु बोठेड हुति समेत । 
नाम मार भिसञारि भव निधन रदित निकेत ॥ १६०॥ 
यह कपट इमोकर वदी पुति लाय कोम वाणी बो्ा--सन ध्मारा नाम 
मिरी कोम एम निर्न जोर अनि ( परद्रारीन ) ह ॥ १६० ॥ 
हि ०-कद देप जे पित्यान निधा । ठन सारिके गव धमिसाना ४ 
दा खि भपनपौ दुरे । सव निधि कुसल इदे नर ॥ १ १ 
रामनि कदा--च आपके सय विने निधान जर सर्वया अभिमानि 
शेते ६ ३ भष खर्पको सदा छाय ते 1 यो केष बन रने दी ख 
तरका क्या दै (प्रकट संवेषम मान शेनेकी सम्भावना श) ॥॥ 
तेहि ३ क सह श्रुति टे 1 परम शिच श्रिय हरि केर 
म्द सम अधन. सिरि अगेहा । भु विर॑धि सिव व १४. 
वर तो संद मौर मेद पुकार कते ६ म परम अक्िन ( र्वषा जर, 
ममता बौर मानित) षषी मवा भिव हते है । चापले नर्भनः मिारी 
मौर मे देडक राजौर विवी भौ देह से शद [ ॐ चे चलम 
संत ण भिखारी] ॥२॥ ¢ २ 
शधि सोसि तव += 
श्न भीति भूपति ऊ देषो । आए रीः 
प सो ड श (अयात जो को मीं ) मै आप सरोम नमल का 


ध ४ 1 
प्र ` # र्रवसिमावसं # 


न 
देलौ | मद परप इषा कौस्वि। वपते उपर राजाकतौ समाप प्रीत 
ओर घ्म म्व दशन मधति मिशवात देके८-] \ † 

सष श्र रावि यता । येः भिक सेए पाईं ॥ 
घु एतिार क मपय । री बघत ` वंति चटु करः ५६४॥ 
व रमे रको मपे पयते करः मय लेह द्व दुधा क { द 
ली )भोल-हेराबम) नोप मेका ठेव घम पीत पया ४ 
दोअ खि मरह न पिके कोड मै न जत्वं काट । 
सकम्यता घन समरं एर तप काननम दाह ॥१६९३)॥ 
अबतक न गो कोर प्रहे पिल बौर न मै सपनो दीपः भरकर तत ह) 
पवर परि अगति ठा रजे पसप वाको मस कर गर्गी £ १६१(२)॥ 
ो*--तुसी. देखि सषु शूं न चतुर तर! 
धुदर केफिषि पे 1 समर असन अहि ॥१६१८त)॥ 
्ठीरासवी करे फदर ३१ देउ मूह नही; [ह लो मूर दी ६1 
चर म्ल म छा दवा वते १। इन्दर मोरो देल), उक्ष षेषन ते भृते 
खान ै लैर भर सपन ह ॥ १६१ { छ) ॥ 
रात यपत र छग भी । रि तति किमपि प्रयोजन भा ॥ 
भु शानत सव भिहि मना । कटु क्ष्वति पिष शेफ रिका ॥ १॥ 
[कष्ट कलीन कदा] शि भर जतम छपर रता {1 भीतो 
छद भिरे इछ भ प्रयोभन 7 रवा । मयु ते मिता जनये है 8 सनत ह । 
किर श, पार रि्मे श्या पिद म्गौ | १॥ 
इ वि पि परम व ओ । परी परतैवि भेदि ए तेरे ॥ 
1.111.011 
हेवा {उपदि 
1 दि मे इर छिपता तो से 
॥ जिमि दभि वपु कषट्‌ उदास तिसिप्निमि दपर उप बिखासा ॥ 
दख स छप भन बनी । ठव योखा तप सधा ॥ १॥ 
च व न कह वा, सयोरीतयौ राक्ष मिश्रा 
। चष उस द्ध व्यान ठगनेवरे ( भयौ 
11 + 
म द्‌ पचतु । नि बे पमि सि गाई ॥ 
वः रथ प अपे बानी ५४ 
नमि एकनु द । चद गकर लाने फिर र -- 
भे श ल्त [ भुम ] ड़ नक अपे मा मधं व 
-आदिखषटि उमशी जवि तव उतपि रै मोरि 1 
[ क च धयै बहेरि॥ ६२॥ 
२ कं उ उतर हुं धी तमी मेरी रयन 
| स्ते न 6 वृत द 1) पदै १९२॥ 


# षाटकाण्ड $ ११४ 


चौ०-अनि भ कदु मन भ । सुत तप ते दुरम ण्डु नष ॥ 
पष ते ग सज्‌ विधाता । तयनरः बि भद्‌ परिवाता ॥ 8 १ 
दे ए ! भन आश्वं मत फरो, तपे कुछ मी दुम नही ह । तपे शसते 
जेठा जपत्‌ र्ते ६ । तपरौ वच्े विषय संारक् पाठ करनेबाठे द है ॥ १ ॥ 
तपवक संख रि संभारा प्प ते अगम न कषु संसारा ॥ 
जयद तृप सुभि भति अनुरागः । कया सुरान कटै सो हाया ॥ २१ 
तमह बल्ञे ख ठंहार करते है । ठंलरमै कोई रेस व्ल नही नो तपते न 
मठ सके | मह नकर राजाको मढ़ भुरा भ । तम षह ( तपस ) पुगनी 
षा कहने रुग ॥ २ ॥ 
कूर्म धरम परिहास अनेका । कर निरूप भिरति भिमेसा 1 
उद्भव पच प्रय केशानी । फदेसि धमित भादरं बसाती ॥ ६ ॥ 
परम, धमं मोर अने मरकर इतिदार ककर वह वैराय ओर शनका निर्मम 
करने छा | सृधिकी उति, पाग ( खिति ) ओर षंशर ( मर्य ) शी मार 
। आरवी कया उरे िलारे फ ॥ १॥ 
धुनि भए साल कस भय । आपन नाम कदम त्च छर ॥ 
॥ कट ताप नूप आन तोह । कीन्हे कपट लाग मरु मोही ॥ ४ ॥ 
राना चुनकर उ तपत्वी$े वमे से गवा जोर तव ब उते अपना नाम कने एगा | 
त्पलौनेका-रानन्‌ भको जानदा हं मने कपट कवा, ह पू भच्छा लगा ।४। 
° कषसि नीति गन न कषद दप । 
। लोहि फर भति भीति स्ह चतुरता विचारि तब ॥ १६३ ¢ 
द राजन्‌ | न सी नीति दै छि राजा लेग जेत सपना नाम नरी कते | 
प्री इदां सगरहकर मपर भेरा दा परभ हे गया है ॥ १६१ ॥ 
चरमा जुमहर प्रताप दिनेसा। षके छन पिता गरखा ॥ 
शर प्रद सव जानन राजा । किक त भाष सानि कासा 9 १ ॥ 
द्शारा नाम अरवापमात ३ महारज सत्क्रेद दग्रे पता ये ! हे रार्‌ | 
युश्की कृपते गै सर जानता हूः मर अपनी शानि पमषक ऋता नेह ॥ १ ॥ 
हशि ठत त सष्टज सुषा । भवि भवीति नीति मिषनाई ॥ 
उपि परी अमता मन मोर! कद च्या नित्र ठे तोरे१२॥ 
है तात ¡ द्रा स्वाभाविक सीधापन ( सर्ता ) रध, विश्वास ओर नीतिं 
नमता देखकर मरे मने च्रे उपर बद्व ममता उस्न हो सवी द; इत्य 
दगध पूढमेपर अपनी कथा क्तः ह ॥ ९॥ 
भद पसघ्र शच ससय मादी \ माशु जो भूप माव मन माहीं ॥ 
सुमि शबर भूपति हराना । गरि एद विनम कन्द विधि नान! ॥ ४ १, 
अम मे पणन ट इमे सन्दे न करना । हे राजन्‌ { गो मनक मावे मोग 
शो दनद (प्रिव ) कदन सुनकर पिद हो गया गौर [ एवे 1 पककर 
पने बूत अशने विनती करे ॥ ३ ॥ क 
छग लोर! चारि पवार कतक मो९॥ 
शुदि भ सी । आनि भगम बर हों नोक ॥ ४ ॥ 


११८ कै शामन्रिवमानल > 


देफयगर गुनि! पके द धतं दां ( स्म) काम नौर 
मेध) री मुम आ गये । तो भौ टाधीनो प्लव देलक मँ ह दलम वर गकर 
क्यौ म] ब्रोकर कते जा्ज-॥ ४॥ 
। दो-क्षरा मरम छख रहित शु समरं द्वितै ऽनि कोऽ 1 
पर्छत्र सथुदीऽ गि यज कलय्‌ सत शोर ॥ १६४ ॥ 
भेत दसी वृद, सु ओर दुत रंत हो जायः गृहे दुद कोई जीत 
नके ओरी भेर सँ ऋस पएर्तन अकणटं रत्य ह ॥ १९४ | 
चऽ~द्दं ताप्सत दप देह तो] कदन एकं कष सुनु सोक ॥ 
श्मल्ड धर पदं सदटि सीएा। एक किङ्क छादि मदीसा ॥ १ ॥ 
रपी कशा-द रावन्‌ रे ही शे एर एक वात किन है, उठे भी दुन ले ! 
दे षवे लागी ! केलव्रारणढुलको दो कार भी त्रे चरणो षर स्र नवावेग। | १॥ 
तण्ण् भिम एद ररर छिन कै कोप न फोड रवारा 
भं न्व वः ट तरेसा। तौ ठम दस विभि पिप्ु महेखा ॥ २ ॥ 
सपक धे नास एदा दवान्‌ रते ह । उनके कोभ रषा कृरनेदासय मेर 
नदी ६! नसि | पदि म बाणे वमे कर शे, ो भहा, विष्णु खौर मदेम 
मी हृदे भ्न चे चायिगे ॥ २॥ 
छठ न वष्र सच वरिमा । सत कदं दो युजः उखां ॥ 
विप्र ऋषि श्लु महिपाा होर नास नहि कब काला ॥ ६ ॥ =, 
बाहुले जोरजवरदसती नवीं च सकती, मै दोनो सुवा उटाकर एत्य कता 
ह । र पन्‌! सुनो, राण धा विना दरा नस किध कभ नही गा ॥ १॥ 
छ्ेड राढ ददन शुनि खसु नाय न कोद मोर मद नास ॥ 
ठ भ्णदं शु शपानिपाना । सो क सदं कत क्यानः ॥ ४ ॥ 
यना उषे भेचन सुनकर वश रत्न हुजा जौर फले षग-३ सवामी | भेर 
क्रथ गा | दे कगनि्नम् पक कृपतिमेय सप दमय सवाग गा ॥ ४ ॥ 
यौ०-पवमसत कटि भपटमुति वोत टिल वहोरि ! 
4 शर सुखाड निमि षद त हमि न णोरि.॥ १६५॥ 
6 व ) क्‌ डय ए ल~ (रि) 
< र्‌ नही 
योगे, तो मार देष नदी ॥ ती 9 
जग-खे ॐ रोदि सरै र कं उ ठव परम भदता 1 
चः प्रन मर प्रत कहानी । प नशर सत्य मम शादी ॥ १ ॥ 
11... 
कन्न चाना ६ द पदे ही दुह मागर ले कका मेर क 
चदं अरे अथक द्विजच! शतत दोर सुरु सातु्ाया ॥ 
„न उप निवन सव वो इरि इर प मस माक्ष ॥ ९ ॥ 
ठ भवापमान | सुनो, वात भकट करेय अथवा वादे परे इन्हायं 


साक्ष हेगा ¡ कौर कि उपाक, चा 
कु कं | र जक अदे च मोर बमो मन ब्‌, इनत 





ई धाकक्यण्ड ‡# ११९ 





\ स्य दा पद गहि मृष माषा। द्वि युर छो कहु को रणा ॥ 
राख गुरं ज कोष मिधाता। शुर विगेष मरि फ्ोड जग प्रता ॥ २ ॥ 
एमे शने चरण परकर कारे खामी | ठत शी द । राण सौर शुके 
षरे, फटिये, मौन रा कर सकता दै ! यदि रहा मी क्रोध कर, तो गुड बया पे 
पर गुहे बिरोध केप जतौ कों भी कचा नई है ॥ २ ॥ 
जन च्छव हम टे हुरं। टेड नास न सोच एमं ॥ 
एकि डर डरपत मन मोरा। प्रु दिदेव छप धति घोरा १४] 
यदि मै आपं कथनके अनुकर नरी चरदगाः तो [भे शै ] मेय नाश हे 
" जाय । पुञचे इसी चिन्ता नही ६1 मेरा मन ठौ दे प्रमो ! [ केवल ] एकी उरे 
रदा रै ति जहरणका शय बदा मवानक हेता ६ ॥ ४॥ 
दो-दो चिप्र बस कवत विचि कहु छ करि सोऽ। 
तुम ठनि दीनदयाल निभ हतु न देस कोड ॥ १६६॥ 
३ रक्षण भरि प्रकारे वहे हो सके ह एषा के वह भी वापय । दे 
{ दौनदमाह | भापको छोढृकर मोर भिनी र अपना छ नही देलता ॥ १६९ ॥ 
{ चौभ-सद् कृप निषि तन जग माक । कटताध्य शुनि तों नि नौ ॥ 
॥ अह्‌ एक धसि सुग उपा त परं पूष श्न ॥ ५ ॥ 
[खन फरा- ] दे राजन्‌ । नः सेशसम पाय तो बहुन ह पर वे एय 
1 (किना नेमे तिह) गौर दपर मी तिद एं मान हौ (उनकी रता 
६ नित ्) ह, एव उपा बहुत सहज परु उस मौ ए कटिनतार॥२॥ 
॥ मम धो्र दगुसि दप सों । मोर जाय चव नगर भ होई ॥ 
भाश छं धर जय तै भग काहू क गृह भास न गग ॥ ९॥ 
॥ दरम्‌! बह शु ले भे शय परेरा जना ददर गस दे नह 
} स्ता । जम पैदा हुम ह दवे अनत त र्म पर सयवा सम नह शया ॥ ९ # 
॥ शैः न भ तव शद्‌ मकान्‌। यना आद्‌ भसमबस भास्‌ ॥ 
नि मसं वोकेड दु पी नीति बनि ॥ ६॥ 
परण यदि नहीं भवा ट) ते बम्यस बिगहा है । अज यदा मकह्गषभा 
पि ोलनाय दमती नवित -1९॥ 
॥ बदरे सभेह श्ुन्द पर कर । गिरि निज सिरनि सदा दुन घरे ॥ 
| जि अपाय सौरि चह न त रमि धर विट ेद५.१॥ 
॥ 


लेगशोयैपर सेद कल ट ४। प॑त मपने्रिपर खदा ग (काव) रो भाएणं 
भि न । माष दप अपे मुकर केनो भरण का है, भौर वली जपने 
५ धिर सदो भूक धारण किमे रती दे ॥ ४ ॥ 
„ शो-मस कहि मदे न्दे पद्‌ खामी दोषु इपार । 
111 
ख कषक राजनि मुनक चरण, पर कृ. ग 
कम्यि। आ्‌ (५ १। दीनदयाड ई [अदः ] दे प्रभो | मेः ल्वि एवा फ 
1 [भक्व] ^` + १६५॥ 
| चण आव शोचा । वोका वपल कपट पणी 
ननि शुम तोष । जन नाव दुर्म 


(५ < शि ¢ 


याको अपने मीने अनेकः स्प पण तली बो--दे रजन्‌ ] सुनो, भै 
इमे स्य कहा हः समतलं ए इर मं इ न दै ॥ १॥ 
अवसि रष धं विद होर ¦ सत ठन कंठे सगतकतै मोरा ४ 
जेय क्रुधि ठरे सं प्रमाञ 1 कट्‌ उवह सय इरिन राड ॥ २ ॥ 
मै को पद कर [ क्योकि | दम स्नः बाणौ भैर छरीर [ दीने | 
मेद भको 1 पर योगः युक, सण यीर सरो प्रभाव ठम फरीमूह हो है जव वै 
छिपकर क जते ६॥ २ ॥ 
छौ ग्रे मे नौ प्सोद। दु पदप सोहि जान च कोर ॥ 
धन्त स पोष लौ मोऽनं रई । सोद सोर ठव आयसु जुरे ॥ ३ ए 
ह नहि {मै वरि सेदं वनां भौर ठम उपे परेल, सौर पुतो कोई नने 
न पमे, तो उर दकफो ो-ड सयम, ने छारा आमान्नरी वन सगा ॥ ३ ॥ 
पनि सिन के ष र्दैह जोऽ। त्व षस हह भूप परुतु सोढ 
जा उपराय ए ठप षटू । सेवत भरि संक्टप कोर ॥४॥ 
५ ४५ व ९ मी जो सोईभोनन भ 
साबन्‌ [ इतो, बह अधीन टो दारा ! हे रजन्‌ } वाक्र यष्टी उपाय 
सौर वपम [ मोजन करन ] च सत कर ठेवा ४ ॥ 
दौ*-मित नूतन द्विव सदस सत रह सदत परिबार ¦ 
म खंकफुप ठनि विनि करव जेषनार ॥ १६८ ॥ 
मिल नय पड़ लाच बा छदुबखव निमन्ित कला ¡र ठरे षटवा 
{कोर भवात्‌ ए कं ] तक प्रतिदिन मोनन कना दिया करेगा ॥ १६८ ॥ 
चौ०ृि दिभि सूम कट सति धोरे । शेहि सरल चिप्र वत तरे 1 
पिए ठम हेम मर सेवा । ते प्रय सेदि य देदा ॥ \ ४ 
ध रसम्‌! एव = दी यौ स ब्रन द्रे मयै हो 
शाते । दाण्‌ इवः यह भौर सपना करी; तो दष रग { सवनध ) ३ 
4, ५ = ४ 1 ध 
भरश ९, ठार । म हि वेद्‌ म नादद काऊ 
9 ० ९ ् ध ररि निन माया ॥ २॥ 
एन जर प तावे देता ठ स्प ङः 
ह पन्‌ म चमनी मते रे इरोम ह लङ ॥ २ ॥ (त 
पष्ठ ट फर्‌ आ परनन । सपं इद याप पतया # 
सै ष्रि दषु दु उ \ घट विभि ठोर दासय इ ॥ ११ 
शे वले उरे पने छनन वना एड वर य्ह रसू; र हे रानन्‌] 
इ मँ उका सम धना सव प्रदाय काम स्दिः || २ ॥ 





ड यवन्‌ { रात चहं दी जवौ; अर सो 
उश्चरी मैट होगी [तपम बच्ते मै मके न नु 


स०-ं टव सोह वेषु वरि यदधन तव ण ध 
जव पकरंव बोला सव कथा छुनावौ केहि ॥ १६९ ॥ 


.# वाल्काष्ड ॐ ` १२१ 


म कहौ (पुश ) कष पकर आङ्ग बव पतन्त दो खम 
का भाऊ, तव दम पतने पचान च्ना |. ६६९ ॥ श 
शचौ-सयन कीन्ह भूप मायु मानी । आसन नाद्‌ वेड ठसनी ॥ 

श्रभित भूप मिद्ध अकि साट । सो किमि सेव सनो अधिका ॥ \ ॥ 
५ रन [६८१४५ त प च ऋमरसनी आघनपर बा वैम। 
थ्काथाः खूब ( ग आ.गवी एर ककरी परे सोता 
खेत वहत चन्वाहेरीर्ी॥१॥ । 
ऋाढकेतु निसिचर द भावा । ओ चूक होहु दृषदि सुरापा ॥ 
परम, मिद हाप प॒ के । जन सो भवि कपट पेय ॥२॥ 
[उषती रमय ] वहे रक्षस आया; ने सूअर बनकर राके भटश्ागा 
शा | ष तपसी रानाका वद. पित्र था जोर सूह उश्च अनत या | २ ॥ 
तष $े सप सुत्त भह दस भा । लत भति अभय देव दु ॥ 
अयमि मूष समर सव मार । ग्मि संतर सुर देकषि टुखारे ॥ १॥ 
उक्ते रौ पत्र शौर दर ईय) जे पदेश इ दे न ते चनेगषे भौर 
देवताभोइध देगेवठ ये । आहरे, तौ भौर देवता्मोमो इती देख राजन 
इन शो प ह युत मार डा या ॥ ३ ॥ 

॥ के ए पाणि शर समार । शप सृप मिलि मश विरा ॥ 
पि र्य सोद रवे उपा । भावी क्त न चात क रा ॥ ४॥ 
उष दुषो पिस वैर गाद के तासी राजते मिच्कर स्ह दिवा 

, (पलक) ओर निष रम इम ना द) पठ उपम एवा मानैव 

} रजा ( प्रतापा ) ङढ मी न समषट छक्र ॥ ४॥ 

शो-रु तेजसी धष अपि ठु करि निय न ता । 

| अजहदेव दुख रदि ससि सिर जवसेधित राहु ॥ १५०॥ 

“ , रेन शु जके मौ ठे पो भौ डते कय नह आषा चि । च्छा 

 किभाभरचा या, चर्‌ मावक्‌ दनम इत देय र ॥ १४० ॥ 

चौक-चपस शृष चि सहि भी एवि मिङड रि भय घढारी 8 

`, किचि करि सव, कथा पुभाई । वदा गडा इख पद॥१॥ 

तमती सं अपने मिष देख ग्ब हे इपर गौर इली-हमा । उमे 
मतो कया कट नाय; व ल आनन्दि दे वोख--\ ६ # 

~ भव सावर एष शुन मेख । जी म्द शद भोर रपसा ॥ 
;" “ परिहरि) सोच ए दुसट सोहं । धतु पध मिपि चिपि खोई 1२ ॥ 

हे राजन्‌ ! सुनो, अव मने भैर कले भदुखर [ एतमा | कामकला) ते 
अवरम शो यूं क ए स्थं उम ] | इम भव चिन्त स्वग णोस्ठो 

` विषाानि भिना ही दना ोय दर फः दिषा ९ ॥ स 

॥ इ रमे रु यूं शई । दे दिव मिक मै माई } 

तापस चपि बहुलं भरितोषी । चा 1 भ 

५ छषमरित शुको परे उलाद्‌ फर ( आः 

` जापि । [इल भ्र ] सलौ रायन स दिस दे क समयाय भैर 

4 भन नरष राक्षत चला ¢ ३ ॥ “ 








१२ # शसिनं # 


अलुपरतपि चानि समे ! पदति छन सप्र तिके ४ 
पठि सरि प स्यन्‌ कर । एय पिस धानि" यनद 1 9॥ 
उष पतपमातु व व ४ । सजन पनत 
पाण सलक पैक अच्छी र ष रिया \| ५ | 
सा ॐ अपप इरि ड पवर वेर! 
रसि गिरि समं शाँ ऋरि मति मोरि ॥ १७१॥ 
कि वह शनक रोधिन उठ 8 मया जीर मायते उदकी बुद्धो प्रमे 
डाः उते उने पाठक खोद त खवा ॥ १४१ ॥ 
चीज गिरि दपरोहि सम । परेऽ आई वैषि सज मनूपा ॥ 
तेद रे अन विदानो) दसि सवन भति अद माना ॥ १ ॥ 
क वाप एरोधिकष हप वनाकरः उस्की शुद्र सेन अ ठेट॑ । रामा स्मैव 
हिदेषछे ह जागा ओर अपना घर देखकर उशन बदा ह माधवं माना ॥ ! ॥ 
युनि महिषा यम सं अमानी ! उड गव ओर जान न सनी ॥ 
प्रान गवर दभि चद हेती । इर कर यारिन साते छी ॥ २४ 
भर निकी मिपानन भदुमान्‌ कछ बह धिरे उ भिरे रानी भ त्रान 
पव । परर सदी धेर चद्कर यनम चज गथा । नारे किवी मी लशु 
नना ॥ ९॥ 
गै मम सर मूषि भाषा । घर घर ॒रन्सच याम बधावा | 
उपरो दक जव रता । चकत विरोक सुभिरि जोह भाघ ॥ ३॥ 
दो पः ग्री जनेपर यजा आया ; षर. ऽस हेन छो दौर याणा बरे 
खा ] ज रा पुोिवको देला, तद ब [ मरे ] उपरी भाग एरय र ऊे 
अश्वी देशम छया | ३॥ {^ 
शग सम पपि ग दि भीगी । कमय सुति प्‌ ए मि रीन ॥ 
समन नि पित धावा । पदि मदे सर कहि सदुपाबा ॥ ४॥ 
रावा ठन दिन पे खन परे । उवी इदि कपटी पिमे चरम गी 
स । तिवत धय जानक एहि [ गना हभा ठठ ] भागा भौर राज़ लेव 
शीव के रा [उछ भने ] ख पिर खे समाद पृ दिव ॥५॥ 
देनूप षसेऽ पद्व शुद श्रम वस शां च चेत ! ध 
वरे दु्त' चत सस कर विप्र छट सोतं 1 १०७९॥ 
(ते यवृ 1 शुके [38 समं ] पयोर यः भस हषा! 
भन उ ददन र [वव न टिरा कानु यक † 1 उर त 
पए यछ उ रत इदस निमन्भय दे दा ॥ १७२ || ` `" 
चनप जवार वागा छत चरि दिधि शि गाई ॥ 
म्यातय ठे अनि सोहं । विशम टु शनि स्‌ व ने ॥ \॥ ` 
पहने 4 भौर सादने डन, वदेम केम कम । 
उ ग्नी सईया दयौर ते यनपे कोई गिन न सकत ॥ १।॥ 
विवि दग्‌ कर आमि सोषा ¦ हि मिय मोस खड सथा ॥ 
मोर चुं सव चिप्र भए । षद्‌ पारे श्र कै९४२॥ । 
बनेढ पञ देका मंखपञ्वा ओर उ इट इनो ब्म माम मिति 





ॐ बाकरोष्ड ‡ र्ष् 


.~---~-~-~------~--~--- 
, दिया] ख रमये मोन 8 वजया भोप्च $ करित वेड २ ॥ 
1 बहर बर छग मिप । मे भावी तदि कडा ॥ 
£ : रिषद्‌ उरि उदि गह मू] हैव इमि षह दि काहु 1६१ 
स्यौ ही राजा परोठो दण, उती कर [ फारत ] ाकथवाणी हुई. 
मो | उढ-उठकर अपने षर जयो; व यव मद खा । इ [के खते 
\ कौहनिदै॥१॥ ४ 
भयर रपोदं॑भूसुर भोर) उब दवि उरे भानि विघस ॥ 
भूष कठ मति सै सुकानी । भावी ब च आब सु वामी ॥ ४॥ 
रगौ आाहर्णजां मव वा ह । [ याससपाणीा ] शवस नर सन 
आर्मय उठ हे हुए । रा वाढ हो गया । { परत ] ऽपी बु गों भूष 
हरं ¶ | शेय उक र [ एक] रात ( मौ ] न करी ॥ ४॥ 
दो०-बोके विप्र सकोपं तव नि कटु कौन्टं षिच । 
आ निलाचर होहु शप मूड सदत परिवार ॥ ९४६॥ 
त ्री्तण पोषित बो उदे--उनदने इ भी विचार गही फिवा--अरे 
भूं रा | तू फर परिवार रक्षत शे ॥ १७२ ॥ ` - ~ 
सौग ह - विप्र वोर । वातै, एए सित सथुदाईं ॥ 
' शखर राक्ता धरम द्रा । दसि है समेत परिवारा ॥ १ ॥ 
र मीच धमिय [ठते ते परिवारं रौ इकर उन करना चाह 
श दते मरे वमंमी रा करो । अष द्‌ परिवापित ४ हेय ॥ १ ॥ 
संबत मध्य भास कम षोडः । जहदतरा य रिटि इ शोक ॥ 
ग इनि श्राप पिक अति गरा । दै बहोरि वर गिरा भ्त ॥ ९॥ 
पप मीतर हेय न हे जय, तैर ङं भरो पानी देेवामककेन 
सगा] शप दक रजा भते मरि भलन सु तो गवा | द 
सकादषाणी ह--॥ २ ॥ 4 ८ ॥ 
विषु, प्राय विचारि र वृन्ा । तदि ,भपराध, भूष कहु फो ॥ ' 
रचि निप्र स सुमि नमान । मूष गयढ जह भोभन खानी ॥ ६॥ 
द्रण | दमन विवासः शप नी दि । यले इ मी भष नदी 
किया । स्वी व पम चभ से गदे । सत स भत तां 
चण भना श1।१॥ ` ` अ 
सहन असन नटि बि सुनरा । पेड शद मन शलीच अपारा ६ 
सवे प्रेय मधष सुने रस पेद, अवनी गडा ॥४॥ 
[भेला वो ] हन मोन थ न रदं द्म हौ ग । दक रत मनम 
सपार चरिता कस हुमा य । उने न्गौमो स्व चात नाका मौर [गदा] 
पयमीत लोर व्याकु होकर ष एलीपर मिर दा ॥ ४ ॥ चि 
दो--ूपति मावी पिरद न च ईषन्‌ दर । 
` ` य मन्यथा होड नहि सि अति घोर ॥ १७४॥ 
पत यप द्वयं दोष भह ३ रो भौ सेनः डौ व्ल) ऋष्क 
+ 11 


श क शमदरितमनिख # 
नि 
चर उर मिदैव सिथवट्‌ ! वन्केर = पुररोगन्ह॒ पाद्‌ ४ 

४ = षष्टि दें! दितं हंस शग किष जही ४ ९॥ 





एवा कवक च वराह्ण चे गदे । मगरवारि्योनि [ ज> ] थह समाचार पाया, , 


तो चिनवा के ओर विध्दा दोव देने छो, जिटने इ कनतिःयनाते कोभ कर 


दिया (पठ प्यास राजा दे बनाना चाश था ले राख यना दिया ) ॥ १ ॥ ` 
उपेहि शनम श्हेषहे । भषुर तापसि छवि सनां ॥ 


कहं खल तदे एजे पादु । सनि सलि तेन भूप सव घाप ॥२॥ 
ररित उसके षर हुचाफर मदुर ( कालकेठ ) ने [कपी ] तपस्वी सबर 
| उव दुमे रप मेने निसतेख [री राना देनासनानक्र [बद्‌] , 
वेरैनिः नगर निसान यजा । विपि नौति नित होद्‌ छाई ॥ 
ख्वे सक सद रि कटनी । पृष्ठ समेत परेड येष घरमो ॥३॥ , : 
शौर उने डंका गर नगरको देर षि । निप्रति अनेक भद्रा तरं ; 
हते घी । [ मरार ] ख योदा [ धरवीरोड } कनी कके रफ जह मेः । ` 
रमा मी मारित केत रक ॥ ३ ॥ । 
त्यत इ एोड नहिं भचा । निर घराप किमि षो जमा ॥ 
स चि प्य धर वगर्‌ इताई 1 निन पुर रचन त्य लघु पं ॥ ४॥ 
उत्क इम जो नही बचा । ग्राह्ोका श्राप भरा वहे हे सकता था। 
रुरो चीतकृर, नगरको [ पिर] षठा उव राना मिनिम शीर यद पकरर जपे" 
पे समस्वो चेशे ॥ ४१ 
दे-परद्ार छद नादि जव होई विधात पाम ! 
रि मेससम, अफ अप्र ताहि व्याह्म दाम ॥ १७५॥ 
[सवी हे ह मदाच । यमो, विधात लव जि नियते 
४कर्सेषदि कोस धनन (मा मरक ह) 
मून (हरय) ओः रसती सपक उमान ( काट खानवा ) ले जी र ॥ १७६ ॥ 
चौकठ पुति उड़ सोद श ! मय पिसाच सदिव इमा ॥ 
दस एर छि वीत सखद ! एवमे नात शीर अरिवा ॥ ¶॥ 
दनि गो, स्व पा राला परारी सवण नाम रा हा । 
उरे दए ण्ट ओ वीठ गुलां पी जर बद वदा ही भच ध्ररवीर या ॥ १॥ 
भूप अलु जसम आमा । भयद सौ मरन दरुधामा 
घसि चो ददा धमरे बासु } सयड विमत दु उरु हाच ॥ २१ 
भि म ओ रमन दोय सं पा कलक पम कुम हा , 
उत्का च सन्ती या निरकना नाम्‌ मनया दह समगकषलेछ्ोय माई हमा |" 
वाम पिमीमन चेदि शम्‌. नाना \ दिष्ठुममल सिग्मान निषामा ¶ 
चे सद वेक द ॐ मद्‌ साम धर चतरे 0३१ 
त ४4 सय जगद्‌ चाना दै 1 व विष्ुमच भरर 
अर 1 
यच्छ हर ॥ ३॥ पक चोरके वेवी क मक 
ऋमस्म ठ विन भे । कि भरकर भिगत देका ५ 
क चैत हतक ए सा । कमि य चह प्स परिदा शा 


# खालक्ताण्ड # श्म 


.. पै सब मने जातिके) मनमाना सूप धारण करनेवाठे, दु ङुरिक) मणकरः 
विवेकत निर्दयी, दिक पापौ मोर संवारमरकरो दुःख देनेदाठे इष्ट; उनका वर्णन 
+ ॥ ८५१ 

°--ऽपजे जद्पि पुलस्त्यकुल परविन अमल अनूप 1 

` चदपि मदीचुरं भाप वस भष संकर अवर ॥ १७६॥ 

मपि े पुरस्य शरुधि पयितर निर्म मौर भतुपम कुर्म उत्् हए, तथापि 
जक्ष शापे सारण ते ख प्रारूप हुए ॥ १७६ ॥ 

चौ०-कीनद भिनिध तप तीनि माद । प्रम उग्र नहि बरनि सो जाद ॥ 

गड भिक तप दलति विधाता । मागहु बर असन्न मै तात! ॥ १ ॥ 
सनौ भादयौने अनेन प्रकारक बड़ ही किन तस्या फी. मिका बेन नही 
से सदा । [ उनका उग्र ] तप देकर बरहनी उनके पास गये ओर गे रात ! 

प्रत, बर मगो ॥ १॥ 

रि बिनती पद्‌ गहि दससीसा । बोरेड कदन सुनहु जमदौसा ॥ 

ष्म फराह के मरि न भरं ! बानर मुन भति ठु शरं ॥ ९॥ 

एवणने बिनेय भरे जौर चरण पककर कड- हे जगदीश्वर । शनिये, धानर 
र्‌ मुष इन दो नाति्ोफो छोडकर हम ओर कीड़े मारे न मरं [यद कर 
भभपि]॥२॥ 

एवमस्तु तुम्ह यड्‌ धप कना । मै परह भिि देष बर दीन ॥ 

पुनि प्रभु कुसकरन पिं मय । तेष मिरोफि मन विषय भयऊ ॥ १॥ 

[वनी क कि] म योर मे परिकर उ कर दया येव ह 
१ परमन बहा रपं किया ६ । किर बदाजी म्ण पाद गये । उे देखकर , उने 
ने बडा भावै हुमा ॥ २॥ . 

बै पि खः मिव करव भरः । होदि सय दनादि संवार ॥ 

साद पररि तात पि फेरी । माणेसि नद सास पड केशै ॥४॥ 

ओ य दए निलय आहार फेगा, तो शर ठंसार दी उना श्च नयगा । [वा 
मेषा] नदाजीम घरलवौको पररा कले उपक बुि केर द । [ षे ] उनो 

५४ ॥ वि माश । 

--गय्‌ त्रिभीषन पस पुत्र बर मा 
तेषं मागेड मगव॑त (~; कूल अमल सलुराशु 1 नौ 
षिः बरहनी विभाषे परास गये जोर बोडे प्र दर मागो । उठ 
भावात चरके निर्मल ( निम्काम मौर अनन्य ) क ॥ ॥ 
चौ०-मिमहि येद जर जदा सिधा । एषित ते शृ धाएु ॥ 
मय भ मोदि चासा । परमं खदरी नारि रमा ॥ १॥ 
उनको षर देकर रषा चे गमे । ओर वे ( तनो माई ) ॥ ५५५ 
(4५ द माये । मय दानवी मनदोदत नामकम कन्य रय नदरी 
मगिथी] १॥ 

` सोषमद वनी । हदि जाठधानपरि _ जानी ॥ 

भु पाद । ति दोड वं षिभाेति ज ॥ ९ # 


९३द > राख्दम्विमालस + 


मयते उते चक्र रान्न दिया । ठ्ठने चम श्वि कि वह रासे ज 
हेष ] भच्छी हौ पक्र रद असम दृः सीर षि रटने आकर दोन भदक , 
छिवाहकरदिन ॥ २} ध 

रि रष ए5 नि भनरी । धिथि निभिच हून षति आपी ४ 
सोह सय दन धुरि सदार ! कनक रदिते मनिगन अपारा ॥ ३४ 
स्छने.दीचम पिल नानकः परतपरं जर्ठान्न बनाया हुमा एक वहा पार 
कि धा ¡ [दान्‌ मादी लौर निय ऋतौगर | मब दानदने उतने दरा , 
दिवा 1 उः नपि दे ह्‌ नेते ्नगिनत म |! ३ ॥ 
मोगारहि ऊमरि शष पासा । जसराबदि जपि निवा ॥ 
तिह ठे अधिक एन्व मति दनय ! नय दिव्यात नम देहि छं ४४ 
री ङ्द) पष्य ] मोगी एतद मः ए रलेकौ 
[खगम ] वमर पुर £ रन भी सर इन्दर णोर बोला ऋ हग ा। 
जगे इता न दफा रिद हा ॥ ४ ॥ 
देख सि पमीर भति चरि दिषि पिरि शाव | 
कलक शेर मनि खचित हृद्‌ दरति न जाई वनादे १७८३१ 
उ नर्ते बेटे णदं मच र सः हए ६ । उ [ इ] 
मनिवीर द हा सोने मूच पेट है निर्ह अयीगरीका दुन नर 
५. खेद न ते ध 
रि कर्य ओह जातुधानपएति षो । 
खर तारी घुल द सेठ व सो ॥१७८६) 
म्ल पर्णे लिट सले ॐ रान्न रम ( र्ध ) हेषा ६, ४१ 
धृ मपी सदव स्मन्‌ सपनी ससद उद पमि शता ६ ॥ १०८ (च) ॥ 
चण ष्टो पिव ज मे) सव इद छम संवर ॥ 
भर ए रटे प ऊे र ।त्खने सेटि इच्छरषठि दे ॥ १ ॥ 
{छे ] षड यडा रान छे ये । देवर दन से इ मर 
य्‌ र एव अणि ते से प बगोड रघ (डेय ) सते ११ 
एमइह श ठंगर भवि पं । देन धनि णद्‌ पेरेसि चष्टै॥ 
वेषि मिष स्ट दद्व दयन्न । रच्छ चीव चै गष परादै॥२॥ 
रपण खम नश तम उने देना चना वच्ने ज देत । ठ ते 
मिक गा यर उसी ददौ नाश देखकर च्छे समने राण छक्र माग गवे | २॥ 
पिरि सट नर दसन दा । गड मोच सु मबड रिय ॥ ` 
उर सहन ज्गस जसुतानी । नि उह एवन सवधानी ॥ ११ 
क त्मने दूरःठर छा नमर दे { उतनी [ खानचम्बन्धी ] दित्ता 
मिय वीर 2 ण र इमा] = रोने सदा ऊद भः 
[ गहवालेडे स्ि ] दग यगन के ` रकन ग अपो "यनाय 
कयमकी|र॥ 4 
मि भख जग दि थू द । दो सड सयमीचर शवे 1 
पक शर कुनै एव॒ भवा । स्क .नान कहि ठै यादः ४४१ 








# वाखकाण्ड# ' ` १२७ 


ओोगधताक अनुखार धरयो वोटर रावणने सब राक्षसो सुती किय ¡ एक वार 
व ङवेरपर चद दौड़ा भौर उषड पष्पकविमानकनो जीतकर ठे आगा ॥ ४ ॥ 
दो कैखस पुनि सन्देसि जाई उदार । 
हप निज बाहु चला व्ुव छु एह ॥ १५९॥. 
किर उने जाकर [ एक वार ] लिव कैखात पर्क्रो उरा हिया, जीर 
मानौ जपन घुनासौष चर सौठकर बहुत ल प्र बः वर्तेर चल भागा |१५९॥ 
च०-सुख संपतति सुत सेन सहं । य परताप व इद्धि बाई 1. 
नित नूतन सव वदत जा । जिमि मिलन डोम अधिकं ॥ १॥ 
छल) सम्पति, प्र, सेना, सष्ठायक, ययः वाप, यल, हदि नौर बहाई-येऽ्व 
उक नित नमे [पैसे त ] ददते जते ये, जते प्लेक मपर लेभ बदृवा रै ॥ १ ॥ 
अतिग ऊुशकरम शस आता । जेहि क नदि प्रत्िमर जग जाता ॥ 
करद पान सवह पट भासा। लागव शद्‌ तिः घुर तरसा ॥२॥ 
अव्यत बलवान्‌ दुम्भकणःसा उसका भां था; निक योदकषा योधा नाते 
श्ट नदी हुमा । बह मदिरा पीकर छः मने शोयां करता था । उ्के जागते 
रीन लोकम तहका मच जाता था ॥ २ ॥ 
जौ दिम अति अह्र कर सोद । विख भमि सव चपर होई ॥ 
„ समर धीर नदिं जाद्‌ षलाना । वेषि सम॒ शमित वीर बरवामा ॥ ३॥ 
यदि बद मदिदिन मोजन करता, तव तो तमू मिश्च शीन द नप ( साली ) 
धे जाता | रणभीर दे" फ़ निवस बैन नकष भिया जा सता । | स्मि | 
क रेरे अरंएय वल्ान्‌ वीर थे ॥ १ ॥ 
आरिदनादू जे सुत ॒हास। भर महँ रयम छक शग तासु ॥ 
दि च हद्‌ ल समयुख कोद घुर मिति परबय कें ॥ ४॥ 

: भेषाद रावणदा या का या, जिका जगते योदानोमे पहला सेबर भा! 
मे) कों भो उवकरा सामना नहा कर सकता था । सग वो [ उदक ममे ] निय 
भद्‌ मी रती शी | ४ ॥ 

दो"-डसुख थ्पन , कषर भुम सतिकाय । 
' एक एक जग जीति सक पे छमटं निन्य ॥ १८० ॥ 
[ इर मतिर ] दुल, जकमनः व्द्तः पूमकेह जीर अतिकाय आदि 
ति भेक योद्धा ये नो उठे ही सार जगत्‌फो जीत फते ये|| १८० ॥“ 
०-कामस्प जानं सव, माया । समने जिन्हं  धरस च दाया ॥' 
दयुख देऽ सर्मा एक बारा 1 देखि खमित्त आपन परिवारा ॥ १॥ 

,. दमौ राच मनमाना स्य .वना सते दे ओर [ जु } मया जानते थ । 
मके दा-क स्म मी नह था । एङ गार समाम बेटे हए याणे अपने जगण 
वारको देला-॥ १॥ अदः 

छन परिजन - शाली । शने -को शार निः 
.् [५ न अभिमानी  बोा यचन शोष मद शी ॥२॥ 
1, पतवोन दी रौर उव दरक थे] ( वरी ] रतो नादिवोको 
गत ठी कौ सका या] अनी यको देखकर समाय हौ अभिमानी रा 


न ओैर गदं नी हुईं बायी वोज-॥ २ ॥ 





तष कूरे ती शिप वस्वा ४ 
ध) मैः रं द स सि छै ए ४६, 
हिल रमम तं छो दद एः १३ षम मञ्च 
५१ रेकद ५1 +> ९५१६ 
+ दि पेय शयु बरभें। 
= 1. एव । सप ३ ज कटु एद पया॥१॥ 
सव सल र ६८२३२ कुथ. २ छा | ठे 
सतै) [ ल) ण मे [वकः पद त् योर शरदःष 
समद्र गा ४1 व 
श्र कलत इर वः निरं द| । › 
1 म शेषि का ॥ (८१1, "` 


ओकसः ए रत एव्र प तर कद ॥ 
दे द मर शैः सम्।तिछ्े क मपिम | 
क उ लद तम भेर उ ठ नः [पे 
प मजार [पिर व भदे स्ने 
स्‌ कौ म मते समदत ए १॥ ् 
पिरदे व वोर 138 शर लष 
प प कद्‌ छग केरी, चरण्‌ नन ४९१ 
3 षै ले, रा । रम उ त के विष , 
थिह ने तक वारौ वः म भम भक्त 
त २॥ § 
ध ईदा कपर अवर एरर एम क हु एवै ५ =» 
ए शठ डोर शेत त र ते छे १६१. ^ 
गक पने प पते एतो उत दरस 
किते शौ | ती गक न ट तम दवे द पती इरे 
न सन्नि) ॥ १६ 
हे भे दाद से पछ द्व प्व | › 
(य करे बौदेः केठद १६ प्तौ ११६ 
सेरड रके दल्‌ पयर । ऋ रदः रर शि 
ति ने क्लः व दे श ६५१ ४ 
म्द क ठि जा पर । प्रियः रोदः इस ¶ एदा ॥ 
श क्र भत्‌ स क्ख नर ४५६ 
से मा वड येय ते 
रै #0; प्‌ २ दव पे भ्न तिल स स्रः क 
क मिहे मर ल नर 1९१ 





# धालकाष्डङः १९९ 


नर सिद्ध भजुज सुर नागा । इडि समह ॐ पथा खगा ए 
~ भक्ष नहं रुगि ४ दणुल भसवरदौ नर नारी ॥ ६४ 
' वितर दः मनुष्यः देवता ओर माग समते पौरे ऋ शपू प गया 
किदौको मौ उठने शन्तूर्वक नही बैठने दिवा ) । नहयानीको खि जेत सदीर- 
प ज्लीुषष ये, सभी रावणे अधीन शे गये ॥ ६ ॥ 
` यमु करं सकर भयनीतता । नंदि आद नित चरन धिनीता ॥ ७ ४ 
इ मरि समी उश्की आशक पाठन कते ये जर भिय आकर नप्ता 
च किर ॥४ १५ न 
°--धुज्व्रल घस्य न युतं । 
मंडी मनि रान णज करद निन मंन १८२(९)॥ 
उदने भुजाभोके षले सारे विश्व षार्मे कर दिया किपीको खर न्दी सने 
दिया । [ इ प्रकर ] मण्डै राजा्ोका धितेमणि (दशमोप पपरर्‌) रााभपे 
इन्छानुखार रारप करे ल्ग ॥ १८२ क) ॥ 
हेव जच्छ गंध चर रकिनर जाग ऊुमारि। 
जीति धरी निन वाहु वल . धह सदर दर नारि ॥१८२८)॥ 
देवता, यक्षः गन्दव, मतष्य निर जीर नागोकी %न्याओं तथा रही जन्य 
शद भर उतम योक उने अपनी यु नभेक्िवस्े जीतकर व्यद ॥१८२(ल्‌)॥ 
सरौण-दबजीत खम ओ कदु कड । सौ सव अलु पदसं करि रेड ॥ 
` धयम बिन करटः मायु पुनद । तिन्ह क चरित सुनहु जे कना ॥ \॥ 
` भषनादते उने गो यु क उस उठने (मेधनादने ) मानो पडे द कर 
सखा था ( भात्‌ गगम कडनेमरकी देर यी, उने मालपार्नये तमि? भी देर 
नध की ) निनको [ र्णे मेषनादसे ] षे ह खाय दे सखौ थी, उन्दने ब 
शरत उन एनो ॥ ९ ॥ 
देखत भीमरूप सब पापी । भिसि निकर दैव परिवापी # 
„ करा उपद्रव भुर निष्ठया । नाना स्प घरि ररि माया ॥ ३॥ - 
एष राक्ष्ठफे घमू देखने बडे मानक, पापौ बौर देवता दुःख देतेषाडे 
३। दे मोम खमूह दपर कते ये ौर माये भो प्रर स्प घे ये ॥२॥ 
केहि बिधि हो धमं निरबूला । सो सथ कं देद्‌ भतिद ॥ 
. जेष जेहि वेस वरु द्विव पाव । कग शदे पुर आगि खानि ॥ ६४ 
. भि प्रकार षमी जद कटे, वे घटी सष वेदिदं काम कते ये] जिर-जिव 
शन देमौ मौर नाको पति थ, उषी नगर गोर गौः पुरं माय छणादेते षे ॥ ६ 
शुभ धच कतं नहिं हों । देव विप्र गुर मान त कर ॥ ` 
ट इरिमिगसि अस्प तप जाना । सपने निम न वेद्‌ शुरना ॥ 9 ॥ 
[ उनके फे ] कृ भी छम आचरण ( बरघ्गमोनर्, यकत श्रद्‌ आदि ) 
न हेते ये। देवता) ग्रहण योर शुरो कोई नह मानता या | न हरिभक्ति मी» न 
भष, प जद शान था । वेद ओौर पुराण तो सम मी सने नी पिते े ॥५॥ 
४°--जप ओग विरागा तप॒ मख भागा वते सुन दससीला । 
अपुञु उरि घाद रहै न पावर धरि सव घाठाए खसा 1 
रण्षण्श- 





१३७ # रा्रचरितमाभल # 


मस ब्र अचार मा संलाय धभ सुनिम सिं फाना । 

देहि बहुविधि जास देख तिकाखह जो क वेद्‌ पुराता ॥ 

ख योगः वैराग्य, ठ तथा यश [ देववा्ोके ] माग पनिकी बार रावण कटी 
कति युन पात, ते [ उषी उपय ] सयं 9ठ दकता | क मी रहने नह पाता, 
वह एवो परकर सिल कः शाष्ता या । संसारे एेख भरष्ट आचरण पैर गां कि 
धमं तौ कषे भी इनम नद गात था; शो को वेद भर पराग कहा, उत्को 
षू तरले त्राह देता ओौर देशत निकार देता था! 

जे--परमि त जाद्‌ भीति घोर निखाचर जो फर । 

हिला पर भवि प्रीति दिन फे पाहि फवमि मिति ॥ १८९ ॥ 
गाल्रोग जो घोर अत्याचार फते थे, उपशा षणेन नही रिया जा सता । 
खपरी जिनकी परीति दै, उनके पापक क्या वकमा ¦ ॥ १८३ || 
माएपारायण, छठा मिभाम्‌ 
चौण-पादे सऊ दु धोर खारा! कपट पर्न परदारा ॥ 
मानद माहु व नरि देवा । सादुन्ह घन करां तेवा ॥ ५ ॥ 
पाये घन ओर परायी लीपर गन ऋछमेवाढ ट, चोर ओर शारी भूटूत षद्‌ 
गै लेग मावा प्र देवताभोको नही मनते धे भीर णुमो [ की पवा कना 
श दूरा) उट ठन ] घे सेवा कवते थे || १॥ 

लिश के यह भाचरन वानी । ते जानु निसिषर त प्रानी ॥ 

तिय देखि धर्म फै हानी । परम बीत धरा भङुखानी ॥ ९ ॥ 

[ शीशी फे टै कि-- ] हे मषानी | शिन देसे भाषण है, उन घव 
माभि रक्षत ए घमहाना ! ए प्रर षम प्रति [ गो ] मतिम म्डानि 
( भदवि, अनाखा ) देखकर ्षयी अत्यन्त मयमीते एवं व्वडुढ हो गमी ॥| ९ | 

गिरि सरि सि भार च्म 1 जस मोदि गदम्र एक परद्रो 1 

सक धम॑देखद्‌ ध्िरीता । कि न सकु राषन भय भीता ॥ ३ ॥ 

[ बह सोचे मी मि ] पवतो, नदिय भौर समदरोका बो ग्ध टना मापी 
नी नान पदता निता भारी यतरे क पोही ( दूर्तेका भनि शाला ) छता 
६ै। व स पमन तरिपरीह देल खद, पर रामे भवमीट हे बह इक पो 
नै सकी ॥२॥ 

धेलु रप धरि दे धिचारी । ग़ वषं भुर भि शारी ॥ 

निल संवा युनक्षि रोद । हू तें षञ देवल न धोद ॥ ४1 

[सन्म † हणे णोच-कििङरः भीक रप धारण फर पर वरत गयी जरत 
सव देषता ओौर सुनि [ छम ] थे । पी रेक उनको थप दुःख चनामा, प्र ˆ 
मिती छठ काम न बना ॥ ४ ॥ 
४०-्ुर सुनि गंय मिलि फरि सरव गे विरेचि ङे टोका । 

संग गोवदधासी भूमि विचार परम विकड भय सोका ॥ 

ब्रह्मं स्व शाना मन शलुमाना मोर क्र न बसा । 

शा करि & दी स्तो मबिनासपै हमरेड तोर शहा ॥ 

एव देषा पुनि शौर गन्धव सव मिज ब्रहा्ीके छो { सत्यो) को गये | 
भय बौर गोकते अयन्त वाढ बची पवी मो गोका शरीर घरण किमे हए उनके 





क बाठकाण्ड १३१ 


खय मी । ब्भ उव जान गवे | उन्न मने जहुमन किया कि इतं मग मी 
ब्ग दसमेषा | [ तव उन्न पवी कहा त्रि-] निकी दु दासी ३, वी 
अविनाशी हमार भौर ठमहास दोनो सहायक ६ ] 
सो°--धरनि धरहि मन धीर कह विरोचि दरि पदं समिर । 
जानत जन कौ पीर प्रयु भिदि दाखन बिरति ॥ १८४॥ 
अर्चाजीन कड धरसी { मनमे धीरन धारम कर शीदिकै चरलौका सर 
करे । परय मपने दादी पीदा जानते है, ये ह्री कठिन पिपरा भागा 
~~ षरेगे ॥ १८५॥ 
चौय सुरे पय पराह भिचा । क रद प्रथु करिब पुकारा ॥ 
र य जान क॒ । कोद पयमिधि यस प्रु सोद ॥ १ ॥ 
ख्व दधता येउ विचार फे ठो रि प्रग करो पाथै तामि उनके समरे 
पुकार (फरयाद ) करे । कोई ैडृणठपुरी जानेको कहता था धर करं करता था पि 
बही भध क्ीसुद्रं िषाए कते ई ॥ १॥ 
जाके हृद मगति जपि प्त । प्रषु दह भगद सद ते कीवी 1 
तें समाज गिरिमा भै श ¦ अवसर पाइ चन एक कठ ॥ ९ ॥ 
चित्के हदे जैसी भक्ति ओौर प्रति हेत है, भथ ब ( उसे के ) सदा 
उशी शीते भकट होते ६ । हे पारवती ! उड पमा मै मी या । अनर पफ मने 
प पत्‌ ्दी-॥ २॥ 
,. ` रि स्परापकं सर्व समाभा । प्रम ते प्रद होषि घ्राता ॥ 
देस ठ दिस बिदिसिड माही । फषटु सो ककं वरं परु ना ॥ ६॥ 
भतो यह जानता ट कि भगवन्‌ श्व जग समानरूपे वमाप द, प्रेमे प्रकटे 
जवे ६। देक कार, दिदाः विदि बतागो, देशी न्ह कै वे न हे ॥\॥ 
खग सगमय सय रदित विरत । मेम सै प्रयु प्रग जिमि भागी ॥^ 1.“ 
मोर षच घव के मन मागा । स्च घाषु करि ब्रहम यज्ञाणा ॥ ४॥ 
वे ्राचपमय ( चरावरमेवयाहठ ) हेते इए ह छदे रषि ट ओर पिरक 
६ (अनी कही आकि नदीं दै); परे प्रकट शेते ३, मैय सन्न । ( समन 
जव्यकस्पसे सर्वत्र व्थात ‰, प्रतु जरे उसके षि अरणिमन्यनादि साधन पिये 
जते £ देहो बद प्रकट दती दै । इसी प्रकार स्व॑र व्यत्त भगवान्‌ भी परमे परकेट 
हते ई 1) मेर] बात उको भिय वी । माने (ड षु कहकर बदा की ४] 
दो नि विरंचि मन हरष चन पुखकि तेय इह नीर । 
अस्तुति रत जोरि कर खाबथान मतिधीर ॥ १८५ ॥ 
मेरी वात यनक ब्ज मने षदा इषं मा; उन तन पुलि शे शया 
कौर तेवर | परे ] ओद्‌ बने को । तष वै षीरुदि बर्ा् साक्थन छेक दाप 
भेदक दति कले ॐ-॥ ९८५ ॥ 1 
&°~-जञय ज्य सुरायक अन सुखदायक प्रनतपाल -गरवता 
गो दविज शिदकारी जय दिता भरि कता ॥ 
पान शुर धरनी ब्धुत करनी. मरम न जानदर कों 1. 
ज्ञो खदने छृपात् दीनदयाल करट अुपरह सों ॥१॥ 
हे देवता्भोकि स्वामी, ठेवो सुख देते, वरणागतकौ रधा कनेवले 


1 ॐ एमश्चरितातस ₹ 


| मागे ज्य दे | चय हो ] हे गो-गहर्पोक छित नेवल, मसु 
4८१ मुदरी कन्या ( भीलन ) के प्रिय खामी | आपकी जय दे | 
दै देवता सौर एषवीका पार करनेवाले ¦ आपी सील सक्‌ &। ठ्ठ मेद कोद नहँ 
जनता । वे मो समा ही हग ओर दीनदयाढ हदे € हमर छग करं | ६॥ 
श्रय जय व व न (५ ॥ 
मविगत रो्ीतं च तं मायारहिति सुकुदः 
ङे डागि वियगी अति अमुरगी विगतमोड अुनिददा ! 
निस दास्‌ ध्यव गुन सन गावि अयति सदानंदः ॥ २॥ 
दे समिनादी, सवके हृदयम निबाछ केले ( अन्तयामी ); सदन्यपके, परम 
अनन्दखस्प) अशेयः इन्दे परः पमिनरचरित्रः मायसे ररित सुन्द ( मेधदाता ) | 
पकी जय शे ! य हो [| [ इष लोकं शौर परक ख मोषे | धित ता मोहरे 
एवया टे हए ( गानी ) सनिन्द मी अलन्त अनुरागी पपेमी) बनकर निनन्न रातदिन 
श्वान ऋते ई ओर धिन गुो$ मूको गान कते रै, उन सशिदानन्दकतो य शे॥२॥ 
नेहि इष्टि उपा भिविध धनां संग सहाय न दुजा । 
सो कड भारी चित -हमारी जानि भगति न पूता ॥ 
ज्ञो मच भयं मंजल शुनि मन रसत गंजन विपति यदथा । 
मन्‌ वच क्रम वाती छि सखयानी सरन सकढ ुरजुधा ॥ ३॥ 
जिन्हमे दिना की अ अयना सहायक अरे ही [ या खयं अपनेषो 
निशुगर्मः गाः भि्ुः स्पार अथवा विना की उपादानकारण 
र्यात्‌ सवं हौ सता अमिनिभिोगदान कारण बनकर ] तीत प्रद्मरदी खि 
उतत ओ वै पाका नाश कसेवाछि मगञा्‌ इरी मि ड) इम न भि नते ४ 
नपूला¡ न रंश { नन्मे) भयद् ना कलेव, युन मनसो मानन्दं 
सग मर नपि सह न करभ य स्व देवार यूह म, कथन 
भर ऋचि शं फरक वान छोड उन ( मदान्‌ ) की शरण [याये ] ई ॥ 8 
सपद शरुधि छेषा रिपरय असेषा ज्ञा कडु कोड नदिं जना 
सेदि दीन्‌ पिर वेद पुकारे षड सो धीमगवाना ॥ 
भद वारिधि मंद्र खव धिभि दुंद्र गुन मंदिर सुपु । 
सुनि सिद्र सकट छर परम यातुर्‌ नमत नाय पद कंसा ॥ ४ ॥ 
व 
र £ पेखा वेद यशर्र्‌ » वे ही श्रीमरषान्‌ मपर द्वा 
इरी उमे { मयने ] स्मि मन्दचडल, सव व न श 


ओर लोभ रावि नाय { आपके चरके › दिद जर खरि ध 
भलन्त व्यङ्क्त केह | ४ | व 


दो*- जनि समय सुर भूमि शुनि वचन समेव सनद । 


देवयो मोर पीके मदमद जनक बौर उनके स्मेह दचन 
शेक भौर देको रेवारी सम्भीर भागा्चवाणी ईं ।। १८६ ॥ ५ 
चण~ननि इर सुनि सिद दरः । दि छनि षरि रर बे 

भं सदव नुन मवार । छं भियक्र वर ददा ¶ १ ॥ 


~, #ै.बाटक्ण्ड # १३द 


-------_~-~~_~~~~~~~_~~_~_्‌_~~_~~- ~ 
` हशरनिः ष्टि भौर देवागो$ि.खामियो ! डरो मत । एष्य व मनुषयकश््‌ 
घरण गा ओर उदार (पचित) स॑ असह नषयनन मवार ॥२॥ 
कल्प भविति द्ातए कीन्हा । ठिनह कट पूव घर द्द ॥ - 
` ते दुसर , कौसल्या सूया । दोसर प्रगट तर भूपा ॥ २॥ 
कगूप बौर अदितिने कड़ा मारी ठप कवा या । तँ पे ही उनको दर दै सुका 
ह । वेह दशरथ भौर त्वा पमे मतष्ोकसवा कर अयोधापरीम प्क हुए ह ९ 
सिन्द ४ गरदं अवतरिहँ जाद । रुङुरतिषकं सो चरि माहं ॥ =, 
मारव भवन सत्य सवं करिह । परम सकि समेत अवतरिदर ॥ ३॥ 
उन्दी षर जाकर गँ खुकुरमे भे चार मायके रपे अवतार दगा । मादक 
स्व वचन ग कतय करेगा सौर अपनी पाशके सदिव सतार दग ॥ ३ ॥ 
इरि सकल भूमि गरमा । निव होड दैव सुदा ॥ 
गगन ब्रवायी सुनि ना । हुरठ फिरे घुर द्य इद्गना ॥ ४ ॥ 
मै वीक रव.मार हर दगा + हे देवन ! ठम निर्व हे आभो । आश्राशमे 
बह्म (भगवान्‌ ) की बाणीको कासे नकर देवता रत लैट गये । उनका दष 
श्ौतल शे मू ॥ च ज २ 
श्न घरनिषि सस्या । धमय अवा॥५॥ 
तव ब्रह्माजीन पृष्वीको रगकचाया } वह भी नर्मय हहं ओर उत भीमे भरोसा 
( शाद ) भा गया ॥५॥ 
“ दो-निज लोकि विरंषि गे दन्द इद सिखाद 1 
वानर तनु घरि धरि मि रि पद्‌ सेव जाद ॥ १८७ ॥ 
देवताओं यही सिखा कि वानरो शरीर धर-कषकर ठमलेग एध्वीपर साक 
भगवान चरणो की तेवा फो, बअष्ाजी अपने छोककषो चे गये ॥ १८७ ॥ 
चौ०~गएु देव सब निज निज भामा । भूमिं खदित मन क विभरामा ॥ 
श्रो कष्ठ सायसु. बर्मा दीना हरषे देव धिषव न शीम्ा ॥.4 ॥ 
„ शष देवता मपने-अपने लोक्क्र गये एषवीसहित खवने मनो शान्ति मित | ्षागीने 
नोक आहा दी, उस्ठे देवता बहुत प्रर्नहए घौर उन्न [वैष केम )देर गदी की ॥१॥ 
बनचर देह प्री हिति माहीं । अहरिति दर रवार निन्द पा ४. ^ 
भिरि तदं नख आयुध खव वीरां । इरि मार्ग चितबरहिं भविधीरा ॥ २ ॥ 
' ए्वीपर उन्हने बानरदेह बारण शी । उनम अपार क भौर प्रताप थू । समी 
शूरवीर थः पर्वतः दरशन ओर नख टौ उनके श ये । वे धीर दुद्धिवि [ वानरस्प्र 
.. देवता ] भगवान आने -राद देखने ख्ये ॥ २ ॥ ि 
1 निरि कानन शह सदः सरि परी । रहे भिज निज अदी एचि रूरी ॥ 
पह सद रि चरित मँ माषा 1 जन छे सुन जो चचिं रतम ॥ ३ ॥ 
वै ( बानर ) पवतो ओर जंग नक तः अपनी-अपनी सुन्दर सेना बनाकर 
भूर छा गमे | यह घव बुनद्र चरिव ने डा । अब चह चरि नो निमे वी वहीँ 
छे दिवा था॥ ६॥ क स 
श्ड। 
ववि स्यानी । हदये मति मति सारंगरानी ध ४ ॥ 
वधयु सुद्धरूथिरोममि दशरथ नामे राना हुए, जिनका नाम वदो 








. ॐ यमदस्तिमातत्‌ # श ___ + एम उना -------- 


~ 4 
स्मर्यः शुके मार ओर छानी ये । उनके इदयं ब्म 
तिरति ठम मी पतौ य 
दोगा करि भिय छव आचरन पुती । 
पवि अुक्ुठ भेम इद्‌ हरि पद्‌ क्ख विनीत ॥ १८८॥ 
उनी श्रवलया भादि य यमि मी पतिन आचरणाय थी \ म [गदी । 
वित ओ परे अदु [ उकम ] वौ जोर हके चरमर्नम उनका 
दुरे या ॥ १८८॥ मे 
शग यार चूषति मन साह । मै गानि मोर सुत नाष ॥ 
ची. क न सियाल 1 चरन खागि रि दिनव दिघ्ष्ा ॥ 4 ¢ 
प वा रात भर वदी ग्नि हर भर ध नद है । रा हरत द 
गु धर गदे बौर चेम प्रणाप एर हुत विय की ॥ १ ॥ 
किस ल सय शरि कयउ । कहि बति बहुविधि स्ुागड 1 
धरु धीर होषि घुर चारी । तरियुवन दिदितं सगत मय हारी ॥ १ ॥ 
रात्र मपना खया तदः शुरो सुनाया । गु वदिन नद बत परक 
स ओर श्हा- ] बीएल धये, दमे बर यवर हेये, नो तीन सेकेमि प्रधि 
ओर मक्तोफ मयो इृलेवलि गे ॥ २ ॥ 
चरी रिषिषटि यष यीरावा । पत्रकम सुभ जप्पर करवा ॥ 
गि ससि धनि आटु दीन्दं ¦ प्रदे लपिनिं चरु कर सीमं ॥ ३ ॥ 
बथिषरलने शी गो दलनाथा यर उनहे शम पूप पश कावा । 
नके भकतिसित आहुतयो देनेपर अग्निदेव हाये चरे (हविषा, सीर) एमि 
शकट हुए. २ ॥ 
ज्ञो बिष कष्ट हरथ विषरः । क क मा सि्‌ पुधारः ॥ 
यद्‌ हवि ौटि देहु मृष चाद! चथा सोम नेहि मण बन ॥१्पर 
[बीर द्गरथस बोडे--] विष इये नो इछ कितारा या, हमारा वइ 
छर कम्‌ सिध ले गा 1 हे जन्‌ | [ भव ] बुम जार व शषिप्याक्न ( पाय) को) 
निघ्न वै उचिते; वैषा माग बनाकर वोद दो 1 ४१ 
दोव धस्य मय पाचक्त सक समदि , समुषा६। 
परमा्ंद्‌ मगन नए ॒हरष भर हवर्यँ समाद] १८९ ॥ 
तदनन्तर यगिनदेव खारी राको खमश्वाकर भन्न हो रये ! राजा परमानन्द 
म्‌ ते गवे, उनके दयम छं समाता न ख ॥ १८९ ॥ 
चवरी रद भिय नरि बोई । कौल्पदि रह चि आर ॥ 
अधौ भाग कौसल न्दा । ड्य माच सा कर कीन्हा ॥ १ 1 
„ उशी दमय राजनि अपनी प्यारी पलिको बुला! सत्या आदि सव [गनि] 
ब चं आ रानाने [ पायक ] माधा माग क्रौषत्याको दिया, [ ओर शेष ] 
साफ दो माय कयि ॥ २॥ 
क नरप सो द्वज रो सो उमव माय पुति मक १ 
कौलव्या चेद दाव = 1२४ 
६ (उनम एक भाग ) रने केकेयी दिया] येष ज उच डा उत्करे 
पिर दो माग इए भर माने उनसे गरया मौर क यष सतक ( मर्तु 


गारन्ड १ श 


1 
उनकी अदत छेक}, भौर इत भ्र उनञच म्र कृ षिामनेदिवा ॥२॥ 
पि बिधि गर्हित सय नारी ¦ मई दर्थ इरपित सुस भारी ॥ 

जा वितत १ गभि माए 1 सक ठोक श्ुख संपति छाए ॥ ३ ॥ 
इख प्रकार सव लियो गरभदती हई । बे हदये बहत हित हई उन वहा 
छ मिला ! जि दिने भीदरि [ रीड ही] गर्भम जवे, सुर लोकम इख सौर 
सम्पत्ति छा गयी | ६ ॥ . 
मंदिर महै घब रानि रानी । घोभा सीर तेन की खानी 
सुल शत कुक सार शि गयठ । हि प्रु ट सो अवसर भयडः ॥ ४ 7 
शोमा, बीड श्रौर तेजकी लान [बनी हु | घव रानियो महर घुयोभित दुर । इष 
मरशनार कुढ उमय सलपूर्वक वीय मौर बद मबूसर आ गया निरो धको प्रकट होना या ।४। 
दो जोग कुगन प्रष्ठ बार, विधि सकढ भप भलुकरूठ । 
चर अद भर्‌ हषं यम॒ जनम लमू ॥ १९० ॥ 

योग, छनन, रह, वार ओर तिथि भी अनुकृ हे यपे । जह गौर चेठन ख 
इषवे मर गये । [परो ] रीरामक्न जनप सुला मूल दै ॥ १९० ॥ 
चौ०-नौमी तिथि मघ मास शुभीता । सुकुढ प अभिजित हरिपोता ॥ 

मध्यदरिवस अति सीत त घाम । वन कष्ट रोकं यिश्रामा ॥ १ 

पयित चैत्रका महीना याः नवमी तिथि यी | श्प मौर मगना प्रिय 
मभिम्त्‌ शद या । दोपहर घम था । न बहुत खी पी न धूप (रमी) थी । 
व पवित्र समय सव ल्ेकोको शान्त देनेषास था ॥ १ ॥ 

सतश्च मेव धुरभि यह चठ । वित घुर संन मन चाड ॥ 

अन सुमित शिरि गन मनिभारा। क्वाहं सक सरिताऽतेभारा ॥ २ ॥ 

शीतर, मन्द्‌ मर दुगन्धित पवनं य रदा था । देवता र्षित पे भौर संडे 
भुनमै [बदा]. चाब था । घन पठे हुए ये, परवतो घमूह ममिरे जगमगा रहे थे 
ओर सारी नियो भषतदी भारा बहा रदी थी ॥ २॥ 

सो भवस चिरंधि शब चाना । चे सक्छ सुर सालि चिमाभ। ॥ 

सगन निर संकुल चुर भूखा । शाविं शुन गंखयै नरूधा ॥ ३ ॥ 

जर्‌ ने वद ८ मगवानछे क्ट नेका ) मनस जाना, इव [उनके 
समेत ] शर देव] मिमान सजा-पस्‌ चरे । निर्मलं भका देवेति मर्म भर 
गया [ गन्धव दढ गगौ गान फले च्येः ॥ ९ ॥ ` 1 

मपि सुमन दुभेडलि सानी । गमद गगन इंहनौ दानी ॥ 

अस्तुति ` करं नाय ञुनि देबा । बहुविधि खाद निज निज सेवा ¢ ४ ॥ 

, ओर सन्दर अज्ञलि उजा-तवार्र पुष्य बरखाने गे । आके पपरादम 
नडे बते कगे । नागः शुनि शौर देषता खदति कएने को जोर बह मारते लपनी- 
अपनी सेवा ( उपहार ) ग प 

कषे समूद ज निच धाम । 

क रु प्रगे अखिल लोक विश्वाम ॥ १९१ ॥ 
देवसा्भोक समू विनती करके अपने-अपने लोकम जा पते । साल लोकरको 
शानि देनेवाठे, जगदाधार भ्रमु मकट हुए ॥ १९१ ॥ 


१३६ # रामचरितमानस # 


छम प्रसदः पाला दीनश्याला क्षौसर्या हितकारी 1 
रित महदारी सुनि भल हारी अद्भुतं रूप दिचारी ॥ 
खेखनं अभिमा दतु घतस्य निज मायु सुज चारै ! 

यनमाद्य नयत विद्या सोमादिघुं खरार ॥ १॥ 
दीनोपर दवा कलेन, कौर्मे स्वकारी शा प्रषु प्रकट हुए | नेति 
समको हलेबाठे उनके अद्भत सव्् किवार शके भादा छसे मर गवी नेतरौवो अनिनदेष 
देनेदाा धके समान यथामशयर धा; वारौ युजारममिं अपने ( खा ) आयुधे 

[ षर क्म इए ] थ [ द ] मामूषण चौर वनमास् पने य; षे नेन ये । 

एत कार शरोभक उ तणा उर रारो माले भगात्‌ म्रकट हुए ।। १ ॥ 
कह दुर र जोरी अस्तुति तेरी देहि पिधि फरौ भर्ता । 
माया शुन ग्यानातीत असमाना वेद॒पुरान भहा} 
रनः सुख सागर खच गुन सागर जहि गाबहि शति संता 1 
सो ममर हिद गी जत बञ्ुरागी अयद गद ` धीकंठा ॥ २॥ 
दोन हथ नेर माता कदने कसी--हे अनन्त | रद प्रकार दारी दति 

द} दद शौर पुराण मके मावा, गुण भीर शाने परै ओर परिमागरहि तति 

६1 शत्यो ओर रखल्न दवा ओर चुखन्न स्र द पगम धाम कक जनका 

मनं (१ शह भक्तौ भेम एरनवकि उमीपति मगमत्‌ भेर शत्ाणके लवि 

प्क ह८१॥ २] 
अरह्मड तिकाया तिभित माया येम रोम प्रहि वेद्‌ षै! 
मग उरखो यासी यद्‌ 1 1 

सुद्धकाना अरित षह ॥ 
ष शा चुं आहु ५ जदि भकार सुतभे है ॥ २॥ 
[क : ौ ६ ध (9 ॥ रषे ए मनेन रमणक समूह 
1 १ इनमें --श्र टकी वाते उुनेपर धीर (मदेकी युस्पै- 
१ इसि (सिव देगी) । र 
५ च्म थन उलन हुभा, एव पठ धु्ये । ३ हुत यकारे चरन 
भना शाह । मलः उनि [पूनम ] इ जरया इर रतम समय, 
निष्ठ बृख्व} प्म त हो ( मगब्छेरि पुत्रमा ह साय ) ॥२॥ 
मि डोली ठजड तात यह रपा ! “` 
प चि अति भियसीखा यह्‌ छख परम अनूपः ॥ , 
छि भम याय र्न दोना दोर शालक खरमू् 
यह्‌ चरिठ ञे गाव हरिव पावषटि ते न परि भवकूपा ॥ ४ ॥ 
मात्रकी द हदि बदर गवी, ततर बह फिर गरोढी-३े तात ! यह ठप छोदकर 
सलन्द भिव बाली करो, [भ स्थि ] द सुसर परम अनुपम होगा | [ मतन] 
यह्‌ वचन चुनकर देवताथेकि ामी दनान भयाने वाक [स्म] देष सैना चह 
क दिव ] [उन्ती कै ई] ने ए णिग मान क ह,३ भीदरका 
१३ पदि ई मौर [किर ] रसारलम त सही पिते ॥ ४ 
वमि धैव चुर संत हिव ऊीन्द मनु अवनार | 
निन छठा निगल तदु माया शुन मोर १ १९२} 





1 


# वारकाष्ड # १३७ 


दण) गौ, देववा भौर तोड़ व्मि मगवानुने भनु अवतार प्म । मे 


[ अ्नमवी, मिना ] मगा रौर उक गुण ( एत्‌? रख त्म ) भौर [ बाहरी तथा 
भीतरी दन्य पर ट! उनमा [दिन ] रीर अपनी इच्छे ही ष [क्वि 
कर्मन्धनरे परवद होकर नियुणामक तङ दाम राय नर् ] ॥ १९२ ॥ 
सौ०~सुनि सि खद परम प्रिय बानी । सभम चलि आदं सव रानी ॥ 
0, द ए मगन सक शुरवासी ॥ १ ॥ 
च्चे रोनी बहुत प्यार नि सुनकर एव रानि उवी शेर दौड छी 
भारी दास्यो हित होकर जे दोढीं । सरे पुरवादी आनन्दे मे गये ॥ १ ॥ 
रथ पुतर्न्म सुनि शाना । मानु बरह्ांद समाभा ॥ 
परम भेम भन शुक सरीया । चाह इट्‌ करत मति धीरा ॥ ९ ॥ 
रा ददयरथजी पुत्रका जनप कानोरे नकर मानो. ब्रहानन्द्र घमा शवे ] मनु 
अप्य पत दै, शरीर पुरष्ठ दो गवा । [ आनन्द मीर ह ] इनो धीरन 
देक [ भौर परमम रिषि हुए. चरीरको भाद्र ]. मे उउना बाहे | २॥ 
जाकर भा सुनत घुम रं । मोरे शष्ट धावा प्र सोदरं ॥ 
परमानंद परि मन॒ राना! टा बोछाद्‌ यजवदु॒श्राना ॥ ६॥ 
विनो भाम हतै ह शंष्नाण हता, वही प्र॒ मैरे षर अये दै | [य 
शचः ] राजका मन परम आनन्दे एणं हे गा | उन्दने भ्रनिषालोको धुखकर 
कहा फ़ मामा बनायो ॥ ३1 
शुर यसिष्ठ करट गवय कारा । आप्‌ दिनन सिह पूपद्वार ॥ 
भलुपम॒याषठक देखि जाह । रूप रासि शुन छटि न सिरां ॥ ९ \. 
य बेशि्ठलीके पास ुखावा गया | त्ा्र्णोफो सय स्थि याबहरारपर आगे । 
उन्न लक शदुपम बालके देला; नो रपश् राि है मौर नि युप कने 
पातत नही हेते ॥ ४॥ 
दो-नेदीघयुल सराध फरि जातकरम सब, कीन्द । 
हयक चेतु षसन मनि शप विन्द फर म्द ॥ १९३ ॥ 
किर जानि नानदीदुख भाद करे सष शतकम भादि श्ये भौर 
पामणोो धोना, गौ, ष्च ओर मियो दान दिया ॥ ६९२ ॥ 
परौ०~ष्वल पष्क तोरय पुर छा । कष न वा दि भाति घावा ॥ 
॥ जमन इषि थत ते दो) बरहान॑ह . मगन घ्म क ॥ 8 ॥ 
` ध्वजा, पाका भर गोरणोे नमर टा गया ! जिस शरकारर, वह घमा गयाः 
उत्का ठो मेन शौ यहे चकवा ! शरदे एमी कृं हे रही ह, खन एग 


` अऋऋ्मनन्दं मदम ह|| १॥ 


छव ईद भिक ची शोगा सदन दिगा किदे टि धई ॥ 
कनक कलसं मेगक् भरि यारा । गवत ¢ 199 
म चछंड-कीनं चटी | सभाविक शगार उठ 
१ ङ्ख देव्य मरकर याती हुं राजधर्मे परे 
ऋत ६॥ २॥ 
करि भरति तेष्ठवरि रही । शार भार सिरु रनन्हि परी ॥ 
भराघ सूत वंदि गण गायकं । पाद्यं॑शुन गावं रदुमत्यकं ॥ ६ ॥ 


१६८ # शमचरितमानसं # 


न~~ 
निढव्र की ह मौर रवार द्ये चरणोपर गिरती ई । 
क ओौर गद वये लाम विष णो गान परे ह ॥ १॥ 
सर॑ दान दन्द सव कह ¦ मिं एवा राद्ध नहं ताह ॥ 
यमद र्दन मं कीच । सो सकल बौविनड विच यीदा ॥ ४ ॥ 
सुजने खड किदो भरपूर दान दिवा ] भरने पाया, ठन भी न रला 
(य दिवा) । [ नमत ] दी गवो दव वीदे कतरी, चनदन ओर गेरी 
कीच मच शयी ॥४॥ ६ 
दोण श वाञ्च दधाव दुम प्णटे षमा कंद । 
रपव छदं अर्द तहँ नगर नारि नर दद्‌ ॥ १९४ 
थर पङहमव वाया वते लगा थो माके ९१ मगान्‌ परकर हए ६ 1 
भगस खी पुखर ध8ॐ हट उदरं आनन्दम हेरे ई ॥ १९४ ॥ 
चौ०-केकय भुर सुमित्रा दडः । सुंदर सुद अनमत भै लोड ॥ 
ट्‌ शु संपति समय पमाया । एहि न सक्‌ प्रद्‌ चहिराजा ॥ 4 ॥ 
न शिता एन दोन भी इन्दर पको मन्म विया । उष सुल) षपति, 
एय शौर माजा वरगन ससत ओर एप रामो गेएली ‰ नह कट सकते ॥ १ ॥ 
मधुरे सोह एष्ट मती । प्रयु मिष्ट शा जनु राती ॥ 
दि शु जु मन ङु । तेपि वनी सध्या अलुमानी ॥ २ ॥ 
अभ एव अकार शोभित ते रती टै मानो रानि प्रषु मिमे भागी हे ! 
ओर पको देखकर मानो मरन धटुचा मवी षे, पटर पिर मी मरम बिचारवर षह ~ 
मान कष्या क [कर रद ] गयी रे ॥ २॥ 
अमर भूर बहु सहु अैधिभआरो) दष्ट अपो मन अरतारौ ए 
मंदिर ममि समूह जनु चपा कृष द करप सो दहु उपरर ॥ ६॥ 
भरती धूपन दुतस्य मानो [ उनासर ] भन्दै यौ सो अवीर 
उद्‌ शार, ऋ उरी साई र । मयम नो मिवे उह ६,३ पानो तारागण 
४) सका चो शल ३) शटी नो भेड ददम रै ॥ ३ 1 
सवव देव इनि भि शुटुवानी। भरु छ या पप जु सानी ¶ 
कत देसि पतय शाना । पक. मास ते आठ ग जान ५४ ॥ 
रनमबनमे ओ अतिमः वारे देदषवमि हो र ४, धरौ मानो चये 
( एमयानक्ढ ) एनी दुरं पश्यो भस्वदाहट है । २ गफ देखकर पूं भौ 
| भनी अड ] मू पये ¦ एक महीना उन्दने जत हुमा न जना ( अरब उँ 
एक श्ना मही कीत गया ) | ४ ॥ 
दो“-गस दिव कर दिख भा मरम न जान्‌ क । 
२५ लमेत रवि थाके निसा आवन विधि हो ॥ १९५ ॥ 
महीने दन हो गया । ख खमते ऋं न जनत ¦ घं अपने रथव 
कही सक गय, पिर रात कित उड देती 1 १९५ ॥ 
० शस करः, नहि आना । द्विनमनि चे कत यच गना - 
देखि महोत्सव सुर युनि नाग । ले भवन बरनत निन भाग १ ॥ 
यह रह कथने नही चान । चव [ मगयास्‌ रमी ] गान करते 








# बारकाण्ड # १३९ 


हु चे | यद महेऽव देखकर देवता मुनि ओौर नाग 
ती नि सपने माग एर करत ईए 
भौर पृक कट निग चोरी । द्‌ भरिमा जवि इद मति भरी ॥ 
काकसुसुडि संग हम दौड) मनुज स्प नान नषि कोड ४२) 
हे पर्वती! ठार इदि [ शरीरम चरम ] बहूव इद्‌ ह, इषि तै जीर 
भौ मनी एक री ( छाव ) को वात करता द, गो! कादुषणड मौर चैनं 
इलं साथ-साय ये परन्तु मनुष्बलपमे होनेके कारण हमे कोई जन न सका ॥ २॥ 
मानंद॒प्रेन सुल परे । शीधि€ फिर गष मन मूके 9 / 
अह सुभ रित चान दै सोदै। मा राम॒कै जापर हो॥६॥ 
परम भानन्द शौर प्के सुखम ९ढे हए इम दोनो भरन मने ८ प्स हुए ) 
ममि [ तनन युधि ] यू हर फिरते थे । परन्तु भह शम दणि कहौ जान 
सफ ह निषपर शीरजीी छपा हो ॥ २ ॥ 
तैटि वस्र जो जेहि विपि माना । दीन्ड भूप जो नेषि मत भवा ॥ 
शदे श्य परय हेम गे ह्ीरा। दोन सूप नानाविभि वीरा ॥ ४॥ 
उच अवर नोनिषपरकार भाया, ओौर सिके मनको चो मच्छा छा, रानागे उत 
वह दिया) ए, रथ, भेदै, रोग, गो रमर भोति वल रानि दिये ॥८॥ 
दो-मन सतोये सबि क अ त धे असीस \ 
के. ईस] 1९६॥ 


सकु तय चिर ओव ठुसिदास क. द 
जने सनक मनम दन कि [पसे खे लेग नदो स दे खे 
भ कचा सामैष तर चते र्म) रजीषी ( दीर्य) ११६॥ 
चो०-क्क दिवस ये पि मती । आत न मानिस दित भस राती ¢ 
नामन र भवस जानी । भूप वकि पठ्‌ ्ुनि पानी ॥ १ ॥ 
इख प्रकार कक दिन गीत गये । दिन जोर राह जहि टद शन नही पडते । ह 
नामकरणस्काका समय नक्र राजाने शनी सुनि शीवयिषजीषो षरा मे ॥ १॥ 
करि पूवः भूपति अस साषा। घरि लम ओ छनि शुनि रा ॥ 
इम के लास धरेक अनूपा । प दृष कंदव समति भुरा ॥ २॥ 
मिक पूला फे यजने काद एन ! आपने मनम जे बिचार रकि शः 
मे नाम रये ) [ निने एा--] ह रा श्ये अनेक अनुपम नाम ई परिभ 
मै अपनी दधते भदुशार रमा ॥ २ ॥ 
ओ आनंद सिं॒ुखरासी। सीकर तै शैलो सपा ॥ 
„ शो घुल धामन राम अघ नामा। भि रोक पाये विन्नभा॥३॥ 
ये जो भान्द सर मौर लकी रागि हैः विव ( आनन्दि ) ९ एकं 
कमपि तीनो खोक सुती हत हैः उन ( भाप समरे वे स्र ) भ नाम व्यकः 
छलका भवन भौर समू भेको चन्त देगेवाय हे ॥ ३ ॥ 
निखा भरन पोषन क ` छो । हकर भापम्र भरत भस हो ५ 
शके सुरन तँ श्ट भासा । बाम सुन धद परसा ॥ ४ ॥ 
जो संखरका भर पोषण कते है, उन ( आ्ेदूे पुने ) कानाम मसत" हेगा। 
,निनके सरणगरवये शुका नाद होदा §, उनका वरदमे भर शुषः नाम द॥ ४ 





१४० %# शमचरितमल्तस # 
दो"-लच्छन धाम राम प्रिय सकलं कलगत आधार । 
शख भसिषए॒देदि राला रखिमन लाम उदार ॥ १९७॥ 
चो घम त्सरणोके धाम, रमजम प्यारे मौर खे लगते यापार है गुर 
शद्ममीते उनका 'तध्यणः देखा धरे नाय रला ॥ १९४ | * 
चौ०-धरे तास शुर हद्यं॑विचरी! वेदं पल दप पव सुत चरी ॥ 
नि धन्‌ धर सरषसर सिव प्राना । पार केकि रसं ठि सुख माता ॥ ४ ॥ 
गुने हदय विचारक ये नाम र्वे [ घौर दा-] हे राजन्‌! ब्र 
चास प्र मेदक वल ( लाद परासर भग्र) है | जो शनि षन, मक्तोडे 
एवल सौर सिव प्राण है, उन्दने [ इस समय परमेति परमक | वारछीरके 
सपश गाना है ॥ १ ॥ 
जेषि ठे भि दिद पति छानी 1 ठष्िमव शम चरम रति सानी ॥ 
सगत च्यम दूनड भदै । परु वेचक जसि प्रीरि बदा ॥ २ ॥ 
सचपनसे व शरीरमचन्दजीको भपना परम हितैपी लाम जानकर दमणजीने उनके 
चरौ भति लोड टी । सरत जर शपू दोनों मद्धो खामी सोर देवकी निह 
प्रिवी मरत ६ री प्रति ह गयी ॥ २ ॥ 
शखाम गौर शुद्र दो जरी ! भिरं छवि वनी तृन तोरी ॥ 
चारि स रंम॑शुन धामा । तदपि क्षधिक सुलसागर रामा ॥ द ॥ 
शयाम जीर गौर श्रीरवाली दोनो इन्दर नोदयो ब्ोमाको देखकर मावा तू 
तती १ { निठमे दीढ न छग जाब ] योतो चात ही पु धल लप ओर शुणके धाम 
४ ते भी तके स्र भीमयनद्रजी एवते अधिढ ई ॥ ३॥ 
हद लुह इदु प्फ । सूत किरम समोर शसा ॥ 
कृ शग हुं मर प्डल \ मातु बार कष प्रिय खङता प ४ ॥ 
उन चदय गामी चनमा भरकाथिठ दै । उनकी मनको वाही दरी उस 
(भन खनद्रमा ) दी किरणो दधित फरीद कमी गोद [लेकर ] ओर्‌ 
पमी उतम पालने [ छिटाकर ] माता पयर र्मा } क्षः दुर करती ३ ॥ ४॥ 
योऽ-च्यापक शठ लिरभनं निरन्‌ विराव विनोद्‌ । 
नि ५०५१. प्रेम मगति वस ० क च १९८॥ 
स्॑यापक्, मिरन .( मापगरहिवि » विनोदरषिव ओर भवन्म जए 
4 "111 १९८॥ ` ^ 
पौर-फास कोदि यि सयाम सरीरा नाक कंस रिद्‌ गंसीरा 
० शोत 1 कमक शएन्डि ड जु मोती ॥ १ ॥ 
क नी कमह ओर यश्मीर ( नहते भे इए ) मेषके समान श्याप्र 
फरो ऋदेवोदी ओम 1 ०4 स नरसोकी [ शभ] म 
मा १ वते [ क ६ ॥९॥ 
ङ धवल सुर मि सुमि सुनि मन भोहे ॥ 
= क व +. देता ॥२॥ 
कः भने चिह शोमिह ई । नृषु (पैनी 
री वनि शुन धनिक मी मन 0 ५) । कमे र र ० 





1 ॐ चाटकाष्ड इ १ 
सीने ( मिव) चै । नामिक यम्भीाको ठो ऋ जनते दै, निनदे. उषे 
देल्ादे॥२॥ 

„ ङ रसि भूषनं शत यूती 1 दिव इरि रख धति सोभा षी ॥ 
“+; म गि प कौ सोना रि भल दद मन शमा ॥ ३ ॥ 
' हते धूमणेणि उधोभित विदा युना ट} द्दवपर वापे नएकी वव 
ही निरी ठा द | छापर र्युक्तं मणि हसकौ शोमा मौर र्षण ( श ) 
क चरणचिहनेदेएदे ह मन इमा गता रै ॥ २ ॥ 
0 डु छ मति चषक शुदा भाग भमित मदम वि एर ॥ 
“ इद र दृ्तन भधर भरे । नासा दिष्क छो शरै पारे ॥ ॥ 
कणठ हकेसान (उदार चदृ्नाल तीनरेखाभौरेडयोभित) र णौर री षुत 
ही उनदररे + अं परवती हदा ठा खी द । ते इर धयं £ 
छाल्चाठरभोठ १ नापि जौ ति्क [के दं कते केनशीकौन कर एकता ।४/ 
वर श्रवभे सुजा कोडा । भति पिम म्र तोत्रे वो # 
बिहव कष छवित गसुभारे। इट अद्र रचि परा षे ॥ ५॥ 
दर ्षन शौर बुद्‌ ही ल्द गाढ ई । घुर सेवे धन्द भहु ही णे 
पते र | अममे एते रवते हए सिके भर वषर ाछ ह वगो तमे बहूव 
पका बनाकर हैभार दिया दै ॥ \॥ 
25 
स्प । खो नाना 0९१ 
्ररीसर पीड धरु पारं हर है । उनका वनौ गौर सयोग द टना 
९ शी ष्णा छता दै । उनम सपक वणन धद जोर शेषी मौ ही ऋ पके । 
खे ही जानता दै, नषे फर लप मौ ेला ठे | ६॥  ‹ 
दोः ध दोह. भोपर श्यान्‌ निर गोतीत । 
४ पम प्रेम वसं कट सि्ुघरिति पुनीत ॥ १९९॥ 

ओ एसे जञ, मोषे परे ठया श्नः वणी जोर धनदे अदीत ह भगवान्‌ 
इदम यतया मयत रम व शोर एत्र गहसे ह ॥ १६९ ॥ 

चौ०-एदि मधि राम गद त माता । ोसषटषुर आिन्ड सुखवाता ॥ 

चिश रुवाय चरन रति सा । पिन की यद्‌ शरि परगट भवानी ॥ 9 ॥ 

एव प्रर [ समू ] जगते मागि शीरापसी अयु तिवधम 
ल दे ६। निनदम भीमक्र्लके चसे परीति जोडी द, है मवानी ! नश्च यद 

~ भरयक्चमतिै [ छिमगाम्‌ उमम बाणलील फरेजनदे आन द रई] ॥ १ ॥ 
र्ति दिख जद कर कोरी! कवन सकद भव बधन छोरी ॥ 
„ जीव उरचर अठ क भुम भय खे ५८॥ 
भीरायै विदु रक वषय पाय को ए उरक 
शंालन्धन सौम श्रा सता दे । न्खने सद चरचर जशो अपने क तसा 
ह ऋ माया मी रुते मय खत है ॥ २॥ 4 
टि विस रथाव ठाहो । नपु छारि जनिम ह काही 1 
, मलं म भदन काह चु । मब शट रशं सर ॥ ३५ 
. भन्‌ उ ममे म दृोमर नच ह । देत प्रे छोर १, 


ए 


त १५९ क रामचरितमावसं $ 


1 
[सौर] भिस मढ भि जय | मन उन यैर जमति चरा गोर भवते 
शी शीरुनापी इग कषे ॥ ३॥ 
प परिधििददिनोद युन । सक तगरकसिनदे सुस वना ॥ 
8 उठे फर एप । ष परमे , चाल शसते ॥ २५ 
इ प्रक भु शररमनद्रवने वाजी कौ ओर उमस मगरमिविर्योो 
ल ध । फौठलयाभी पमी उने गोद वे तैद भौर कमी पाने 
लियफ् चलती थी ॥ ४! 
दो-गरेम मग्न कखला सि दिन जठ न लान 
घु सने घल माता वाछ्चरित एर गान ॥ २०० ॥ 
रे ममर पौपत्याजी रद मौर दिनश्च वौतना नई जानती थी । पुनके लेव 
माता उनके वाल्चरित का शन शिया करतीं | २०० ॥ 
चौभ-ए5 धार छनन धनदाय । रि पपार परौ पोप ॥ 
निद्र हृ शेन गवाना पूना हह शीष भखाना ॥ ¶ ॥ 
प वार प्राते शरीगचनीम्े ्ान कराया लौर शगार परहेपर पषा 
दिया] किर अपने कुत्ते इदेव मगवाग पूते त्वि ञाते किया ॥ १ ॥ 
करि पूः दधे चाषा! शषु सदं जह परक वनावा 8 
शरि भात तषट धि मह । जगत शपे देष सुत बा ॥ ३ ॥ 
पू करे नैवेय धदाया भोर खये षो गयोः च रों बनायी गवी थी ! 
सिर मता श ( पूलके शानत ) चैट सावी, शीर कदो अनेपर एको { इषयेव 
भगवान थि चये ह नष ] भोजन रते देखा ॥ २ ॥ 
मै जसी धिप पदिं गयसीता। ैवा वार तौ एमि सूता ॥ 
बटर शाद देा भु सोई हवे कप गरष धीर न चष ॥ ५॥ 
मति मयमत होकर ( पमे खेय या ये किरने दाः वैठा दिया दष 
वयद) एते पाठ गयी, तो वं वाख दोग हमा दे । प [ पाशान 
दौव्कर ] देखा भि कपर क [ मेडन फर खा | दै । उन ्द्े कमरे सा 
ओर मने वसन नदी हवा ] ६1 ५ 
श्तौ उत दह धवे दे । भदि्नम मोर कि भाद पिते ॥ 
वेचि राम अमनी अलुनी । प्रु दैति दण्ड मर भुदठकानी ॥ ४ ॥ 
[ऋ सेचने ठगी कि 1 गे णौर वं नदो क्फ देले । यह मेर षदधिका 
भ्रम टै ओैर को मष करा ६१ प्र शीरमन्रमते मातो वषाद हर 
१४ च ॥*५॥ 
दी* देशा निज्ञ अद्भुत रुप अखंड ! 
योम रोम प्रचि छागे कोटि शटि श्रं] २०१] 


किर उन्दने मादान अश्ना अखण्ड 
गोर करद याण छो इए है ५ 1 


पौ०~गनित रथि सिं सिव चतुखामन । ड यिरि सरिद शि महि नन ॥ 
श्यड कम भुन ग्वान याड! वो देखा धो सुना त छा ॥ १ ॥ 
अगणित स॑, चन्रमा, धिव, वह चत पवत, नद ष एरी, वन, 
आक कम गुणं लोर लम देते) यौर वे पाथं म देते क्म नेमौ न थे (१ ॥ 


कै वाख्काण्ड # १४२ 


देलौ माया सब बिधि गाद ¦ अति समीत ओरं कर ठार ॥ 
दषा ओीवं॑ नाह आही! दी मगति जो रद्‌ राह ॥ २॥ 
छव भकारे बञ्वती मायाको देखा किं द [ मवा शमर ] भलन्त भयभीत 
कष चबे की दै । नीपो देल) वे वह पाया नचाती है भौर [ षि ] मको 
देखा) बो उ लवकर [ माया ] धह देदी ३॥ २] 
व पुकि यख अदन न भाषा । जयन मूषि चरननि सिह साः ॥ 
बिसमवव॑त दै हतास । भर्‌ षरि पिलुरूए सरार ॥ ६४. 
[ मातरा ] शचसीर पित हो गया, ले क्वन नरी निकर | हद भह 
कार उतने श्रीरामचन चरामि हिर नागर । मातो आभिवंयकति देडकर 
खरे श्तु भीरामी फिर बाल्य घे थये ॥ ३ ॥ 
भषति करि न शादु थ माना । गतं पिहा र छत करि साना ॥ 
इरि लगनी बिभि सणुश्ादं । यह नभि कहं कमि धुप मा ॥ ५॥ 
[मादे ] दति भौ मी कौ भती } दः दर गी फ मन गलिता परमास्य 
पु फलौ बाना । शी दामो बुव भकारे सका [ भौर कहा--] मता] 
यनो, यह बात शरीर दना नहीं | ४ ॥ 
दोबार यार कौसल्या विनय कद कर शरोर! 
~ यव सति कं वये प्रय भि भाया तोरि ॥ २०२॥ 
दौऽलयामी सार शाय दः विनय ती ह भिर पमो | एते यापक 
मगा भव कमी न व्यपे | २०२ ॥ 
च" -बरचरित हरि बिभि शदः धवि र्व रासनह ट टा ॥ 
कष कार वीतं सव जां | वे त शरन शुदे ॥ १४ 
भगवान बहु प्रभरे भा को, धीर जपने सरक यतयन भान्द 
दिया ह मय तपः चां मा पर र इदानव्ि इत देन र ॥ १ ॥ 
षत पर र भं । पि इति विन बहु पाई ॥ 
परम मनोहर चस्ति अयारा। करत शस्त शरिड दुमद ॥ ९ ॥ 
वब गुरी अफ भूम सकार भव } जमन भि पी धिग 
पवी । चारो भर ाजङ्ार ये ठ मनोः सपार चरित्र के धत ६५२॥ 
सन कम बन अगोचर चे। द्र भिर विचर पु स 1 
भोजन करत थो चथ शा । नाहि आवत तजि बार समासा ४.३४ 
नो मन, कवन भौर कमरे भगेोदः दीप्र दर्ये गगन मिचर 
छ ६। भोजन को मम चर रम यते यवे मए ववाम सगो 
छेक महीं भाते, ॥ ३॥ 
कौहत्या ज वोत नाई इय इड गयु च पद 8 
(व ष्विव म धरे घननी म म 
स्वाभी जव द्ुजते जाती १, एव अघ उमर भाग ् 
वेदेति, न) ऋ निपव्‌ केह जोर शिवि जसा भन 
न पाया माता उन वूं पकम रथि दोकती दै ॥ ४ ॥ ति 
परर भूरि भर ष्ड़ अय्‌ । भूवि नसि रोद व्‌ ६ ५॥ 
३ रपू वे दभ ओर गबा उद गो मेम तनि ॥९॥ 





५४ % शामचरितसानसं # 


सेऽ--पोज्ञन छर्त॒खपक धितं ठ उत अवसं पाई । 
आभि चठे मिछकत शुल दधि चोदन, उपरा ॥ २०६ ॥ 
भोग करे ई पर चित्त उदक है { उपटर पाकौ दशी-मात वषये 
किच्कारौ भारते इए इधर-उधर भाग चढे ॥ २०२ || ५ 
शरौ°-दालयरिति घणि घरढ सुशाए\ सरद सेषं संसु शि गाए 
लिन्द कर मत नद सत नाई सतः। ठे जन वंदित किषु दिथत्ता ५ ५ ॥ 
भरीमघनद्लीकी बहुत दी खरल ( मोली ) खर बन्दर (मनमावनी) वाष्ठीलार्ज- 
क्षा सवती, तेष, शिवी ओर वेनि यान किया दै । जिनका मनं एन लीणर्भमिं 
अतुर्नही ुधाविषाताने उन भनु वञ्चित कर दिवा (नितान्त मागयरीन बनाया) 1१। 
सपु मार जवि ब राता । न्द अनेडः गुर पिह साता ॥ 
शुर श गए पदन श्रा! भ्य एर विधा सब भां ॥ २ ॥ 
यौ ह स्व मारं छमाएवखाके हए, त्यौ द गुरः पि भौर भाहाने उनका 
योपन. छसकार कर दिया । भीखुनायनी [ भाइयौसदिद ] गुरवे परमे विधा पठने गमे 
भौर यदे 8 स्प उनको ख विवा स गीं ॥ २ ॥ 
फी सदन स्वस शति चारी। सो हरि पड़ य कतक धासो ॥ 
पिया पितयं निपुन शुन सीरा ! सेकं खेर सकट तृपरीरा ॥ ६ ॥ 
चारो बद निनके खाभाविक श्र ई, ३ भशवाद प यह बरहा कौहक ( भचर ) 
| चापे भाई बिद्या, बिनय, गु ओर धीक [ वे ] निपुण ६ भौर सव रानाओकी 
लाभो ही लेठ देते ६ ॥ २ ॥ 
इरत यान धनुष कति सो) देखत स्य॒चरावर सोक ॥ 
जिन नीय विहरं सय मा थित होट खद छोय दगा ॥ ४ ॥ 
हपोमि बाम जोर धनुष बहुत की शोमा देते ई । स्म देखते ही चराचर ( जह- 
चेतन) मोधि से मते ई । ३ खव भारं जिन ग लेते [हए निकते ] ३, उन 
गय, सी छौ -युदष उनम देखकर ले शिथिल हे जते ह॑ मथवा उठकर 
रह ज्तिरै॥४॥ 
दोण-शमेखलषुर वासी नर वारि इद॒ मख वाख । 
नहु चे श्रिय काव खथ कष्टं राम पाल ॥ २०४ ॥ 
कोऽप खश ली, पुरुप, दृद गोर वादक समीक इगाडु भसमन 
प्राणो मी गधिक बुक प्रिय छते है ॥ २०४ ॥ 
च"-येड सक्ष कैग ओ चोर चन खया निद केर जै ॥ 
परावन सग मार्ट जि लान ¦ विन भि गपि देखावद्ं भानी ॥ ¶ ॥ 








भीमचन्रमी मायो बीर म्भो हुलक खाय ठे दो ह मौर नित्य गन्ं ` 


जाकर विकार लेते द} मनम पतिन ऽपसकर मृगो माते ई जर मिदिन लप 
रन्न ( दस्य ) ो दिखव्मरे ६ ॥ \ ॥ 

जे शरा राप्न वान्‌ के मारि! ठे वतु सकि रोके चिधारे ॥ 

अलु सदा संग सनन छी । मानु पिता अम्बा भुस ॥ २ ॥ 

जो मृग श्रीराम जायते मि चते धे, दे श्वतर छोडकर देवरोकको चरे अति 
ये] शीरमषनदरनी अपन छोटे भ्य योर इलाके साय मोजन कते ई थर माता- 
पिताक़्ी माशन पाङ्न कते ६, ॥ २॥ 


# बालकाण्ड # १४९ 


व १ क कर इषनियि सो तोया १ 
रव सुनहि मन छ। यु उदि अलमन्ध समुक्षदं ॥ ३॥ 
चि शाः नगफ्े मेय खी श, पन्न भौयागजसनौ भ सयोग जीभ) 
कते द | 9 यन छार ददुरण तते ट ओर कि शंम 
समक कते ६1 २॥ । 
तकन उरि क राथा । मातु स्ति एह गावा मावा ॥ 
आयु मागि रहं एर का । वैच चरित रषद भन एवा ४ ॥ 
~ श्रीनाथ आतःकाठ उठकर मता-पित जौर गुर्को मक नवाते है मौर आ 
सेक नरमा कम कते ई । उनके चरि देवदेव रा न चदे पिव रेते ६।५ 
दो°--च्यापक भक अनीह घज न्न नापर न सूप 
भगत देतु नाना विधि करत चरि अनूप ॥२०५॥ 
जो व्यापक, शवर ( निरवयव ), प्छारदित, अन्त्र भौर निष १ तथा 
मिनका न नाम है र सूप, ददौ मया भक्त चयि नानाप्रकार अनुप (बीमि) 
गि कटे ६॥ २०५ ॥ 
सौ» सव चरित शा भ गां  जगिषटि कयः सुनहु मन शां ॥ 
पितवभिव्र सहासुमि ग्नो । बसष्टि षिपिन सुम आश्म जानी ॥ १ ॥ 
यह एव चभ गे करं ( दलानकर ) छदा । अम मगिकी केषा मन्‌ लार 
इमो] अनीमदापुनििशरामिजी प म भभम (पवि साद) गानमये द, ।१। 
ज प गय ओग सुनि करद । जति सरी पुबारि इरी ॥ 
देखत शर्म नियर धायं । कदि उपद्रव छनि इख पाह ५२0 
ः शनि च प शोर योय के ३ पसन गरीच ओर ४31 
दते ये देखते 8 राटठ दोह पद 2, भौर उप मति ये, भष 
[ बहु ] दख पेये ॥ ९॥ ... . 1 £ 
माभिनम सन दिता "यी हरि मवु मरन निधि यी ॥ ” 
" ठद शनिमर मन शह निचरा । भु अबचेड इन सि मोरा ॥ ६१ 
गोपि पूत दिशवमिनजैक मनम चिन्त्‌ छ गमी किये पापी राक मगदरारके 
[मरे ] ना न मतो । तर भ निने मनम विचार मिवा $ रन इ्ीका भार 
केम किमे अकतार सिमर है ॥ १ ॥ 
पट भिस शौ पद खाई) फरि विनती, आनी दोर, मादे ॥ 
शान भिराग सकस शुन यना । सो प्रमु ओ देलवं मरि नयनः.॥ 9 ॥. 

„ " ही ने चाकर म उन चरा रन $ भौर विती कके वोन मयः 
च ञआरई । [ मह |] नो चम, पैसन शौर स्व पगे धमै उन प्रेमे 
गेत्र मर दा ॥ ४॥ 

दो°--बहुमिभि "करत मनोरथ जा लाभि नषि वार | 
करि ` मजन सड जंक "यदश दरवार ॥ २०६॥ 
वहू प्रकरे मनोस्य कतै हए नाने देर नकं गी । इयूनीके ज्म लान 
कर बे राजके दरनिपर पचे ॥ ९०६ ॥ ५. ऽ 
चोदति आगमन सुमा जब रजा मिन मद ह च समाना ॥ 
„ रि दुददत सुभि साली] भच -आसन वरद सानी ॥ १ ॥ 
र० ८० १०-- 





९. . # शमचरितमनस ॐ # 


~ 
राजनि न विका आमा पुना, घव वे ्ाहगोके मावो खथ ठेकर मिक गये) 
शौर दण्डवत्‌ कलं सनि एमन फते इए उन्दै सकं यपे भाऽनपर दैडदा ५१ 
शरम पषठारि कन्द अहि पूना ¦ मो सम खु धन्य न दूजा 
विथिष सौति भोत्नन तवादः! विवर हरे हर अति पादा ॥ ९ ४ 
अरणोको भोकर दहु एूना की भौर क्ये समरन घन्य न दूरा को 
नदी दै दि अनेक कारके भोनन गये, निरते भे इमिने भपने हृदये बहुत 
हषरः ॥ २१ 
शनि रमि मते सुव घारी। श्म दि सुनि देह विसारी ॥ 
भए मरन देखत सुख सोमा । जद णक्ेर परम सति कोभा ५ ३॥ 
किर सचाने रो पुश मुनिके चररणोषर छ दिया ( उतरे प्रणाम क्षा ) | 
ओरसचन््रसीको देखकर मुमि अयनी देषो इषि भू गये । वे शमीक पुलकी 
शोभा देखते दी ए र हे गये, मानो चकोर पणं दनम देख छमा गया हे ॥६॥ 
उव म रपि वचम कट रा । सुमि म्स हप न कौषिक ॥ 
केष करत आगमन महारा इ सो घर र छे षा ॥ ४ # 
वव रानाने मम षित होकर ये कचन कदे-ह एुनि ] एए प्रकार छ तो 
मे कमी नटं फी । भान कि करणे भापका छभायमन हुमा ! कय) परै उते 
पूर फलेम देर न जार्जँष ॥ ४ ॥ 
दुर पूष उतायं सोदी। पै जान भरद प्र तोष ॥ 
¢ र भ 1 दभ्रं शेव 1 ॥५॥ 
श्ा-] हैया समूह प हुत घाते द । दीति भँ 
छे भोगे मगा ह । डोर भाप मीखुरापनीो इते दो । दद मो 
मुत (ताः पत 
०, भूप मलं रितु तलह मोह भग्यान। 
६ र्‌ ८१ क क दि कल्यान } २०७ ॥ 
रामम्‌ | भ्रस्न अशषनको ॥ 
इमे भमै जोर सुक गति दोषी भौर रत न 1 
० राना शि भिय धावी । इव कर घुल हति हयु्ाती ॥ 
येद पायै त॒ धी दिर गचन मद हु विरा } १ 
न 
कनति | 
न न रे बराह्मण ! नि चौयेपने जार पुत्र प्रमे 
गहु भरमि चे धन केसा । सदस देहे शाञ्च रोस ॥ 
दद भन त्रं िय छु चोड युति निमिदपङ़ मा ॥ २॥ 

„ दनि | भनी, र मीर मनाम भवि, भवे इकेव अयना 
द्वद | देदमोरमारदे मधिक पाया मी नदी देल, उरे भी पप्यददूग 
छव सुत भरर मोह माच र नं । रम दैव यहं चनह रोवां ॥ 

र मिसिर जति भोर करत । र दर सुत पम कोद ॥ १४ 
भमी रते पराेप समान ्वर द उमे भ हे मो ] गमो तो [सि 





> वाटकाण्ड |... 1 


रर भी ] देते नी नता । शरो जलन उएयने मौर कूल राट, ओर क परल 
किंगोर अवस्माके ( बिस्ु सुङुमार ) भेर उन्दर पुत्र ! ॥ ३ ॥ 
शुनि एप शिरा भेम रत सानी ! हृदर् ्रष मान युनि भ्यायी # 
तव बिष्ट अहुमिधि समुश्वा। वरप सेद नाक शद एवा ॥ ४ ॥ 
पेम-रों सनी इर रानाकषौ वाणी नकर श्ञनी दमि विशवामित्रजीते हदये शा 
छं माना । तवर वथिष्ठणीने राजा दुत प्रकारे सम्या, निवे रानाणन एनदेद 
नाशको पराप्तुम ॥४॥ 
अति आदर दोड एनय योषद्‌ । हदय ख्‌ बड़ भोपि सिला ॥ 
मैरे रार नार शुत दोढ। तुह सुमि पिता आन महिं ड ॥ ५॥ 
रागने बहे ् आदरे दोनों पुरौ इलया ौर दधसे ठग बहुत ्रणाररे 
उन वा दी! [ फिर कंहा--] दै नाथ । पे दोनो एष भै प्राणं है । है इनि। 
[ अव ] आय ही इनके पिता 6, दूषय कईं नदी ॥ ५॥ 
दोपि भूप रिषिदि घत ध्विधि दे अषीस । 
जमती भवन गपु प्रयु चले नाद पद्‌ सीख ॥२०८ (४) ॥ 
रजाने बुव प्रकारे आीर्वाद देकः परनोषो ऋषिक वाले फर दिया । पिः र 
मादाके महम गये शौर उनके चर्ोम सिद गवेकर चे ॥ २०८ (क ) ॥ 
सो०~-पुरुषसिष्ठ दोड वीर रपि चटठे भनि भय हरन । 
, . पासि मिधीर भवि विख कारन फरन ॥२०८ (स) ॥ 
पुरषो सिहरूप दोनो माई (राम्मथ ) पुनिका भय रेक एमे प्रस शकर 
चे । वे एप समुद, रुद र सम्पूणं नशक्रेकारणके भी कारण द ॥ २०८(ले)॥ 
चौ०-भर्ल नयन उर ब्रह विसासा । कक जलन तमु सास कमाता ॥ 
ऋरि पट, पोत कष डर मथा । इचिर श्राप सायर. ह हाया ॥ ॥ ॥ 
मगवानके शठ नेभ र, वौदी ती ओर विाल इजा ह भीक कम ओर 
तमा वृकी तद श्ामदरीर दै, कपर पीताम्वर (पटने ] भीर शन्दर तरक के 
इ । दोनी द्म [ मः] न्दर षनुष मौर बाणं ह ॥ { ॥ 
खम शौर दर दोड भाई) वि्धामिनन _ महानिधि , पाईं 
भ्रमु बरहान्यधेवे ओ जनि । सोद निरि पिता तेड भगवासा ॥ २ ॥ 
श्याम भौर सौर बण शोनो भारं परम इन्दर टै । पिश्वामितरभीको हान्‌ निषि 
भ्रा ष गवी । [पे लोचने कमे-- ] मै जान मया कि भयु अश्ग्यदेव (बहणे मक्त) 
~ ४। भैर स्मि भगवानले अपने पिताको भी छोड़ दिवा | २ ॥ 
चरे जात शुनि दीम्दि देशं । चुनि. चादृ कोष करि धां॥ 
एक्ट बान राम्‌ हरि छन्दा । दीन नालि तेष्टि निल पद कृषा ॥ ३ ॥ 
सर्म चे ति हप यमिने ताइकरो दिखाया । न्द इते दी ह रष 
छक दीदी { भौरामनीने ए ही बागठे उर्के भराय हर ल्थि ओर दीन नाक उस्ने 
निषद्‌ ( अधना दिव्य खूप ) दि ॥ ९ ("प 
हं रिषि निल नायि चिव चीमही १ कहं विधवा दन्द 
खाते कत्य. स चधा पिपासा । जुति बर हु ठेर भकासा ॥ $ ॥ 
उव ऋषि यमिने अरो मने वामर यर सते हए मी [लने 


ॐ यामद्रितम्रानसं # 


१४८ 
= 
म कतेक तयि ] ह विक्र दौ निषदे मूरास न को भौर शरीस्य बसति क 
रना भन ॥४॥ 
यो-शयुध सवं समधि कै भथ निज माश्रम मनि 
शद सू फल मोलन वर्ह मगति दित जानि ॥ २०९१ 
उव अलल समकग के सुनि र भीरामजको जपते जामते ले भावय; ओर 
उष परम सितु जानकर भसपूरक कनद, मू सौर पटक भोजन सया ॥ २०९ ॥ 
पौण कठा युनि सन रुरा । निम॑प॒जम्य करहु इन्ह शाहं ध 
कभ करन छगे दति सञार । कायु र्दे सल क रलषारी ॥ 9 ॥ 
समै नाये सनिञे कहा-आप जाक सिडर शेक यत्र कौम } चद्‌ 
सुक सव सुमि दवन कले कमो । जप ( श्रीरामनी ) यतकी रखवालीपर रे || ‡ ॥ 
दुनि मारीद निस्वर करोह । ले सदाय धावा सुन्द्ही ॥ 
बलु एर घान राम वेडि मारा | सत॒ जोजन गा सगर्‌ पारा॥२॥ 
यह्‌ समाचार सुनकर पुनियोका दद श्रोषी रास मारीच अपने सदायोको छेकर 
ददा } भरम विमा परास्य बाण उसको मारा चिते वह सौ योजनै वक्तार" 
बहि सशो पार सा गिदा | २ ॥ 
पावक सर सुधा एनि मार! भुल निसाचर कटु संवारा प 
मारि भलर द्विल निर्मयकारी सस्ति करं देल सुनि पारी ॥ ३ ॥ 
पि भुाहुको अग्नियाणं मरा । इधर छे भारं लमगजीने राशचसोगम सेनाका 
शर $ शला | इत प्रकार श्रीरामजीने रक्षको भारक ब्राणोषो ` 
निर्म क दिया । वथ खे देवता बोर मनि स्ठदि करे तगे ॥ ३ || 
परै एनि कुरु दिथतस राया । रे कौन्डि विपरन्द॒ पर दषा ॥ 
जमति हेतु बहु फथा पुराना। कहे पपर जपि प्रयु लाना॥ ४॥ 
शीखुनाधनीन बह क्च दिन गौर रहकर त्राहणोपर दवा छी । भते फारण 
बराणोति उन पुररणोषी इतत श्रा दी चपि प्रघ स्व चानते थे || ४ ॥ 
तव शुनि सदर कशा शु । चरति पूक प्र॒ देिम जाद ॥ 
धमुपरस्ब सुति रुह साथा । रषि चले मुनिवर ॐ साथा ॥ ५ ॥ 
तदलन्तर मुनिने आद्ूर्क समश्षारर कष्ठे प्रमो ! चष्कर एड वसि 
देसे । रुते लामी भीरामचन्दरनी घुपवत्न { को गात ] बुनकर मुनिभे्ठप्रिधा- 
पिर्म शा प्रत शेकर चले ॥ ५ ॥ 
आश्रम भूक दख मग महीं । खग सग नीव जंतु तदं गादः ॥ 
परा निदि सिकः भयु देक । सकर कथा सुति कषा धिसेषी ॥ ६ ॥ 
यमे एक आश्रम दिखायी पड़ । व प्छगक्नीः कोद भी लीव-गन नदी था | 
तयी प्क विला वेरु प्रभते पूषा; तव पुनते वि्तासूर्तक खव कथा कही ॥६॥ 
ो०--यौम नारि श्राप ष॒ उपलः देह धरि चीर ! 
रन कमर सज चइति छपा कडु रधुीर ॥ २१० ॥ 
गौतम धुनिकी ल जह्वा पय परयरकी देह धार प्रय दढ षीरत्े आप 
चाके भू चात द । द रषुनीर !इस्फ ङ्या कीनि ॥ २१० ॥ ' 
छं०---पर्सत पद परावन सोक नसावन प्रगट भूर तप पुंज सश 1 
प्रत रुतायर अन दुलद्ायक सनु दोद्‌ कर शरि रद 1 - 


# बालकाण्ड # १४९ 


अति प्रेमं अधीरा पुख्क सरीरा सुशं नि आव वचनं कटौ ! 
अतिसय वदृमागी चरबन्दि छागौशुग चवन जठघार वौ ॥ ६॥ 
भीरामजीक पवित्र जोर रोको माम करेवा चरका सं पाते ह शचषुच 
बद धपोमूहि अदस्य प्रकट हो गयी । भ्तोको एल देने भीखुनायनीफो देशक 
वह हाय नोढकर समते खड़ी र गवी । अलन्त मेम कारण वह अभीर हो गवी) 
उका शरीर गुरुक्िद द उदा; शुषे कचनं करे नष्ट धति थे । वह भवन्त 
५. महमागिनी लतया ये चरणो स्मिर गयी थोर उस दोनो नैशो चक (परे 
जीर नन्दे यो ) र वारा यहे हगी ॥ १ ॥ 
धीर मन कीन्हा कुं चीन्दा रदुपति छां मगति पाई । 
अति निमंङ वानी अस्तुति ठानी ग्यान गम्य जय रघुराई ॥ 
म नारि मपावन भमु जय पावत राचनं रिपु जनं छणवारं 
याज्ञीव विच भव भय मोचन पा पाठ सरन आई ॥ २॥ 
किर उसमे मलम धीरज धरद्र प्रधुको पष्टचाना जीर शीरषुनाधजकी कृपसि 
मि प्राह की | तव चलन्त निरमक वाणीरे उठे [ श प्रकर ] सति भारम ्ी-- 
हे श्न भानने ग्य भीरघुनायमी | भापक्षौ नय शो ! ओ [ सहन ही ] अयतिनि जनी 
ह भौर ह प्रभो । माए अगतो पयि कनेषठ, मको सुस देना ओर रावणे रु 
ह। हे कमयन | हे षंार ( जन्ममृत्यु ) के भवे चदान ¦ #ै भापकी भरण 
सावी ह, [ मेर] रक्षा कीनि, ररा कीचिये ॥ ९ ॥ 
॥ सुनि थप जो दीन्हा मति मल कीन्हा प्रम जड म माना । 
देखे भरि छोखन हरि मद मोम इहद सम संकर जानो ॥ 
विनी रसु मो म मति भोर नाथ न माग बरं आना । 
पद्‌ कमल प्रयाग! रस यदुर भम अल भधुप करे पाना ॥ 9 ॥ 
निने. मते चप दिया, सो धुत ए भच्छा कि । म उत मघ्न्त जनुरह 
[ करके ] मानती है किं जिषे कारण मैने दंशा घुदानेबाे प्रीरि ( थाप ) शरे 
म्र भरकर देखा | इसी ( आापडे र्न ) लो शकलौ षवे बह ठी समे दै । 
दैप्रमो | हिक बढी मोली ह मेदौ एक विनती है! है नाय | मै शौर भोकर 
नह मौती, कवठ यही चती हूं कि मेय मनसी भस आके श्रणकनस्फी दने 
रेमसमी रका सदा पान करता रहे ॥ ३ ॥ 
ओ पद ुगसप्ति परम पुतीती भट मदै सिव सीस घसं । 
` शोप पंकज ओष पूजव भजन मम सिर धरेड इए दर) ॥ 
ष दि भति सिघारी मतम वारी चार धार दरि चरन परी । 
दये बति मन माबा खो ब पावा गै पतिरेक यनद मरो ॥४॥ 
जिनं चरति परममिति देवनदी गङायै प्र ¢ जनह धिषे वपर 
रय का, सौर विनं चकमे नदय पूते ह, ग हरि ( माप ) मे 
उन पिर सला} इ भमर [धवि छरती दं] भरर. भगवान 
जरम पिर, जो मनक बूत ही मना रगा उप करने पाक गौरम ली षया 
आनन्दम मरं द पतिलोक ची येवी | ४॥ 


+ (4 प हरि करस रदित दाख । 
५ इ =) श्षठ तेहि मदु ऋ कपट जंजा्ं ॥ २१९१ 





८ _ ० पमन ° --------- % यमद्रितमानख ₹ 


जर तिना चरस दवा कलेव द! धी- 
छवी "1 उन्ही मजन कट ररौ 
ासपासयणः स क ^ 
०-द्टे रास कषिपन इनि संगा } चद्‌ जः जग 
५ सिद एर कथा इरा॥ मेरि मका सुरसरि मि शद ॥ ११ 
शरभ जौर समगनौ मने चाय चे । दे वह रय जहो उगतुको पवित्र 
लेगा गदान य । मात यापि च िशराग्िजीने च छम कथा जद नायी 
जित शः देवद दधाजी धीष सावी थौ | १॥ 
सव भं दिदि समिद नह्‌ \ भिमिषे दान सदिषेदन्डि एप्‌ ॥ 
शपे च्छे नि दद षदा वेगि बिदेह नभर निराया ॥ २॥ 
सद प्रेशर [गङ्गां] लान कया [त्न मेदिभेतिकेदानपमि ॥ 
किर मुने साय सन्न रोषर चे मौर शीर द जनश्ुखे निकट पैव गये २ 
र स्पत्य एम जव देलौ । हवे अदु सुमे पितेषी ॥ 
पी य परि एर नाना । इङिछ सुधासम मनि सोपाना ॥ ३॥ 
भीरमर्ने ज जनु शोभा देही, तव ३ हो मां स्छमणसित मलन 
हि ए । य भे वम्र, नदी ओर वाल ई, जिन अभूते सपान 
ऋ भर मभियोदी सीदि वनी हरं ] ६॥ ३॥ 
श भ॑र मत्त रस गा नत श्रं दहुवरन विहगा ॥ 
दर परन विकते षमत । ननियि€ समीर षदः धुखदाता ॥४॥ 
मददरठते माठ हे मैरे दन्दर गुर कः दे ई] रंगविरगे [महए] 
पी मर षवद ऋ द ई । रये कमह विषे; षदा ( उष श्रध) इल 
देनवादा दीष, मन्द, रन्ध पमन ऋ रश ई ॥ ४ ॥ 
` (वौ-दफद डिका धाम वत विषु विहंग निदास 1 
` ढल फर पवत सीदतं पुर च एस ॥ २१९॥ 
„, , पृषमवार्कि{ $व्नासी) दाग भोर वमि बहुत-उे पषरयोका निवासदे,एूल्ये- 
श भः द तठ गले चो भ इत ६॥ २१९ ॥ 
न° न दानत नगर निका । बटे जाह मन तहं कोम ॥ 
चरु दना९ विनि यारी । मनिमय दिधि शरु सकर संभार ॥ १ ॥ 
नाप स्रा बर्न कृ बनता । मन ध बद व मा चा 
(ख सद) 1 इन्दर गाजर ई, भवर त इए विधिर दै, मानो रहे 
उदं भप हाये वरायादै ॥ १1 भ 
धनिक यनि वर धनदं साना । वैर सकर बस्तु छै माना 1 
चोष्य दर गे पुद्द। संवत षि सुगेष सिदे ॥ २॥ 
कुमेर उपान श्ट पनी व्यापार सव प्रकी जनेक बरे लेकर [टूकानीमि ] 
चै ६। इन्दर चौय गौर वौ गधयो दा गव पिर खव १॥ २ ॥ 
मगटस्य संदर खय रं \ षिमित चतु रतिनत्य विहि ॥ 
र नर श्रि सुमग सुधि खं । षरमसक ग्थानी शुना ¶ ६४ 
सवे षट मतम ह चौर उदर विति देह सनदे मानो अमदेवह्मी 


# बाल्काष्ड + ` ११ 


वि्रकाले भेकित कया दै | नगरे ) 1 
+ (ए व 
अनूप सर जगेक निकास । विय मिहुध दकि 
शित शिति चवित क्षोद 1 सुकल अ ५) । ४] 
शा लाका भलन्द अलम (यन्द) निवारान (गहर) & वेन भिद 


शता ममो उने समल मेषी माने रक (वेर ) सला ह ॥ ४॥ 
दोघ धाम ममि पृर्ट प्ट घुटित गाना भति। 
सिय निवासत शुद्र सदन सोमा कषमि कदि शाति ॥ २१३॥ 
उन्म महम सनक प्रक्ररे युद रतिर षने दए मणिजधि सेमी शप. 
के षदे लो ट। शीताजमे रूहे एर मरी शोभा्न वणेन वा ते $ 
जा एकता ट ॥ २१६॥ 
०-समग दवार प्व सि कपय । सू सीर भट मागम भाद्र ॥ 
व च ॥ १२ संकल खव सघ ॥ 11 
गने टम इन्दर £ जिन शर ( मधषूत भवा करे 
चमकत हए} भर्‌ छो  । क माश ] रो मर गो ओः भरे 
मी गी उती ै। पो गौर पिप त्थि शत वहीनी कसा र गनरं 
(रान ) भनी र ह, भो शद सपय धके ौररेवि भरं सवी १ ॥ १ ॥ 
सचिव सनेप शेरे । दृष सरिस छदन सव मरे 1 
र शिर सर सरिति समीपा । उतरे भं तं दिषु भर्षा ॥ २॥ 
त-स पवी मनी ओर रेनपति टै रन सपमे षर मी रानददीते 
दी ई] गे ब्र ताला भौर नदे निकट नह बदरे यनचेग उत ए 
(ग न 2६।.२॥ 


~. 


[कं] आख एड अनुपम वाग देख बद सव ममेमे थे गौर 
जे सत्र ते यापना य), विामिनभीने क्-रे इनान मीः | मेप मन श्व 
हैमिीखजाय॥१॥ ` , 

सषि नाय एटि मिक्ता । प्ये वहं इनि दद समेता ॥ 

बित्वामित्र भदधुनि श । समाचार मियि्ापति पर्‌ ॥ ४ 

पके धाम कषीरामकन्रभी हुव अच्छा, स्वामिन्‌ ! कहकर बह निमे 
शमे धा उदर्‌ भये । मिथिलापति लनकनीने ऋ यह समाचार पामा ए मानि 


^ खचि मुरि युर म्याति। 
० मड ब्र 
चले भ्िछन श्रुनिनायकहि सुदित राड पहि भाति ॥ २१॥ 


1 # रामचरितमानस प 


शौण-दोन्द मना चरन धरि माया ! दनि भली सुदित सुनिनाथा 1 
विरहे सग दद्र वदै । जनानि माव्य बहु श अदे ॥ ।॥ 
गजान भुमिकरे चरणो एक रखकर प्रणाम क्रिया । पुनि खामी 
विश्रमे मरक होकर आशीवीद दिवा ] फिर सारी बराहमणमण्ठलीकमो आद्रिति 
प्रणाम विवा ओर अपना दर भागय जानकर राजा आनन्दित ए | १ ॥ 
छप रल कदि यरषट षारा। दिलामिद्र॒भषदे वैरा # 
देहि भवस घाए्‌ ठोड मां । शप रहे देवन युर ॥ २॥ 
वारर इच्च करके विमितजीने रजाको दैठाया । उदी समय दो 
भर आ पटर जे ष्मादी देखने एवे थे ॥ २ ( 
सयाम भौर भट बमस दिसोरा । रोचन सुखद पिख तचरा ॥ 
उ सकट सथर रघुपति भए । गिस्वमित्त निकट वैपु ॥ १॥ 
युक्मार किशोर शव्यावारे, ध्याम भौर गौर गर्णे दोनों मार तरेक शष 
दे सौर सरे मि चिच शुरातेवे है ¦ व रुनायनी आयि तव भी 
[उकम ण्ड ते प्रमान होकर } उर खे हो गये 1 विश्वामिनरनीनि उक 
भते पाए डा लिव ॥ १ ॥ 
मु एर घी देति दर भ्रा । वारि बिोचन पुरुक माहा ॥ 
रति मर गोहर देष । मबठ ॒बिदेहु विदेह पिष ॥ ४ ॥ 
दोनौ आ देर सभी ती हुए । सये न्मे जर भरभाया { मानन 
बैर रे भोष्‌ उड षदे) भौर शीर रोर हे उठे । रप्र मषुर गमो 
५ 1 विदेह ( जनकं ) किष विद (देशौ पुमे एत ) 
॥१ 
दोष्‌ मगन ज जानि पृषु करि विवेक धरि धीर । 
पोकेड एन पद्‌ साई छिरः गदगद भिस गभीर ॥ ९९५॥ 
मनने र त जान रामा सनक पिको आभर ड घौरल धारण गा 
मै एमि अरग च नना हद (ममर ) गमः वर का 1२६५) 
नौभ-च्‌ नार दर दौर शक 1 गसि मिका ॥ 
1 कमी सोद मावा ॥ १४ 
गा १९ च दोनो छ क धनिके भूसण-ट, मा ती 
युके परक { अधवा सिता वेनि भोति, 
तो 9 टकर यान का है, कीं इ बह 
उल दिस्य , दु मोर । थम एत्र चिभि चोरा ए 
थे श्चुः सतिम टु य नमि खु हुड 1२१ 
मेष न भे समाप दी क्सम [ बना इमा ] 8, [श देलक ] ६8 
ए षे र केः नने दडः | ह ममो ¡ एतथ आवे श 
(ति) भाते धय दू । ह नय ! रातेः दयाव न कोने ॥ २ ॥ 
द्दषटि च्छक अति आरामा । इ्दस बरहषुखष्टि मम स्याधा ॥ 
ए सि विईि ड प नीक ! चन इमहर न हो भकोषठ ॥ ३7 
इन ेखते ध भख मके ब हेव मेर मनते चदे ब्रहयुखकतो स्याम 





& बालकाण्ड जै १यद्‌ 


दिवा दै । यनन षर य्य रान्‌ ! आपे ठीक (वयायं ही) का | आपका 
भदन मिथ्या नी तो सकता ॥ ३॥ 
ये रिय सिं जौँ खमि प्रानी । मन सुका शसु चुनि कानी ॥ 
शुक मनि वसरथ के लाए । म दिव ऊगि सरस पाए ॥ ४॥ 
शतृ ्दतिक (जितने मी) प्रणी है ये समीक्ष मिव है । सुनिकी [रहमरी ] 
बाणी सनकः शरीरामली मनीःमन शुतकराति है ( हकर मानो संकेत फते ह पि रह 
खो नही ) । [ तव पमि कहा--] ये खढुद्मणि महारा द्रे पत्र है । भेर 
हिते कि राजान षै मेरे साथ मेजा है ॥ ४॥ 
दोयं ल्खलु दोड धघुवर रूप . सील वल घाम । 
मख रायेड सदु खालि जगु जिते अघुर संभराम ॥ ९१६॥ 
भे रामर चौर सकष दोनी भेह भा रप शी यर वके धाम ई । हारा नयह्‌ 
{ च गातक्ा] शी देम इन्दि ददे शको जीतकर भे मरणा की ह ।११६॥ 
शवौ० मि तच प्रन देलि शट राक । फदि न सकडं निन धुन भरमा ॥ 
सदर खाम गौर दोड धाता । भरनदह॒ के भर्म वाता ॥१॥ 
रलानि फा--रे शति ! आपके पर्णोके ददन कर मँ अपन पुण्य अभाव कद मही 
सकता यनद एम जौ मौर व्क दोनो भाई भानन्दो मी नन्द दनेवले है ॥१॥ 
दन्द कै प्रति परसपर 1 ॥ 
श्ट नाय कह सुदित पिदे । बर एव सदन सनेह्‌ ४२॥ 
इनकी आपस परीति दी पिभ ओर दामी ह; भ मनको बहुत भाती रै, 
पर [ बाणे दी गह ज कती । षदेद ( धनगर ) आनन्दित शेकर क्षे ६-- 
हेनोय | दुय रह सौर नौवी तद छै सामावकपरेमहै॥ २॥ = , 
नि धनि पशि च्व नरन 1 घु गाढ उर सभिकः उछ ॥ 
शनि पसंसि ना पद सी । चे उवाह नगर भवनीसू ॥ १ ॥ 
राग जस्बार परु देते टै ५.५ इटि वरे श्ना श नी चाहती ) । 
{रे ] दर प्त रहा द मर इयं बहा जह ध । [ किर ] निकी 
भवेस करके मौर उने चरो दिर नवक राना न्द स छवि चे ॥ २॥ 
घव श्चा । तरौ णाद ठे द्द शुमा ॥ 
क भलि देवकं । गपड राव एद चिरा करां ५४६ 
, णक इन्दर मछ ने एन समय ( दीश } धुलदावक भा, षं रजाने 
ऊ ३ नकर उह | तदमत्ठर सुव अक्र पूषा घौर सेवा करके पाया विवा 
”“ गकर अपने षर गये ॥ ४॥ च ~ प 
०--रिषिय धरमु 
“ के (99 दिवु रहा मरि जमु ॥ २१७॥ 
खख धिरोमणि भु भीरामवनदरनी शरधियेकि खाय भशन ओर मिम करके 
भा लदपगरमेत दैत | उत उम रमर दिन दई गया था ॥ २१७ ॥ 
ज०-डसलन हदये उरला विते 1 जाद्‌ छनक्युर आाईइन देखी 
रमय भरहुरि निदि सङ । अग न कदं ममाह सदा ॥ १ ॥ 
कणजीक दये वेष खाच १ 9 वकर कमकपुर देख जा । परु मं 





१५४ ॐ समस्वरिठभानस £ 


~ ~ 
1 [ इलि धरक्यम इ नौ 
६ सदी चन उष्क्त रै ई॥ १1 ह 
श रास शुद्ध स्न दौ सति चमन { स शटा शि न ५ 2 
पुरम छिनीत सङ्वि पडक्ई 1 छे शुर अनुशासन प्त 
{ अक्क ] ीयन्वदरलने छोट मे मनी दथा जन सी, तव ] उन 
इवमे कर्ता उमड़ यारी 1 ३ दी माहा पर ऋतं ह विनये खथ 
हय उन्ककर रोड २॥ 
+ एर दडन उद 1 भमु सकोच र प्रय न कषद 1 
क उम ऋव्तु यै परी! नगर दरद्‌ दूरत है सारो ॥ २॥ 1.2 
हे नाण! छम नर देखना श्रा ै, मई (आ) ॐ उर जौर संकोचभे 
श्रथ स्ट नह कदे पि जापक धाद षज; तो नँ इनन्ने नमर दिचलाश इत 
शै [ भा ठे मर्जे ५३॥ 
१ च कह कचन सुती 1 कल = राम कुहं रत नौती ४ 
धरम खेद पारश हन्द सष । प्रेम पिदस सदन सुखदप्ता 1 ९॥ 
यह नुनकर इुनीशवर रिशवगिनिडन रनर 8च्न द्दह राम ! हम नीतिकौ 
गा करदे नेग दे सत ! 2 ध्नी मरवादाननं पालन ऋनेगले ओर पमे की, 
र हेकर चवक इल देनेबाछे हे ॥ ४ ॥ 
दो-जाद दि जाबहु नगद शुरू निधान दौड भाद । 
शण्ु सुफरः उव के मयने दुद्र ददन देखा ॥ १.८॥ 
क़ नित्रा दोनो मदं अक्र नगर देद्ध आयो ! भने इन्द्र मुख दिवश 
ऋर सव [ नगरननिवादौ ] ३ नतरषि द्य कटे 1 २१८ ॥ 
चैग-सृनि पट न्न रषि दोर भरना! च्छे कोफे ठोचन सुद रः ॥ 
यरु धद देफि लति सोषा 1 कगे सेम छेन भु छोमा १ ९ ॥ 
रन उ देने भेनो भाई उति परणक्मलकी भन्दना के 
चरे । वारक हेड इन [ ॐ सैनदयं } शरौ गव्यन्त लोभा देखकर खाय छग गये ! 
उनके नेद शौर नन [ इनन म्र्ठरीपर ] हमा गये ॥ १ ॥ 
पीठ दन परिकर कटि माथा । चाद चम स्र सोदठ टाधा ॥ 
कल श्च र्द्म खरी ! समक शौर मलेर शेश ॥२ ए 
[ दन म ] प से बत ४ म [ प] प्रं वकः वैष ट! 
च्यम छर णट्य.वाग उरोम्ति ई ¦ [ शयान ओर सौर उ ] शरीरो अनु 
(अर्यात्‌ ष सिद र चन्दन अष् पदे उद्र उदी रग ) जुदर चन्दनी 
लर व्नीदै। रद यैर रे [ त ] गी मनो जीद ॥२॥ , ~ 
रि बर यह दिता 1 उर ससि सविर नामनि गा ! 
सुभव सोच सर छोडन \ ददद मर्व सपत्र ओचन 1 ३ ॥ 
हे दधन (पु) र्दन (यजे पिल आग ) द चिल छ १ 1 
[ चैड़ी ] लीप सचन्त सनद गलदुचछकरी याचन ई । न्ट खाक कमले खमान 
मैव ६1 दीने तारे चुडनेगा्न चनमाढे उन इ है } ६ 1 
ऋनम्दि नं ट पि देह ! विनत दिदि रे सड ठे 1 
कठि चाद करि घट याद । तिरक रेख सोमः चसु रकी 7 ४ ॥ 





ॐ वचछकाण्ड क शष 


स 
ररम कं [अलनत ] चोमा र रेह गोर देखे 8 {देने 
विलो परानो ण त दै । उन निवपन (दि) यी मनो 4 (4 
पं इन्दर ६] [ गेपः ] तिचे एरी यनदर द मनो [पूति ] शोमापर 
शद वगा दौ गयी है ॥४॥ 
दो--हचिरं चौती खम सिर मेचक कबित केस । 
नख सिख अ छोड सोमा सकषट घुदेख ॥ ९१९॥ 
 , सर इन्दर चोन यिय [ पिये ] ई, ऋठे भोर ईशे बाह ह धनौ 
मारं नकते ककर रिखातक ( एदीरे चोदीतक ) न्दर है जौर षारी शोमा ज री 
च्वि वैली ह ६ै॥ ९१९ ॥ 
चौ५-देखन कर भूपसुत आप्‌ । समाचार ॒पुरवासिम्द पार्‌ ॥ 
धा धाम कम्र सब त्यामी | म संक निषि चन छरी ॥ 9॥ 
जबर पुरवारिेनि यह समाचार पाया क दोनो राजकुमार मगर देखने वमि 
अविः तप्रषे सष घट्थार ओर स्म फाम-कच शकर ठेते दौ गरा दसी 
[ धनका ] नाना छन ददे षं ॥ १॥ 
, ^ निरि सहन दर दौड भादर । हों घुल दोचन फक पां ॥ 
कृषतः भग्न शररेखन्दि छागी ! निस्खटिं रामर सूप भनुरानीं ॥ २॥ 
समातदीठि इन्दर दोनो भश्यौको देकर वे जेग नतन फल परकर दसी ले षे 
द) बरी लियो पर रोली इ पेमरदित धीयमवन्रनी$ पको दैव श ।२॥ 
महिं प्रपर अदन सपरीतौ ! सखि इन्द फोटि काम एनि सीरी ॥ 
सुर नर भघ्ुर नाग सनि माकं! सोमासि क सुतिअति नाक ॥ ३॥ 
मे मप रदे रे रातं कर रदी ६--े दल! देन करो कामक 
छवि जीत छया है| देना, मनुष्य, सुर, नाग बरौर यिम एल दमा तो की 
उने थी नी आती ॥ ३ ॥ 
जिषतु चारि युन विधि छल चारी } विकट वेष युस पंच पुरारी 
अपरं दे भस छोर त भादी । य छवि घी पटतरिज शा ॥ १॥ 
„ भगवान्‌ विष्णु चार भुजा रै, नीके चार सुख र, शिवता विकट 
(८ 1 ओर उनके पोच दै ४। दे शशी | दृषरा देवता भी शरदं देष 
नहे विक सा इत ठविकी उपमा दी भोय ॥ ४ ॥ ५ 
दोय किलोर षमा सदन स्याम गौर इक धाम । 
. ` अग्‌ भय पर वारि कोटि छोटि सव काम ॥ २२०॥ 
व लमौमियोर अवसादक पर, धवडेओीर गेरि रंय वया डलके धाम! 
ब्न-भद्गपर रोद अरो कामेन नषटावर कर देना चाधि | २२० ॥ 
च» ससी थस छो सजुषा । लो न मोह ष स्य निषारी ॥ 
कोड सेम चोरी शट वाली) जो मै सुगा खो धुहु सथाभी ॥ १४ 
देखी {( मल ] कशो तो रेवा फन शशीरवारी शेय नो इ स्प देल 
मोहित ने दनाय (अर्थात्‌ यद सूप व्ुचेठन सयक्नो मोहित करनेदाखहे )। [तव] कोद 
शूरौ सलौ परेम कोमरु वाणीसेनोली, दे यानी [मनि चो छनाहै उखे बुनो--॥ १ ॥ 
ष्‌ दढ रय क दोधय । बाड सराकनि ढे कल शोडा ॥ 
उनि करसि मखं“ के रद्ववरे । निन्द रन अभिर निसाचर मारे ॥२॥ 


ष * समचरितमालल क 


1 यत 
भे दोना [ रामार ] मदग व्यस्य पतह । शार राचतका सा धन्द्र 
चेदाह {दे 0 दिशवगिषे ली रधर कलेव & इन्दे युदक मैदान 
रसो मगरे ॥ २॥ 
द्याम मातत ठट दं चिकेचन्‌ ¡ भो सारी सुसुज महु मोचन ॥ 
स्या घत सो सुर चनो ! ना रु धल एयक पानी ॥३॥ 
जिनका दम बरी यर इन्दर कमर-$डे नेन है ओ मारीच शौर सुबाहु 
पदको दूर कलेब वीर इस्त सान ई धीर जो हयम धलश्वाग च्वि ह ह वे 
परठलारक् पुत्र ह इनक्ष नाम पम है ॥ ३॥ 
गौर भ्िसोर वेषु षर क्क सर चप राम के पठे 
छष्ठिमह मासु राम उषु ता । सुदु सखि तासु सुमित्रा मतता ५ ४॥ 
विनशन रय मोय ओर किशर अव्या है मौर रो इद्र ञे बनाये भौर शध- 
य पतुपरवाणर स्मि श्रीयम पीठे-पठ च्छ रहे ई; वे इनके छे माई ई उनका 
नाम हण ६ ¡ ह उख ¦ इनो, उन खता उुमित्रा है ४ ॥ 
दो०--विपर्रभु कर धषु दोड मृग सुति चधू उधारि । 
मप्‌ देवन्‌ चाएमख सुनि हरौ सष रि ॥ २९१ ॥ 
देनो माद ब्ाहण विधामिनक्ा काम कफे जौ राततम सन मौतमकी ची यहलया- 
पर उदय श्रते ग पयसदेरणे भाय दै । यह सुनकर घव लियो प्रस्रहुरं | २२१॥ 
चो०-देसि रास हमि को पक कद । जु नाकि चद्‌ बड मं ॥ 
लौ सदि इहि देड गरन ! पन पदिद डि करह्‌ भवाह्‌ ॥ १ ॥ 
श्रीरामचन्रजीकः} छवि देखकर कोई एक (दुष्य स्स ) कमो डमी वर 
नके योय ह ¡हसी । षद कर रा इट देड ठ, वो प्रहा दक ह~ 
पूर्वं पि विया कर देरा ॥ १॥ 
कोठ चह ए भूपति पित्ते । सुनि सेत द्र सनमाने ॥ 
एचि पर पटु सद न तच । विधि वल इ सवदे सनं ॥ २ ॥ 
निभे कदा--राना इन पश्चान स्वा है भौर मुमि सहि एना आदू 
समन भ्व ६! णच हे सी ] राज पना परग नेका । भह होने 
भीय दोक इण अविद है माभ वे ए है ( पणर असले 
मूता न्ष छोड ) ॥ २ ॥ 
स ष धी लठ यद्‌ भिधा । सव क पुरि चिव शठा ॥ 
लौ सानि मिट पर पू । नाहिन भाषि यो सवेह 
मोदं परल ४ पि गात ३६ बौर नः लतारैभिमे स्यम उपि फर - 
£ तो चनो यही च मे} द उछी ¡छे सेद मद है ॥ १॥ 
जी भिभि वस भत रौ संग । तौ इह्य छे सम समू ॥ 
सशि मरं भरति नति त ! कनक पू जावि टि मे ॥ ९॥ 
मेरेवोगेदे पोगवन नः लोध्यसद लोगे ज हवी नो 
१ न सीह १.दपी नते कमीये यह मेये ( ५१ 
०-- चादि त टम कखन लखि सद कर दरसु दरि । 
य्ह सु तथ दो जव पुन्य पपच सूरि ॥ २२९१ 


# वाटकाण्ड # १५७ 


~~~ 
, नकी तो (विवाह न हआ तो ) ह तख ] इनो,हमको चढ़े ददन इम १। 
४ तमी शै का ६ लवर ण प॑न हु पष्य शं | २९२ ॥ 
० गली भयर कदेद सि नीक । ए विट्‌ अति दित सबही क ॥ 
को फ संडर चप केरा । ए रमक गूदुगद किलोर ॥ १ ॥ 
नि काद उदी गने बहव यच्छा डा । द. विगाह प्रम 
दित द । भरन उरा--रङ्कनीप् दद कोर है मौर पे व रन्छुमर रोम 
५. शरीर बच्छ ई ॥ १ ॥ 
स्वर स्स अहर्‌ सयानो । ह सुनि धव ऋ अटुवानी ॥ 
सति दन कोड कोड असक षद धमार देखत उदु चष ॥ ९ ॥ 
रै सवानी [ उर अरमंबष ही है । यह युनकर दू सलौ कोम वाणे के 
खगी-- ली | इने समन्त कोई रेण ऋ है फ़ ये देखो रो शरे, 
पर दमक प्रभाव बहुत बा है ॥ २॥ 
"परि जा पद पकक धू । तते अहल्पा छत सघ भै५ 
सो कि रहिष्टि बि सिवधज सोरे । बह प्रतीति परिहरिभ न भोरे ॥ १॥ 
जिनकै चरणकमले भूक सै पाकर अहल्या तर मयौ, मिरे बड़ा मापी 
पप भि य व पवा विवी धद विना तदे रो । शठ विशा भूलकर भी 
मी छोडना चाध ॥ ३ ॥ 
जे विरेचि रचि सीय सदा । ते वयम धह सवेद भिषारी ॥ 
¢ , वानु बदन शुनि सवं हरषानीं। दे होढ इहि एषु यागी ४ ॥ 

“ नि र्मने दीवार गाजर ( द चदे ) रा दै, उतीने विचारकः 
बला बर भी रे रमा दै । उसके ये षन नकर स्र इत रं मौर कोम भाषे 
कहे एनी दहे ॥४॥ 

वो०-दि्य इरि बरहट मन खुलत छुोधनि शद 

“ जाट जं जं वेषु दोउ त तष पमान्‌ ॥ २२६ ॥ 

इन्दर एव शौर नदर नेनौवारी चरो वमूर-ीमूद इदम इवि हकर परल 
भरा शी ह । जहो दोनो माई वति £, पदों पम आनद छा बता है २२६॥ 

चौर पूरय दिति गे श्ोड स ! अ घहुसख शित भूमि वनाद ॥ 

भति भिर तादे पाय उरी । निमङ बेदिका सचिर सवारी ॥ १ ॥ 

दोनो भारं नगर पूर मोर रये, जह धवुष्ये स्थि (रग ] भूमि बनायी 
गयी थी. बहुत खवा-चीढ़ां सन्दर ढाज इभा पक्ञा गन था; निष्पर सुन्दर ओर 

„ग~ निर्म वेदी इजायी री वी ॥ १॥ , 

ऋ दिति द्रे मंच विसाला । रवे नौ वैं महिषा ॥ , 

„ वहि ठे समीप चटु पसा । अपर मंच भेडरी यिद ॥ २॥ 

“ वार. सोनेके कड़े मंघ वने ये, जिनप्र राजा जोग बर } उनके पीडे 
समीप ह चं भोर कूरे मचा्ोका मष्डलकर भेर दुोभित था ॥ २ ॥ 

“ कुक ईति सम भोति सुशं । वैकि नगर. सग सहे साईं ॥. 

„ दन्द के निकट विसा सुाए्‌ । चवठ धाम॒ बहुषरन यनाप्‌ ॥ ३॥ 

उद कुछ ऊँचा र ओर सव र्म सुन्दर यः, जँ कू नगरके सेय बैडगे । 
उत्वि. विशा पलं सन्दर सफेद मकान उनि रमेन्न वये गये ई ॥ ३ ॥ 








श्षट & मचस्तिपालिख ॐ 


जह ई देहि ठव वारो ¦ बयाशेतु मिल ङ सलुदषरी ॥ 
पुः कक क वि हु दष । साग्र सुदि देवं ,रवमा ॥ ४५ 
अं यपनेपने मुखरय चि यवाये (जो ज देठना उचित) 
वक ेतषी नगरे भा कोमल पचन धकर भादर भरु भीराचन्द- 
जो [ वशाल ] एवन दिख रद ६ ॥ ४ ॥ 
141 
तेत रषु ऋत 
स्व दच्क इी बहाने भेम वश्च होकर शरीरके भनोहर अश्नीत 
छू धे पित ह सै ६ भौर दोनों मादय देठदेवकर उनम हदये 
भलनत इ ह ए दै ॥ २२८ ॥ 
ौ०-तिष्ु एुय राम प्रम से । प्रति सरैत निकेत वसाते ॥ 
मिञ निस शि सय के वों । सदत पेद जाहि दोठ भाई ॥ १॥ 
गवन एव वामो परमे पृश ज्ञानक [ यमु } दा 
मभू परया फी [ छठे बा उमर, भानन्ड वीर प्रेम सौर भी भद 
रागा चि ] बे खव  अपनी-भयनौ सिके गुर उन इण वेते १ भर 
[ ल वलनेषर } दोनो मा परमि उने पाड चले लाते ह ॥ १॥ 
रभ देखी भलुराि रथना । फट शु मधुर मोर यथा # 
ड निमेष भ सुन निकाया । रच्‌ जु अदुसासन माया ॥ २५ ट 
कोम मुर भौर मनोह बदन कर भीरी शपते शरोर भा उपरतो 
[शमि ] सवना दिखछपे दै । विन आश माकर मागा छव निरेष (ष्ल्क 
शिर चपा ताव ) र हाड समूह स्व शस्त १, ॥ २ ॥ 
भति श॒ सोह पीनद्यासा । चितवत शित धतुप मसा ॥ 
दौः देखि चरे शु पाक्ष । लानि पिरह त्स सन सटी ॥५६॥ 
कह दीनोमर दवा कलेब प्ीरमनौ भके सारम धुषयराडफो चकति 
देकर ( भशर णय ) देल र । त रकार एव रक ( विपित रचना ) देख 
कः प रुते पर चे । देर हई नकर उनके मग रहै | १ ॥ 
कष ्रास सर कृ इर दो । चन यमाङ दैवते सोई ॥ 
फषि एतं भद मधुर सुई । किए भिदा वारक बरिमाईं ॥४॥ 
निन भके दसत मी बर छदा ३, मदु मनका यमाव [विदे रण र 
गदम्‌ श भी मयम नाव्य कते ह] दिस रदे १ ¦ उने कोपर, मधुर ओर 
दौ०-समव भति सन्‌ दित वोऽ मा६। 
ˆ» चुर प पसि चाह दिर दे भयघु ` पा ॥ २२५॥ 
किर मदे विनय ओर द संकोचे साप दो मारं गुरुके करणकप 
हिद नवा) माज पकर वै ॥ २९५ ॥ ८ 
न उनि भब मड) सवौ संवाद ६ ८। 
र 
समय ) मुनिन याश दी, तव वते 
क्र िदमाचनकयादरपा इति तेकते इन्दर यमि दौ पड बीर रयी॥९॥ 





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# बवारकाष्ड # ५९ 


ुनिबर सयन कीम्डि उब जा । छते चन॒ चाप्न धोद भां ॥ 
जिन के धरन सरोद छागी । फरद रिपिध लप शोग धिरागौ ॥ २ ॥ 
इष ओ निने लाकर चयन शरिा । दोन मां उम चरण दयति 
विने परणकमरछमे [ दरशन एवं सरं ] थि वैयग्यात्‌ यस्य भौ भौति-भोविके 
नप भौर यो के ३ ॥२॥ 
, वह दोड व॑ प्रेम नतु जीते । एर पदे कम प्लोरत् रते ॥ 
श बर छत भ्या दनी । रर जद सबन सव नटी ॥ १५ 
बेह दोनो माहं मनो परमे जीते ह पेमपू॑क गुज चरणकमौको व्वा द 
४1 एने बास्चार आला दी, तव भीखनायीने जाकर धवन कया ॥ २ ॥ 
चापत चरन छलतु उरं छा 1 स्य परेन प्रम पु पर ॥ 
एनि पनि भद क€ सोवहु पाठा । पौष धरि उर पद्‌ जक लाता ॥ ४॥ 
भीरमनीफे चरर्ोको दयते सगाकर भय धर परेमसदहित परम धका अनुभव 
कृते हृद ठगी उनको दवा दे है । प भीरपवन्रनीने भारा क 
ह तत ! [ भव ] े वामो । त वे उन चरगममर्लको दव धरक़रकेट रर ॥ ४॥ 
दो०--ञ्दे छख निसि विमतं दनि अरनसिला धुनि फान । 
शुर स पिले जगतपति आगे रा छान ॥ २९६॥ , 
शोत भीतनेपर, पश शम्द श्वनेति नक श्थमणमी उदे । चगत्के सामी, 
नान मीरगचन्दरुजी भी गुर पद्डे ही जाग गे ॥ २२६ ॥ 
चौ०-सकछ- सोच करि नाई नष्‌] नित्य निवि सविहिधिर राप्‌ ॥ 
मय जनि पु भाषस परां केन दून चले वड भां ॥ ३॥ , 
ब ्ौचकरिमा करे पे लाकर महये । फिर [ सन्ध्ा-अग्नत्ादि ] निलकमं 
सात फसो उम्नेसुनिको मतक नवाया 1 [पूजाफन ] घम जानक युरुकौ भा 
शकर दोन भाई शल कमे चठे ॥ १ ॥ 
भूष भगु ` षर देते शां । णे शसंत रपि शह ओम ॥ 
लले भिदपर सोहर नाना । धरन .षरन धर दि सिताना 1 ॥ 
उन्ने जकर ना घरन्दर बाग देखा अरे पन्त श माक २६ गवी ६ ॥ 
मक्ष ्ठमनेवाले भने शकतो र। रेगःविरंी उत्त उता मण्डए छवि ८ ६।९॥ 
भेव षद शरु सुमन सुषु । निज संपतति इर स जायु ॥ 
कातकं फोिंक हीर कोरः । दूष बिग नटे एक भोरा ॥ ६॥ 
नये पतौ, फलो भौर एवे युक्त इन्दर शर्त अपनी समयते कलयदृषलो भी 
षन रहै । पी, कोय, वैते, चकोर आदि पष्ठी मीढ बोरी षोर रे है भोर 
मोर बुनदर दत्य कर र ह ॥ २॥ \ 
प्य यगा सरु सोई स्वः । मनि सोपान विर्धित्र बनाना ॥ 
. विर सचि ' सरसि हूरंशा । जङग शनत शंजत शग ॥ 8 ॥ 
भागक बीयोवीच सावना सरोग इ्ोमित द, भिर मगो सदयो पिनि 
दृयते भनी उस्ना जठ म्मड दै, वितं अनेक `रंगोके क सिल हए ई चले 
(५ गत स 
वाशु वषु त 
॥ परम रव्यं आरासु  । रागरहि इख देत ॥ २२७ ॥ 





। % राप्बरितमानस # 


ग ओर तेकर देलक प्रु श्ररमचनद्रवो भारं खगत धित ह ¶ 
यह ब्रा [ वाव] प्रम रीय दै, ओ [ जगत्न ख देनेवरे ] भीरामचन्जीको 
अल दे. रै ! ॥ २२७ ॥ 

चौ दिति चि शर माोगन ¦ छग केत दंड शूल सुधित सन्‌ 1 
सेदि अवसर सीता रव आदं \ गिरिम पुवं जननि पउ ॥ ४0 
चरि ओर दष्ट डाक ओर मासि पृक ३ शररत मनसे पष्प ठेते 
खे } उती उम सीतानी वह म्म । आतान उन गिरिजा ( पै ) नस पूवा 
रेके धथ मेख थ। ॥ १ ॥ 
सेग स्ख खव सुम वानीं ! गावहिं शीतं मलेर यानीं ॥ 
खर एमीप भिरिजा यृ सोडा । बरनि त नाद्‌ दे मब सोय ॥ २१ 
साथे घ्व बन्दी भो समानी सो है जो मनोहर वाणी सीत गा र ह । 
सतेकठे पा मिरिलाजीका मन्दिर ुोभित है, भिसका वर्णन नही किया जा एकता; 
देलकेर मन मोदित धे जतः ३ ॥ २॥ ` 
मु इरि खर सिन्द समेत ) गह सदिस मम रि मिक्ता 1 
पूजा कौन्टि अधिकं भुरा । निज अनुरूप सुभय दत मागा ॥ ३ ॥ 
सिरो सरोवरं लान कके दीवाजी प्रर मनते तिरिगज मन्दि 
गी । उन्दने बहे रे पूला कौ भौर अग्ने योग सुद्र बर गो ॥ ३ ॥ 
पक खली सिग संगु वि्ठाई। गं रदी दशन फुख्दादै 1 
विषं एर ये विटक शट प्रेम भिदसे सीय पिं आई ॥ ४॥ 
एण़ सी सीताचीका अथ छोडकर एुठगड़ी देखने चटी वी यी | उमे भाक 
दोन मग्न देवा मौर रमे श देकः ड ठीतार्ने धत भयौ ॥ ५॥ 
दो, दसा देदी सकनद पुरक भात अदु वैन । 
कह आरु निज ह दर पूछ सश्च सुदु वैन ॥ २२८॥ 
„  एविभने उदकी दक देखी क उनका उरी पत है जीर नेमि च भय 
१ ॥ एव कोम बापीत पू तमीं कि मपनी पर्ता कार घता] २२८ ॥ 
चौद वु इर श आ! च्च किर सब मति सुहाए्‌ ॥ 
सम गौर कमि शट बतानी | गीर अददन्‌ नयम्‌ नु जानी) १॥ 
[उने इव--) दो रा्छुमार बाग देखने अये ई । कयोर्‌ भवस ट 
भर सव भकारे छर इ । व जग नौर गेरि [ रंगर ] 8; उमे सैन $ 
लानकृए टं । वा विने नेरी दै चौर तरेके अणी ह द ए \॥ 
सुनि दर्प सर सन उपान । सिय हिद चति उतक्षठ आनी 
एर कड नूषत तेद भी । सते ञे युनि सेर लाए कालो ॥ २ 
क ख (क अनर न सथो 
ण ¡ वे वही सज न 
कर मिशवामित मुम चथ मवि है, 1 २ 0 
धिमद निज ङ्प सोदनौ री कौन्दे खयं यर चर भरो ॥ 
यत थि जच सद होप्‌। अछि देहे देहम होम्‌ 1३॥ ` 
र विन्ते यपे सपत्र रोदिती कर नसे लीगुसवको अपने कमे 





#, वाखकाण्ड ‡# १६१ 


कर किण दै । जहो तह ख ओ उरं छवि दण॑न छर रे ह | भवस्य 
[ चलकर ] उन देखना बः वे देखने ही योगय दँ ॥ ३॥ 
ˆ शाब बचन भति दियदि सोते । दरस छमि ` छोचन शक्काने ॥ 
चलो अपर करि प्रि सखि सोद ; भीति . षुत उद = शद \४॥ 
उड़े कचन सीवाजीको अवन्त ही प्रिव छो ओर दरधनके स्थि उनके नेम 
अकुल उठे । उसी प्णरी खलीको धागे करके सीताजी ची । पुरानी प्ीतिको कों 
छक महीं एता ॥ ४॥ 
दोभ-ुमिरि सीय नारद बचन इपञजी प्रीति पुनीत । 
कषित विलोकति लफट दिसि अड सिष्ु समी खभीत ॥ २१९॥ 
र्दी क्वनोका संरण काऊ सीताजीके नर्म पितरे प्रीति उलन हई । 
वे चकितं शकर स ओर एत तरद देख रद दँ मानो उरी हं पृगढौनी इ्रउधषर 
दे रही छे ॥ २९९॥ 
चौ०-करकन किमि नूपुर मि सुनि । कदत कलन सन रयु हदर् युति ॥ 
मानँ सद्न दुम कीन्ही । मला बिस्व विनय कंठ कनही ॥ १॥ 
ककण ( हामि फे ), करणनी जौर पायजेवक ग्द नकर भीसमय्नी 
दवम विचारकः र्मणसे करत ६-{ यह ध्वनि देरी आ रही है ] भानो कामदेवने 
रषयो जीतनेका संकल कफे ङकेमर चोट मारी ह ॥ \ 1 
स्च कटि फिरि दिए तेदि मोर! सिथ शस ससि भए नयन चकोरा ॥ 
भए बिोखने आह अघर । म्ह सुषि निभि रे दिद ॥ १॥ 
छेषा र श्ीपमजीनि फिरकए उष योर देखो । भीपीतानीमे सर्पी चन्रमा 
[षो निकष ] के द्वि उनके नेतर चकोर बन गये । इद्र ने स्थि शिगवे 
€ कटक छग गयी ) । मानो निमि ( जनके पूवज ) ने [ निना खवर परमि 
निकास भाना गयां है णदस-दामादमे गिष्नरन्नको देजलना उनित्‌ नही. 
मायते ] सुचाकर रफ ए दी, ( पल खना कोड दिया, जिते परलोक 
गिला स्फ गया ) ॥ २॥ थ 
खि सीय सोभा घुल एवा । दर सराहत धच न भाषा } 
जलु विर संब निम निषु । यिरधि विस्व करं गरि दसा ॥ १ ॥ 
शतानीक शोमा देलक भौरामनीने वहा इल पराया । इदर् वे उषी 
सरना भ्र ह, क खरे मनन नही निके | बद योभा देवी मनुमम दै] मानो 
बरहममे थमी साय निपुणो मूर्तिर्‌ कर चंड कट करे दिला दया हो ॥३॥ 
दस्ता शट इपर करई । छदि दीपसिखा णलु श्रं ॥ 
खन उपस कथि रहे छरी । हि प्र - विवहुमारी ॥ ४ ॥ 
षह ( सौवानीकी शोमा ) इनदरलाको मी इन्र कएोवाी दै। [वह पी 
माद शेव रै ] मनो घदरतस्मी धर दीपक चे नल खी श | (यक 
नदरी भवतं सैष था, वह मन मानो चीताजीकी छुरतासमी दीप, 
शो पकर बगमगा उ दै, पठेडे मी अभिक इनदर हे गरा! ) लारी उपमध 
कतो कनिभेनि ला क "सला दै } यै जनकनन्दिनी प््ता्की कसि 
सपमा द ॥४॥ 4. 
शर स° ११- 





प्श # रदरितवषत ५ 


प्रद शरन्लक्ः 
से शट पद द स१ श्वर सत श्दुऽर१२४०} , 
[कः | वम वरे दे शः ए नः सलौ रं 
ककः भ सौर्य च पते मपि ह र ए सत्‌ 
दवन े-4 १६० = 
चक असत्य दः ए । शश्च धद लष श 1. 
श्ल मेरे श्छ ई ध्‌! धत श्रु र्ठ इषया 44 प 
ए दसी कवी स्व तिरो नि पणे वर] चिप ~ 
छे देले ति ४ भारी । ग्‌ इवत मद ज्तौ एर सैर 01 
षु किरि श्रनि सेनं । सर इ मो पतु नेषा ६ 
ष सड शल शर रिष । परर दुमद भैण ए भ्र १६॥ 
निष प्रन एप देशत से ¶ पिम र ए धे त 
६। श खल ( भप उल प सप ) तो मिवा तते । कदरे भा 
के म्यक ( रहे) ना ज दं १॥२॥ 
पि भ्र पर एर । चु ङ श अ र इ ॥ 
मेहि अर दिर 3 दं उ री र १0६4 
शमस (अनः ) सगर १ ति उमर क पम कषत 
क मी एव पो दे मपे सा भलत ¶ ताद किमि [ रटे 
भे शे} म॑ भै छी म१॥१॥ 
कद ३४६६ द पि र रौद बहि रे सि पतु 1 
बैगर कहि रदे षो । ते रणः ध धा वी १1 
पस सि # मर पे (अः ने सा मैदे माते 
ऋ ) ए व मिरे १३ ततोन धीर ए जैः पिव किते रे 
(प सई पर (ले एम म के ) एते गः स सथर तै १।५॥ 
से, उती भ्रुर ल भर धिष सप दोप । 
व रोब भद डवि ष शष्ट ध पान ॥ २६ 
गर भरम मि वं १९ दे ३.१ गतस मि इस षमा 
उक इतन एण स परनमौ तए ¶ २४१ ॥ २६९} 
योऽव श च्‌ दति रीव 1 ध दः पर य्वा ॥ 
शं दिते एय परव के । दं रए एतम म यदी | 8 
चच र सेत र भोःरेह ख| ज ए गत वित्रा 
पव क. । अ मनै (पत भ मोपा) 
कैत च ए र्कम कमै ठा पत १ ॥ १ ॥ 
धद भेद छ प्रद्‌ उना । भमर नौर कितोर पुप्‌ 
91 १२४ 
क केसे 
सद -भ्कखराता चत्‌ 
ष र युते इरि १३ एमं पी त 


शिर पदं ध र गत सुभि ज 1१५ 


# बालकाण्ड # श 


आषुनायत्ीकी छम देखकर नेत्र थित (निल) हे रये । पठन पी गिरना 
छे दिया } भिक सेहे करण दरी वल ( वेका ) हो गवा । माने श्‌ श्रै 
च््पाको चकेरी [डु हुं ] देड ए शे ॥ ३ ॥ ` . ~ 
छोय मग राम उर आरी ! दने पफ कट साती ॥ 
छव सिय एसिनद मेगवस जानी । कहि त तका मन सक्वमी ॥ ६ ॥ 
तेने रे पतक हृदयम शक दठुररोगमि आमीन पणो 
किवाढृ सा दिये (अयात्‌ मे भूद उनशन ध्याम के च्णी ) | जव सिने 
दीलरजीण र बदा यना ठव वे मनवा री इ नही कत यी ॥ ४॥ 
दोङताभवन त प्रगट भे वेदि घस दोड माई 1 
निके जु य विमल विधु घच्द्‌ पटर विगाह 1 ९३९ ॥ 
उदी समव दोनो माई स्तामण्डप ( इस ) मेते कट हए । मानौ दो तिम 
भरमा वादके परैको हटकर निकले हं | २३९ ॥ ^ 
चौग-सोभा सी सुमग दो वोरा । मख पीत अलाभ सरीरा ॥ 
‡ भोरप॑ल सिर सोट्वं॒नीके। श्छ षीच बिच सुम फी के ॥ १ 0 
दोन इन्दर आईं धोयकी सीमा ई। उनके शरीरकं जामा मौज ओौर पीडे 
कृठकीसी ह ] कपपर इनदर मोरंल हरोभित ह } उनके वीवबीच पूर्य 
वधक गच्छे छो ६॥ २॥ 1 
भाढ रिक श्रमविदु सुप । श्रवच दुभ यून छि छाद्‌ ॥. 
बिक शकुटि च शरषरदरे ! नद रोच सूोचच रतनरे ॥ २॥ 
मपर तिलक भौर पी पर ओमायमान र । फानौमं उदर भूषणे छवि शयी 
दैवी मौर दषरडे गर ई । ने र कमरे समान रान (भर) नेष ई ।९॥ 
चार, चिवुक नासिका यपोखं । शास धिङास छेह भु मोखा ॥ 
शख छि क्वि न जाद्‌ मोहि प! जो विलोक गडु कास राही | ३. 

, मोदी, क भीर गारे उदर चौर हीम शोमा न गोः धम रती दै! 
पी छि त मे री न रत, मड देखकर वहे कामदेव ठ बति ह ॥३॥ 
डर मनि भ कु फर गीवा । काम कम कट शम धरीवा ॥ 

शमन समेत चाम कर यौना । सर्वर छर्म सखी धुरि एोमा ॥४॥ 
वदठःखल्पर मभिवोकी माया ह । श्रह्के ष्ट बुन्द गम है { फगदेवो हीमे 
रचय ड सात ( उतस्नदुवदाली पतं म ) बा ट, जो पकी सीमा ६| 
निरव ह््पमौसितदोना हसी बदथेभय डमर गे तदी छ्ेना रै॥४॥ 
दो०--केहरि कटि एट पीव घर उपमा सौं निधान । 
देखि विरा खखिन्द भाने \ २३३ ॥ 
शिवी (पतथ, श्री ) कमा, ताम्र धारण पि ए भा शीर 
शमे ण्डा, पूय्च्छे सू मीरामचलीको "देखकर एरिया सपने आपकी 
शूवी॥ २३॥ =. > < ॥ 
चौ० रि धीर पक भाषि सथानी । सीता भन बोडी गधि प्रानी 
“ ; षरे गौरि कर श्यान छट । पष्ट, देखि किन लेह ॥ १1 
पल चर सल वीरल करर, शय पककर सीवान वोै-पिरिवागी् यन 
सिर कठेन, इर दपर राजकुमार कयौ नदी देल लवौ ॥ १ ॥ 





1 # चमरचरितमानस # 


सदि सौर्यै तद कयन इधर । सनञुखं रोड रेदसिथ निरे ॥ 
क चिल देखि रान ह ओषा।सुभिरिपिि दुबु भतिष्ोमा 1 २ ४. 
वर जनीन सुरद नेर सोढ बीर रुके दोन को अपन छमने 
[सङ ] देवा । नदे हिव श्रीयम रोमा देखकर जोर पिद पताका प्रण 
याद रै उनके मनं ब्रव क्षम घे ग्वा ॥ २ ॥ 
परस पि ऊः फ सीरः \ गयट ग्र सय कटः घवा ॥ 
ति भार पु उरि ऋ \ अल ऋरि मन विशस एक आदः ५ ३ ॥ 
स्य ससियेति दीपताजीकने पश (परमके का ) देखा, दवे सव्र मबभीत हेरा 
कटने सर्णा--दृ देर ह यवी [ मव चलना चा | । कल दी प्य पिर गर्यिगी, 
पेष र ए पल्ली मन सी ॥ ३॥ 
गूह गित सुनि सिय स्री ¦ भग्र यिदद माद सथर भासी ॥ 
धि बि धीर राञ्च उर अनि। किरी लपतर पितुबस जामे ॥ ४1 
शलौकी यह्‌ रहयमरी णी पुनकर सीतानी सकु गर्व देर छ गयी जान 
उ पातक भग छमा । बहुत भीर भरकर बे प्रीएमचन््रगीक्न हदये के आवी, 
भीर [उन्न यन कद हुं ] अपसो ता सीन जानकर जैद चरी | ४ ॥ 
धोद मिल गग दिग तठ फिर बहोरि बहोरि । 
निरि निरखि प्घुवोर डपि वादृह प्रति न थोर ॥ २३४ ॥ 
गः पनी जौर इमो देखने वहाते ठीतानी वारर घूम चात १ शौर 
भीय छवि देलरेदक्र उनसर कम नही बदर है ( सोन बहुत ही 
ऋता जता दै) ॥ २३५॥ < 
चौ-अति सुधि सिक्चाए मपूरत। चो रि टर साम मूरति ॥ 
0 क सह सोभा शुर सानी ॥ \ ॥ 
जक व प्तौ ( मत विला कती ) द द. 
मे शरम सेनी मूको रकष चरी । ( म 
अनिद उन चिन्त वी पी म यधप रषुगायजी उ त तद पित अकी 
सयते उन दयम भोम य दो, इन्दि मे विलाप कान घ्य परेम देशय, 
शीरि त गम र दुभा, र भगवा व्क स भति हो 
नर स उन दके पाल कक जन ) प्रु ममो नन दष, 
लेहः योम योः ुगोमौ चा बानद्मेगती रं जना ॥ १ ॥ 
पम भगम श मसि कह । चर दिद सीय विदि दीनी ॥ 


द जवनी भ्ल योद भल मो कर सोषो 
दम रम भी परेम साह नाह ६२५५ 
1. (४ खडकर अपने इनदर चिम 


अगोमी वन्दना के हय चकर बो ध 





अव गप पात भाता । जगद अनि वुसिनि इति याता ॥ ३ 
स अः परेम गना साच यक प्रे! आदी जयं हो, जम्‌ श द 

> धर्मी उनी [ ओर ठन्न खगा देशमेव ] जकोतै | 

भ ष दे षी समरे मरेन सौर छः इले लामिकरदीक भावा! 


क वाङकाण्ड # श्य 


हे शगजननी ¡ हे निजरीकी-सी कान्तियुत दरीरयाखी [ आरी जय हो 1" ३ ॥ 
ष्टं तव शादि मध्य छवघाना । अमित अरमा वेह निं नामः ॥ 
भद भव विभ पराभव ारिनि 1 विस्व बिमोष्टनि बल विषारिमि ॥ £ ॥ 
आपका न भादि दै, न म्व दै गौर न गन्त दै । लापे अरीम भमावको ेद 
भी नीं जानते । भप संसारो उच्च, पालन जौर नाश करनेवाली £ । विश्वको 
मोदित करनेवाली भौर खतनररपरे बिहार करनेयारी ह ॥ ४॥ 
दो*-पतिदेषत घुतीय महु माहु प्रयम ठव रे | 
भमा अमितं नं सकर्हि कहि सष्टस सारदा सेष ॥ २६५ ॥ 
पतिक देव माननेवाी भेह नारियोमि, हे माता । आपकी पथम गगना है | 
आपकी जपार महिमाको दारो सरखती भौर शेषी मी नहीं क एके ॥ २१५ ॥ 
्ो०-सेवत तो सुखभ फर चारी । बरदावमी  एरारि ` पिमा ॥ 
देबि पूजि षद्‌ कमर दु्हारे। सुर नर युनि सव र्ट सुखरे ॥ १ ॥ 
ह [ मक्त र्गा ] सर देनेषाली {हे तपरे श चिवजीफी भिव पती | 
आपकी सेवा कमेत चारौ फठ घुलम शे जाते है । दे देत ¡ आपके चरणकयलोकी 
पूला फे देवता स्नुधय जोर मुनि सभी खली के जते द ॥ १ ॥ 
मोर भगोरधुलाद॒नीकें। भहु सदा उर धुर सवष ४ ॥ 
कनेक प्ट न कान तेष । भल कदि चरन पदे वैदेही ॥ ९॥ 
मैरे मनोरयको आप भीमेति भनी है, योक माप सदा खवके दयरूपी 
नमे निवास रती दै । इसी कारण नि उन्न मक्ट नही किमा । पेरा ककर 
जनकीजीने उनके चरण पकड़ लि ॥ २॥ 
कवितेय प्रेम अल भं भवानी । खसी साट भूरति  भ्रसुकानी ॥ 
सद्र सिर भसा सिर धरेढ। कोरी भौरि रषु शये भढ ॥ ६ ॥ 
णिर्िजी दीवार विनय ओर परमके वमि हे गया ! ठन [ के गे ] की 
मारा लिक पी शौर मूत खकरा । सीतलीने दापू उत पररा (भार) फो 
पिपर धारण का । गौरोमौका इदय हते मर गया शौर व कर्य --॥ ९ ॥ 
` रुद सिम स्य अघ मार । एविदि सन. कमना पुरी 
, “ करद बचन सदा सुचि साचा। सो बर मिषिदि जा मदु रचा ॥ ४1. - 
हे सीता ! दासी स्वी सीख इनो, तरी मनःकामना पूरी होगी । नारदनीका 
क्न खदा पि ( संखयः भ्रम आदि दो्ेसि रत ) भौर छत ३ । चिमे इन्धा 
मन अनुरक्त हो गथा £ वही बर वुमको मिचेणा ॥४॥  . 

_ जमु ज्ाधि. पचेर मिञिष्ि खो चरु सहज खंदर्सौवरो। ; 
करुना निधान छान सील सने जानत “सचसे ४ 
अ. 

सी म मन म ॥ 
नुवर पन नह शो गवा ह वशी सभावे दी इन्दर सबा व 
( शरीरामचन्द्रजी ) मको मेया ।, वर्‌ दयक] खजाना लर पजान ( सवश ) दै, 
ह्रे चीर जर सहर चागता रै 1 इ प्रमनर आगोरीनीका आशीयाव सुनकर 
नानदीनीसमेत स्न रसि हदये दिव हु इरहीदासौ के ह--मवानीनीम 
बासयार पूजक साली मन्न महे रजमहसपर खैट चरी । 





धि) 


धः ६ = 
१९६ > रमरिदगायत > 


० 
के" दि परि ठ दिर दिर एतु व जद ष । ^ 


पठ भढ भूच वार गं शवर छने 1 २६६॥ 
गौत दू यतः यार इतर वे एं इम ऋ ऋ त च 
सर! र मातरे मूर उत बं म पनि क) 1 २१६] 
सोऽह सह दव तोकं । एर रि से दोढ सव ४ 
म श श समिर घर। पाठ एवः दुत क? शह ॥\ ॥ 
रयो वततव लाह रत प देनो गदी ए गे | 
प्रग मि स इह श दरं । समि नंत नमात £ 
छते केकी ॥१॥ 
य फ इगि ९७ मवं । एर छ ए नाद वीण ॥ 
पढ भरट रु इ । ए उषु पुषि ४ पुषा ॥ ६१ 
{फकः एतिन ए | षि शौ आवत गीर पिव 9 इरे 
मेप स्ह 1 ११ इनश्न शरत ध्न दुपी इए ॥९॥ 
करि भनु पिर वियात ठय ऋत सद ए एतौ ॥ 
भिक विद एर भद र्‌ । एषः र पे रौद भं ॥ ६॥ 
ॐ मिती ठौ निशि मेम रते इ प्रयत भष ले ी | 
[ए ] रित गव भोर एसी शग पश दों मां य इते षरे 1 3 | 
अत दि पि उप दुहा एव सिदे मु ए ॥ 
र मि पेन अद तदी} मीर कुर एम हि ता ॥ १ । 
[उ] चठ एनः वतम उर शएवनरवे ॐ ह 
पुरे न र कू एय । भि मनो विये र ९ म. कदा सनद 
शे रता १1४1 
यौू-क्ु स पि पु प दि मतन एह । 
चि ध खा पष विमि भदु धुरे रह ॥ २६७॥ 
श त एत क १ [उत महते उ हात ति 
ए ग, दि न (श्म, गये) पा £ नैः भरौ (करे 
करर) वेकवा पी पौ पारत ।॥१६५ 
भष्‌ सत सि ए म्‌ ए न पर ॥ 
(न मा कदी) \॥ 
भ ( 4५ ..4 


प्र वै (खे 
क 


.%# बाङकाण्ड # - १७ 


करि सुनि चरन सरोल. भामा । यसु पाद कोम दिभरामा ॥ 
विग निता रघुनायकं आ । बं पिय कदनं भस खाते १ ३॥ 
निरे चरणकमलं प्रणाम कके, भाशा पाकर उनतेने विभाग का ! रात 
गतनेपर शरीरुनायनी ये शरीर मारे देखकर पे कहे ओओ--॥ ३ ॥ 
इयर भरम अवषटोक्हु॒तात् । पकय- कोक , लेक सुखदाता ॥ 
वो छषतु ओरि जग परान । प्रु पभाड सूचकं यु वानी ॥ ४ ॥ 
„देतात । देल, फ, च॑कबाक गौर समस सरको सुख देनेवाला अरमोदय 
हा है । व्मगनी दोनो शाय जकर पके पमाने घि कोगाडी वोम 
वाणो बोडे--।| ४॥ स 
, वो-अश्नोदरये सञ्च इद _उडगन जि मीन । 
निमि तुम्हार आगमनं चुनि त कृपति षटीत ॥ २३८ ॥ 
मरूमोदय हेत कुदिनी कुचा गयौ ओर वारागणो पका फश्च पड गया, 
मिह प्रकार आपका आना नकर सव रात्र बच्छीन शे गवे ६ ॥ २१८ ॥ 
सौ दप स्व नत करं उजिभारी । दारि न स्वाप तम भारी ॥ 
कमर कोक मुकर श्ण नाना । इरे घट चिस शवसाना ॥ १ ॥ 
सरव रागरूपी तीरे उग्रा ( नद परक ) करते £, पर पे धतुलपौ मन्‌ 
अन्भकारणो टा नदीं सकते । राभरिका अन्तं हने चैते कम, चकमे, भौर मौर नाना 
मवार पही दर्द दे ह ॥ १ ॥ 
पे प्रषु घब भग एमे! शद दं धलुप धुरे ॥ 
' यङ भासु बु श्रम घम नासा । दुरे गत अग तेश्च प्रका ॥ २ ॥ 
„ _ वैरेष्ीरे पमो भाप स्व.भरु षष नपर डी हेम । दयं उव इमाः 
(= श पर्रम अन्धक मष्ट के रया । तरि छप गये, सलाम देन भराय 
गवा॥२॥ : `: “ 2" 
~" ` रवि नित शंद्य भमान रुरा । मञ्च भवाएु सव दरदं विष्वा ॥ 
छव शल बक सदिमा ऽव्य । पटी टु पिघटन परिषादौ ॥ ६॥ ` 
दे श्ुनायनी | भूते अपने उदयके यहाने उ राबामोको प्रघ ( आप ) का 
अतप दिखाया हे । भादी युजा श्छकी भहिमाको उद्घाटित कएने ( खोकर 
दिखाने ) ॐ दिवि शी ष नेक थह पदति मर इवं ॥३॥ = ` : 
शे भच्चन सुनि भयु धके । शो हु सहव धीत नशते ॥ 
नियर रि युर परि द्‌ । चरन रोज भय सिरं नाद्‌ ॥ ४ ॥ 
" आरे चन दुक पु युखकरये 1 भिर खमते ए पविद्र रामवीने 
शौचे निद छेकः सान किया ओरं मित्वं ककत वे गुर्नीके पाच आये | यकर 


स्ने चरणकरमरलम सिर नबाबा ॥ ४ ।| 
(| जदक वोढा । रसिकं सुनि टि हरत पठाए्‌ ॥ 
नक भिय वनद आद्‌ सुनाई । हरे धोक छिए दो भां ॥ ५ ॥ 
तम जमफलीने रवानन्द्‌जीको यो मोर उन दरव ही विवामि सुनिके ए 
भे [ उन्होने माकर बनकषोढी विनी ुनावी ! वष्वमिरजने क्त दक्र दोनो 
मादक बलया ॥ ५॥ + 





षद्८ # रा्चस्तिमहलख # 


*--ारतव्‌ पै फुर पठि जद। न 
क चसु 1 =. बोई ॥ २२९॥ 
शतान्द्े चणो कना र यु एरक सनी पाद जा मै । 
इव गुते ह ताव | चये, वनक्नन व भेला ै॥ २३९ ॥ 
सासपारायण, शठो दिशाम्‌ 
स्वाहा, दूर्‌ विभ्रम . 
नौ"-सीष सैव देम जाद । षु कि धौ देद यदा ॥ 
छषठन फा चस भाद सई । माथ शपा सतर सार होट ५१ ॥ 
नतर सीता सवतो देलना चाम देख ईव पो वद देते ६। 
सणि कारे माथ । निषपर आपदी कपा सेफी, की उदक पत्र हेणा 
( चतुष रोढनेका भेय उीमो मा शेन ) ॥ १ ॥ , 
हरषे नि सच दुभि घर धानी । दीष असीस सपं सु मानी ॥ 
एमि छनि्ैद सभेत पारा । देडन शे भरदुषमख सा ॥ २ ॥ 
इए ह वाणीको इनक एव सुति भरषत हए । एमीने युद भागकर धाद 
वि ] रि मुनिम छ छमा शररमचनद्रमी पतु देने चे ॥२॥ 
स भूमि भाष दोर. भाद 1 धि सुषि सव एयक पा 
चरे सक्डं शृ काच दिसारी } धार छन रट नर तारी ॥ ६ १ 
दोनो भागूं भथ रै, देसी खदर्‌ नव संब मगरमिवापिरयनि पायी, तमे 
! बाहः जान चदे, ती, पुश्य समी षर लोर काम-का्ठोसलकर चल दिपै | ३॥ 
दैएी अनमः भीर भै भारो! पि सेवकं ब रिष हकारी # 
हरत सकर फोगभ्ट पिं जाह । शसन उदधिह देष सम काहू ॥ ४ ॥ 
जय अने देडा म दी मीडे गगर हः ठय उन्हे एव विष्वा 
रेषो दस्र ल्या भौर कक्ठ-तमलोग हंत ख लेग पाल. नाधो जीर सम 
गिरी यमायोष्य आने दौ (४ ॥. 41 
योषि षु वयन्‌ विशीह तिन वैरे भर कारि ।. 
रंत म्यम तीच छु नि निच थर अजुारि ॥ २४०॥ ; 
उन उेवकोनि कौम ओर नमन वचन क उततम, मध्यः नीचे दौर सुः 
( तभी भेके ) जी-पषमोतो भपने-मपते धोत्य श्वानपर दगया ॥ २४० || 
ौ°-रचडमैर दे, यद्सर आए । भनु असोत हस छाए 
गुणं समर नरं पर यरा । सुंदर यामल गौर सरीरा ॥ 9 ॥ 
द नु 4 सवयि । [वैरे ^ 
शात्‌ भनोत ही ल ! इन्दर सबला 
उनम श्दीर रै ० चहुर भौर उतम वीर ह ॥ १ ॥ 
` शन्न माने भिरजत से । उन मह जु वन चिषे ॥ 
जिनः द शी भावनः सै । मु सूति कि दी तसौ ॥ २ ॥ 


पे साभ समा ते सु्ोभित हेरे रै मालो तारागगेन वीच .दौ शं 
यमा | मिनी गी वन यी; अघो मूत उन ववी ह देलौ ॥२ ¢ र 


# बाठकाण्ड $ ` १६९ 





ढक 


` स्प" मही. रवी । अरं खैर चसु घरं एररा॥ 
इथि "गुप प्रुष निहारी । सन भयानक सूरि भारी ॥३॥ 
रणषरीप [ राणाणोग.] भीरमन्रीड स्पको रेस देत र दै पानो खये 

चारण किमे ह हो । टिल रादु देकर ढ्‌ ये, मानै 
शरिषे॥३॥ 
भसु छ होन वेषा । तिन्ह प्रु प्रगट कार सम देखा ॥ 

इतयदिन्ट वेदे, दोड ` माई । न्‌ षन कषर खद ४ ॥ 

५ के ्ो राक्ष बं रामे वेमे] वे ] येः उदनि घमो भतत कल्के] 
सौम देहा । नगदनिबादियोने दोनो माध्वोफो मत्ये सूषयल्प शोर नेको 
देनेकाल देखा | ४॥ † 

दो०~-नारि व्िरोकहि हरपि हिय निज मिञ दधि भदुखप । 

8 सद छविगार धरि सूरि परम अनूप २४६॥ 

यो हदय इत देकर अपनी भपनी सचे भयल उन देख खी ई । 
मानौ श्ल ध प सतुम पूति भारण ये दोमित हे हे ॥ ९४१ ॥ 
चौ-गिहुषन्द भयं भिरादस्य दौसा । धु यख ९ पच शोगन सीसा ॥ 
शमः भति अवलोकि फ । एवन सगे पिभ कग ने ॥ १ ॥ 
विन्न पु विगत रला दि नि बहे द य, प, नेन 
शर विर ह| ऋालैके नातीव ( डमी ) कतो र तद (वै परिष सम ) 
देश रो है, रे छो स्वन ( सबन्धी ) धिय छते है ॥ १ ॥ ~ 
सिति भिदेह पि्ोि राकी । सि सम प्रीति दति षती ४ 
जोगिन, परस श्वम्य भसन । सांव घु धम बहन प्रशसा ॥ २ ॥ 
अनक मिय नदे जपो गले शमा देख व ई, उनकी भिका वणन 
सी कथा ज रकता | योगको पे चन्द्‌, धद, स ओर खतभका्च परम क्के 

स्प रीषे॥ २] ॥ . , 

हरिमिभरन्हं देखे बोर श्रता शेय शष सुषे इस पाता ॥ . , 
शमह दिव चेदि सीया । सो से. श्च ताह कथनी ॥ ३ 4 
रमति दीन मावो लंम देन एके सान देखा । शवानि 

भ भौवनो ख ससर द लद रल तो के शनी ता.) ३॥ 

द भमदि म ऽरि सहो । शन्‌ अकषर ४६ फ ड ॥ 
पहि धि रा नादि जच `मा । रि, इस देखे केसल्रर ॥ ४ 
उ (ह मौर ल) वे धते भतुमव र खौ प्रमे मौ खे कश्य 

स । भ कोई मि उ किल प्स द सका है । इ भख जका देता भा 
श उवे शेवणधीशच भौरमचरमीो श ही देडा ॥ ४॥ मिलि 
` दम--एवत रल समाज कि्मेर ! 

र श्याम शौर चनं धिख विोचनं चोर ॥ २४२॥ 
दर सौम गौर गरि शीसे तथा विष्वमसे नेग सुरेव कोर्छमीया- 

ॐ र रामां ए प्रर] भित शे ए द ॥ ९४२॥ 

च*-च््न सनौर मूरति दोर ! कोदि छम उपमा शष सो$ ॥ 

'. शरद वु निय डु तीके नोरप्न नयन मादते खी 1१1 


(र 


बीर 
बीभ 


£ त्रु 


१६० ॐ यसचरिग्ारख $ 





दोन तियं शमा है (विना मलौ बनाये } मनने हेवाडी 1 
कशे कादेतरकी उपा मी उन वमि कच्छ रै । उने नदर मख सद्‌ [पूरषिम ] 
ॐ च्यक मौ नन्द कलेति (उरे नीचा दिवाेवटे ) ई लौर कत्र एमन 
क्र मनक हूत र मते ६॥ १॥ 

चितवन चदे सार मरु हर ! मादति इद्ध जाति महं दरी ए 

कट कयोक शि हं शोका । गिकं अधर धुंद टु चोखा २1 

इन्दर चितवन [ धरे सेते मनो हेरे ] जमदेवके भी मनवो इवास 
1 बह इदमो महत ठौ पारी छारी हैः पर उल्का वर्णन नहं विया जा सकता | 
छदः यत & कामगं चचऽ ( छते ए ) इष्ठले ई । मेही भौर थध { भट ) 
ब्द ३, कभक वथ र ॥ २॥ 

इदं पेड एए तिद हसा । शक्यो दिष्ट मनोहर ना ॥ 

भाऊ वि तिक प्रकारौ ¦ कष पिोिं वदि मवति राही ३॥ 

चमनी किरणो पिसतार कवी टै । मौह देवी भौर नासिका 
नोह ट। [ दि ] बे च्यरप विष चल दे ह ( रीरमन्‌ शे रो दै )} 
[ कर परस ] बणे देलक भीरो पयो मौ ला चती १॥ १॥ 

पत चेतनः सिन्द घां । घुम कः विच पौव वता ॥ 

रे एनं उं कर गीवा । जलु भरियुवन धुषमा की सोवा ॥ ४ 1 

पी चेन योध चिर यो ई, नि वीची पर्व णन 
नाणी ( मादी ) ६ ई । र मान ददर ( गोर ) गछ मनोह तीन रल ह 

मलो सीत भेकी इन्दलाश् सीम [ फो वत खा ] १॥ *॥ 

व"-ेनर सनि. कं उरिति अहि ठुरसिद माठ । 

दषस कध ररि उवनि उठ निधि दाह विदा ॥ २४३ ॥ 
वयर गजपुभेड इनदर कड चौर द्म मामे युश्ोभित य | ऽके 
ती दष्ट [ ऊवे दण पु] & रे ( खत हेनकी शन ) शी 
& भर एवा निव एवं ब म्र | २४६ ॥ । 
चगि कसो शेत पद पदि । कर सर तुष वाम षर का 

सौत्र चये उवी शप्‌ ! गड षि सङ मह्दि छाए ॥ १ 1 
न मतम तठ र पम वभि । [न ] दोर याय र भर नदर 
० ) इोमत ¦ नसे र चिल्ातक़ ह 
भ इन्द ह, ऊपर मन्‌ गोम जयी इं है ॥ १॥ 

दि भेग पम चर्‌ सुस । पकक छोदन च्छद न तादे ॥ 

र वी द 

म छ लोग दुली हए । नत्र पटक ( निमेल्य मौर 
{पद्मा ) भी नद चरते | जनक दोनो ण देलक ०.५५ ल 
उन्दने बकर मुनि चरयकमल एड चवि | ९ ॥ 

शरि धिगहो तिव कथा सुनाई । रग अटि सव सुनि दें ॥ 

ह जद मां रर कर दोर। वह यकद छित डु ञो ॥ ३ ॥ 

विनती कफ अपनी कषा दनाय ओर मुनिनो खरी रेगमूमि ( ठया } 


# वाटकाण्ड # १७१ 


दिय ([ यने शम ] दोनों ह रन्डग जज बते है, कर 
मो बावत हो देखने ते है ॥ १ ॥'. ध जन 
निम नि सू रामह सहु देखा । कोड न जान कटु मरम वि्ेपा ॥ 

भक ना पि रूप सन वड । र्थो युद, सहालुख सेड ॥ ४ ॥ 

सने रामको नी-अपनी ओर ही युत मि हुए देखा; परु इसका के 
भी मिशेष श्रा कोर न्ह नान सरा । पिमे रजते का--रगमूमदी स्वना हव 
इनदर दै । [ पिषापिवर च निः, चिक घौर शनी मि ` साफी पशं 

। व अर वध ४ ॥ 
दो“ सब भचन्द्‌ तें मं एक सदर धिसद्‌ विलाल । 
मेत दोड वधु तहं वैरे मदिफल ॥ २९४ ॥ 

न मर्वसि एक म अधिक छनदर, उत्व गोर विद्र था । [ खयं | सना- 
न मुनिसदित दोनो भ्यो उप्र बरैढाया । २५५ || 
चीण-अधुहि देष सय न यै इरे । जु रेष खय म॑ हरे ॥ 

भति प्रती सव नो.मन मा । राम चप तोर प्क ना ॥ \॥ 

रुने देखकर उवं राना हयम ञे शः गत्र ( निराश एवं उताशठीन तै गवे) 
सैपर चरम उदम दने तर प्कथकीन त जते ६। [उन्ती देख { 
सेने मा विरवास हो गया ङिरामनन्रमौ ही धनुषो तोके), रम छनदेह नी १ 

तितु स॑ने भवे धुप बिता । मेलिहि सीय राम उर माका ॥ 

मस विचारि गनहु पर सादं । जसु प्रषु व ते गदं ॥२॥ 

[ हषर उनके रूपक देलक सवके मनं यह्‌ निशधयं हो गया प ] धिये 
विशाल धको [ नो सम्भव हैन टट खे ] बिना ते भीता ओयमचनरजीके 
गरम जयम दासी ( अर्थात दो तरते 8 हमारी शर गी भौर विव रामन्- 
भौके एय रहेगी } । [ वौ सोचकर मे कने तो] है माई ¡ पेता विचाऽकर वष, 
परताप ठे ओौर के गार अपने-अपने षर्‌ चलो | २ ॥ 

बिसे अपरं भूष शमि धानी ¡ ने भवितिकः घ अभिमानी ॥ 
शीर पठ न्यु भवयादा । दयु तरं मर इर्थरि विमा ॥ १॥ 
दे रामा, जो भविक जं शे दे ये भौर अभिमानी ॐ यह्‌ बाठ नर 
महतं ते । [उन्न कदा--] धुम ोदनेपर मौ पिबाई -शेना किन है ( भयात्‌ 
सहनी ए चामढीको छते जने मही देगे), फर तिना तोहे ठो, रणरणो , 
न्यादष्ी कन ख्कवाहि॥३॥ . _. र ¢ 
एक बार इड शिनं हो । सिव हित समरं विदब हम सोऽ ॥ 
ग्ट सुनि भवर हिप ससस । धरमसीर हरिमिगत सवान ४१ ४ , 
काल दीक्यो नद, एक वारतो सीतीके.रिथि उषे भी श्य वदधमे जीत हग । यट 
पणी बात सुगर दूराय, जो धमता, हरिमकत ओर सथाने ये) मुखुकएये ॥४॥ 
भो०--सीय पिभा शम गर परि करि तृपन्द्‌ के । 
जीति को खक संग्राम्‌ द्रय के रन वोह ॥ ४५ ॥ 

[ उने कह] राशयो यव दूर के ( जो धनु किदीसे नही दय केर 
ठे तोककर › भरोयमचन्रज्र सीठानीगे म्पा [ खी दधी बाल, शो ] महाराज 
दग्र रणे वकि पोको छनं वो नीव हौ कौन कता दै ॥ २५९ ॥ 


१७य्‌ # रामघरितमानस # 


1 2 
चौ०-वय सद अमि गा वका! भन मोदन मूर हरा ॥ 
सिख मारि इनि प्रम इतीतर 1 मदैव घानहु लिये सीता ॥ १ ह 
गाल वर व्ययं 8 मत एते । मन इदि भौ की भूर हती दै { 
हमारी परम पदि { निष्कपट ) छीडको उक सीतानीको अपने जीमे तनात्‌ 
उगब्नमी एसो ( उन पीस्पमे एनेन आच एं खक्ठा छोह दो ), ॥ १ ॥ 
गत पिव रघुपति विसे । भरि रोचत छदि रे निरी ॥ 
स्र जुखद स्क युन रस । ए दो वेष संच ऽर वासी ॥द॥ 
र ्रीुनायजीफो जयतृफा पिता ( परमेश्वर ) षिच नेत्र भ उनकी 
छदि दैव से [ देषा स्वर बार-बार नरी मिलेगा ] ] धन्दरः इख देनेधणे (५५ 
शेषौ रादि ये दोनों भां शिबनीक हदये बसमेवले ह ( सवं शिषनी भी मिन एदा 
दमं छव रसते ह ३ इहो तषे दामने आ वे हँ } |; २ ॥ 
शुध समुद्र॒ समीप विदाई । सूयज पिरसि मरु कह धाद ॥ 
करहु अपद जा रे जोह यवा ! हम तौ साज्ञ जनत एलु पावः ॥ २ ॥ 
स्मीए अगि हृ [ भयवदशनस्य ] अमृते सके छेकः दम [ जहती 
जनको परीरपमे पानक हुराखाहम मिष्वा ] मृगजलको दैक दौकर र्यो 
मे धे! पिर { माद । } लिघको ओ अछा को, दौ जाकर फरो । हमने तो 
[ भीरमचन्दनीम दन के ] माज चन्म लेनेका पर पा या ( जीबन मौर जन्म. 
को सपर कृरच्वि ) ॥ ३॥ 
अठ कि भके भूप॒ अनुरागे! र अनूप निरोकम उरे ॥ 
देखि सुरं नम धते विमता । यरपं सुमन करं ड गाना ॥ ४ ॥ 
रेखा क्प जच्छ राया प्रेम हकर भ्ीयमनीका अहुपम रुप देखने जो । 
(म्य तौ बा वा ] देवता लेग भौ भसतम चेह दर्न क 
पै ६ चौर छ यान कते ए षट दरदा दे ई ॥ ४ | 
"जनि सुवऽ सीय हद पढ लक बो =` " 
चर गरी दर सक्छ साद्र च्ल ठ्वा ॥ २४६९॥ 
न एव्र जानकर जनकलीने सीताम श मेना 1 एव चछर भौर सुन्दर 
भाद्रपत्रर उन्हे कवि चल ॥ २४६ | ~ 
चौर-सिष सोमा न णाप दानी । जगदपि इय युव सानी ॥ . १८. 
उपमा सक भोदि अमो । आ नारि संग भुरसीं ४१ ॥ , 
स्य मौर मी न भाजन जनन माब हं चर | 
उम तम त [ सनी ] सव उपग द्छ ऊती, सथो वे सौमिक तिमि 
ये मदरय रगा ई ( अरात्‌ च उगत सिरे द्धो दौ च ई )) 
[कामक उमर सद िवुपासतः मागि उगते ली गवौ ई, उह मगवरानूकी 
सला जानकीम वप्रः पिय अङ तथ प्रु ऋनाठनकन यमान 
कता ओर मपन्न दग्चतासद दनान ह] ॥ १ ॥ 
सिम दनि चेद उपमः दे । ककि काह अदद दो दं ॥ 
ओं पदर लीय सम सीया चग हि हयिप ॥ २ 
त गन उनी उपमा देकर दन ककि कदे जर सयक 
भागी चने (र्यात्‌ सीता वमि उन उपो वोग करना सकफे दप श्यते 


# वाठ्काण्ड # १७ 


~ 
वीना भौर यपि मोड छना र, भो भी सकि रेल मदी एवं अनुच कर 
नी कोम ।).बदि कि मे चाव सीतनीकी लना कौ जव तो माद वनद 
री रै 8 १ [मिद उग उन्हे दौ जाव ] ॥ २॥ 

गिरा शुलर धद मरध मानी 1 रि मति दुखचित अतु एति जनी ॥ 

बिष रतो चं प्रिय जह । किम रमाम किमि वैदे ॥ ३५ 

[एष्वीकी लिर्योकी तो ग्रत ¶ी चया, देवार्ोक छ्ररयोको मी यदि देखा जायज 
हमारी भा की मयि दिव्य ओर इन्द ई तो उनमै ] सएसती ते बहुत गोन 
वाली ४ याव॑ती अभीश्रनी र ( भरथात्‌ अ्दनारीनटेशवसे सपमे उका आधा वी धक्ग 
तीकार देप आधा भप पुश्य-शिवयीका ६) कपदेबी सी रति पिको भिना 
ररक ( जनद् ) जानम हद दुखी रती, भौर बनके दिए मौर मदमे 
[षरे उलन हमक वति ] प्रिव मा ६, उन व्क समान ते जानीय क 
शीकैमेचय॥३॥ 

जीय दुधा धयोनिषि होई । पम ॒स्मगय कच्छेषु सों ॥ 

कषोभा ` एड मंदरं सिगार । मै प्यमि पक्व निन भारः ॥४॥ 

„ [ निन रष््मीजी%ी वात्‌ उपर कट गी हे वे निकी थीं सदि समुद्रे, भिषकौ 
ध तिमे भगवानूते अति फेय पीटयले कष्ठपक्ष हप पारण कवा रत बनायी 
मेषौ मन्‌ विपधर वासुकि नागी, मयानीका काय॑ रिया बति कठोर मन्दाचढ 
प्ते ओर उदे मथा सोरे देवता ओर देलोनि मिच्छ । लिन कमो सतियष 
गोमा खाने ओर अतुषम दी कते दं उन प्रकट कले वने वे स यकर 
णवं सयमायिक ह कठोरं उपकरण । पेदे उपकरथौसे कट हरं रमी भीजानकौ नीवी 
सतापो परे प सकत ६ । हं, प्त विपरीत ] यदि छविस्पी अमृता र हे 
परम कमय कच्छप दे ोभास्म रधी हो शवणर [र ] पवत हे शौर [ उप मिमे 
मु्रको ] सवं कामदेव स करमन मपे, ४ ॥ 

दोऽपि भिधि छच्छि जव सुंदरता छल भूल 

तदपि क्षफोच समेत कवि कहिं सीय समूल ॥ १४५ ॥ 
द भ्रकार [ श तंयोय हेरे जब शु्दरत शौर एल भ सी उत 
हो) तो भी किकेग उते [ हुत ] सेचने साय सीताजी समान को ॥ ९४७ 
[ लिव पुनद सरको कामदेव मेगा ब नदरा मी भ्व, लोक्िक 
सुदरवा हेम; कोम फामदेय खयं मौ रमय श्रि र निकर । अतः उत 
स्द्ाक्रो मथर कट दी लवी मी उषु एक्मीकी अर कृ वधि इद्र सौर 
. दनय नपर भौ शेग भातं ह, अवः उक खय मौ जनकीलीकी ठ्न करना कविर 
मे ठकोचक़ौ पात दोगी ¡जिर छदरवाते नकी दिवथापिदिवय परमिनय विग्र 
कपा वह दुमदता उपर्ुक् एन्धरतसि मिन अपा दे-अुतःलयरीनीका अप्राते 
हप भी य रै । वा कामदे मथने नँ भा खरी लोर भद्‌ जानपीजीन्न सरूप 
शी, अतः उतदे मिन्‌ नी, भौर सपमा दी जती है मित्र मले साथ । इतके मतिर 
जानकी धभ ह चयं भगी मदिमपे, उन प्रकट करो ष्थि भतो भिज 
उपद्रणनो अगा म दै] य्या य श्यन्‌ मभि शद है धतव 
अनुपमेय र, श गूढ दा्निए च भकतधिरोमणि विने त जमूतोपमानर द्वार 
यही इनद्रतपि व्यक्त स्या ३1 ] - 


१७४ ॐ रापदरितमात् ४ 


= 
ची-्डी सं ठै सदी खयाभी । यावन ठ सनष बान ६ 
सह मल तसु सदर सारी । यत ऊतेनि सुरि छदि भारी ॥ १ १ 
सवनी दसय पासीत घाम सने वर्णे गीत पती ई चलं! सीताडो- 
नव शरीसर नद र इमि} सयनननी की महत्‌ छमिजुनीपदे ॥ १ ॥ 
षन कए पुस घुष्य । लंग संग रचि रखिष्ड इनापु ॥ 
ससि पठ कलिय ष्तु धै । देखि स्प सोहे भर नारी ५२॥ 
सड साश्व मपनीय जहर दोमिव रै जिदं विमि अङक मरी. 
ति स्सा नागा दै । जव तरम तमू पैर खला, तव इनन { हिय } ~ 
रेष दैक त) पुय शम नेषि जे रे ॥ २॥ त 
षरि सर्द इंटल साईं 1 वपि प्रघ मपट्रा गां ॥ 
पानि रोड सोह जयमारः । छवबष्र चितए्‌ प्फ़र शाका ॥ ३ ॥ 
देकतायौनेषित शेन गाद वपि मौर पुषववत्लकः मष्सरर यन समी । सीताम 
परमे जयमाच शोभित दै | व रा चकि हेकरजागनः रनक ओर दमे को । 
तीय पकषत दिह रारि रहः । स्‌ मोह क्स सद भर पाहा ॥ 
यमि मीर डे दोर माई टे ठरूकि रोचन विधि पाई ॥ ४॥ 
शीता परित चिस शरीयपमजीको देके ल्मी, त्र एष राज ठोग मेके ब 
छे गये] सीहाीने नक णस [बैठ इए ] दोनो वेशे देखा तो उन्न छाना 
श शल्यम बही ( शरीरामरनीमे ) (2 शे गये)॥४॥ 
+--शुस्जन लज माञ्च घ्‌ सङ्चानि। 
स्यमि धिरोकन सकिम्द तन रणुषीरहि उर मानि \ २४८॥ 
परन्तु दुर्ननौकी लपे तथा हुत वड उणजक देखकर रीता सुच पौ । 
वै भराम हव यकर स्वङ्ग घोर देखने ठगी ।। २४८ ॥ 
ौभ-एम शु श सिम छ दे तर नारदं परं निमे ॥ 
शोहि सञ्छ कदत सहरी! दिष्ट उने विवय करमन माह ॥ १ 9 
शमनर स्प जौर सीदाजैीङ छवि देल ल्-पुोनि पठ्क गारा छेद 
दिया ( एय एक्ट उरणो देने खे ) ] उमी अयने मनत ठो &/ पर कहते 
चरति ६। मरी पे वम्र विनय एते ६-- २॥ 
श मि वेमि भन जाई । महि इमारि षि देह सुहाई ५ =, 
विड धिर एडु तम मरू । सव रा इर करै बिदा ५२५ 
ह मिषता ! दनन्ी गू्न दौ षट लीन भौर छया हरेती इन्दर इदि 
उन द्वि नि सिच धिना ही विचार किव चडा अयसः परण छद्‌ सीतायका _ 
विद समरे छे २॥ ॥ 
जु भट कि रष सम छट । छठ ऋं शद उ दा ॥ - 
पि फलतौ सगन इय शम्‌ 1 वं सिरो जनी सोम्‌. ३ ` 
वचर अन्द मत केव, शयोक २३ ग सद किरी अच्छी छती ह} ह 
केसे मत्तम मै इयय अखगा । तव लेग दवी जख महो के है जननीः 
योष्ववर ले यह बोधा ह है ॥ ३ ॥ ॥ ८०२ 
ख्य ददौ म नकु दोऽय । दिरिदादरी कत रि धपु ¶ 
कृ वरु इष ष्टु एन मेरा । ठे स दिम दरद न योरा ४४१ 








# वाटकाण्द % १७५ 


~ 
तव पबा, नकन व॑दौमन ( भं ) श हवया । वे वद्शावदी (म 
दहि ) गाते हुए ऋ आये । राजे काय मेर परग सव ५ 
न र प्रस माः च 
॥ वचन घर सुनहु सकट मिषा 
पन विदेह ऊर पदि शम सजा उठाई धिखाठ ॥ २४९ ॥ 
भाने भढ वचनं कदा-र प्व पालना कला ऽब राजगण ] दुमे | 
छ अपनी विशि मुख उडाकर उनेकजीकी परण कहे ६--| २४९ | “ 
सौ०-क सुख वड सष्ठ सिव चदु । प्रम ,कोर बिषित सव आह ॥ 
गवे बा॒_मशमट मारे । दि सराहन पर्वौहं सिधारे ॥ १ ॥ 
रानां गर्गो क "चन्रमा ३, शिवनीक धष रा दै, क भारी १, 
कोर दै, भ समनो विदित र । ड़ भाद योदा रावण ओर बाण मीव धतुषु 
देखत (पकः) चदेव (उदेउडाना तो दू रह दूती हिम नइ) ॥९॥ 
सोह परारि शरोवृह फोर । रच खमाज नाह नो तेरा ॥ 
रिश्वत चव समेत. देदह । बिं बिधार ब्‌ तेह ॥ ९ ॥ 
उसी शिवजी कठोर घनुषको भानि इत राज्घमाने मो मी तोतया, तीनो लेशेकी 
विलय एथ ही उर्फ नानकीनी मिना किसी विचारक इय वरण रथी ॥| ९ ॥ 
सुमि प्रन छर ' भूष भिरपि । भटमासी तिस्य मन मासे ॥ 
परर पोषि उड अजडा । शले दृष्टेव सि नां \ ६॥ 
ण युनकर स राजा रचा उठे । जो ीरतफ अभिमानी ये, वे भने बूत है 
दमदमपे । कर कफर, डुक ठे ओर अपने इषदेवोमो पिनवाकर चरे | ६॥ 
“ तकि ताकि तकि सिव घन धरदीं । उदन कोरि भौवि शट काही, ॥ 
निन के कु विचार सनं मष्ट । श्राप समीप महीए न जही ॥ ४॥ 
वे तमक (देता) धिनी कषक शोर देते ईर फिर निगाई जमाकर 
इषे पकड कर्षौ मतिषे जोर लगाते £ पर ६ उता ही नहीं । जिन" राजामि 
मनये ड विवेक, ३े तो धनुष पव ही नदी बते ॥४॥ =" 
दो सम्रकि धरहि धनु ,मूढ़ नृप उद्‌ न चरखहि उना ! 
नहु पाह भट बाहुबल अधि गरुभाई ॥ २५० ॥ 
तै मूं रामा तमकरकर ( टकर ) धतु पके है परु ज नही 
उक्ता "वो 'दनाकर, दे ति ह । मानो पीक जोक बर पाकर वह 
सधिकय्षक भारी छेत चता दै,॥ २९० ॥ 
पो०-धप स दस एकर शरा कमे उडाबन च्द्‌ न शरा ॥ 
~ ऋत सं -सराशु कैत कमी क्व्‌ पती महु चैतं ॥ १ ॥ 
तष द इनार राजा एक ही वार ण्ुपको उठाने छो, तो मी ह उनके टे 
नहं एला ] शिदनीकम वड धुष करे महीं दिगता या, सरे कामी पुरषे वचनम 
सती मत [ कमी ].चमयमान नह होता | १४ , ड 
सम" शप सः ओशु उपदा । जैस पि बिरेग सन्या ॥ 
“करति विलषग॒चीरता “स्री । चे शाप एर अरर हारी ॥ २ ॥ 
शवराबा उपहासक यो होय । यशेवैरसय धिना वन्यी उपसे थो हौ जगा 
¦ कीति, विनय) द वीरता, ए स्क वे घटुषके कथो बढ हारकर च्छे गे ॥ २॥ 


१७६ # रमखरितमानस # 


शो भ्‌ परि शि "र ! क रिख निन भद्‌. समाना \,;- 
स्‌ निलो दरु शे । वेके भवत रोष "जु साने ६ ॥ 
लोम दयते चकः शीदैत ( इमे ) हे गवे बीर उपलेपने, समाम 
जे राशे [ अनप ] दकए जनक जडुं उ जोर वै चोरे भो 
मनो करोमे दए ये ॥ १] 3 4 
दीष दष फे दूपरि भासा भए ुमि हम जो,पतु छना. 
डेव दशु धरि मुज छरीरा । विश॒ वीर आपुः र्तभीरः ॥ 9 1 
ज रम टाना धा, उपे नक पक छने राना भवि । देस भौर , 
दै भी सुय इतीर वारण कतं मवि ठथा नौर भौ बते रथीर वीर भये ॥५॥ 
शोर सोहर यिय यदि कीरति अति कमनीय ! 
पबनिष्ार विचि अघ एवेड न 4 दूमनीय ॥ ९५१ ॥ . 
पर धतो तोकर मनोह न्या, वी विवय घौर यतय सुन्दर फो 
पेवीडा मानो बहाने किरीको एवा दी नष | २५१ ॥ 1 
चग फ ष रपु त भावा । कु म सफ चाप चबा ॥ 
शट चद्व त्तव गे । चिद गरि भूमि न सदे षा ॥. ॥ 
फे, यह्‌ जम ्िसफो अन्ड ही खातः १ पटु किन भौ चद्धरकीका पुष 
नी दपा । ल माह! चदान सौर तौढमा ले षूः सहा, दं रिषभ भूमि भौ 
शुषाम एका॥१॥ १ ४ 
ध वनि छोड माधि मटमानी । दौर विहीनं सष्ठ पै जानी ॥ 
सु सत नित निव गह जट 1 किस विधि ददे दिक ॥ ९). 
थोर वीप शरमानी नार न से । तन जन हिया एवौ वीरे साली 
गोगी) मवा ठोडक मपनेअपन षर मोका ैताकोपिमा हतान 1२ 
शुक द्र मैः पलु परि । इभे ङभारि खड का करद ॥ 
जी भन नु भट सुवि आ तौ पृषु करि हैते ₹ रैषाई॥ ६॥ 
दि प्रगतो पुग नुता है पवि क्या कहे, कन्या मारी हैर । 
यदि भनता १ षौ वीते शर्व हतो मण के उपहार एव न पना ॥ ३ ॥ 
भनक प्रन पुनि एव तर नौरी । दशि ्ादिषि भण दुलारे ॥ 
सारो श्लु णि भदे मै । रपट रक्ह नपन रिस ॥ ४ ॥ 
जनके पचन दमक चमी शी ुस्व जानदीीद ओर ददर बुखी एः रन 
ची तमम उठे, उनकी मौर ददौ हे ग्व, ओठ पको सनो भौर मेव 
न ॥४॥ 1 
५ स सकष रषी इर ठो, च्चत जु धानं । ~ 
ताद सम पद्‌ कमठ सिच दके भिरा प्रभानं ॥ २५२ ॥ 
इरे कठ ऋ ठो इकते नदी, पर जनक क्वन उन वाणः 
को 1 च न रह ए तव ] राामचननके ऋरणकमोमे दर, मवार प यायं 
केषन परे-॥ ९९२ ॥ ८४ 
चा" -ुवतिनः मं अ ड हो । दरिं ससाद अप्र द्‌ ज 4) 
ब जनक जि अतु दारी 1 किद्माद रल सपि जानी ४ $ ॥ 
रियो शई भी ज हेवा दैः उ5 समाचरे ए बव हं महौ -कक्ता, 





# घाठ्राण्ड -‰ ७७ 
ओर मतुनित वचन रिरेमणि श्रीरमैनन उषिते जानते हए थौ जनके 
क०६॥ १॥ ~" र ५ 
" . शनह' भाद्र पंकज मास्‌ । कठं माड न कडु थमिमानू ॥ 

नं द्ारि अनुसस्‌ परो । हुक इद प्रदर ददर ॥ २॥ 
है चव्लस्मी कमले च| निवे । मै लमा शता द; कु अभिमान 
करके मही; मदि भापकी भाश पाज, तो मँनघाण्ठो गंदकी तवहा दू ॥ २ ॥ 
"“ ऋषे, षट चिमि डारौः कोरी । सक भेर (यूल जिमि घोरी ॥ 
तब -अरताय महिमा भगवाना। फो ब्रुरो पिनाक ' पुराना ॥ \ ॥ 
ओर उरे कल्वेधदेकी तर फक दा 1 मै.ुमेद पनत मूग त तोड़ 
सक्ता हे भगवन्‌ | आप परतापक महिमसेयदबेचाय पुराना वनुषसो कोन ची ह॥ ३॥ 
नाथ जानि भप्त आयसु कऽ । कौदङु भरौ दिषो सोढः ॥ 
कम नार जिमि चप वश्दौ । जोजन सत प्रमान छै धादौ ॥४॥ 
एसा जानकर ्े नाय ¦ भा्ञा हो सो इढ देख करे, उेभी देखिये । धनुषो 
फलकी डंडीकी तरद दाकर छते सौ योजनतक दौ करिये च्य जाँ ॥ ४ ॥ 
को*--ठोरौ छषृक दंड जिमि तव प्रताप वे नाध। _ 
जञ नक्र श्रयु पद्‌ सपथक्षरन धर धु भाय ॥ २५२॥ 
दनाय ! मापे भवाय यच्े धतुषके इकर ते ( ३ षी तद 
तोर । यदि रेता म करं वो परुके चरणोकी मय दै, भिर र बलुष शौर सर्सपो 
कृमीहायोप्रीनरदगा ॥ २५६३॥ न 
चौ५~रुषठन ठकोप मच ॒ने बो । उगमगानि भि विमान शोठे ॥ 
, सक ोगृ सद -सूए डठने। सिथ य इषु चन सचाने ॥ १ ॥ 

, य श सगौ तकमर वचन गोड भ एमी खगमा जटी नोर विराम 
हौ प यये । रमी छग भौर सप रावा दर गये । तीवा इदयं शं हमा मौर 
जनक्रनी सटा गये ॥ १ ॥ म मकम ए ॥ कलं 

शपति सब युनि मन माहीं । अष्‌ इनि ठकष्ी ॥ 

नेवारे । प्रेम समेत निकट क 

गुद विशाल, ीसुनायजी सौर वर एुनि मनम भच इए भौर वारर 
इन्त चरो] न इरिते छक्ागसने सना करवा मौर परमिति 
मपे पाठ बेडा किमु ॥ ९.॥- । = 

, „ भिवित्र समय घुम जानी । बोडे अति सनिमेय षा ॥ 

„ - उह राम जड भव चपा । गेय ` दाच जनक परताप. ६५ 

, मि्याम्निनी द्म समय जनकेर अत्त मेममरी माणी बोडे सम ! उटो, 
किवीका धतु तोदो शौर हे वात ] जनकका उनतराप मिटाभो ॥ ३ ॥ 

“ “शुनि गुर बचन चरन सिह नावा । वु विषा त कट उर भगदा] 

डे मप्‌ उषटि सद्व सुभा] ठ्वनि इवा त त 
सके वचन शनकर शरीरमजीनि चरणो दिर माया । उने से न श्व हयाः 
न नसे वे अनी दं (सदे रनक शान ) से जमान सिमो भी छते हर 
शन समावते शी उ खे हुए ॥ ४ ॥ 
यय, १९ 





१७८ # दावचसितिसचच इ 


दौ--खदित्‌ शदययिरि मंच एर रुर वापप । 
विषये संव सरोम सय इप्े सेचत भम ॥ २५४॥ 
मद्वरण उएयाचस्मर सुनापीपी दे उदय हेते ही एव घर्मौ कमर 
हि उ सैर मसी भरे ह शे गे | ९५४॥ - 
चौ०-शनद $ेरि आत्ता सि पाती । दमं पठत धवल प अकासत ॥ 
आवी. महिप छु र्चा | कपरी मूप॒ उतु हने ॥ १॥ 
रामो आसास्थी, यनि नट शे यथी] उनके वचगसपी तारके सपूषती 
दमो बेदघ्ेयय (षे रौन शे गवे )1 मिमरानी रनस्पी हद ेडुधित है रते 
कषर कसी राजी उष्ट्‌ छि एवे | १ ॥ ॥ ६ 
मपु रिसोकं स्येढ मुह देया) रिसं हुम अना तेवा ॥ , 
भरर पद दं सिव ङुरएया राम सनिन्द सन आधु मागा ॥ ९ ॥ 
युनि शौर दगतस्सी चक्षदे धोरति हे शे । ञे ठ परण अपनी सेवा 
अट कर रर । परमि शुखये वणोकौ बन्दना कके धीपम्रलीने पुगिवहे 
श मोग | २॥ 
ससि चरे छक्र चग ससी । सत मंच वर कंन गामी ॥ 
चछ राम दं पुर भर पारी पर्क पूरि शय ष शखर ॥ १॥ 
ख वपत लागी भीरमनी एतद्र मवे भह हथी-वी चालते -खाभागिक 
६ चरे। धीपमनरमैडे चकते ह नरम उ बनीपुख पी शे गे भौर उमे 
^ वि र 
छर घुष खी कहु एन्य प्रमाद एमारे ॥ 
सौ सिव धु भरा की ना । लो श्य गते गो्ा॥ ४॥ 
1 0 0 (८ णका सरण प्रवा कि 
कृष धर प्रम ख गोश । गामषनद्रनी 
धुप ऋसी इंहीी मोति तोद गे | ४ ॥ 1 ५५ 
दो-पमि भेम समेव छि सिन्द समीप वोधा । 
सीव मातु सेह. वस गधन काह मिला 1 २५५ ॥ 
शीम्वनजीमे [बातत ] परमके सम देलक्र र सिदद मी भक 
सीताम त लत विदकर (वि ती री) े यक बो -॥२९५॥ 
चरसि य श्रं पेदवे । हेड राद विद्‌ हमारे 
कद न इषम्‌ ५ यर री 1 प शर ससि हठ मरे नाह ॥ ॥ ॥ 
दौ | प न इमे व कदे £ बे मौ स पगा देषनेद १1 1 
भी [ स ]गुर विश्िनलीदय छमा नरीँ रहा किमे ( रमी ) गरस ह ^ 


एमी उ रोग त्वि चड देनो रानी हठ बान पड; ड 
8 गु दशवमिननीको कोहं साता भी नदी । ] ॥ १ || . (४ 
, सवन वान शुम नाट चापा । हरे सक्छ नूप रि दाच ॥ 

सो धु रज फर दं । र मक. कि संदर > ॥ ९५ 


यष भौर कये निर च्चे यात मही भौर छव रना कद्र करै 


# बालकाण्ड [1 


० 
एर गै दौ वतप इए मार रानु हाव दे खै द । ठ वन्य 
भनदरचर द दा कके है| २॥ खेद ठे के भशं 
भूप याप इकर सिरवी । सन्िषिधिगठिकदु्पिन नी ॥ 
गी भुर हली टु शनी | तनव श्रु गनिब्‌ न ररम ॥ १॥ 
[ भौर ते भेह शाकः षे थ मक, रन ते षदे उदार शौर शनी 
उद तो शुरो समदाेकी चेष करनी चति थी; पर ह हेता है ] चभ 
भी णरा खवानापन समा हे गगा 1 है सी ¡ वषा गि कठ भगे नदौ 
वाती [थे ऋछर नी इप शची] । तर एङ्‌ चर (रारन गत यतने 
गो ) सखी कोम वापी बोी-हे रानी ! तेन्वानूको [ देस चेढा हने 
भी ] छदा नहं गिनना भष्वि ॥ ९॥ 
फ संमत कट हि भारः । सोदे सुव एषह साप ॥ 
रमि. दै शु काग । उदरे ताबु दिञ्ुव तम म्रा ॥ ५४ 
क धे उलन हेनेवटे { ढेन नि शरस्य शोर कहौ मगर र कितवे 
उन्मि ते से स चिका इश ख बंधो खाया इमा है। पूर्म्डल देने 
छद] पता र, १, उत उदम दते तीन दोश अनपकार माग ना है ॥ ४ ॥ 
दो-्भ् परम ब्ध जघ यस बिधि हरि हर छर सरं । 
मदपत्त जयाम करटं घस छर अकुस चं ॥ २५६॥ 
, भिवे व क्ष शिषः सिव ओट मी देवता ६, क मन असनत शो 
हे महान्‌ मत्ठेमलरामो 9ोदासा यु भम षर ठे टै ॥ २५६ ॥ 
श्ौ*-शकम इषम धयु सयक कीमे । सक यवर सपने भस की 
दभि तभिभ सं भप छानी । मंडप धुप राम सुं एनी ॥ +1 
कामदेवे भूक सी धल-्वाणं ठेकः समल छ्को जपने कम कर रकता 
दै। ह देवी] रेखा भनक सेह त्याग दौज । दै रान |. निव, यमच्जी 
धतु अव्य ह सोढृ ॥ ९] . 
सी धच भुभि मै शरीरी । भिदा पिपादु कटी अति प्रीती ६ 
हय राभि विरो ये ¦ समध हृद्ये बिलवति नेहि पदी 1२५ 
लीके धवन इुरषर यनीक [ भीमली खमध्ये खनये ] शरास हो 
यथा ¡ उनकी देसी मिट गयी जौर भीरी प्र उनका रे अत्व जद पपा । 
उः रमय धीपमचनीफो देत वीतास्ी भवमीव इदपते मिसिर [षत्‌ } भे 
विनती कर रही ६ | ९॥ ॥ "` 
ममः मम मगाव भङुलानी । होहु पसनन महे भवानी 
करट सश “जापर सेवकं । रि दि श यप गं ॥ २५ 
„ वे व्याङ् होकर भीम मना री ह~ मरेशःमधानी | इतर रक 
ये, रे मापी नो रे १, ॐ युर कीरदि भर स्प र कणे धते 
मरीप्ोष्छन्वि ॥३॥ , - .- ~ 
गवाय कर्‌ दुक ` दा । भ एग करोनि पुम सेदा ॥ 
आर्‌ बाह विवी ति सोरी । कटु आए शुदा अति शरी ॥४॥ 
हे गमे नयक, यर देवम देवता गेरी | मैने आकि सि दना 


२८० ‰ शमखरितगोनस ५ 


--------------------- 
सवाक वौ । वारर मेदी दिनती हलकर परप मारौगन वृहुत ही कमर 
दीनि \॥४॥ 
दणि देखि रुवीर हसे शुर सनाद धरि घीर। 
श्रे विवेद मेः जलं - एुटकावटी सीर ॥ ५७॥ 
शआीरषूमायीगी भोर देलदेखद्र सीताडी भरीरज धरकर देवतार्भोको मना री 
६1 उनम रवभ >> भौ यः £ यैर त्रसी सेमा दै! २५७ ॥ 
चीनी निरस्त रयन भरि लो । डिपतु ुमिरि व्रि ड़ छोमः ॥ 
षद तात श्रनि हठ उनी । सदसत नष कदु छु र हानी ॥ 4 ॥ 
यी पदं मैव नखर श्रीरामर्जकी खोमा देकर; फिर पिताक पगा 
सरण कफे सील्वीका मन शुव्य हो उठा [ बे मन्मन शने ल्गी--] अहे | 
पितातीमे बद ही कठिन छ ठाना ह पे लन-हानि ष्ट भी नरी उप दे र ॥ १ ॥ 
सचचव्र सय सि दै न फो 1 इध पमान वह अहुदित हों ॥ 
कटु ठलिएह़ च कोर । क चयायजञ गरहुगात कितो २॥ 
मनमीडर दै £ शटष्यि कों उम ठंड मौ नदी ठेता; प्तक तममे 
य वद युत शो सा ६ ! करो ठो न्ते मी वकर दटोर षु भौर कँ ये 
नौमल्सधैः निचोर ध्वामहन्दर ¡ । २ ॥ 
दिधि कै भति धरौ उर धीर 1 सिरस सुमन कन चेधिघच हीरा ॥ 
सकर सम्् कै महि भै मोरी । जब भष सं चाए यति सोरी ॥ ३॥ 

द मिघाता । मै ददं कठ र धीरन तँ; सिरतके एतम भग्रञे कही हीरा 
ठे सता ६! खरी सभा उदधि मोड ( बी ) घे गवी ६, अतः हे धिवलीने 
भ्य । मव चे हे इन्र दी भाद दै ॥ ३॥ 

भिस बदृह। सोगान् ्र दारो । ए इरन शुपतिषठि भद्र 1 
महि परतर सीव मन म 1 उव निमेष शुग सय सम जाई 1 ९ ॥ 

हन अपनो जहत्‌ दपर शच्छः शीरहनायदी [ कुमार श्वरीर ] नो 
देर [ उतने श ] शके हे दामो ! इ5 परकनर सीतजेमे म्म वदा ही छन्दाय 
पेन्छ ६ तिन एक द्व (यंग ) मी रौ इग इयान्‌ वीत ख ३ ॥ ४ ॥ 

दो०-पुद्धि छिदं युनि धित्व मि राजतं लेदम्‌ टर] 
देखत मदसि मीन शुग जनु विषु मंडङ डो ॥ २५८॥ 

प शरीगमचनरनीको देर फिर पवीकरी ओर देखदौ हरं घीताजीके च्छल 
नेष व भर शोत द दे ह मनो चन्मण्डलस्मी दोसे कामदेवी. दो सदसि 
सेल्‌ रै ह ॥ २५८] 

नौण-निदय भिति शु पं शद । ट द स लिला सवलोक -॥ 
खोचन शष्ट द वयेधम कोना । चै परम कषर कर सोना ॥ १ ॥ 
चीकी दमस परमको ज्.इतर्मी कख रोक रवा र । लनहगौ 
यि देखत बह भक नो हे री ६ । वोजा जज नेक कोने (कोप) षी 
सा जस न षे भर इक लन चे ह गदा र्‌ चवा ६ ॥ १॥ 
ङे वमन्तः यटि जामी । धरि धीर अतीति उर सआस ॥ 
तनं मने दधन मोद पदु साद् 1 


न खुपति पद सरोन चु राता ॥ २ ४ 
यनी धद रं नाका जानकर सीताथौ च्छा गीं र वीरल रक्‌ 


है ाङुक्ण्ड # , १८५६ 


हृदयौ विशवारछे आर्य कि" यदि तनः मत धीर दथन्ते मेर प्रण.श्थ है गौर 
ीरुनायजीके चरणकमलं मेर वित ासतवये अनुरक ६, !; ९ ॥ 
, चौ भवतु तक उ चसौ । किरि भो श्वर कै कती ॥ 
.“. जेषि कँ मेहि पर सत्व सने । सो धेरि भिदं न कु पह ५१५ 
., ` तो उवे हदयमे निवा कएमेवा>े मगवान्‌ गते. आयागचननीकी दाप 
अव अनाग । जिका निष्प्र सा स्ह हता है, बह उषे पल्य} मे 
ङ भी मह नही £ ॥ ३ ॥ , 
„ श्रु हन चित प्रेम तन ठाना । छंपानिधाने राम ष॒ जना ॥ 
वषि विणो वकेड घु कते । वितव गसः इध भया म ॥ १॥ 
„ प्भुकी भोर देलक घीताीने ररीरम द्वय प्रे शन ल्वा ( थथीह्‌ क 
दिश्वय कर कवा कि यह बीर इना हकर रहेगा य रहे ही न }! कृानिषान 
शरीरमजी.सप चन गये । उनदनि सीताजी देखकर धतुं भोर र8 ताक मते 
गल्वजी छेते ५५५८ ४ न 
, दो°-छलनं रुवं हर फंड । 
„ पूषि गात बोढे प्न चरम चापि बरहा ॥ २५९ ॥ 
इर सव ठथमणसीते देखा मि खकुलमणि भरीरमयन्रनीने शिवे षतु 
स्र पा है, तो बे शरीरे धुररित शे ब्र्ा्डको चेम दाकर निमनतिसि 
कचन धोडे--॥ ९५९ ॥ 
भौ०-दिसिहंनरूह कमठ अरि को । धर धरन ररि धीरं न योह ५ 
गु वरा सं धु तोरा । होड सजा छनि भाव मोरा ५ १॥ 
हे दिल] कन्य ! है देष ! द वद ¡ षीरन धरर शवो पमे रे, 
शित द दिको प्व । भीमचद्रनी दविव्थक्े धतुपके तेना चाहो है । भरर 
भाश शुनकर छव शावधान शे भो ] १ ॥ # 
शाप समीप राप लम साद । नर दारि सुर भुतं मनाय ॥ 
कय श स्सड भरं अवान्‌ । संद भदीफ करं सणिमाय ॥ ९॥ 
ओगामचतद्जी. जद धनुपके सीप आये, तद ष छी ुरधोमे देवता भौर 
मरो मनाय । का उह जोर भशानः नीच राजमो ख यमिमा, ॥ ९ ॥ 
"यपत किरि गर्द गरा । सुर सुनिबण्द करि कदर ॥ 
सिय कर. सोद जन पठिता । रननदं कर दासन दण दृवा,॥६॥ 
पणजी गवी गुरा; देका ओर नियो, तरता ( मय फ 
सीवनी सोच, जनक पशाक्तम भौर रानि दारण दलका दवान, ॥ ३ ॥ 
संयु चप भद्‌ ` बोदिद पदे । चे जा सम सप पगा ॥  . 
रामो षाटु चष्ट सि भगार ¦ चहृतं पार सदिं कोठ कषहारू ॥*४॥ 
भे एव परिब धनुपरुपौ दे जहाम पाकर, एन वनाकर च्मर श 
चे । वे भ्रीगमचनसीकी सुजान चहरमी अपा स्के र जाना वाहते है 
एर कोई करेवट नी ह ॥ ४॥ (क ॥ 
सो~-चम विलोके खेम खव चिभ्र दिनि से देखि। . . 
, लित सीय इषाय आयी निक ˆ विसेपि ॥ २६०॥ 
„ आरमभीरे सव लोगो ओर दा जर यनद वतिते इये देखकर पिर 





१८द्‌ > रथचरितिमातसं = 


4 
याधम ब्ीयमलैन सीताजी गोर देखा धौर ठै धे वयज अगो ॥२६०॥ 
नीद विपु व्ल दैदेदी! निभि विक्षत इङर ससं देही ५ 
सषि षरि च्छि जो ष्यं स्वया । युर रर्‌ छ सुधा तदाग ॥ १॥ 
उन्हे नानरयरो चत ्े िक्छ देवा! उनका एक-एक कण कल्पते समान 
यत्रा या । उदि प्यारा भादी पानी पिना रीर ओह देः तो उरे मर जानेपर 
मृदा तखव भी क्या दया १॥ {| 
श्य दपा खव दौ लाने ! तमय सुक पुनि का पछि ॥ 
कत दवै जदि जसी देल । भमु धुदमे कदि प्रीति षिदैषी ५२॥ 
खै लेती मू वनेः वपर किर कामकी { मय वी जनिपर पिर पठते 
कण व्यभ ! मं ठे उम शरीतमजीने लानक्रीजीकी ओर देल भौर उनका 
बिष तरेम कद ३ पुखभनित हे गये ॥ २॥ 
गुरि पनी मनषि मन्‌ क््टः । रति खाप उख धटु डीन्डा ॥ 
एमकेट दोभिनि जिमि खद उयर । एति नय धलु मंडलसम भयऊ ॥ द ॥ 
मसत उन्दने रुस्छो पामर किवी ओौर बी एरीरे धनुबरको उखा छा । 
तः उमे [ हाये ] याः तद ३ भतुष जली रह चाम्म यीर फिर आक 
मेणैव ( मण्डलक्नर ) छे चया ॥ ३ ॥ 
रे साद कैच गद । कान्‌ र्चा देव शतु दारै 
हेदि छन शम मध्य भद सोरा। मरे शुदन धमि घोर केरा # ४1 
छे, अदत ओर लोए जीने हए किमे नी रला ( अर्थात ३ तीनो करम 
तमी एर्तरि दए कि घनुधको च्व उठाया) कथ चढाया भौर करब खा, इतका 
निमी पता नह ठग ) उण भीरी [ तुर नि ) सहे देला । उषी शण 
1 न वीच वों अरा । महर कनेः ललिते [ ख लेक 
४५॥ 
इं, सुवन धर कठोर रब यि थाङ्गि तमि मार्‌ शे 
चक दज सेठ मि शि दु 
णड सुनि कर कान वन्दे सक िक्टे विचारहीं । 
ड संडेड राम. ठुखो अयति चन्‌ उदारी ॥ 
पोर कोर धे { उत ] ल मर २, समे षदे मार्ग छश चरमो 
गो । मिमान निग्न कमो, तौ होकने समी; शेष) बारह शौर क्प कतपल 
स म्‌ि प ए रब वड शेर चाने 
ह दते ६, उ़ [वको निश्चव ठो गवया 
भ सदर व च्व दोल्ते 4 कि] भमन पुन 
“सकर चायु जायु स्मय रघुवर . । 
छ स सकर भदो पर म २ ॥ 
प 
गय डव 
भु 1 मत शवर 
प्रभ दो पटं मि उरे! देसि लोग खय यप्‌ र 
पौर पोत पन । प्रम शारि सकु छ ॥१॥ 


#) ल 
% बाखसाण्ड £ - म 
~ {3 
भरने धल दोनों इहे एष्वीप उठ दिये} यट देखकर सलेम 
विराम पिम सपद निर्मली इन्दर जयाई छ सा, कः । 
शासरूपम रकेषु मिषा । घृत वीचि पुकि भारी ॥ 
वानि नमर गहे निया । देवद. नाचि करि गरमा ४२९॥ 
यमह्मी यूरो देखकर पुखकाबीर्मी भासी ठट बहन वगा । मामा 
ये रहे नगादे यजने टे भौर देवाद्ग गान करके नायते र्गी ॥ ९ ॥ 
बहदिकः सुर॒सिद्ध घवीसा । भयु प्स॑स दह -अलीसा ॥ 
बरिसर्हि 9 रग १ किनर गीत रखा ॥ ३ ॥ 
हठा आदि देवता; सिद्ध ओर मुनीश्वरणेग प्रधुक प्रशंता कर रटे टै भर 
सारद दै रे ६ । ३ रंग-धिरपे पढ मौर माघ प्रसा रे है । ्रननएलोय श्वीमे 
गीतिगारहे ६॥ १॥ 
र भवन भरि जेय जय छानी { धुप भंग नि भात्र म जानी ॥ 
खदित किं जै व नर नारी । भ॑निड राम संधु भारी ॥ ४॥ 
मि बह्डं जय-अयकरकी व्यनि छा यी, नदे पटु देशी पमि जान 
ध नरप पती । अ एरपश्ली प्रव हेकर कटं द टँ कि ्ीएमचगदलीने 
बिव भारी धनुष्को तोड्‌ दाग ॥ ४॥ 
दोपदी माव विर्द्‌ वदि मतिधीर । 
करट निावरि सग सवे क्य रय धे मनि चीर ॥ २६२ ॥ 
र पद्धिवारे, मार, गाय शौर यलो विषदी भ ष्म ध्रलाग कर 
शे ६! सय लेग पदेः शी, धन, मणि शौर वल मिषः कर इ द ॥ २६९ ॥ 
चणम शद संच सदं । गेरि णेठ दुंुमी पुं ॥ 
यानां पहु ाजने र्‌ ज त विन्द मंगल गाद ॥ १ ॥ 
घ शूर्दग, शद्, शदनाई मेरी, दो ओर एवमे नादे आदि बहुत कारे 
शुद्र वाने रन रौ । ऽ. युवति मद्लगीत स ख ई॥ १॥ 
शिन सहित रषी पति रानी । दूस धान परा शसु पानी ॥ 
जमकर कषे सुसु सो चष । पैर यरे याद कतु प्रई ॥२॥ 
रसिर्यौखदित रामी अत्यन्त र्षित दं । मामो सते इष धानपर पानी पद्‌ या 
ते] जनके पोच तयाग कर घुल माह किया । मागो तैरेक हु पुरम 
शहपाचीहे॥२॥ ` £ § 
दव शु भूप धतु द्वदे । नैते दिवस दीम चदि टे! 
सीय घुषि भरि कष्ट मती । ज़ चातक पाद नं स्वाती ॥ ६॥ 
भद द जमेषर रान छेग पेते हीन (निले) रये जते दि दीपी 
ओभा जती सहत रै । सीताजीश्न इल करि प्रकार वर्णन कपा ज जैवे चवक 
सलासीका चछ पायी हे ॥ ३॥ त 
~ शमि कलु दिलमक्त कै) सिह चकोर सिर वैद ॥ 
सर्द तक भाय ददा । सीरी गमलु रास पिं की ॥ # 
शरीयमचोदरे ल्मणजी फिठ मकार देख र हँ ख चन्द्रमा चकोरा वन्ता देल 
रकष से । तब श्तानन्दलीने भाय दौ मोर ददानो शीरामजीके पाच ममन विवा ॥ ४ ॥ 





१८४ % रामचरितमानख भ 


कं सीं सुंदर चतुर गार्ह मंगख्चर । 
शे पवी य स सहि षमा अंब अपार ॥ २६२ ॥ 
मे इन्द्र र सचय सङ्ग्चारके गीत ग रदी ई, सीताजी वाहिनीकी 
बाहे चली । उनके अद्गोपे सपार शोमा रै ॥ २६३ ॥ ` ति 
सवौ*-सिन्ह सथ्य सिय सोहि दै । छविणन मप्व॒ नदादि मै ॥ 
छ सरो जयमाङ सुद । विस विय सोमा जदं छदं ॥ १ ॥ 
सचिवो बीच सीराजी कैरी शोभित हे खी, मैरे बहत-ती छषियेके बीचमे 
मदाच हो | करकमलं न्दर यमासा निरे धश्वविनयकी शोम ठायी हर ॥ १॥ -“ 
ठन सकरद मन परम उदा । गूह प्रे उछि परह व काहू ॥ 
जाई समीप राम छबि देखी । र्ट जलु छु्ैरि चग अवेदी ॥ २॥ £; 
सीतानीमे री रको रैपर मनप परमउत्वा है] उक्र वगु भेम क 
जन गदी पड़ फा दै! दीप जाकर श्रीरामजीकी शओमा देखकर रा्डुमारी सीताजी 
चित्रे सिलौी-री र गर्वी | २॥ 
चतुर सरली छर कदा वत । पषिराबह नयमा सुषा 1 
नउ चेष कर भार उरई! पेम विक्त पहिराश च जा ॥ ६४ 
र धीन य्‌ दा देखकर घमसारूर क्-टहायनी जयमाला पलो । 
युतक सीतागीने दोन दा्थोमे माण उढा्ी, पर परेम विवश होनेसे पहनायौ 
नरी ती ॥२॥ 
सोषठ जु ग जलज सना । ससिषि मीठ देत जयमाठा 
गावं धि अवो सेल । सर्गै जयसार शम उर गो ॥ ४ 
[उष्य उनके इथ द योम हो रहे ६ } मनो अबधोसकि दौ कठ 
वन्मा हे दए जयमाला दे रे रौ । स छवि देखकर सखिवाँ गानि गी! 
तप पीहाजीे भीरसर्जते गे 1 दु 
ओी°--षुबः उर जयमाक मत! 
सदे सकर शुनाठ अभु बिलोकि रपि शुसुदगन ॥ २६४ 
शीखुनायलीके रवप जयम देखकर देवता. एड वर्णने छ । समल 
गाथ इ भका चङ गये भानो दतंको देखक्र उमया समूह षिङुद़ ग शे! 
सौणषुर भद मोम पातै पाने । खक मष्‌ छि साघु सव राले ॥ 
र छितर नर नाय सुती । जय जय ण ररि ईं भवीसा 1.1२. 
गगर भौर भाद धे दनो छो | इ्ेग उदास हो रयै ओर सतनेभ 
व भत्र लो रय । देव, किऽ मतु, नाग जौः एरी जयया करे 
आद दै एदे ६॥ १॥ पु ^ ~ 
नाच बरद सिवु बी \ चर चर इमा ॥ 
नहं तहे चिर वेद्‌ इनि ही । शीः दिरिदृषछि क ॥६॥ 
रव चि वी १ भवा एप षो मध दूर 
री । जह दण वेदानि कर रे ६ जौर भागमेग विषयक ( इरि) 





कषान दे ६५२ 
` महि पाताल नाक असु च्याया । राम मरी सिव भेले चाफ़ 
करटं आरती धुर नर सारी । दि निरि वि बिसात ५ ३॥. 


# षालक्नण्डे ¢£ १८५ 


~ 
एमी, पाताल जर खगं तीनो ओर्ोमि क कैक गया कि भीरमचद्धभानि 
तौढदिया बीर सीवाजीकरो दरण कर छवा { नगर नरनारी शठी कर र ष्क 
अपनी पमी (दयत )फो भुलाकर ( सामये बहुत सिक) नि्ादर ्र रै ॥ ३ ॥ 
सोति सीव राम कै. बोरी 1.छठदि सिगार मने प दौर ॥ 
सखीं कहि प्रच पद हु सीता । करति स खरव परस अति भीता ॥ ४ ॥ 

. श्रीीवानयमजीकी योद फेखी इुयोभित दौ खौ रे सानो बुन्द जीर शरंगार. 
रष एकम हो गवे ह । स्थिर्यो ह री ई६--सीते ¡ खाक चरण मो; वि 
सौताली भथन्त भयभीत हुई उनके चरण नी दूती ॥ ४॥ प 

दो-भौतम तिय मति सुरति करि नि परसति पग पानि ; 

मन विसे रघु्वखभनि प्रीति धटौकिक जानि ॥ १६५॥ 

‹ बौतानीकतो ली भ्या गतिर सरण करे सौराय भीरानीमे चनन 
ररे सथं नह कर खी ह । सीताजी अलीक प्रीति पानक खुदल्मणि 
शीरोपचन्जी मरन मे ॥ २६५॥ +, 

चीत विय दे सूप भभिरुपे। श्र कपूत यह मन माले ॥ 
उेटि उरि पहरि सना ममि । नहँ तद मा वनादन छागे ५१ ॥ 
उत सगय सीताशीको देक कुछ या ठटचा ॐ । वे दए, पूत घौर मूढ 
राजा मनम बहुत हमतमाये । वे अभये उठ.अउकर, कक पकर, न तके 
गाठ बने ठगे ॥ १ ॥ 
केहु च्वष्ट सीय प्ट को । धरि घु दम यठक दौड ॥ 
तोर घञ चाद निं सरह । जौवत इमहि ररि शो षह ॥ ९॥ 
को कते द, सीताको छीन लो मौर दोनों रज्छुमा्ोको पककर ष रौ ! 
धनुष तोहरे चाह मही सण ( एत देगी ) हरे असिज रन्डुगादीसो मैन 
ग्या सकता द १॥ २ ॥ ५ 

„ भोः ,बिदेटु क्च फर पदे । भीष खर सहित दो भाद ॥ 

„ सु भूप गोते पमि बाती । राजसम छाज शची ध ६॥ 

यदि जनक कुष वपता को तो युम दो मा्वोदित उरे ५. जीत एो 1 
य वचन हकर शाघु रा बोे-दस [ निन ] रनसमानको देखकर तो "छन 
भील्नागयी॥३॥ . 1 ॥ 
बद्ध अताघु- बीरता " वका । ना पिनाकदि संग सिषा ६ 
सोद सूरवा रि भव कट पाईं । भसि धित रिषि सुरभि उर। ४॥ 
अर | दुहा भख, प्रताप, बीरता, बाई, यर्‌ नाक ( प्रदा ) तो घदुषके छाथ 
`` हौ ची गवी | वड वीरता थी कि अव कीस मि दै! ररी दष्ट द्धि हैः पमी चो 
विषाताने म्द गु्ोपर काञ्लि छगा दी ॥४.॥ 
दो० देहु शमि चयन भरि तनि इरिषा ,महु. शो । 
1 रल ये (मव नि ५ --- 
ष्वा, धमंड भौर . कोच हंद मभ मतर भसि [ सी छविं 
लो । वमग क्रोधो प्रवं अग्नि जानकर उसे पतंगे म बनो ॥ २९६ ॥ 
नौ०-कैिय वि जिमि चु कग. । निमि सु नाम अर मायू # 
मि चह सङ जकारन की । सव संपदा रै सिवदो ॥ १ ॥ 


१८६ ॐ रामचरितिमालस # 


रे गदा भाग दभा चादि, सिका माय रसो चः मिन कार दी 
मोष रेवा यनी यर चदे, शिवे विरोध इनेनालर सद परकारकी 
अगपत्ति चदि, ॥ १ ॥ 
छो शोर क करति वदं \ धशरंकता कि कमी उद्र 
हरि पद चिमुख एरम गति चा १ 8९ तुरशर खु नरन ॥ २॥ 
सेमरी सन्दर शति चद कामी मनुय निष्कड्कदा [ चद से 1] स्था 
प्र समा है | यैर तैसे शीश चरणेपि विख मनुष्व परमगति ( प्रोष ) चि, ३ 
गातय | सीत च्यि हारा क्च मी वैश ही व्ययं ३ ॥२॥ 
कों शुनि पीर सकरानी । घी उवाई्‌ सद॑ जह रानी ॥ 
ग पुमा चरे शह पा \ सिप सदेह दहनत भन भ ॥ ६॥ 
शोर सुनकर सीताजी दित शे गी ! तव रियो उन वर्णे ले ययी जं 
भनी (हीतारजषी मती) थौ । भरीरचनद्रमी नो दीवा प्रेमा सान कति एर 
स्वाभामिकं शावे गुर्लीके पार चडे ॥ ३ ॥ | 
रानिन्् सितं सोद चख सीया । शदे धौ धिष काश फटनीया ॥ 
भू भषन सुनि इत उत दक । कलु रम इर पोकि ण एकौ ॥ 8 ॥ 
नियो ढाती [ दु रा दर्वदन सुनक ] सोच क फ़ न 
भेन विभा भद या के ६ । राजा क्चन सुनकर द्मणरौ इमरउषर 
५ भन व श्च्वे॥ ४ ध 
०--अत्‌ नयन चप सक्षोप! 
मलं मतत शतत गन निरस छिध किसर चोप ॥ २६७॥ 
उक तन लः बौर भेदै दले ग्य भौ द नधे रता भोः देलने 
"यो मानौ मतरे श्वि धर दसद दे वन्येको लोर आ गया ए ॥ २६७] 
च०-सरभद बे वर एर नरो! सब मरि ददे हप ग ॥ 
त मदर नि धि घु भा । लाय सग कमर पे ] $ ४ 





ल्म शं परयरवी यमि ॥ १ ॥ 
मवि मम सश स्वाते । घान इ श्लु रा दने 1 
गौर सत भि मढ़ अ । मड चराश नद धि ] ९ 6 
एद दर व स च्चा ये, मनो वा न्‌ वर इ ( म ) 


विँ! गो शैरपर विभ ५५ 
त्‌ व १ की पव शौ £ मोर विदा र्भया, 


पीस भद परिवदच्‌ इयः] सदि जलल रोद भावा 


इम दंड दर हु रिय । च नतेड मड सगा ए 
करि युनि चन वन पौरं ! घल चर कर ङ्द ल श्र ॥ ४ 8 


# वाखकाष्ड # १८७ 


[8 
ते सपान ( ऊँचे जौर प) पे है, शती गौर भुजा विशाल है । इद 
य्ोपवीत धारण विये, आहा प्ट जौ पचम दयि दै । कमर सिवो वनञ(पलत) 
दो स वृधि हथ ना य इन्दर वपर फस षय मय ६॥४॥ 
दो" संत येषु करनी कञिनि वरनि न जाद सप } 
धरि खनि नद जज बौर रं आय अरं सव भूष ॥ २६८॥ 
शन्त वेष, परन्तु करनी बहुत फोर हि खरपका भ्न न िया अ सकता | 
माने वीरस हौ मुनिका दरीरधारण कक) जरत र राजालोग है गरेमा गया २६८॥ 
चौ-देखत श्गुपति देषु कराखा । ॐ सकर मय निके सुमा ॥ 

दिषु समेत कि फ भिस नामा । ते करन" सम दंड नामः ॥ १ ॥ 

परश्चरामभीकष भयानक वे देखकर रप रावा मयते प्याङ दो डठ खे हए जौर 
फरितासदिह अपना नाप क्टकर उव देष्डवह्‌ प्रणाम के छो || १॥ 

दि धुमा सिता ददु खानी । सो जनद्‌ जद आद्‌ एुटानी ॥ 

जनकं योरि भादर सिरं नावा । सीय योलाह भना एरादा ॥ २ ॥ 

परश्चरामभी दित समकषकर भी सहन धी चिकी भर देख ठते बह ठमहता 
मानो भेद दु पूर वो गवौ] र जनकमीने यार सिर नाया भीर तामे 
स्कः प्रणाम कया ॥ २॥ 

आसिष दीन्हि सजी हरएानीं । रिज समज्न ॐ गई एवान ॥ 

मिलान मिकते धुनि भाई । पद सरो भेके दोड भा ॥ ६॥ 

पञमे दामो द दिय । ससि हरि र जौर [ ् ज 
अपक देर उद्ना ठीक म समक्नक ] वे सानी विया उनको भनी मण्डल ठ 
र्यी । र विशागित्रजी आकर मिरे ओर छन्देन दोनौ मायो उनके धरग- 
कमर्लोपर गिराया ॥ ३॥ 

श॒ श्लु दूसरथ कै दोग । दौन्दि शसीस देसि भक शद ॥ 

` शमहि विष्‌ रहे थक रोचन । रूप पार मार मद मोदन ॥ ४॥ 

[ विश्वमिति कड--] ३ र जौर ठम राना दशरथ पव र । उनकी 
द गोकी देकर पमष आशीवोद दशा । कमेक भौ मरश्ो हुनिाे 
भीपमत्द्नीके अपार रूपक देश उनके नेत्र षकरित ( लम्मित ) शे रहे ॥ ४॥ 

दो०--दहुरि षिकोकि विदद शन कट काद्‌ अति मीर। 
, ` प्व आनि अज्ञान किमि न्याये कोषु संसीर । २६९॥ 
फर स देकर) आनते इए भी भनेसानकी त भनक्त धूते किक्र 
यद्‌ दरी भारी भीड़ वैशी दै ! उनके शरीरे ष छा गया 1 २६९ ॥ 
च०-समाचार्‌ कहि जनक सुनाए्‌ ! जहि कारन महीप सथ शा ॥ 

सुरत भवन रि मम निदे । दे चप खंड भरि शरे ॥ १॥ 

भित फारण व राना अये थे; राजा जनके वे ठव माचा शड्‌ नि 1 
जनके वयनं सुनकर परधरमजीते परकर दूरी ओर देखा ठो धनुषके इषे ध्व" 
पर पडे हुए दिखायी दिषे ॥ १॥ न 

अलि रिस ओोसे बचने केश । कटु जद जग घटुष ह पोरा ४ 

बेगि देखा सूट न॒ त॒ आग्‌ । उरई मदि हे कि सव राव्‌ ५ २॥ 

-मल्यन् कमे भरकर चे कठोर बचन योर मूं जनक { बला, घतुप 


१८८ & रामश्वरितमानस # 


1 ~= 
हदा ! उरे शीघ्र दिखाः न ते मरे पू ! याज पै चर्हेतकं तेस राच भ कदोतिककी 
पृष्वी उल्ट वंगा ॥ २ ॥ ण 
जति ह उतर त नृषु "नाः । टिक भूप दरे मन माही ¶ 
शुर नि नाग नगर नर॒ नारी । सोच सकक रघ उर मारी ५,३५ 
राबाननो स्यन्त डर ठा, मिक कारण वे उत्तर मदी देते । २ देखकर कुर 
रात्रा मनम वदे पठन इ । देवतः सुनि, नाग जौर नगर तुय सभी सोय कर्ने 
स्मो; एवे हृव्य षद मय दं ॥ ३॥ १ 
मन पताति एीय महतारी 1 दिधि घव सँवरी बात मरियारी ॥“ 
मृुपति कः सुमष्ट सुनि सीहा । अरघ निमेष कलप सम वीता ॥ ४५ 
सीहाजीकी मोता सनम पठता रही ह कि हाय ] मिघाताने अब वनी बनायी वात 
निगद दी । प्रञ्चरामजीमा समान सुनकर सीतालीको याथा क्ष भ कलयरे"ठभान 
वीठे स्मा ॥४॥ 
धो--खमय विलोके लोग सव जानि आनक भीर । 
हृद्यं न रषु पिष कटु वे धीरघुवीर ॥ ५७०॥ 
तव भीरामचरनी स्व गोरो मवभीत देलफर घौर सीताजीको उरी दई नकर 
चेे--उनयै हदवय न कुष श था न निपराद--॥| २७० | 
मासपारायण, नवां बभ्राम 
चौ०-नाय संघु भंजनिहारा । होषि केड पक दस पुर्हारा ॥ 
जायु काट कदि किन मोही 1 सुनि रिसा बे युति कदी ए ९१ 
हे नाय ! चिषत्री$ चनु तोढनेबाम जापका कोद एक दाव ष्टी होगा] प्या 
आशाः मुत त्यो नह कहते ! य़ युनकर नोपी मुनि रिसा बेरे ॥ १ ॥ 
रेष्ठ शो जो इरे सेवका । भरि करनी करि करि छरा ॥ 
सुनहु गस तेह सिव धद तोरा । सरसा छम सो रिष मोर ॥ २॥ 
„ सतक वै लो रेयाफा काम कर । शतमा काम कठे तो एडारं ह करनी नाधि ¡ 
दरम उनो, निरते विषनीके धनुषे रोद दै, बद सदेवा समान मेरा ६. ॥२॥ 
स पिका बद्ध माना । न त मारे सहि छद राच ॥ ,¡ , 
छनि ञमि शचन उखन युका । वोके परघुधरषिः अपमान ॥ ६ ॥ 
हे दऽ सगा छोडकर अवग शे जाय नही तो एमी राजा मारे नायै । पुनिके 
चदन शनक छ्मणती मुपकरये ओर परश्रमलीका मपमान कते इए गरोढे- २॥ 
वहू धञुरी तो ररि ! कह न धसि रिद कीन्दिगोसद।॥ , 
एष ध प मसा षि हद्‌ धुनि रिख ह शकक २.1 
दे गोषा [जकन हने बहु-री पतौ तोद डा । तु भाण्ने ठेस 
कोष कभी नही क्रिया । इ घनुपरपर इठती मता कित, कारणस दै १ यद मुनक 
की ्ययासरूप पशरमजी पिद हेर कट चत ४ ॥ 
दो-रे चपः काठक कपडे यख योल्त सोहि न समार । ‰ + 
धु लम निुयारि चटु विवित, शकल संखयर ॥ २७ 
अरे सनपुव । कालके उच नेते धोने इछ भी होर नर है! प ५ 
विश्य वितलीका य धनुष प्या चने मान है | २४१.॥ -~ -;- 


# धार्काण्ड १६९ 


चो८-ल्हन ए हसि समरे ना । सुदेव व षड सगरा ५ 
क इति इ मून चु तोर देहा रम स्य ॐ भोर \ ११ 
मलीन ददर कहा देष ¦ निय; इ्र.जानमं पो इमौ धनम एके 

8९१) र धपते तोके या छनि.खम्‌ ! भौरगचननीने पो इते नमी 

पोरे दैवा भ ॥ { ॥ ^ 

मत द्र पुपर » दोष्‌) छि रज कि करोतु ॥ ` 
शरे दितद परु की धो । र सदढ पुने सुमाड भ मो 1 २॥ 
क्रिः थह तोशते दूदा हमे खुनाधनीक्न भौ भें दोए व । 

६ नि । आप्‌ मिना ही श्राप प्रितसमि कव ¶ते ह एर्रमनी' मने एकी 

भीर देखकर भढ दए ] रे येप सम नही ना ॥ २॥ 

वठङ बोर दषं नं सदी । केवर मि भष घा सदी ॥ 

भाक प्रहारी भति फो । विद्य मित एति इ गोह ॥ ६॥ 

मै शासक नानक नही मरत हँ भरे भू ¡ भा रे तर ने 
ठी जानता द! गै बाहरदमयरी मौर मलन श्रषौ दू षतिनडुचका शट तो 

विशवमणमेपिस्त ह ॥ २॥ 

छन यष भूमि भूष यितु ही । षु धार भदिदेवन्द दन्द ॥ 
ससग सुन ेदनिहारा ! परु विले मीपरेमात ॥ ४५ 
, अनौ सुजान वरे नीको राजापि एदि क धिया जर बहत भर 
उर रोको दे टा । र र्गा | सदताहुी धनरयोको कोवि भे द 
एर देष ! ॥ \॥ 
भ पिति जनि सोच वस करसि मीस किसर । 
„ गरभ्ट के अर्भक दन षर मोर धति घोर ॥ २४९॥ 
ॐ पारे कक | तु अपने मतीत शोचे वच न कर । मेर फाला 
यष भयानकं ट, ए गमो केका.मी नप करम ह ॥ २५२ ॥ 
चौ०-षठसि एडु. बे अहु बनी । भरो सनेम मदा मपरारी ॥ 
पुमि शि मो दवि रु । चत इदवववं पे पार ॥ १ ॥ 
छदी हरक कोम वाषीरे वोक--भरो; नीक तो अपने दा भाते 
गोदा समशते६। बरार सोडा दिसत षड उदाना बाते ॥ २ ॥ 
श इन्वधतिमः शोर गाद । ओ स्दभनी देखि महि तादौ ॥ 
; देष , यदं `सरसन शाना । पर फ = २५ 
`" "य फोर डुक मपा ( छोयकवा ५२.) रधी ६, गो तर्गनी (चके 

अ ) दीनो दैवते इ र शी ई । गर भीर तुषबाभ देखकर ह ने 

उड भमिमानष्लि का थ्‌ 1 ३ ॥ वि त 
" ` भूरसि जरे विलोक 1 यो कद षट्‌ सद रत रोकी 1 

४ दुर मदिर एर यर "गं । इयर क ए पर तं ॥ ६१ 
री समहः वौर पीत देखकर तो चे छ भाय कते ई र 
षन सकर सय दं देवव; रम; माने भ यैर गौ त इषि 

इ वीर न॑ दिली जती ॥ ३॥ ति 


९ ॐ शम्रितमनत # 


बते पाठ बष्कीरति धरं। सू पर द ध 0 
कोरि शष्सु इहा 1 ध्यं घरहु घलु 
04 भनिषर मपी हेती ६। 
इये आप मारं ठे भी गफ पैर दी पना अचि ! भाप एरु ज्वा ए 
कोद बने एमान ह । धतमराण ०५५ स १॥४॥ 
भ श ~ हु गिरं पभीर ॥ २७३ ॥ 


द्‌ 
दै [८ क भौर दटाएको ) रेखक रने ट अनुचित भ्य ट, तो उ8े ., 


ह पीर महनि । शम वि ] यह हुकर शुवंशमणि परञचरमलौ पधक साथ 
गम्परीर षणौ वोड--1 २४६ ॥ ^ 
ची"-कौषिक इगु मंद हु बर्ज । इष्ड कठ ब नित छर पाठ ॥ 

मादु भ॑ल॒ रपे कठं । निपट निरस अदुघ शरस ॥ १ ॥ 

दपि ! इनो, यह टक द डदि मौर रिद ट काणे क एर 
वभे लक पाठक वन श ह । यः स्लसगीपुं चटका श्र ६ । यद 
पिदर उद मूं धीर निर रै ॥ १ ॥ 

काठ पवश ~ षस मार 1 न ॥ 

[भ , चु उबारा । फ प्रहु ष्ठे हेषु हमार ॥ २॥ 

न पुकार ढे देता ह, फिर 


छते देष न ६ ( यदि दम ₹ बचामा भते, ते समारा पराप भक शौर फो 
कतार दरे भगा कर दो | २॥ 


छव एरेठ युनि पुणु हमार । एहि भष शो पतै पाद ॥ 
सपन हद हट मामि कारी । षा भतेक सौति टू कनी ॥ ६॥ 
समग्ने का--३ गनि ! भापका सुयश भाप यते दूर कौन वैन ५९ 
सना हैएमाने जप ष्ठे भनौ कनी कोक शर गकर वन कोर ।}। 
म संतोष ह पूनि कट क्‌ । चनि गि रो$ि एष दु सह्‌ ॥ 
वीरमती दुष्ट धीर ` अष्ठोभा । गारी देते म पबु सोमे ॥ ४॥ 
पपर भी नतष न दुला हे तो पिर कुड कह व्यि । शेम रोककर थद 


दुःख एव श । भार शीनन न षार कराम, ववा जौर ष 
11.111 ध 


दोर समर करली करद कटि त जनाव माए! - 
पियमाव रज पद रिपु कायर कथि भस 


ध्री से इ कानी (्रवीतासन करं ) कले कर अपेत ही - 


मनति बतु दु अरत परम ह अफे परतापन डप मय कदे || २७४ ॥ 
चो-एमद तौ का छत ज़ खवः । दत बा -मोहि लपि बोधया 
गव कन के ध्वन डोर । परु सुधार षरेड कर घोरा ४ १॥ 
भाप तौ मानो फलन श चा वपाः ऊत भः तिम हणे ६ । ह्मयनी- 
ऊँ कठोर वन्‌ घुने शी पडरामनीने सपने मयान, परेम चुषार हे 8 छि । 
भद ननि दद मेष मे लोग. पड्षादी- आल उ जोग ॥ . 
गाह विलोम क ¢ च } भच यहु मनस, भा सो - ॥ 


% बवाङ्काण्ड $ शशै 


[ मौर बोढे-- } अध डोब इदे रेष न ट । वद कडुवा वोकनेवास ग्रा 
मे भने ही योगय ३ 1 इ षराक देखकर मैने टुत याया, पर अवं यद ठषषुच 
मरके द्यी आ गया ॥ २॥ 

कोसक कहा मिशन अपराधू ! वाड दोष शुनं मनं र घावु.॥ 
खर टार भै, अकस्य कोष्टी! भो सपराधी गुष्योही ॥ ३१ 
विश्वामितरजीने कदा-~-अपराय प्सा रीभिये । वार्कंक दपर घौर सुगनने 
हषेण मही गिनते ¦ [ परद्मनी योे-] सीसी घारका कुडा) मै दयार 
~ शमर क्रोषी, ओर या रुसद्रोी ओर शपराकी भेर समने--॥ ३ ॥ 
उतर देव छद वितु मारं । फदर कौसिक सीढ हारे ॥ 
; न्त एदि कारि कमर कलर ! गुरि उरिन तेद कषम योर ॥ ४१ ` 
,“ उदे र] नेप भी मँ षे विना मरे छोड रह हू, ठ हे विषमिव ! 
कैव दर्रे पीठ (प्म ) ते । न तो इठे इठ कठोर इछारते कायकर योक है 
पररिभमे गुस्से उक्र हे नाता ॥ ४॥ 
दोग्धि कह इयँ हसि निहि हरिर सृ । 
यमथ सड त ऊखमय गजँ न वृष भवुक ॥ २०५॥ 
विशामि हदये हतक करासन हाय दत रश दै (मधाव 
सव॑ निवी हेमे कारण मे भीरम-खयकों भी लषारय अभि ही नन दे द १ 
नुं यह शोहमयी (केवह पौलमदकी वनी हरं) लोह ( लोदग--खद्ग ) द, 
ऊलकी ( रकौ ) लौ भदा रै [नो शं धेत गल जपय । सेद है ] एति अगर 
भौ केम यने हुए ई, इन पमा नही दद्र ह ¦ ॥ ९४५ ॥ 
चौ० देर र्म सुनि सीध इरा । कौ लं जान विदित धंखारा ४ 
आता पिति रिम भप भीर । धुर सि र सो बद ने ॥ १॥ 
उप्मणजीने कृ सुमि ! जाप शीकरो फोन नी जानता { बह ठंशारमरम 
भरद दै । आप माता पिति वो अच्छी ठर उष्ण हो च प्य; अभ रुरक छण रह 
५. १॥ ॐ ऽ 
सषु इमेहि मभि कडा । मषु न्य बद्‌ 
„भय भानि ध्वनिम पोर । हर दें भ यैक शोठी ५ १॥ 
' यह मानो हमरि ही मतये कदा य । बद दन वीत ग देवयान भौ गहु षट 
भदा या । भय की हिसाब कलेाहेको ला छम त मठर येल रोल्कर दू ॥२॥ 
कवन सुषारा । हाय हाय छव समा , कारा ॥ 
८ १ मोदी । विप्र विरे व्यै वरषद्रोदौ ॥ १४ 
हमसणजीके कर भन तकर पयरामनीने $ार सादय । हारौ समा 
हष | हय | करे पार उलौ  [ समगजीने का--] ह शह } भप शे 
पा दिखा. रदे है { पर हे रना णतु मँ हण समकर पचा रण हू (वफ 
देरढदं)॥२॥ ८ 
प 
- सभर खग ॥ उह प 
= यवान्‌ घौर नरी मि । दे नाष देवव ¡ भू परी 





1 % रामचरितिमनस # 
[०० 9 गगररं 
द है ¡ यड सुनकर अलुप्त ३, अवुवि द ककत स्व 'लोय पुकार उदे । ठव 
शीुनायनने श्रे स्छमणसीको रोक दिया ॥ ४ ^ 
देखन उतर आहूति सरिख श्युषर कोपु छता 1 ~ 
यदत्त देखि ज संम दने धोटे रघुङुरभातु ॥ १७६ ॥ 
छ्गजीॐ उत्तर; जो आहतिके खान ये, प्एमनीम क्रोपरमी अग्निक 
गदृरेदेलकर सुकृ दर्यं भीगमचनरजी लक समान (शन्त केरे) वचन बोरे 
पती-भाय कहु 'नाकक एर छोहू ! धृष दूष इरि न कोह ॥ 
जै प्रु प्रसाठ कष जाना । तौ किं बरबरि करत लयाका 7 १॥ 
हे नाप} बाकर ङृपा फीरिवे । इख सीप भौर दूह वच्येषर फ्रोष न 
नये ! मदि यह प्रका (भका) छ मी परमाव जानता; वो मा यह वेसग्च आपकी 
अराव करता { ॥ १ ॥ प 
जीं ठर कदं भचगरि करट । गरं पठि माहु मोद मभ मरं ॥ 
केरिभ कृषाः रि छेदक आनी । ठह सम सीर धीर.सुति ष्यानी ॥ २ 1 
वासयं यदि क्ट चपलता मी क्रे ई, ते गुर, पिता जीर. माता मनत आनन्दे 
भ जते है । अहः हे छोय व्च ओर सेवक जानुक छपा फीभिये । आप तो रमदरसी, 
उसी, धीर लोर शनी यूनि ६ ॥ २॥ 
म वषम पुनि कषक शुदे । कष क ठणलु बषुि कने ॥ 
हसत देखि नस दिख रिस भ्यापी । रेस सोर श्रता घद़ पापौ ॥ १॥ 
श्ीएणचन््रनीके बचन सुन वे कुठ ठंडे पड़े । इतने रकषमणजी बु कहकर 
पिर एका दि । उनको हैते देहकर परषठरामनीके नरे शिखातक (सारे शरीरम ) 
पोष सा गया } ऊर्न कहा-हे राम | तेरा भाई कड़ा पापी है ॥ ३॥ 
मौर तेरीर साम भन साद । कदल यजुख भारः ॥ 
सष्टम 3 जह द लोह । सीद मीखु सम देल त मोष ५ ४॥ 
ह्रीत गोरा, पर हदमका बंदा कडा दै } यह्‌ विषु £, दुध्ैशा नहीं ! 
स्मभाषे टे, तेय अनुसरण नक्ष करता ( तैर्मे शीख्वान्‌ नदी है ) यह नीच 
शते र मान ५५-५. ४॥ ५ £ 
एखन केऽ दसि सुनहु सुनि प्रोष पाए फर्‌ भक । 
> वख अन अञुचधिव करि चरि विरः ४१ ट ॥ २७७॥ 
„. | ्यमणरीन दक शा--ह युनि } इनिये, मोष पापका मूर दै, निवे मे 
शीर मलुष्य अनुचित कयं क्र रटे है ओर विषमे प्रिर चल्पे ( सवका 
भिव कते ) ई ॥ २७७ ॥ ^ 
च-प इन्र भचर भिरा । परिहर रो कसि व दाया ॥ 
ट प नहि छेरेष्टि स्सिने 1 वेडि शेषि एय फिरने 0 1 
_ दै भृनिरान ! ॐ आपका दाह दं अवे कोष त्याग कर दया करनय | शू 
46 कोष केसे शङ नेरी जायगा । दन्द पैर दुखते खो गि, वैद" 
१॥ * 
जौ चति प्रिव तौ फरिम उपार । शोथ पनोउ र शुनी बोरा ॥ 
“ पोत ठ्न जनङ् दगा । मे कड्‌ मलुधित अछ नाहः ॥ २॥ 
"दि बदु मलन धव द व कोर समय कवा चय नौर मिती बे दुषो 


रै वाटकाण्ड १९ 


( कीर से इकर सुया दिवा जाव । उष्मणो लनी डर जते 
कते द-यत. सु रिः चतत योना अच्छ नदी २ ॥ + 
धर भरपुर न मा । छेद इग्रार रेट पर भारी 

परि निनि निरभव चनी! स्वि दन शद ठट यही २१ 
भनक जीप थरथर ह [ ओर मनीन कद द दकि जेया्मर 
यदम वो रै । एरषजीको निर्मम बाधो सुनन्द परयुयमरीका दीर्यते जरह च 
शा £ सौर उन मौ ठित सी दै ( उन भढ धट र ४ )  ३॥ 
योरे रमरि दे निदा । यं पिचारि णोदः ॥ 
भु मीन तदु संदर कस । विपस्स भरा कनेक्ट जते ॥ ४४ 
त्ब शरीरमननद्रजीपर शसन जनकिर परामनी पोरे-तेस छोय भाई 
समकषमर ष्ये बया सा ह| फः मनका मैल बीर भरी ही शद दै, 9 
पिष स्ते मरा हुमा सेने भरदा || ४॥ _ . 
दो०-दूनि रिमन विसे वहूरि नयन तेरे शाम । 
शुर समीपं मवने सुषि परिहरि धानी वा } ९७८॥ 
श भक एमी मित हमे । हव शरीरामनन्रवीने मिरी नरे उनकी 
कोर शैख, मित समधी सफुचाफ़र, परीव रोचना शोहकर, धुपमीमे शष 
चऋेगपे ॥ २७८॥ ` 
रवि मिनत शु सीतल यानी । योरे ग॒ लोरि हण पानी ॥ 
नहु नाय तुग्‌ सड सुगान्‌ । चालक रच करिभ कति फाना ॥ § ॥ 
भरमषन्री दोन दष जकर अत्त विनय तय कोम ओीर शौक वाणी 
सेल दे नाथ ! भुमिमः भाप तो सभाक षी हभन ‡ । आपि बा पचनप्र 
शानं फीमिमे ( उसे सुना-अनेुना कर दीवि ) | १ ॥ 
अ भासक ए सुभार 1 नदि त संत विदुषि फाड ॥ 
वेदि ना फट कज विशार । भयराधी रै चाव हमार ९ ५ 
र ओर वाक क सभाव दै संन पे कमी दोप नह खाति भरने 
(कते) तो कछ कम भी मिग दे नय] आपका अपी त म २॥ 
हा कषु ब बंषय गोसाई । मो पर करि दास, ना 
करिति जष्ि षिधि रिस ना । छनिनायक _ सो क्ती उप ॥६॥ 
अकः हे साम ] हृषः क्रोध इथ ओर वन्भनः जो ठ कलां च दापती तः 
( अरपत्‌ दास सम्रकर्‌ ) मुद्पर्‌ कीनिये ¦ निष पकारे शम भप षष दूर हे, 
दिर | मठर धी उपम कृले ॥ ९ ॥ 
इह धमि राभ साह स्स क । भज भलुम शव चिव अनते ॥ 
धिक कर न दी तौ क कां फोषु करि कीना 1.9 ॥ 
नन भहा-दे याम | ोध कैर जाग मगमीतेयाछोदा मादी तक 
रा इती गदं डंयर म चया पे ष कते िा स का {| ४॥ 
दो ग्म सवदि नी सि-न कमर भति घोर । 
ध लु श्दठत देखडं - कैरी दपर ॥ २७९५, 
यद कुस षर री दक सजो मोम गिर पे 1 
उ भे रे ‰ ए शु रनपत्रलो नीनिव देख रा हं ॥ २०१ ॥ ' * ` 
एर स १द- 





ॐ बाखकाण्ड ४ ~ १५५ 
शम षड रिस हनिब जनी! क इं ' भते यह्‌ सप ए 
२ जनि आपन डुगासी ॥ ४ 1 
यरीशवर | कोष छोय | भके शये 
णार ह ओर मेय यह सिजा द} मव पर्न यमेष शय, 
मिय | से मना अल्चर ( दार } संनिये ॥ ४॥ स क 
(+ खमर कस समहु विप्रवर षु 
निं दो ॥ ६८ 
लागी भौर तेव यद कैसा! दे तराणम शरम 9 ॥ क 
[ रना वष देखकर दौ स्ने र ऋ मल था; वातवे उसका मौ कोई 
दोप नरषदै॥२८९॥ ` 
नौमि इम्‌ यान घय भ । भ कति स्ति मी विपी ॥ 
मु चान पै एहि न, चीनाः । शंस माये उतर तेहि दीम्डा ॥ ५ ४ 
भाप कडार, धाण भौर घुष धारण शरे देखकर शौर वीर समश्चकर जक्ष 
हृष आ रेया] वेह माका मोम तो जानेा था; प उसने भापको पहनाना नही । 
शयने वेश ( सषु ) फे खभा्के तुखार उतने उत्त दषा ॥ १॥ 
गौत सनि % चदं । पद त सिर सिद भरत सादं ॥ 
छह शूक - शमनानत केरी 1 विम प्र उर दा धरैती ॥२ ५ 
यदि आप छनिकी करद थति, ए दे खामी ! षाचक आपके वरणौ भूरि 
्िए रखता । अनजाने मूख कषम फ दीय । ब्राह्मे इदयं षुत अधि 
सये चास्मि ॥९॥ ` ` 
न्ह सरिवरि कसि नाया । कटु न क रन्‌ एदं माया ॥ ' 
शम माश्च धु भास माश । भरु सषटित ड़ नाम तोरा # ६१ 
“ नां । मरी मौर भाप रर कैच! किम न ऋ चर ओर कौ 
मस्तक [करो मेरा राममातर छोय-छ नामजौर को भापक परद्चसरितनदा नाम| ॥ ९ ॥ 
दैव णषु गुलु घुष शारं ! नव. युन प्रम पुनी दारे # 
„ शव प्रकार म मर सन हदे । छम्ड॒ विप्र अपराध. मदि ॥ २॥ 
५ देष) मरे तो.प्क ही युण ध ६ शौर आपके प्रम पवित्र [ धम, द्म, 
कृष, च भेम, षता, जन, निशचन ओर 1 नै-रण ६। इमे 
खर प्रजसते पते हरे ई । ह विम ¡ धमे अपरधन मा छन्ने ॥४॥ 
शोग--शर बार शुनि विप्रवर कद. राम ` खन यम ए 
शपति - सखव इसि द्रः दधु खम नाम ॥ २८९॥ 
भशामचद्र्लि, पयमनीकफो बरवार नि, ओर (विम कहा 1 ठ 
षपति (पर्रमनी ) रित दो [ भयव क्रोधी हषी ईसकर } बो$--द्‌ भी 
अपने माके मान क णेदरहै ॥ २८२ ॥ . \ ष 
पोर द्विज करि चनद मोही! शै जस -बिप्र सुनाकर सदो ॥ 
„ ‡ "शाप शुदा क्षर आहुति -जन्‌ ३ कोड मोर अति ओर इृसान. ६ १४ 
६ शके निरा ह्मण द समत है ! ‡ चैव दिप ईः दते नाता हूं । धको 
भोः बागे आहुति नोर भैर कोषे चँवन्त भव्कर अगि रर ॥ १ ॥ 


१५६ † एमचरितमागस % 


समिधि सेन चहुर॑ सुष्द ! य महीप मु पसु धादे ॥ 
एष्ट एम शारि ठचि दीने 1 समर जन्य सए कोरिन्ह कीरे ॥ २ ॥ 
चहुीगी डेन दर समिधा ( ग्ड नायी जनेश सदि ) ६ । वै. 
ढे एमा उमे आ बर हए है जिनो मै इ फतेकाटकर ्रलिदिया है । 
ये करोडो जपयुत रयत भने वि ई ( रात्‌ मैते मननोचारूर भाः इन्दे 
माथ खाहि ठी अत दै, उम र्न पायक सद्यो बरिव६)॥ २॥ 
मर भभा विदित न तोर । करसि तिदुरि विम के भोर ॥ 
मेढ चापु दाष वद्‌ जादा । अदभिति मनु जीप जगु दग्र 1 ६॥ 
ये प्राच तुते मादू नद दै, शीते तु गरामे ोदधे मेस निरादर करते 
धेट रश ३ । प्रग तो$ शा, दे देया धमंड बहुत बढ़ गया रै । पेता धकार है 
मामे दारौ अीतकर खड़ा है ॥ ३ ॥ 
यमन कहू सुमि हु विचारी ! ससि अवि षरि शु धृक मारी ॥ 
करति टूर पिनाक पुराना 1 जँ केि एत करौ भसिमाना ॥ १५ ॥ 
भीरमवजैने कारे मुनि } विचारक वोच्ि । आपका कोषे वत वहा है 
आर मेरी भूत हुत शयी दै । एुयना धनुर थ, चैते दी द गबा । म किह कारय 
1 4 विद 
० हम सत्य इय ॥ 
क्षै अस कतो अग शु जदि मय वख नावि पराथ १ २८२ ॥ 
ए. शनाय ! दि इ सचमुच ्राहण ककर निदः कते £, तो यह एत 
षि, फर सारम देन कौन योद ह न्षि इम रत मोरे मलक़ नवाय! ॥ ९८१ ॥ 
८३ बसु भूपति भट नामा । सपर धिन ड गखत्ानाः (| 
ओ मत मदि पारे कोठः । रह तेर काठ कित होः ॥ \ ॥ 
देवन दैव, यना मा जग युते योदा, ३ षै धो हमरे रवर छ, 
ओ भक परमान है, हि रमे हये जोई मी लतो इम उष सपू 
ऋय, चाहे गल दीन्वौ न हो}] १॥ 
उभि टु भरि समर सङा । कक के ते पावर भाषा ॥ 
„~ र ुमाठ न इल प्री । कलह इर नं रन रषुव॑ती ॥ २ ॥ 
विन ्री परर दुमे उर भया, उ नीत्मे अपने त्मर कर 
कधिया) म माके ही ऋष ह ङ्व मतर करे नही, कि रवभ रफ 
अल्ते भी नदी इतै ॥ २॥ 
कित ॐ भति अहुत । भगव हे शो दुहि भां ॥ 
सनि शु ठ चय रदति 1 उरे पट परुष मति ऊ ॥ १ ॥ 
वणम तीह पु (मदमा) ३ कियो मठे इस वह चवते निय षे 
जत्रा [ अथवा ओ भरि वा है इ भी याप इरता ६ }। ग्रीखुनाय्वक्े 
कमर ओरं वत एन पारी इदि परे दुर य| ९॥ 
म गतापि कए षतु चेह चहु मिरे भोर सदेह ॥ 
देन चु अषु छ यड पस्तु भव्‌ विसम भयत ॥ ४ ॥ 
[प्पे क] ३ सम ! दे नीषति {बनपनन शये { अवा च्छीपति 
ति पनु [रि सर क लीने विमय देः मिठ जन्‌ [परमन भुव 





व ॐ बाखकाण्ड कै „ १९४ 
9 
दे कगे तद व आप दी च गवा | त एरुरमरीमे गम व आध हया | ४॥ ` 

रोजाना राम भ्रमाड तव पुलक परु्टित गात 1 

, जोरि पोनि वोे वचन दर्ये न पेसु अमत्त ॥ २८४॥ 
तव्‌ उन्न भीमक परमाव जाना, [रि कारण ] उक गीर एरमित भौर 

भित श यय पे हय जोदकरभचनबोर-पेम नेये समता न ा-|२८४॥ 
चौण-जय वंस पन बन मान्‌ । गहर दुक. दर दरान्‌ ॥ 
भ्य घुर 1 हितकारी । जव मदु मोद फो भम हारी ॥ १४ 
हे खुली ॐ दूयं | ३ रकषतेके रुसी पने जसो जलगेवारे 
अनि | मापक जय हो ¡ह देवता राह्मण ओर गोका धि कनेवाे ! भाप वय हे । 
दै मद, मोर कोष बौर भरमम हेवा | आपी जय रो ॥ १ ॥ 

' विम, सी करना शुन सागर । जहि वचन रमा छलि नागर ॥ ` 
.सेवक सुखद ससग समे अंगा । जय सरीर ठि कोरि धरैगा ॥ २ ॥ 
दै करिव, शी कृपा जदि रोक समुद्र जर वीर रचनम चन्त चतुर | 

आपकी जग हो | ह चवर इत देने, सव गद्गे सन्दर थौर धीम रो 
कमदे्वोकी छम धार कमल | अतिकी जय हे ॥ २॥ 

„ कौ फाह धुल पक परसंसा । भ मेस भम पराव हंता ॥ 

अतुचित सुत वेदँ भप्यातः ! उरु छमामंदिरं दोर शनाता ॥ द ॥ 

५ मैत पले भाप क्या रसा फं १ टे मएदिवमीके मनसी मानदरोगणे 

इं आपकी जय हो । मैने धननाने आपको बहूतसे अरुदित वजन के । हे धमाके 
00 - 
, क्देञ्यजय शय । गुपति गप दनहि छप दत्‌ ॥ 
भप इटि महीप 3रने । श तरं काथर गरदं परे ॥ ४॥ ४ 
` हे खे भराकाशवल्य धीरमचन्द्रनी ] आपकी जयि, जय ह) तय ह 1 
पे कषक परराम तप स्थि वनजो चरे गये | [ यह देखकर 1 दष्ट एवाख 
मिना ही फारणके ( मनःकसित ) बरसे (रामचगजीसे तो परधुरमरन भी हार गये, 
एमे दना अपमान रिया था, अब कंडी य सका बदल न हे\.एस वयथ इरे 
डर गमे आयर पपकत श तस मग ग्वे | ४ ॥ | 
यो-येवन्द न्दी डमी भयु पर , षरपषटं शू । 
रये पुर नर चारि खव भिय मोह उह ११५॥ 
देषवानि मगादे भायि मे प्के उपर श्र, परखाने छो | जनके ली- 
बुस्प॒ सव हवित हो गये ¦ उनका मोषमय ( चाने तपन्न ) धूल मिट गया ॥२८५॥ 
सौति शेद्गहे यारत वाजे 1 ह्यदि मनोहर मंग. साने ॥ 
थ शूय भि सुखि धुनयनी \ करदं गान ट ' फोकिठियनीः ५ ४ ॥ 
तूल ओ वाचे भने छो । समीने ममो मड सान सत । इन्दर ल गीर 
नदर मेया ठया कोय समान भुर बोरनेवारी लिय शड-की ड भिल्कर 
सुन्दर गान कले गीं ॥ १1} 
' ` शष्ठ भिद फ घरि न जाद । जन्मदष्डि मन निधि पां ॥ 
बिग रासं मद्‌ सौय सुदारी । जड. विष उदर्य चमोरुमारी ॥ २ ४ 
जनके हुलक? यर्णन नहीं मिया जा सकता; मानो जन्मा ददी नका 


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सव रागये] तर्च गद ला ए म दसौ इ रं मे चन्र 
उव देहे चनी नया सती होती दै ॥ २ ॥ 
उतर दीन सिक प्रमा प्सु खाट धु सेठ रमा ॥ 
सेटि जतय फौम् हट भाद । अद ज उचित सो कष्य गोसं ॥ ६॥ 
कमकत मरमम पामर किव [ भैर क-- ] परेको इमि 
ध्ीपमचन्रनते धनु तोद है । देनौ मवेन शो कायं कर पिया । हे स्वमी ! 
सद मो उचिते सो कलि ॥ १ ॥ 
इष्ट ठुनि श्रु नाथं दीद । शट विवाह चाप भाषीना ॥ 
दी धु भयं विवाह । घुर दर ना विदि सव कहू ॥ ४॥ , 
रने क्श दुर ने! इन । य रे विगाह कतुर अपन था; तुप 
ते दौ माह ते सया । देवत, मनुष्व ओर नाग व रको चह मासूम है ॥ ४॥ 
चदि जई द्द क मव्‌ सया रंख भ्यवहादं | 
धृकि दिम इख शर पेद्‌ दिदि? भाषा ॥२८६॥ 
थापि रम बार अमे लका नैवा महार हे; दर्ग; इ पू ओर 
परि पकर ओर दो मित जेष आचार शे मैव क्रो ॥ २८६ ॥ 
चौभ-दृत रपषुर पव - गद । आ शप दसय बोडे ॥ 
दिते राड कटि महि षाड । पु दू वकि तिषठ कठा ॥१॥ 
तर अथोभ शरत भजे, चो रान दशन बद स । सते प्रस 
शेफः क~ ६ छप ¦ बहुत जच्छ ओर उीसमय वूोतोदखकर भेर दभा ॥१॥ 
परि महत सक ` प्‌ । द्‌ सन्द सादर सिर शाण ॥ 
| छठ षट मदिर सुवासा । द॒सा यर शद ॥ ९॥ 
पर श्व मननेन वुल भौर खे या जो दस तर गबा | 
[पय [बजर त र देदल्ययौर सरेरा मोर सभो ॥९॥ 
चरे निष निग शृह आद्‌ । एति परिचार देक प्र्प्‌ ॥ , 
~ पु दिधि शितान वरा । सिर घरि ब्र ५ सु पराई ॥ ३) 
मदन परर होक भके ओर भपे-मपते षर शि पिर रजनि नैकरनन 
इत मेख [ ओर उदं भामा दौ ङि] ददिव मण सा तैयार कते | यह घन 
३ स रज न विसर धट जरुर पार्‌ चे | १॥ =; 
मृ परो शनी दनद शाना ] चे वितान दिधि इष सना ॥ 
म कनकं दति क दभा ॥४॥ 
प व (क जो भण्ड बनाम दुद्‌ शौर 
चुर भे ¡ उर वाती बन्दन आरम्य 
५.१ 1 क [त ४ 0 0 + 
॥ भा भन फ पटुमराम के. \ =` 
रचना ५. विधिव. अति मनु विचि क्षर्‌ न्‌ ॥ २८७॥ 


# षाखकाण्ड # १९२ 


बव चन ही मियो (पे ) ॐ सीव ओः योर युच रेरे मेम 
पढने नह शते थे [ कि मणि वा दाधार | । च नदर ाममेटि (पान- 
कौ ता } कना, नोपतेसिदेसौ ममर म्मे थी9ि पठ्वनीनदी जीयो १ 
तेहि फे शि पथि यंव घना । विद विच दकता दाम सुषाए्‌ ॥ 
ऋमिक मपर रिश्च भिरेला । चीरि -कोरि पति सते सरोजा.॥ २१ 
उसी ना त्र ओौर पीर क वधन (भ रती) यतते । 
मीची मोतिवो् सुन्दर हां र । मिक, एन, हरे ओर रोने) न रय 
~ चीर कोरक योर पीकर फते, इनमे [ जरे करद गौर गी से 
कमर वनि | २॥ „ नि 
षि ष्टौ धुरा दिका । युहि दनि पवष भरमा 7 
र प्रतिमा समन गदि. करी । मंगर बेन्य लि खव उदी ॥३॥ 
मौर भौर बहु रग पी गनये गो वा. गजे भौर ूजते ये । एंमो- 
पर दाग मूरदयो गकर निकार, जो सव म्दनय समि खड थी | ३ ॥ 
फे भति शेक प । हिर मचिमय सव सुरां ॥ ५१ 
गमुक्ाभेगि सहन १ सुदाभने यन्ते पाये. ४॥ ~ 
दो०--सौरम, प्व शुभम सुटि किए नीलमनि ` कोरि ¡ ` 
„ , देम वैर मरकत ,घबरि ऊसत पाटमय , डोर ॥ २८८॥ 
मीरणिको कोरक भना एन्द्र आफ पते इना । सेन गौर ( भागे ए ) 
जोरेधमी दो पेष ए पक नेश च्छे इशोभिवे ६ ॥ २८८॥ 
शौण-रमे सविर यर॒शंदयिवारे । मन मनोम द -सवारे ४ 
„ अगर ण्न क्षं ' धनाए ष्ठ पताक पद चर ` ए ॥ \ ॥ 
> दस बन्दर ओर उत्तम वंदनवार वनाय मानो ऋपदेषे फे तपे दँ ¦ अने 
मद्रकस्य जीर पदर ध्वज) प्रका) परदे ओर वर बमा ॥" ९ ॥ 
दीप सोहर मभिमय नाया । आहं न अरति विचित्रे बिताना ॥ ` 
, , जि मंप शुकदिनि वैदेही सो बलै-सि मति इनि कदी ॥२॥ 
* धिम मणिके दति युनदर दीपक ई, उव विचित्र मण्डपका तौ वर्णन धै नी 
सिमा सा सकता] निढ मण्डप भरोखनकीसी इषित गी, रि, कवि खी इमि 
है नो उक वपन शर सके ॥ २॥ . , 6 ¢ 
प॒ शुन सागर ! सो विताघु रट खोक उथगरं 8 
॥ ध 2 क व कैसी ॥३॥ 
, . जिर म्प सप ओर गुपेकि सट भीरमचन्द्रज वृदे हेगे, कह ण्डय शने 
जक परद्र हेना.दी अवि ।'चनकनीके महक भैवी शोमा वैरी-ही शोषा 
मगरे भवयेढ घर दिखायी देती दै ॥३॥` ` > 
परति तेदि समय विदारी 4 वि छ छग रन दस श्वा 
जो संपदा -शीच श सेडा। नय लग 0 ॥ 
सपय जितने देखा उखे इच्छ -जानं पदे ।- मनुर 
विक भी म बु्ोभित थी». उठे देखकर इन्ध मी मेश 


दरो ऊत.या |. ॥ 


२०४ # शतचरितमारस ‡ _ 
~ 
मे०--सद ममर ॐ च्छि करि पड मरि वर वेषु) 
वेदि पुर $ सोर महत स्ङुचहिं सारद सेषु ॥ २८९ ॥ 
नि यते त्त्‌ स्धीनी के कोभ दः द धन वसी द, उ 
परी दमा षन करे सं ौर वरग दडचति ६॥ २८९॥ 
सौग दूत रम इर पव्‌] हने कषर विदोषं दुद ॥ 
शूप हर दिद द्रि जका क्ट शूष (अ ११ 
सदर श्यमषतीी परित एत अपरया परि । इनदर नगर 
देशकः £ बि हए । स्र क्षर उनम बर भेत; र्दवे 
इनभ्ट उर क ष्म १ ॥ ध 
करि भगम तिमद एती दीन! मुदित महेम आटु दरि लीद 7 
चरि विलोक कवत पाही ( एक गद शद भरि छठी ६९॥ 
परनि भम ऋते नि दौ! अल हेर राते सयं क उ गा । 
दित सोचते उ उन ेतेमे कर (प्रम सौर जनन्त भष ) ्ा गया शैः 
एष शे यया शीर धत म भा | २ ॥ 
शसु श्रु दर ४ वर सीद । रि गपु ध न सादी मी्षी } 
इवि धरि शीर परति डः । षी सभा रप सुमि सं ॥३॥ 
इदमे रम मौर वम ६ श इर कद ह र ऊे शपते धि शै 
सरे, छ्नीती इह भी ९६ न से) 9 वौ कर उरनि पी प) 
स मा सौ वपि कर हित सो यवी ॥ ३ ॥ ६ 
व रे ष सभि फं 1 ब्‌ नतह सदिव ह भाई ॥ 
पू भि स स्डचदै। शन सौ त पार आद] ४॥ 
भनी ध मिध गौर मरे सग रं तये ये की सार पा 
१ 1 रेरे हर ठे ईव पव करभ ॥ ४ ॥ 
कै-ञदल धि दोऽ धी रट केदेस। 
क बी १ ॥२९०॥ 
[८4 रे रोने सु तर ट मौर ३ नि देशम १ 
सेए र पचः छन ययते चि विद्म प ॥ २९ ॥ 
पइ पी वे वोद, अवा । कभ सु समत म गात ॥ ` 
रि ध्व मत # ल {सकर री सत ओ पिते ॥१॥ 
वि पि स देन म पीते २ लद छ्‌ भप रोगमा रि क 
त ल प सतम मिप १1 
कट भरम इटं विटि दे, शेः कत उरे ॥ 
भै इष वोर रै! इय भे दि रत तिहरे ६ २॥ 
रदत भन्न दते मे कचन येके-भैग) सो, दोग 
पदपदे दकु वम भदे उे मी कह ददान! ॥ २ ॥ 
शमह श्र षरं चु जया \ चप कसो सतह सु साधा ॥ 
प्‌ कदं कु इ प्रिर इतिति ऋ. ५१४ . 
पर नर तो तच ३ तु र तर धर मे खे £, शेर 


# वाखाष्ड # _ २०१ 


=-= 
अत्रखा विश्वामित्र रुनिके खथ है । इमउनको ्ानते होतो उनका खभाव कताभो । 
सबा बेम विदरष चा नते घ्रार-यार इ गरक्ार कंद (पू) रदे है ॥ ३॥ 
` ज दिव से सुमि गयु वा । तव ते आघ सचि सुभि पाई ॥ 
एदु विदेह क्वन्‌ विधि जाने। सुनि भ्रिय बच दूत शसुकाने ॥ ४॥ 
[मैव ।] निह दिनि उ वि 8 गे, मे जान द दने स 
यी दै । पो तो महाराज चनक्मे छन्द फैते पटचाना १ ये रि (ममे) यन 
सुनकर दूत गुखकएपे ५ न छ 
दो०-दुनहु महीपति भुकटः मनि ठह सम धन्य भ शेर 1 
,„ ` रामु रणत जिन्ह के तनय विख धिभूषन दोउ ॥ २९ ॥ 
[वृतेन क्रा] ३ रजाम्रकि कुटपणि | दुनिये, आप दमान धन्य चौर कोई 
मह रै, मिन राम-च्मण-जैे पत्र ह, ओो दोनों विदे विभूषण. ॥ २९१ ॥ 
पी०~दूढन जोश स तनय ॒सुगहाे। सिप्र तिद र उमिमारे ॥ 
* जिन्दर के जस भरताप कं आगे) ससि मरीन एवि सीतं कागे ॥ ॥ ॥ 
आपे पुन पून योगब नदी ह] वे पर्प तीनो लोकि भकासस्म ६ । 
जिनके यदके,भगि चन्द्रमा महिनि ओर प्रतापे अगि दू वीर लगता दै, ॥ १॥ 
तिन्ह क किध नाथ फिमि चन्दे \ देखि श्डि क़ वीप कर एीनटे ४ 
सीय खय॑यर भूप अनेका । सिटे भट एक सै एका ॥ ९॥ 
हे नाप ] उनके छे आप कहते द कि उन फते. पष्चाना! स्य पतने एषे 
दीक चकर देल जावा है | दी्रजीके. सयनम अनेको राना भौर पक ते-एक बकर 
भदा प्के ए ये, ॥२ ॥ ४ 
सु स्गास्णु कट म य। होरे पकक ,वीर बरिमारा ॥ 
सीनि लोक महे जे भटमानी । घम कै खकति संधु भावी ॥ ३ ४ 
पयु शिवजी धनुपको कोई भी नषा इया का । सरे कतरन्‌ वीर शर थये । 
तीनों लोकमि भो रत अभिमानी थै, शिवेजीके षनुपने सवक शक्ति तोढं दी ॥ २॥ 
सकद उडद सरसुर॒मेरू। सोढ हिय एरि गब करि भेर ॥ ` 
ओह शतक सिवसैदध ` डवा | सोढ षटि सर्मौ पराम पावा ॥ ४ ॥ 
-माणामुर) जो शुमेदको भी उदा सकता पा, बह मी हृदये शारकर प्रिमा कै 
चल गवा; ओर जिने लद सं कैसे उठा च्वि 'ाः कट रावण भी उत समा 
प्रावथंको ग्राह दभा ॥ ४ ॥ (3 र 
दोह राम रघुव॑समनि समिम महा. मदिपाल । 
. "1 भ॑जेठं चाप भयास विदु जिमि मजं पंकज -नाठ ॥ ९९२ ॥ 
` हे मारा ¡ सुनिये जहो ( जहो दे योद्धा श्र मान गये ) खुवं्मभि 
भीरतच्रनीने मिना ही रास शिवजी धतु वै तोड़ डि मैरे यी कमर 
कौ इंटीको तोदं दल्तादे!॥ रे२॥ '' “ _ ` 
शरौ०-घनि सरोष श्एनायु आ । हुव माति तिन्ड ओं दाप्‌ ॥ 
देखि रमि षड निज धसु दौनदा । करि च विनय गदु यन दहा ॥ १॥ 
पलु र्मी बाह इनक परमन कोष भवि जोर उन्न बहूव मको 
भो दिल । अन्तमं उन्दने मौ भीरोमचन्रनीका बक देखकर उन अपना धतुप दे 
दिवा जौर बहुत भकारे विनती र कनको गमन किया || १ ॥ 


९०९ # समचरितिमानस # 
ससन प॒ धवुरदल चैतेन रिथ उडु एमिस ५ , 
योपि भूप बिलोकठ नादे । लिपि टन इरि भोर कै म २ ॥ 
३ जन्‌ मचे शरीमवदरसी जदरमीय्‌ करौ & वैते दी तेननिषान र उकका- 
शमी निने देलनेमत्रचे एमगोग धे फोर ,२8त ये जवे हषी रिहते बजय 
वकने क उवतेदै॥२॥ - ~ ध 
देष देखि इव वारुक दो । शव ब भादि त्र दत्र कोठः ॥ , 
ूत ध्म रतः धथ छागी । मेड प्रतर दौर रस पानी ॥ ३४ 
दे देव ¡ आते दोतौ बको देखके वाद्‌ अव शसेण नीये फोर भाता 
प न्ठ (एमाय दिर कद चद "हौ नरह) | मगमताप जर वीय पी 
ह ूतोफी वचन्चना सक्को हुत व खी | ९ ॥ । 
भा समेतत राढ -अपुरागे । दूतष्द्‌ देन ॒निष्ठपरि . कगे ॥ 
फ भगीति , ते सूदं कना। घरमु विचारि सव चख भानो ९५ 
यमाः न र म हो गे वीर दलन नकर देने छो ¦ [ उन 
नियर देते देकर ] य़ नीविवष्ड दै, पेय इकर दूत अपने दयसे णान दने 
को! परमको विचा (उनका भुक्त तोय देकर) समते घर भना ॥ ४ ॥ 
रोूत इटि भूष धसि फट दीन्दि "पतिका कष 
. _ कथा चलो ` गुरि सब ' सादर दूत ' पोल्‌ 1 २९९ ॥ 
कव रानने उदक वचि पठ चाकर उन पतिका दौ भर आदरूर्वक 
1 1 
॥ छर जहि, }नय ल कर मदि इष छदँ ॥ ` `" 
निमि रिदा सागर्‌ ख ना । जपि ताद , करना पादीं ॥ १॥ 
सथ समाचार धनर १७ अलन्द.डल पाकर शुर योपम पुरषे 
समि मी सणि छी दर द । ले नदिय मे जती ह नुदौ 
छमा न हेती, ॥ १॥ ` भ £ मग 
विमि इ सपि नहि पां पजक प जहि सुं 
` "५ शुर पिष भेत्‌ घुं सेवी । उसि एुमीत, दौत्य देषी ॥ ६॥ 
र एदु समि.वना सवपाक धी घम ५4 
युर, तष, याय , ५ 
५1. 1२... 1 
“ सु त समान भग्‌ स । यद्र धद कोद हनेरा" 
म चे सधि पुय मद्‌ के राम सस स । क 
द्धो एमन अमाता जवेन रोई हमा, न है भौर.न दोनेका षी रै। 
१यनप।उे भगि् उ ओः तिन तेः गरि यम्य ुव १, ॥ २.५ | 
1. तरत ची । गुल सायर अर वारु, चयी ॥ 
॥ कोल केल्यास! सहु 1 मिषा ॥ ४॥ 
1111. 
छ स ६ । कमते ववि ची प्न चाण है । यद स मु 





बरत ऽमवोः ॥ ४॥ 


ध 


# चाटक्ाण्ड $ २०३ 
यो०--चलु वेमि इमि शुर वधन भले नाथ खिद नाद | ` 


सनि षते र गवौ | राजा प दूरी सव बात ८ भो 
थी) तरमनम्ि ॥१॥ ` च अ 
रेस श्रुत, राजिं रनी। मन सिखिनि सुनि बद णमी ॥ 
न अती ददि 1 अति भवद्‌ गन महतारी # २ ॥ 
मुदित इं यन रौ सुलोभित शे रौ ई भे मोरी बादल गरल 
छम लिते होती टै । वदू [ अथवा शमन ] लि भक क 
आश्र दै रदी ६ । माता भलन्त आनन्दम म ह ॥ २ ॥ 
छेष .प्र्मर भति प्रिय पाती । हदये रयाद्‌ र्रप छाती ॥ 
शमर रतत क कीति करनी । बरहि घा. भूपवर चरली ॥ ६॥ 
उ अत्यन्त परिय पतिका आप केकर सवर हृदये छार छदी शतस, 
६ राजाभेभर भेष दारयलौने धीरामनश्मणकी कीतिं जर कनीका वारर 
॥.३॥ ॐ 
, छनि भरसाहु कष दवार सिधा । समिन्ड तय महिदेष योजाए्‌ ॥ 
दिषु `दान जांद ` समेता। शठे ग्परनर 'आसिप देता ॥ ४॥ 
ह सव धुनि गां हः एसा ककर बाहर चरे आपि | तम यनियनि नाहे 
शमा शौर भानन्दसदित उन दान दि । श त्राण आरव त हए वके ॥ ४॥ 
सो जार्चक.ठिष हारि दीन्हि टि विधि । 
जष्टं छत चारि चक्रयतिं दर्थ के ॥ २९५॥ 
फिर मिषुोको धुठवाकर करोद्धं परकारकौ निछवरं उनको 'दौ | (्वक्नती 
मरा दर्थे चोरो प चिरंजीव कषे, ॥ २९५ ॥ =. 
चकत चे पिर पट नाना । हरम हते टे भिसोनो ॥ ` "3 
समाधार सबं ˆ शोगन्ह पापु । गि धरं॑धर होन बधा} \५ 
यो कते हट वे अनेक कारके भुन्दरं वल पहन-पदनकर ' ठे । आनन्दि 
शेकरं नमदेवालोगे बढ़े लोर नगा चोट व्गावी । हव हौयोने जव गह सपराचार 
षामा, त घरपर नभते होने को) १ ॥ 
सुवन चारिदेखच अरा ` उच । जनकसुता '' रषषर विभा ॥ 
सुनि सुभ कधा छग जुरे । य ` गृह गरो सदार खगे ॥ २५ 
` शवौदहं कोकमिं उत्छाई मर गया नि जानक्ीजी योर भीखुनायनीका विवाह 
शो । य म माचार पाकर लोभः गरम कषे गमे लौर यास्त, ध्र तथा गलियौ 


स्ननेत्मो ॥२॥ 
सदैव चश्चवनि। राम संमककमय पावनि ॥ 
तदपि प्रीति कै प्रीति सु नंग स्वनाः रची वनां ध ६॥ 


न __ ~ १ पन ----------- , # गमचरितमानस व 


गि सयो सद सवनी है, वोन द श्ीरमनीरी मद्ल्मवी परवि्र पुरी 
हयम भहियरमीि शेरे उद मङ्गप्वनारे खजायी गयी ॥ १ ॥ 
खल पताक पट चामर श्रू! छवा, परम विशचिघ्रं वजार ॥ 
नफ कदस तोरन सतिला । ह दष दधि अच्छ माला ॥ ४ # 
वण) वाका, पदे चौरं इनदर वरति खारा भरालार यहृत ही यनूहा शवा 
हा ह 1 सोमक कछ, तोरणः मण साक हलः दूय दही, अत बौर 
परासि .४ ॥ ५ ठ 
दो-मंगढमय निज तिः मन सर स्चे' वनद्‌। , 
बथा सदी चलुरसम धौः चार . पुरा ॥ २९६॥ 
लोगेन अपने अपते घरक सलार क्य बनं सवा.|, गिक चरमे 
दना मौर [ रेप इनदर चौक युवे]. चन्दन्‌, कणर क्री जर्‌ कूरे 
क पप द्रव रो रप कत ई ]॥ २९६॥ , 
सौम रहं लू बू मिलि भातिलि । सति नदत ्कढषटुतिदाभिनि ॥ 
वि्ुवदु्ी श्रूग सक शछोऽनि। निज रूप रति मासु जिमोघसि ॥ ॥ ॥ 
तिज. फन्हिडी चनुली, हिने र नेवती नौर्‌ अपन 
दर सपे कागदे शी रविके जमिमानकन ददानेवाली गिनी छि्मो समी 
सीसी शगार सलक रशत डी ड मिलकर, ॥ १ ॥ , ई 
गावि प्रस मं यानीं । सुमि कछ रद पकरि ठजानीं ॥ 
भूप शन मि जार्‌ बरमा । निर्व भिमोदन शवेढ विताना ॥ २ ॥ 
नोहर कणीय म्वल्गीद गा र र, जिनके धन्द्र खरो श्रुलकर कोषे भी 
छना जाी है । रानमदल्की वर्णन कैते किया जाय, जरह बश्वको मिमोदित केषाम 
रण्ड नाया गथा है | २ ॥ ॥ , 
सशर इष्य सलोह नाला । रजत ानत धिषु मिराना ॥ ' 
कत विरिद ददौ उरी । करे चद_ इलि भुर ही ॥ ३॥ 
मने प्रकारे मनोर माचि दायं शोभित ह रे ६ भीर बहुतसे नगद 
चज र ६ । कौ भार विव्दानी ( इत्रत ) का उचारण र ररे ६ थौर कह 
जद्मणं वेदणनि ९ ए ६ ॥ ३ ॥ त ~ 
माव शुद्र संगक्नीा । है छै शासु सु धरं सीता ॥ 
गुन उछ भवषु -मतनि योरा मानु उसगि चल खु भोरा ॥ ४॥ 
„ - शुत्दरी लिये क्रामी जीर भीसीतजीका नाम केकर मङ्गटगीत गा री ६ । 
उता षटुत र जर मह अध्यन्व ह छोय ह ] इते [ उसमे न उमाकर ] मनो व 
उता ( यानम ) चा ओर उमड चल दै | ४॥ ~~ 
रो-सोमा दस्य भवन कः फो कथि वरै पार । 
व व ध अवतार ॥ २९७ ॥ 
ै, जौ खमस ‡ 
के दिरोमणि रामचन््रजीने मपतार छया ई ॥ २९७ ॥ 3 (4 
नीरूप भरत एमि खि दोाई ! इय गय स्येदन साहु णै! 
चहु देशि रषवीर करत । सु शुक भूरे दोड शरा ५ ¶ ॥ 


क वाखकाण्ड # यश्य 

, पि रागे मसतमीको हय, स्वि जौर इहा रि जकर वोद, हषी मौर 
सत्थ. जही प्रवननीढी वायत चन ! यहं दने ह दोन मार ( परती 
ओर जी ) भन्दय पुढे भर गमे | १ ॥ 5 

: भर छ खानी वोढा । चु दन इवः धाद ॥ 

^ एचि सचि-जीन्‌ परय तिन्ह सा 1 गन शरनं घर वामि विरजे ॥ २॥ 

भने ख आलो (शवर शन ) हमे ओर उन [षर 
दमने } भ दी, वे रन दोर उठ दौर । उन्न शचि सय ( यथायोग्य ) 
` तम ककर घोडे सनाप । रग-के उ चम षडे शचोभिद हो यमे ॥ २ ॥ 

सुभग “सकर सुटि देच करती । भय व अरत भरर परा धरनी ॥ , 

नाना जाति न जाहि बचाने । निदि पु शतु इह उदाने ॥ ३॥ 
„ एव षेहेप्देएी चन्दर गौर चठ कलौ (ठ) ॐ दै । व पप ए 
वर सते &े सते य लर रव हौ । अनेक जगि पेट यनक केन गती 
शे कत । [रे तड पाम] गानो हवाकृ निरादर इरे उद्ना चाहते ६॥३॥ 

तिन्ह सथं एवल भए असषारा । मरत सरसि य राजकुमारा ॥ 

ष हंद -सव भूषतथारी । र प चाप इन कटि भाती ॥ १॥ 

उन श पोदप भत समान अवलावारे ठ छड-धीले रजछुमार सगा 
हप । वे समी सन्दर ई गौर स्व भभू पारय पिव हुए ह| उनके दर्म बाण 
नौर भत दथा कमस भारी तरस वेषे ई ॥ ४ ॥ 

.दो१--छरे छवी छयलः छव चू शुजयत गर्वीन। , 

कग पद्चर भखनार अरति ज.जसिकला भवीन ॥ ६६८॥ 
धमी न ए छी 98, शीर, र गौर नणय । मरे 
शाय दो दल शपा £ ओ तरप्ार चलनी क्म ये निए दै ॥ २९८ ॥ 
नोऽव विरद वीर्‌ रव त ।चिकभि भर बेर ठे ॥ 

„ , करि चहुर रण सति लाजा । एप सुनिशुमि पनर निसान ॥ \॥ 

, श्रररका बाना धारण हए रणभीर वीर ख निकर, तमे ब्र आ 
देइ । वे चठ अगे गोद इर्य चत फेः स ६ जर भेतीतणा 
नगादैकी नाज सुनु मतक ह द ई ॥ १ ॥ . 

एथ सारथि विचद्र यनाय] ज्व , पठा मनि मूपा ॥ 
कवर चाद किकिमि इनि करी । भाड़. आन तना धाह ॥ २॥ 
सरथो, प्श, मथि भौर समो गकर सगो हु नवम 
अना दिया दै । उन घर चैषर छने ई ओर शवो उदर भद कटर दे 
स ते इर दै ममो श रथी शोमा छने ॐ १। २॥ ठ 
. , शकट जगनि हव (न ॥. 
दर ` स । जिर सनमेदे॥२॥ 4 

1 111: 
सभी दे इन्दर भौर ग्ि.समे ह शोभित £) ओर निन देखकर सुनिये 
नीमू ह ८. ॥ 

, ड जह चरा श्रि ङी गद यपं नद्ध न्य अधिकां ॥ 
क शख सवव सादु चाद सी सधन विद्‌ बोला ॥ ४ 8 


१०६ ॐ शमरदरितमागस के 


जो नपर मी नमी त ह चले ट वेगस भधिकताणे उनकी याप पामे 
मही हवती ! अख जोर उद वाल ठयक अरि रिम छलं लिया | ४॥ 
शेण--द्वि ष्टि पथ पिर नगर छागी ` जरुर वरात । 
छेत गुन धुदे९ सधि शो जहि कारन जात ॥ ९९९॥ 
रौप चटृ-चदक वापातं नगरे ररः चरने र्गी । जो बि पाके स्थि भाता 
£ समो इन्दर दुन रेते ६ ॥ २९९ ॥ ` 
च०-शरर्ति करिवर परी. भशर । एदि न चा जेहि सौति सवारी ॥ 
चे मर गढ धट पिज । मन पुसग सालन घन दी ॥ १ ॥ 
धे पियो इन्दर मारय पी ह वे मि पकार नायी गवी यौ, से 
फा मही जा सता } भतल शषी धंसि शोभित शेफ { भे षते हुए ) चे, 
मानोः वमक भु्दः बाद्येके घमू [ गरजे हुए ] ना र टे ॥ १ ॥ 
बहन शर्‌ अमेकं पिधान । विक सुभ सु्ासम छाना ॥ 
तिण्॒॑चदिं पठे विपवर दा 1 छु श्लु धरं सकर टुत टदा ॥९॥ 
दर परसकर्योः सुखरे ठन योगय सामन (जो दरुमा के दं ) ओर ए 
शादि शीर भी अने परारी घवािमो ६ ?'उनरर भेऽ बराहमगोके समू चद्कर चलः 
मानौ सत्र ेदेकि छन्द ही दरीर धारण क्वि हए ह ॥ २ ॥ च 
मआागघ सूढ दरि युनणामक। च्रे जान चदनि जो घेहि लायक ॥ 
चख ऊँ ॒रृषुम अह शती । षरे चटु मरि अमतत भौत ॥ ६॥ 
मागध, सतत, भार भौर गुण गनेव ठ, ज भित योग्य ये, वैस सवारीप्‌ 
पदर चे । भूव धातिवोके जकर, ऊट जोर ट असया प्रकारक पदर लाद. 
छद्‌ से ॥ ६॥ ८२ 
्ेरिनद रमोबरि चले क्रा | सिचि वस्तु खो दमे एर ४ 
॥ 1 सण, पवक शुदं । नि निच सा समध परभा ॥ ४१ 
पार करो कोषं उव चले । उन अनक पकौ तनी पथं फं गिनका 
ममन जन क खरा । सव देके मूर मपतना स॑ समान भनार चे ॥५॥ 
शेव य उर निमैर दगु पूरितः पुछ सरीर । 
कवि देखिये नयन्‌ मरि रसु ` डञ्लु "दोर ` धीर ॥ ६००॥ 
| । {.ववन्नो प्फ ही खला 
सी ह} हम भीय दोनो मादव नेत मसर कव दते ॥ ३०० ॥ 
“रीरि भय यं ` वोरा। सथ स्व वालि दख चु भोग ॥ 
ध नदि दे निसाना। मिन परा कुन शना ॥ \ ॥ ४ 
गरन दै £ उने की भीय वनि श वी दै । चारो भर रथी 
पर मौर वेह शलसिनाट रे रदी हे । वादेन निगद्र करते हए नगे 
पोर शम्द कट्‌ रे ६1 दिली अमनीपायी मो बात कानेसि नायी नहं देषी ॥१५॥ 
म भीर भूपति & हे । स दद्‌ जाद्‌ पान धारं ॥ 
ऋ भयर देहि व । दि शारदी अछ" पारी ॥ २॥ 
रन यक दन इतन मारी मीढ हो री वरहो एथर फक गाय 
4 ो लष अयवोगर चद लियो ननमा ्रारती एवै 
५२ ¢ ११ 


„भै वारकाण्ड = . „ ७ 


शाविं शीत सनोर शमा 1 ति आर्त न जाद्‌ काना 
हि. इनम रुद संरमं साली । भति रथि हम निद मानी ॥ ६॥ 
' , श्र नाना प्रको मनोहर गौव गा डी | उनके अत्यन्त आनन्द भ्रलात 
मदी ते सकता । तम दुमन्तेजने दो रथ एनाकर उने से धोक्ष्ो भी भात कले- 
वले धोडे जेते ॥ ३॥ 
दर्‌ रथ सिट भूप पिं जाने । नि सवर प्ट जाहि भलाने ५ 
रा समाद एक `रथ साजा । दूसर तेज धुन अति आना ॥ ४४ 
दमौ इनदर रय पे राता दशरथे पास छे भावे, मिनकरी युन्द्रवका पर्न 
परएलतीरे मौ न हो सदा । एं रथपर रानी सामान समदा यवा | ओर कूप जे 
बा धभ मौर जतयन्त ही श्ोमायमन था, ॥ ४ ॥ ४ 
शते स्थ रचिर वसिष्ठ कटं हरपि चलू नु । 
भापु चदेड स्यंदन सुभिरि र शुर गौरि रने ॥ ३०१ ॥ 
' डप न्दर सवप रन वयि रपूरवक चदाकृर पिर यं शिव, गुर, गौरी 
(पार्वती ) ओर गणाभीका सरण करे [दूसरे ] रथः वदे ॥ ३०१ ॥ 
चौ»-सदित वसिष्ट सोद नृप कैं घुर शर सग इद भैर ॥ 
१५५ रोति चेद विधि राड । देहि सवदि सव भति भना ॥ ५५ 
अिष्ीमे सय [अति हए ] राभ दशरत वैते शोभित हे खे ह देवशर 
इएसतिनीरे खथ श्र हं | मेदकी विभिरे शौर ङष्की रीति अनुसार सय रां कके 
तथा पवको सव मकारे सते देकर, ॥ १॥ ४ 
भिरि श॒ शुर भयु पाई । चले महीपति सस वना ॥ . 
पे बिथ ॒यिलोकिं करता । परप सुमन सुगर ता ॥ २॥ 
“ शीपमचद्जक सए के, दौ जाश पतर पीति दयन य्व 
स । पारत देखकर देवता र्ट ओर इन्दर मरणाय क पमा कने फो ९ 
भयड कोष हम गय गचे । ण्योम भरत मजने वाने ॥ 
शुर न नारिं ुमगछ , ई सस रग. मंज सदना ॥ ६1 
„ ज श्र गन गया; वेदे ओर श्वी गर्ने को । ओ ओर गदतम 
[ शो जाह] बजे बने चय । दवन ओ म्यक तिरो छन्द मषगान 
कले सीं भौर रसीडे सासे शना्य नने सगौ ॥ १॥' ` . 
द टि श्नि भरनि न जादी । सतव ` करि, पफ फा ॥ ' 
करहि विदूषक शप _भामा। शस पक कर गान श्ुलाना ॥ ४॥ 
_ ' विवोदी लनिका कनन हे व । पद चलने सेवम भया 
पन करे" कर य ह शौर द द (गयम अनेज दएन 
ह) । दौ ल नन नौर दर शन चिद ८ मज ) तरते 
[६ खेदै॥४ ५५ व मर र < (ते ॥ 
(भ. कुरभर भरर "षग ॥ 
„ र नद चितिं चकित , गहि न दाल वधान ॥ ३०२॥ 
“छट यजुः मङ्ग ओर नग न्द दुनकर यगो उर्मि अनुखार इष 
भकार नचा द ६ पे ते बथानसे नय मी विगते त ह । चर तट, चभ 
शेक यह देष रदे ६॥ ३०२॥ ध 





र्ण्ट * यमचरितमानसं ॐ 


शौर त _ वरमठ वनी रासा । होदि हणुन संद्र शुभ्रता ॥ 
चत्त चु घाम दिति के । ननुं सक्छ मंगर कि दे ॥ १॥ 
दाएत देरी वनी ह फ उव वर्मन कते नहीं बनता । इन्दर श्वमदायक शन्‌ हो 

दे] नीव्छठ पी वादौ ओर य डेरक्च ‡ माने वमू मह्र्लेकी सूखना 


चर्छहे॥६॥ ति 
वषि काय सेष्धेठ सात्र) न्ट चरु खव कटू पावा ॥ 
घातुक श दिति इयारी } सरवर सुद्राठ आव दर्‌ नारी २॥ 
मनी भोर दरौभा इन्दर केकर शरोमापा खा है) मेव्ेव दैन भी स्र 
रिप णया । सीने पर्रसक्ी ( शीतलः मन्द, बन्धित ) हथ अनुकूल दिधामे चह 
सै ।त्रेध (इागिनी ) लिय मरे हए षडे भौर गोद ब्र ष्वि या रही द ॥२॥ 
का फिर चिरि द्छु देखना + घुरी सनु सिसुदि पिया ॥ 
खगमा फिरि दानि अ । ग गन जलु दन्द ३ेखाई 1 धह 
समङ्क कनिःिऊर (रर-वार ) दिला दे जाती है | माय सामने खी बह 
पूष पि हं । इनको ठै [ गर्यो ओखे ] धूमक्र दाहिनी रमो भाय, मनो 
ममी मार्क तू दिवावी दिवा ॥ ३ ॥ 
छसकती कह छेम विदेपौ। सामा वाम बुतर पर देखी ॥ 
सनस भरायड द्धि ध मीना 1 कर्‌ पुक दु चिप्र प्रवीना १४ 
कमर { सफेद परिल ची) मिय रप केम (कमाण ) इद खी | 
श्वामाव्रावी ओर चन्दर पेष दिललावी पडी । दही. रौ चौर रो दिदान्‌, नाण 


श्रय प्त च्वि हु सामने भवि ।। ४ ॥ 
वो०-मंगमय कथानमय अभिमत फ दातार । 
लघु उत साचे होम्‌ दि भण शुन पक्त वार ॥ ६०६॥ 
मी मकम कष्वाभमय योर मनोकाभ्डित फल देवे कुन भानो वत्वे हैमे 


पिधीयते गये] ३०६ ॥ 
शोण-संगरे लुन शुगम सव शाद । युन अह घ्रं सुद चाकँ ॥ 
तम सिसः कह दुनि सीहा । समधी दसरयु भनक पुनीता ॥ १ ४ 
„ स एन गह जिकर बन्दर पत्र ै, उफ वमि सड म्खश्र् सुच्म ६ । 
गस भनोत दृषा भरर सौव. इदिन र ता करण्डौ शौर 
भनकनीैदे भत समधी द | ६ ॥ 
छि अश्या सुन व नाचे । जद शे विरि हन सये ॥ 
, पि विधि शन चष पयान्त्‌ । हयं गव याजि एने चिखाना ॥ ३ ह 
ष च इनक मनो धमी ग्न ना उठे [चौर डमे को] यत ~ 
वदे दते च्च कर धवा । ख. गुरते यसन धवा 1 रढेकयौ गल 
र द मौर नग ल्य दीद ॥२॥ 
नाच्ठ चनि मुदल इद्‌ षरतिमिः चनक चेषाए्‌ वेद्‌ ॥ 
भच रद ष॒ नाद्‌ सुर सरिस संपदा. पु ६ 
„_ सवने पायसम्‌ इ्यपयवीदनो अते इटं भक्‌ जनक्बीनेनदिवोपर पुरः 
चैषा दिये दीनी वद्र ह्मि न्दर र (पड़ते ) वनका दि, निन देरी 
एमन समद थी ह, ॥ ३ ॥ ~ । 





ॐ बारकाण्ड # २५९ 





असम समन वर वन घुहाए्‌ । पाव सच निन निस मम मपु ध 
निर भूतन सुख रुषि अलुकृे । सक वरातिनदर सेदि भू ॥ ४॥ 
ओर जक बारतके स च्ेग अपने-अपने मनकी पदक चुल सुहवने उत 
भोनन भिर ओर वल्ल पते ह 1 मनके अनुद मित्य नये परसो रेलकर समी 
अरापियोको अपने र भूष मे ॥ ४ ॥ 
दो-आवत ज्ञानि वरात बर सुनि गहगदरे निसान । 
सषि गज रथ पुदचर तुरग डेन चे भगवान ॥ ३०४ ॥ 
॥ मे ओर जते हुए नया्ोकी आवन घुनक्र भे ब्रारातको आती हई भनकर 
खगवानी करके हायी, एय, ैद> चौर वोदे ठन बारात कने चते ॥ ३०४ ॥ 
मापपरयण, दसा विश्राम 
चौ०-कनक कर भरि कोपर यारा ! माजन टित अनेके भकार ॥ 
भरे घु्षसम सब पकाने । कनः सौति न ला धाने ॥ 1 ५ 
[ पूष, शबैत, ठंडा, जल भादिसे ] भरकर सोनेके कदो, तथा मिनका बर्न 
नं हो सकरा पेरे अमृतके तमान मति भौतिके सव पकवानोसि भरे ह परत, याह 
आदि अनेकं प्रका सुन्दर तनः ॥ १ ॥ 
फ़ भक बर बत्तु घुहाई। हरषि भेर दित भूर पमदं५ 
भूम चसन स्ठामनि नाना । खग सर हय मय बहुनिषि जाना ॥ २ ॥ 
उत्तम फर तथा ओर भौ उतन्न इन्दर यल राजाने हित दोक भट कमि 
, भेर्जा | गहने, कपे, नाना रकी मूल्ययान्‌ मिव ( रख ) पी शट धोद, एषी 
` मौर व तरी मवा, ॥ २ ॥ 
मगर सगुन सुंघ सुदाए । भुवे भोति मषटिएाख पद्‌ ॥ 
धि चिररा उपहार भपारा । भरि मरि विरि चरे कारा ॥ ६॥ 
षा हव अक्त सगन्वव प्व वने मगर ओर सुनके परां नने 
भेन । दी, निदा भोर अगणित उपरर चीज करोम मर.मरर कहार चरे ॥ ३ ।| 
सगवानन्ह ` जब दलि धरराता । उर आनेदु एक मर भाता ॥ 
' दलि भाय सिरे अगवा तः ! सुदित घरारिन्दं एने निसान ॥ ४॥ 
अगवानी करनेवाले को भव॒ बारत दिखायी दी, त उनके हदवम भानन्द छ 
मया ओर शारीर रोमाशचते भर गया । अगदानाको सन-घनवेः साय देखकर याति्योने 
सल होकर नदे बजाय ॥ ४ ॥ <~ 
शे०--्यषि परसपर मिन ` दित _ कटुक चले बगमेख । 
१, ज॒ आनद" समुद दुर मिङ्त विदाई सयित ॥ २५५॥ 
` करती तथा अधवानमिरे | कु चग परसपर मिर्नेके स्मि षके = 
शोर (सण ) दीद चरे, ओः रेख भके भानो भरने दो षट मां भेक 
मिते तँ ॥ २०९ ॥ , , ॐ 
रं र म । चि वेड इ मदे ॥ 
बस्तु सकर रातौ नृप समं । बिनय कीनि तिन्दं अति रतुं ॥ १ ४ 
ˆ देवद पढ मरकर भीव गां री हैः चौरः देकवा आनन्दि कर नगे 
ती दे ।[ अगवानी मवि" ] उन शेति स्व चे दररय्के जगि कलु 
दौ ओर सतयन्त परेमने दिनी शरै ॥ ९ ॥ 
गऽ षर श्थ- 


४९८ # यामचरितमानसं # 





प्रे घम रा षडु छीन । मै वकस ताच्छनहि दन्हा ॥ 
: करि पूवा मान्यः वदद! ्मबते कँ च्छे उधार ॥३॥ 
रि दरयन्त सव वु ठ किर उन वसे शने सी 
सौर बे काको दे दी गयीं! तदनन्तर पूजा, धादरसकतार शीर बहदं कर 
खगतान होम उनको जनमासेक़ी बोर च्वि ऊ चले ॥ १॥ 
वसन्‌ विचित्र ॒पौददे परह । दै धनु घन मदु परिददौ ॥ 
अति संदर ीष्टेड समवासा ! रं सद दु सब भति सुपासा ॥ ६॥ 
विस वनो पनरे पड़ द ई, जिदं देखकर वेर भौ अपने घनक्ा भमिपान “ 
छो दते । मदा सुन्दर जनबाखा दिया गवा, र्ट दको सव प्रकारका रुमीता था ॥ २॥ 
जाती सि बरातं सुर आदं । कष निव महिमा परगरि जनां ॥ 
इवं भिरि सष सिद्धि बोरा । मूष॒प्हुनद॑ कलन पड ॥ ४॥ 
सीताभीने दात्र अ